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मार्कण्डेयउवाच

 ततःशुश्रावतंबद्धंतनयंसकरन्धमः। तस्यापत्नीतथावीराअन्येचापिमहीभृतः॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

इसके बाद श्रवीक्षित के वन्दी होजाने  समाचार महाराज करन्धम, उनकी पत्नी तथा अन्य राजाओं ने सुना ॥१॥

तमधर्मेणतनयंवद्धंश्रुत्वामहीपतिः। समन्तैःपृथिवीपालैश्चिरंदध्यौमहामुने॥२॥

हे क्रौष्टुकि मुनि ! राजा करन्धम ने सुना कि उनके पुत्र को अन्याय से राजाओं ने बाँध लिया है । इस पर वे विचारकरने लगे ॥ २ ॥

केचिदूचुर्महीपालाबध्याःसर्व्वेमहीभृतः। यैरेकःसंयुगेवद्धःसमस्तैस्तैरधर्म्मतः॥३॥

कुछ राजाओं ने आकर महाराज से कहा कि वे राजा जिन्होंने अधर्म से अकेले राजकुमार को बाँध लिया है कैद किये जाने केयोग्य हैं ॥ ३ ॥

युज्यतांवाहिनीशीघ्रसूचुरन्यैःकिमास्यते। विशालोवध्यतांदुष्टस्तत्रयेऽन्येसमागताः || ४

दूसरे राजाओं ने कहा कि श्राप चुप क्या बैठे है शीघ्र सेना को इकट्ठी कीजिये | और दुष्ट विशाल व उसके साथी राजाओं को 'पकड़िये ॥ ४ ॥

अन्येतथोचुर्धम्र्मोत्यक्तःपूर्वंमहीक्षितः। अन्यायेनवलाद्वयेनगृहीतातमवाञ्छती || ५

दूसरे राजाओं ने कहा कि राजाओं ने कुपित होकर धर्म इसलिये छोड़ा कि श्रवीक्षित अन्याय से उस कन्या को चलपूर्वक पकड़ लिया जो कि उसे अङ्गीकार नहीं कर रही थी ||५||

स्वयंवरेष्वशेपेषुतेनराजसुतास्तदा। खलीकृतास्ततःसर्व्वेसमेत्यसवशीकृतः॥६

और भी स्वयम्वरों में अवीक्षित ने राजकन्याओं को हरण किया है इसीलिये राजाओं ने एका करके उसे बाँध लिया है ॥ ६ ॥

तेषामेतद्वचःश्रुत्वावीरावीरप्रजावती। वीरगोत्रसमुद्भूतावीरपत्नीमहर्पिता। उवाचभर्तुःप्रत्यक्षमन्येपाश्चमहीक्षिताम्॥७

उनके ये वचन सुनकर वीर कुल में उत्पन्न वीर जननी, वीर रमणी महा- गनी बीग बहुत प्रसन्न हुई और दूसरे राजाओं के सामने अपने पति से बोलीं ॥ ७ ॥

भद्रंकृतंभद्रभुजाममपुत्रेणपार्थिवाः। गृहीतायदवलात्कन्याजित्वासर्व्वमहीक्षितः॥८

  हे राजाश्रो ! मेरे पुत्र ने सच राजाओं को जीतकर जो बलपूर्वक नेकन्याएं हरण की यह बहुत अच्छी बात है ॥ ८॥

तदर्थंयुध्यमानोऽयंयुद्धएकोनधर्मतः। तदप्यस्मत्सुतस्याजौमन्येनापचयमदम्॥६॥

उनके निमित्त कुछ करने से चाहे वह युद्ध न्याय पूर्वक न हुआ हो मैं अपने पुत्र की इसमें

कोई योग्यता नहीं देखती हूँ ॥६॥

एतदेवहिपौरुष्यंयदधर्म्मवशान्नरः। नीतिंनगणयत्येवंजिघांसुरिवकेशरी॥१०॥

पौरुप यही है कि येन केन प्रकारेण शत्रु को जीते, मारते समय सिंह नीति को नहीं सोचता ॥ १० ॥

स्वयंवरायविन्यस्ताममपुत्रेणकन्यकाः। वहंयोगृहीताभूपानांपश्यतामतिमानिनाम्॥११॥

मेरे पुत्र ने स्वयम्वर में याई हुई कन्याओं को अत्यन्त मानीराजाओं के देखते देखते चलपूर्वक ग्रहण किया है ॥११

कक्षत्रियकुलेजन्मकयाचाहीनसेविता। वलादेवसमादत्तेक्षत्रियोबलिनांपुरः॥१२॥

कहाँ तो क्षत्रिय कुल में जन्म ओर कहाँ हीनों द्वारा किये जाने वाली भिक्षावृत्ति ! बलवानों के

सामने क्षत्रिय ही बलपूर्वक कोई वस्तु ले सकताहै ॥ १२ ॥

लोहशृङ्खलावद्धावानवशंयान्तिकातराः। प्रसह्यकारिणोयान्तिराजानांधर्म्मशालिनः | १३||

लोहे की जंजीरों में वध कर भी क्षत्रिय वश में नहीं होते, वश में तो कायर होजाते हैं ।

धर्मात्मा राजा लोग भी कभी कभी हठ पूर्वक ऐसाकर लेते हैं || १३ |

तदलंदौर्मनस्येनश्लाघ्यमेवास्यवन्धनम्। युष्माकमप्यायुधानामङ्गमूर्द्धसुपातनम्॥१४॥

इसलिये श्रव चिन्ता करने से क्या है ? उसका बन्दी होना तो प्रशंसनीय है ।आप लोगों के हों तथा शिरों पर अस्त्र शस्त्र लगेहुए हैं ॥ १४ ॥ दुत्वैवपृथिवीशानांपृथ्वीपुत्रादिकंवसु। भार्य्याचार्य्यनिमित्तानिततोयातानिगौरवम्॥१५॥

हरण करनेही से राजाओं को पृथ्वी पुत्र, धन स्त्री आदि मिलती हैं, और इन वस्तुओं

को प्राप्त करने से ही उनका गौरव बढ़ता है॥ १५ ॥

तत्त्वर्य्यतांरणायाशुस्यन्दनान्यधिरोहत। सज्जीकुरुतनागाश्वमचिरेणससारथिम्॥१६॥

इसलिए रस के निमित्त शीघ्रता से रथों पर सवार होइये तथा घोड़ों और हाथियों को उनके घाहकों

सहित तयार होने की आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥

मन्यध्वंकिंमहीपालैर्बहुभिःसहविग्रहम्। प्रभूताएवतोषायशूरस्याल्परणेक्रियाः॥१७॥

क्या श्राप नहीं मानते कि युद्ध बहुत से राजाओं के साथ हो

गा और उस युद्ध में वहुत-से राजाओं को अपनी वीरता से संतुष्ट करना पड़ेगा. ॥१७॥ कस्यनाल्पेषुसामर्थ्यंनरेन्द्रादिषजायते।

येभ्यो न विद्यते भीतिः कातरस्यापि शत्रुषु ॥ १८

थोड़े से युद्ध में कौन से राजा ऐसे हैं जो अपना जौहर नहीं दिखलाते ? वीर चे ही हैं जो शत्रुत्रों से नहींडरते हैं ॥ १८ ॥

व्याप्तलोकान्समस्तान्योह्यभिभूययतोनरः। व्यरोचतेतिशूरःसतमांसीवदिवाकरः || १६ ||

शूरवीर लोग सबको अपने वश मैं करके अपना प्रकाश उसी प्रकार सब लोकों मेंफैलाते हैं जिस प्रकार कि सूर्य अन्धकार को हटा कर प्रकाश फैलाते हैं ॥ १६ ॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्यमुद्धर्षितोराजाऽनयापत्न्याकरन्धमः। चकारसवलोद्योगंहन्तुंपुत्राहितान्मुने ||२०||

मार्कण्डेयजी बोले:

हे मुनि ! जब रानी वीरा ने महाराध करन्धम को इस प्रकार समझाया तव उन्होंने अपने पुत्रके

शत्रुओं को मारने के लिये सेना तयार की ॥ २० ॥

ततस्तस्यसमंभूपैर्विशात्लेनचसङ्गरः। बभूववद्धपुत्रस्यतैरशेषैर्महामुने॥२१॥

हे महामुनि कौटुकिजी ! तब उनमें और वीक्षित को वन्दी करने वाले विशाल के साथी राजाओं मेंघोर युद्ध होने लगा ॥२१॥

दिनत्रयमभूत्युद्धंतेनराज्ञासमंतदा। करन्धमेनभूषानांविशालस्यानुकुर्व्वताम् ||२२||

राजा विशालके समर्थक राजाओं के साथ महाराज करन्धम का तीन दिन तक युद्ध होता रहा ||२२||

यदापराजयमायंतंसर्व्वंभूपमण्डलम्। तदाविशालोऽयकरःकरन्धममुपास्थितः ||२३||

जब वे सब राजा लोग करीब करीब परास्त होचुके तव राजा विशालअर्ध्य लेकर महाराज करन्धम के सम्मुख उपस्थितहुए ||२३||

करन्धमोऽपिसम्प्रीत्यातेनराज्ञाभिपूजितः। चिमुक्तेतनयेतत्रनिशांतांसुखमावसत् ||२४||

राजा विशाल से पूजित होकर महाराज करन्धम बड़े प्रसन्न हुए और पुत्र के छूट जाने पर

उन्होंने वह रात्रि वहाँ ही सुख से विताई ॥ २४॥

ताञ्चकन्यामुपादायविशालेसमुपस्थिते। अवीक्षित्प्राहविमर्षेविवाहार्थंपितुःपुरः ||२५||

है विप्रर्षि ! विवाह के लिये उस कन्या को लेकर राजा विशाल के उपस्थित होने पर अवीक्षित ने

अपने पिता के सन्मुख विशाल से कहा ॥ २५ ॥

नाहमेतांग्रहीष्यामिनचान्यांयोषितंनृप। परैर्यस्यानिरीक्षन्त्याःसंग्रामेऽहंपराजितः ||२६||

  हे राजन् ! मैं अब इसको अथवा किसी दूसरी स्त्री को भी ग्रहण न करूँगा क्योंकि मैं इसके सामने युद्ध में परास्त हुआ हूँ ||२६||

अन्यस्मैसम्प्रयच्छेमामियञ्चान्यंदृणोतुतम्। अखण्डितयशोवीय्योंयःपरैर्नापिमानितः ||२७||

 इस कन्या का किसी दूसरे ऐसे पुरुष के साथ विवाह कर दीजिये जिसका यश और पराक्रम अखण्डित हो और जो किसी के द्वारा अपमानित न किया गया हो ॥२७॥

परैःपराजितोऽहंयदकातरेयंयथाऽवला। किमन्त्रमानुषत्वंमेनतस्याममचान्तरम् ||२८||

मैं दूसरों से पराजित किया हुआ हूँ इसलिये यह अवला दुःखित होगी । सुझमें मनुष्यत्व ही क्या

है ? मुझ में और इसमें बड़ा अन्तर है ॥२८॥

स्वतन्त्रतामनुष्याणांपरतन्त्रासदावला। नरोऽपिपरतन्त्रोयस्तस्यकीदृङ्मनुष्यता ||२६||

पुरुषस्वतन्त्रहोतेहैंतथास्त्रियाँश्रवलाहोनेकेकारण. परतन्त्रहोतीहैं।परन्तुजहाँपुरुषभीपरतन्त्रहो : वहाँमनुष्यताहीक्यारहगई१॥२६॥

सोऽहमस्यासुखंभूयोदृष्टंदर्शयिताकथम्। योऽहमस्याःपुरोभूमौपरैर्भूपैःखिलीकृतः ||३०||

जो किइसके सामने ही मुझे राजाओं ने परास्त करके पृथ्वी पर गिरा दिया इसलिये मैं किस प्रकार इसका मुख देखूं और अपना इसे दिखाऊँ ॥ ३० ॥

इत्युक्तेतेनतनयामुवाचजगतीपतिः। श्रुतंतेवचनंवत्सेवदतोऽस्यमहात्मनः॥३१॥

श्रवीक्षित के ऐसा कहनेपर राजा विशालने अपनीकन्या से कहा, "हे वत्सं ! जो कुछ महात्मा श्रवी-

चित ने कहा वह तुमने सुना या नहीं ?” ॥३१॥

वरयान्यंपतिंतत्रमनस्तेरमतेशुभे। वयंवासंप्रयच्छामोयस्मिंस्तस्मिंस्तवादृताः। एतयोर्येकमातिष्ठमार्गयोरुचिरानने॥३२

 हे शुभे श्रव तुम किसी दूसरे पुरुष को जिसको कि तुम चाहो वरलो अन्यथा जिसको हम कहें उसको अपना पति चुनो । हे सुन्दर मुखवाली ! इन दोनों मार्गों में से एक मार्ग का अवलम्बन करो ||३२|| कन्योवाच

पराजितोऽयंबहुभिर्नसम्यक्सम्यगाचरन्। 'संग्रामेयद्वयशोवी- हानिकारिणिपार्थिव ||३३||

कन्या चोली:--

हे पिता ! यह बहुत से राजाओं द्वारा अकेले परास्त हुए हैं, इस कारण युद्ध में इनके यश और

पराक्रम की हानि नहीं समझी जायगी ॥३३॥

एकोबहूनांयुद्धायगतानामिवकेशरी। यत्संस्थितःपरंशौर्य्यंतेनास्यप्रकटीकृतम् ||३४||

यह अकेले ही युद्ध में उन सब के सामने सिंह की तरह डटे रहे इससे ही इनकी वीरता प्रगट होगई ||३४||

नकेवलमयंतस्थौयुद्धेतेऽप्यखिलाजिताः। बहुशोऽनेनयत्तेनविक्रमोऽपिप्रकाशितः ||३५||

उन राजाओं ने ही केवल इनको नहीं जीता है वरन ! इन्होंने भी कई बार उनको जीता है इसलिये इनका । पराक्रम तो स्पष्ट ही है ॥ ३५ ॥

शौर्य्यविक्रमसंयुक्तमिमंसर्व्वमहीक्षितः। धर्म्मयुद्धमधर्मेणजितवन्तोऽत्रकात्रपा॥३६

शौर्य और पराक्रमसे युक्त इनको यदि सव राजाओं ने धर्मयुद्ध में अधर्म से जीत भी लिया तो इसमें इनके लिये कौन-सी लज्जा की बात है ||३६||

नचापिरूपमात्रेऽहंलोभमस्यगतापितः। शौर्य - विक्रम - धैय्र्याणिहरन्त्यस्यमनोमम ||३७||

हे पिता ! मैं इनके रूप से ही इन पर श्रासक्त नहीं हूँ । इनके शौर्य, पराक्रम और धैर्य ने मेरे मन को हरण कर लियाहै ॥ ३७ ॥

तत्किमुक्तेनबहुनायांच्यतांमत्कृतेनृपः। त्वयामहानुभावोऽयंनान्योमेभवितापतिः॥३८॥

हे पिता ! बहुत कहने से क्या है, तुमतो इनसे मेरे लिये प्रार्थना करो । इनके सिवाय कोई

दूसरा मेरा पति नहीं होसकता है ॥ ३८ ॥ विशालउवाच

राजपुत्रसुताप्राहममैतच्छोभनंवचः। एवञ्चैवत्वयातुल्यःकुमारोनमहीतले॥३६

विशाल बोले:-

हे राजकुमार ! मेरी पुत्री ने कितने सुन्दर वचन कहे है | आपके समान पराक्रमी राजकुमार

दूसरा इस पृथ्वी पर नहीं है ॥ ३६ ॥

विसंवादितेशांतीवचपराक्रमः। पावयास्मत्कुलंवीरदुहितुर्भेपरिग्रहात् ||४०||

श्रापका शौर्य है । हे वीर ! मेरी कन्याका पाणिग्रहण करके हमारे कुलको पवित्र करो || ४०॥ राजपुत्रउवाच

नाहमेतांग्रहीष्यामिनचान्यांयोषितंनृप। श्रात्मन्येवहिमेबुद्धिःस्त्रीमयीमनुजेश्वर॥४१॥

राजपत्र वोलेः

हे राजन् ! न तो मैं इसको ग्रहण करूँगा और किसी अन्य पनी को । कारण कि इसस्वयं मैं स्त्रीवत् होरहा हूँ ॥ ४१ ॥ मार्कण्डेयउवाच

ततःकरन्धमःप्राहपुत्रेयंगृह्यतांत्वया। विशालतनयासुभ्रस्त्वयिहार्दवतीदृढम्॥४२॥

मार्कण्डेयजी बोले-

तब महाराज करन्धम बोले, हे पुत्र ! विशाल की पुत्री इस सुन्दरी कन्याको ग्रहण करो, क्योंकि

यह तुम्हारी प्रीति में दृढ़ है ॥४२॥ राजपुत्रउवाच

नाज्ञाभङ्गःकदाचित्तेकृतपूर्ध्वोमयाप्रभो। तथाज्ञापय मां तात यथाज्ञां करवाणि ते ||४३||

राजकुमारबोले:- हेप्रभो ! मैंनेपहिलेकभीआपकीआज्ञा उल्लंघननहींकियाहै।अतःआपमुझेऐसी आज्ञादेंजिसकोकि मैंभङ्गनकरसकूं॥४३॥ मार्कण्डेयउवाच

अत्यन्तनिश्चितमतौतस्मिन्राजसुतेसुताम्। तामुवाचविशालोऽपिव्याकुलीकृतमानसः॥४४॥

मार्कण्डेयजी बोले-

राजकुमार वीक्षित का अत्यन्त निश्चित मत जानकर राजा विशाल ने व्याकुल होकर अपनीपुत्री से कहा ॥ ४४॥

निवर्त्यतांमनःपुत्रिएतस्माच्चप्रयोजनात्। अन्यंवरयभर्त्तारंसन्त्यनेकेनृपात्मजाः।४५।।

 हे पुत्री ! श्रय तू अपना मन इनकी ओर से.. हटाले । किसी दूसरे पुरुष को  अपना पति चुन ले, संसार में बहुत-से राजकुमार है ||४५|| कन्योवाच

वरंवृणोम्यहंतातमापयदिनेच्छति। तपसोऽन्योनमेभर्त्ताजन्मन्यस्मिन्भविष्यति॥४६

कन्या बोली:-

हे पिता ! मैं इन्हीं को अपना पति बनाऊँगी, यदि वे मुझको न चाहेंगे तो मैं तप करूँगी । इस.

जन्म में कोई दूसरा पुरुष मेरा पति नहीं होगा ||४६|| मार्कण्डेयउवाच

उत: करन्धमोराजाविशालेनसमंमुदा। स्थित्वादिनत्रयंतत्रनिजमभ्याययौपुरम् ||४७||

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर महाराज करन्धम प्रसन्नता पूर्वक राजा विशाल के यहाँ तीन दिन ठहर कर अपने नगरकोगये ॥ ४७ ॥

वीक्षितोऽपितेनैवपित्राऽन्यैश्चनराधिपैः। नदर्शनैःपुरावृत्तैःसान्त्वितोऽभ्यागमत्पुरम् ||४८

जंव वीक्षित को उनके पिता तथा अन्य राजाओं ने बहुत ऊँच नीच समझाया तो वें

भी उनके साथ अपने नगर को गये ४८

तापिकन्यावनंगत्वानिसृष्टानिजवान्धवैः। उपस्तेपेनिराहारावैराग्यंपरमास्थिता॥४६

वह कन्या भी अपने बन्धु बांधवों को छोड़ कर बनको गई और वहाँ वैराग्य में स्थित होकर निराहार रहकर तप करने लगी ॥४६॥

निराहारायदासातुमासत्रयमवस्थिता। सम्प्रापपरमामार्त्तिकृशाधमनिसन्तता॥५०

वह तीन महीने तक निराहार रही और इससे वह अत्यन्त कृश होगई. तथा उसने बहुत कष्ट उठाया ॥ ५० ॥

नन्दोत्साहातितन्त्रङ्गीमुमूर्षुरपिवालिका।

देहत्यागायसाचक्रेतदाबुद्धिंनृपात्मजा ||११||

वह बालिकाउत्साहरहित होकर मृतप्राय होगई। फिर उस राजकुमारी ने देह त्यागने का विचार किया ॥ ५१ ॥

श्रात्मत्यागायतांज्ञात्वाकृतबुद्धिंसुरास्ततः। समेत्यप्रेषयामासुर्देवदूतंतदन्तिकम्॥५२॥

जब देवताओं ने यह जाना कि वह आत्मघात करने. पर उद्यत है तो उन्होंने इकट्ठे होकर एक देवदूत को उसके पास भेजा ॥५२॥

नमुपेत्यसतांग्राहदूतोऽहंपार्थिवात्मजे। पितस्त्रिदशैस्तुभ्यंयत्कार्य्यंतन्निशामय || ५३ ||

वह दूत उसके पास आकर बोला, "हे राजकुमारी ! सुझे तुम्हारे पास देवताओं ने भेजा है, अव जो कार्य है वह सुनो ॥५३

नभवत्यापरित्याज्यंशरीरमतिदुर्लभम्। वंभविष्यसिकल्याणिजननीचक्रवर्त्तिनः || ५४ ||

श्राप इस दुर्लभ शरीर को न छोड़े । हे कल्याणि ! तुम चक्रवर्ती महाराज की माता होगी ||५४||

पुत्रेणचमहाभागेभोक्तव्यानिहतारिणा। अव्याहताज्ञेनचिरंसप्तद्वीपवतीमही॥५५

हे महाभागे ! आपका पुत्र अपने शत्रुओं को मार कर सातद्वीपों से युक्त पृथ्वी का अखण्ड राज्य करेगा।।५५

इन्तव्यस्तेनतरुजिद्देवानांपुरतोरिपुः। प्रयःशंकुस्तथाक्रूरोधर्मेस्वाप्यास्ततःप्रजाः॥५६

वह पुत्र देवताओं के सामने शत्रु तैरुजित् तथा दुष्ट श्रयःशंकु को मार कर प्रजात्रों को धर्म में

स्थित करेगा ॥५६॥

रिपालनीयमखिलंचातुर्व्वर्यंस्वधर्म्मतः। न्तव्यादस्यवोम्लेंच्छायेचान्येदुष्टचेष्टिताः॥५७.

वह चारों वर्णोंको अपने २ धर्म में स्थित कर उनका पालनकरेगा तथा चोर, म्लेच्छ'

और दुष्टों का वध करेगा ||५७|

क्रव्यंविविधैर्यज्ञःसमाप्तवरदक्षिणैः।

वाजिमेधादिभिर्भद्रे पट्सहस्रश्च संख्यया । ५८ ||

 |हेभद्रे ! वहअनेकों यज्ञकरेगातथाउनयज्ञोंकोउत्तमदक्षिणाऐं: तथा दान देकर समाप्त करेगा । वह अश्वमेधादि छः हज़ारयक्षकरेगा॥५८॥ मार्कण्डेयउवाच

तंदृष्ट्वासान्तरीक्षस्थंदिव्यखगनुलेपनम्। देवदूतमुवाचेदंराजपुत्रीततोमृदुः॥५६

मार्कण्डेयजी बोले-

आकाश में स्थित तथा दिव्यमाला पहिने और चन्दन लगाये उस देवदूत को देखकर राजकन्या

कोमल वाणी से यह वचन बोली ॥ ५६ ॥

सत्यंत्वमागतःस्वर्गाद्देवदूतोनसंशयः। किन्तुभर्त्राविनापुत्रःसकथंमेभविष्यति॥६०॥

 हे देवदूत  तुम स्वर्ग से श्राये हो, यह निस्संदेह सत्य हैपरन्तु पति के बिना मेरे पुत्र किस प्रकार होगा ||६० ॥

अवीक्षितमृतेभर्त्ताममनान्योऽत्रजन्मनि। भवितेतिप्रतिज्ञातंमयैतत्सन्निधौपितुः॥६१

मैंने अपने पिता के सामने प्रतिज्ञा की है  कि श्रंवीक्षित को छोड़कर इस जन्म में मेरा कोई दूसरा पति न होगा ॥ ६१ ॥

सचनेच्छतिमांमोक्तोमत्पित्राजनकेनच। करन्धमेनाथसम्यग्याचितथमयातथा॥६२॥

यद्यपि मेरे पिता विशाल तथा उसके पिता राजा करन्धम ने उससे कहा है तथा मैंने प्रार्थना की है तो भी वह मुझे नहींचाहता है ||६२ || देवदूतउवाच

किमनेनमहाभागेबहुनोक्तेनतेसुतः। समुत्पत्स्यतिमात्याक्षीस्त्वमात्मानमधर्म्मतः॥६३

देवदूत वोला. --

हे महाभागे ! वहुत कहने से क्या ? तुम्हारे  पुत्र अवश्य होगा, तुम धर्म से अपने शरीर कोन त्यागो ॥ ६३ ॥

अत्रैवकाननेतिष्ठतनुंक्षीणाञ्चपोषय | तपःप्रभावादेतत्तेसर्व्वंसाधुभविष्यति॥६४

तुम इसी वन में रहो और अपने कृश शरीर को पोषण करके स्वस्थ करो । तपस्या के प्रभाव से तुम्हारा कल्याण होगा ॥६४॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्त्वा"देवदूतोऽसौयथागतमगच्छत। चकारानुदिनं सुभ्रूः साप्यात्मतनुपोषणम् ||६५||

मार्कण्डेयजीबोले- यहकहकरवहदेवदूतजहाँसेआयाथा वहाँचलागयाऔरवहराजकुमारीभीदिन प्रतिदिनअपनेश रीरकापोषणकरनेलगी॥६५॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंअवीक्षितचरित्र (३) नाम१२४वांअ०स०।