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मार्कण्डेय उवाच

शैलेषुमन्दराद्येषुचतुर्ध्वेवद्विजोत्तम। वनानियानिचत्वारिसरांसिचनिवोधमे॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले

हे द्विजोत्तम ! मन्दरादिक चारों पर्वतों में जो चार वन और चार सरोवर हैं उन्हें मुझसे सुनिये॥१ ॥

पूर्व्वंचैत्ररथंनामदक्षिणेनन्दनंवनम् | वैभ्राजंपश्चिमेशैलेसावित्रंचोत्तराचले || २ ||

पूर्व में चैत्ररथ, दक्षिण में नन्दनवन, पश्चिम में वैधांज और उत्तर में सावित्र नामका वन है॥२॥

अरुणोदंसरःपूर्वंमानसंदक्षिणेतथा।

शीतोदं पश्चिमे मेरोर्महाभद्रं तथोत्तरे || ३ ||

पूर्वी पर्वत पर अरुणोद, दक्षिण में मानस, पश्चिम मैं शीतोद और उत्तर में महाभद्र नाम का सरोवरहै ॥ ३ ॥

शीतार्त्तश्चक्रमुञ्जश्चकुलीरोऽथसुकङ्कवान्। मणिशैलोऽथनृपवान्महानीलोभवाचलः॥४

शीतार्त्त, चक्रमुंज, फुलीर, खुपङ्कवान्, मणिशैल वृपवान्, महानील, भवाचल ||४||

सविन्दुर्मन्दरोवेणुस्तामसेोनिपवस्तथा। देवशैलश्चपूर्वेणमन्दरस्यमहाचलः॥५

सर्विदु,मन्दर, वेणु, तामस और निषेध और देवशैल, ये महापर्वत ये मन्दराचल के पूर्व की ओर हैं ॥ ५ ॥

त्रिकूटशिखराद्रिश्चकलिङ्गोऽथपतङ्गकः। रुचकःसानुमांश्चाद्रिस्ताम्रकोऽथविशाखवान् || ६

त्रिकूट, शिखराद्रि, कलिङ्ग, पतंग, रुचक, सानु- मान्, ताम्रक, विशाखवान् ॥ ६ ॥

श्वेतादरःसमूलश्चवसुधारश्चरत्नवान् एकशृङ्गोमहाशैलाराजशैलःपिपाठकः॥७

श्वेतादर, समूल,वसुधार, रत्नवान्, महाशैलं  एक शृङ्ग, शैलराजपिपाठक ॥ ७ ॥

पञ्चशैलोथकैलासाहिमवांश्चाचजोत्तमः। इत्येतेदक्षिणेपार्श्वेमेरोःप्रोक्तामहाचलाः॥८

श्रर पर्वतश्रेष्ठ पञ्चशैल, कैलाश हिमालय ये महापर्वत मेरु की दक्षिण दिशा में हैं॥८॥

सुरक्षःशिशिराक्षश्चवैदूर्य्यःपिङ्गलस्तथा। पिजरोऽथमहाभद्रःसुरसःकपिलोमधुः॥९॥

सुरक्ष, शिशिराक्ष, वैदूर्य, पिंगल, पिंजर, महाभद्र, सुरस, कपिल, मधु ॥९॥

अजनःकुकुटःकृष्णःपाण्डुरश्चाचलेोत्तमः।

हस्रशिखरश्चाद्रिः पारिपात्रः सभृङ्गवान् ॥ १०

अञ्जन, कुक्कुट,कृष्ण, पर्वतश्रेष्ठ पाण्डुर,  सहस्र शिखर और शृङ्गवान् पारिपात्र पर्वत ॥ १० ॥

 पश्चिमेनतथामेरोर्विष्कम्भात्पश्चिमाद्वहिः। एतेऽचलाःसमाख्याताःशृणुष्वान्यांस्तथोत्तरान्११

ये मेरु की पश्चिम दिशा में पश्चिमी, विष्कम्भ के बाहिर हैं।  इनपर्वतों के बाद श्रव और उत्तर पर्वतों को सुनिये॥ ११ ॥

शङ्खकूटाऽथवृषभोहंसनाभस्तथाचलः। कपिलेन्द्रस्तथाशैलःसानुमान - नीलएवच॥१२॥

शंखकूट, वृषभ, हंसनाभ पर्वत, कपिलेन्द्र पर्वत तथा सानुमान और नील ॥१२॥

स्वर्णशृङ्गीशातशृङ्गीपुष्पकोमेघपर्व्वतः। विरजाक्षोवराहाद्रिमयूरोजारुधिस्तथा॥१३॥

और स्वर्ण-शृङ्गी, शातशृङ्गी, पुष्पक, मेघपर्वत, विरजाक्ष, वराहाद्रि, मयूर, जारुधि ॥१३॥

इत्येतेकथिताब्रह्मन्मेरोरुत्तरतोनगाः। एतेषांपर्व्वतानान्तुद्रोण्येोऽतीवमनोहराः॥१४

हे ब्रह्मन् ! ये पर्वतःमेरु के उत्तर में स्थित हैं ।  इन पर्वतोंकी घाटियां:अत्यन्त मनोहर हैं ॥ १४ ॥

वनैरमलपानीयैःसरोभिरुपशोभिताः 1 तासुपुण्यकृतांजन्ममनुष्याणांद्विजोत्तम।१५ ||

वे घाटियां वनों और निर्मल जल वाले सरोवरों से सुशोभित हैं ।  हेद्विजोत्तम ! उनमें धर्मात्मा लोगों का जन्म होता है||१५||

एतेभौमाद्विजश्रेष्ठस्वर्गाःस्वर्गगुणाधिकाः। ६नतासुपुण्यपापानामपूर्व्वाणामुपार्जनम्॥१६

हे द्विजश्रेष्ठ ] ये स्वर्गसे भी अधिक गुणवालेपृथ्वी के स्वर्ग हैं। इनमें पुण्य पापों की वृद्धि नहींहोती है ॥ १६ ॥

पपुण्योपभोगाएवोक्तादेवानामपितावपि।

शीतान्ताद्येषु चैतेषु शैलेषु द्विजसत्तम ॥१७॥

विद्याधराणां यक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।

देवानाञ्च महावासा गन्धर्व्वाणाञ्च शोभनाः॥ १८

हे द्विजोत्तम! इनमें देवताओं के पवित्र उपभोग भी उपस्थित हैं और इन शीतांता- दिक पर्वतोंमें विद्याधर, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता और गन्धर्वों के सुन्दर २. निवास स्थान हैं॥ १७-१८ ॥

महापुण्यामनोज्ञैश्चसदेवेापवनैर्युताः।। सरांसिचमनोज्ञानिसर्व्वर्त्तुसुखदाऽनिलः॥१६॥

 जो कि बड़े पवित्र हैं और मनोहर उप- वनों से युक्त हैं। वहाँ मनोहर सरोवर हैं तथा सब

ऋतुओं में सुख देने वाली वायु चलती रहती है।।१९॥

नचैतेषुमनुष्याणांवैमनस्यानिकुत्रचित्। तदेवंपार्थिवंपद्मंचतुष्पत्रंमयोदितम् ||२०||

इनमें कहीं पर मनुष्यों को दुःख नहीं होता, इस प्रकार मैंने चार पत्र वाला पृथ्वी कमलः चतलादिया || २०||

भद्राश्वभारताद्यानिपत्राण्यस्यचतुर्दिशम्। भारतंनामयद्वर्षंदक्षिणेनमयोदितम्॥२१॥

इसके चारों ओर भद्राश्व भारतादिक,चार पत्र हैं ।  भारतवर्ष जो मैंने दक्षिण की ओरवतलाया है ॥ २१ ॥

तत्कर्म्मभूमिर्नान्यत्रसम्प्राप्तिःपुण्य-पापयेोः। एतत्प्रधानंविज्ञेयंयत्रसर्व्वंप्रतिष्ठितम् ||२२||

यही कर्मभूमि है, अन्यत्र नहींयहाँ पुण्य-पाप की प्राप्ति होती है इसे ही प्रधानसमझना चाहिये क्योंकि इसी में सवं निहित हैं ॥२२

तस्मात्स्वर्गापवगैौचमानुष्यनारकावपि। तिर्य्यक्त्वमथवाप्यन्यत्नरःप्राप्नोतिवैद्विज॥२३

  हे द्विज ! इसी भारतवर्ष से मनुष्य स्वर्ग, मोक्ष, नरक, पक्षि योनि अथवा और योनि भी प्राप्तकरता है ॥ २३ ॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंभुवनकोषनाम५श्वाँअध्यायसमाप्त |