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मार्कण्डेय उवाच

ततःसहतयासोऽथररामगिरिसानुपु।

फुछकाननहृद्येषुमनोज्ञेषुसरःसुच॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले

वह गन्धर्व वरूथिनी के साथ पहाड़ों, किनारों, फूलेहुएवनोंऔरमनोहरसरोवरोंमेंबिहारकरनेलगा॥१॥

कन्दरेषु च रम्येषु निम्नगापुलिनेषु च । मनोज्ञेषुतथान्येषुदेशेषुमुदितोद्विज॥२

हे ब्राह्मण ! वह रमणीक कन्द-रात्रों, नदियों के किनारों तथा  अन्य मनोहर देशोंप्रसन्नहोकररमणकरनेलगा॥२॥

वह्निनाधिष्ठितस्यासीद्यद्रूपंतस्यतेजसा।

अचिन्तयद्भोगकालेनिमीलितविलोचना॥३

 उससे भोग के समय वरूथिनांखें बन्द कर लेती और अनि से अधिष्ठित  उस ब्राह्मण की तेजमयी मूर्ति काध्यान करती ॥ ३ ॥

ततः कालेन सा गर्भमवाप सुनिसत्तम । गन्धर्व्ववीर्य्यतोरूपंचिन्तनाञ्चद्विजन्मनः॥४

 हे कौटुकि सुनि ! कुछ कालमें ब्राह्मणरूपी गन्धर्व के वीर्य से वरूथिनी ने गर्भप्राप्तकिया॥४॥

तांगर्भधारिणींसोऽथसान्त्वयित्वावरूथिनीम्। विप्ररूपधरोयातस्तयाप्रीत्याविसज्जितः॥५

उस गर्भवती वरूथिनी को सान्त्वना देकर ब्राह्मण रूपधारी  वह गन्धर्व प्रीति पूर्वक विसर्जित होगया ॥ ५॥

जज्ञेसबालोद्यतिमान्ज्वलन्निवविभावसुः। स्वरोचिर्भिर्यथासूय्योंभासयन्सकलादिशः || ६

गर्भ की अवधिपूर्ण होने पर जिस प्रकार सूर्य सकल दिशाओंकोप्रकाशित करते हैं उसी प्रकार कान्तिमान् एक पुत्रउत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥

स्वरोचिर्भिर्यतोभातिभास्त्रानिवसबालकः। ततःस्वरोचिरित्येवंनाम्नाख्यातोबभूवसः॥७॥

जिस प्रकार अपने तेज से सूर्य प्रकाशमान होते हैं उसी प्रकार वह चालक तेज युक्त हुआ । इसी कारण वह स्वरोचि नाम से -विख्यात हुआ ॥ ७ ॥

वधेचमहाभागोवयसानुदिनंतथा। गुणौधैश्चयथाबालःकलाभिःशशलाञ्छनः॥८

जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी कलात्रों से दिन दिन बढ़ता है उसी प्रकार वह वालक अवस्था तथा गुणों में दिन प्रति दिन बढ़नेलगा ॥ ८ ॥

सजग्राहधनुर्वेदंवेदांचैवयथाक्रमम्। विद्याचैवमहाभागस्तदायौवनगोचरः॥६॥

वह भाग्यवान् चालक धनुर्वेद, वेद तथा क्रम से विद्याओं को पढ़कर यौवन सम्पन्न हुआ ||९

मन्दराद्रौकदाचित्सविचरंश्चारुचेष्टितः। ददशैकांतदाकन्यांगिरिप्रस्थेभयातुराम् ||१०||

मन्दराचल पर्वत पर विचरते हुए उसने भयभीतहुई एक कन्या को पर्वतीय प्रदेश में देखा ॥ १० ॥ .मार्कण्डेयपुराण त्रायस्वेतिनिरीक्ष्यैनंसातदावाक्यमब्रवीत्। माभैषीरितिसमाहभयविप्लुतलोचनाम्॥११॥

वह इसको देखकर वोली कि मेरी रक्षा करों । इसपर वह उस कन्या से जिसकी भय से अांखें बन्दहो रहीं थीं बोला कि तुम मत डरो ॥ ११ ॥

किमेतदितितेनोक्तेवीरवाक्येमहात्मना। ततःसाकथयामासश्वासाक्षेपप्लुताक्षरम्॥१२

उस महात्मा स्वरोचिष के वीरता युक्त यह पूछने पर कि क्या बात है उसने श्वास लेते हुए स्पष्टअक्षरों में कहा ॥१२॥

कन्योवाच

श्रहमिन्दीवराक्षस्यसुताविद्याधरस्यवै। नाम्नामनोरमाजातासुतायांमरुधन्वनः || १३

कन्या बोली-

मैं इन्दी वराक्ष नाम विद्याधरकी बेटी मनोरमाऔर मेरी माँ मरुधन्वा की बेटी है ॥ १३ ॥

मन्दारविद्याधरजासखीममविभावरी। कलावतीचाप्यपरासुतापारस्यवैमुनेः॥१४

मेरी विभावरी नामक सखी मन्दार विद्याधर की पुत्री हैश्रीर दूसरी कलावती पारमुनि की कन्या है ॥१४॥

ताभ्यांसहमयायातंकैलासतटमुत्तमम्। तत्रदृष्टोमुनिःकश्चित्तपसातिकृशाकृतिः। क्षुत्क्षामकण्ठोनिस्तेजादूरपाताक्षितारकः॥१५॥

उन दोनों के साथ उत्तम कैलाश तट पर घूमते हुए वहाँ मैंने एक मुनि को देखा जिनकी श्राकृति

तपस्या से प्रति क्षीण और निस्तेज होगई थी, तथा जिनका कण्ठ भूख प्यास से सूखा हुआ औरआँखें गढ़ में घुसी हुई थीं ॥१५॥

मयावहसितःक्रुद्धःसतदामांशशापह। क्षामक्षामस्वरःकिञ्चित्कम्पिताधरपल्लवः ||१६||

उनको देखकर मुझे हंसी आ गई जिससे उन्होंने क्रोधित होकर मुझे कमज़ोरी से काँपते हुए स्वर और होठों सेशाप दिया || १६||

त्वयावहसितोयस्मादनायेंदुष्टतापसि। तस्मात्त्वामचिरेणैवराक्षसोऽभिभविष्यति॥१७॥

 हे दुष्टे | जो कि तू मुझे देखकर हंसी है इसलिये बहुत शीघ्र तुमको एक राक्षसेभक्षण करेगा ||१७||

दत्तेशापेमत्सखीभ्यांसतुनिर्भत्सितीमुनिः। धिक्तेब्राह्मण्यमक्षान्त्याकृतंतेनिखिलंतपः॥१८

मुझे शाप देनेपर मेरी सखियों ने मुनि की निन्दा की और कहा कि तुम्हारे ब्राह्म-

त्वको धिकार है कि तुम में क्षमा नहीं है, तुमनेवृथा ही तप किया ||१८||

मर्पणैर्धर्पितोऽसितपसानातिकर्शितः। क्षान्त्यास्पदंवैब्राह्मण्यंक्रोधसंयमनंतपः॥१६॥

मालुम होता है कि तुमक्रोध से ही क्षीण होरहें हो तपसे नहीं ।  क्षमावान्होना ही ब्राह्मणत्व है और क्रोध को नियन्त्रणकरना तप है ॥१६॥

एतच्छ्रुत्वाददौशापंतयोरप्यमितद्युतिः। एकस्याःकुष्ठमङ्गेषुभाव्यन्यस्यास्तथाक्षयः॥२०

यह सुनकर उस श्रमित तेजखी मुनि ने उन दोनों को भी शाप दिया कि एक को कुष्ट और दूसरी को क्षय रोग होगा ॥ २० ॥

तयोस्तथैवतज्जातंयथोक्तंतेनतत्क्षणात्। ममाप्येवंमहद्रक्षःसमुपैतिपदानुगम्॥२१

उसकेउसी क्षण कहते ही वे दोनों कुष्ट और क्षय रोगसेग्रसित होगईं और मेरे पीछेभी यह महान राक्षसचला याता है ॥ २१ ॥

नशृणोषिमहानादंतस्यादूरेऽपिगर्ज्जतः। तृतीयमद्यदिवसयन्मेपृष्ठनमुञ्चति ||२२||

क्या आप उसके गर्जनेकी आवाज को नहीं सुनते हैं ?  श्राज तीन दिनसेयह मेरा पीछा नहीं छोड़ता है ॥ २२ ॥

ग्रामस्यसर्व्वस्यहृदयग्राहमद्यते। तंप्रयच्छामिमांरक्षरक्षसोऽस्मान्महामते॥२३॥

मेरे पाससम्पूर्ण स्त्रों का हृदय मौजूद है "। हे महामते । इसको मैं थापको देती हूँ, आप इस राक्षससे मेरीरक्षा करें ॥ २३ ॥

प्रादात्स्वायम्भुवस्यादौस्वयंरुद्रःपिनाकधृक्। स्वायम्भुवोवशिष्ठायसिद्धवर्य्यायदत्तवान् ||२४||

  इस हृदय को सब से पहिले पिनाकधारी स्वयं महादेवजी ने स्वायम्भुवमनुं को दिया था और स्वायम्भुव ने इसे सिद्धवर्य वशिष्ठ-जी को दिया ॥ २४ ॥

तेनापिदत्तंमन्मातुःपित्रेचित्रायुधायवै।" प्रादादौद्वाहिकंसोऽपिमत्पित्रेश्वशुरःस्वयम्॥२५

वशिष्ठजी ने यह मेरे नाना चित्रायुध को दिया जिसने मेरी माता के विवाह में इसको मेरे पिता को दिया ॥ २५ ॥

मयापिशिक्षितंवीरसकाशादबालयापितुः।

सकलास्त्राणामशेषरिपुनाशनम् ॥ २६ ॥

हेवीर ! मेरे पितानेइसकोमुझेबाल्यावस्थामेंहीदेदिया। यह सम्पूर्ण अस्त्रों का हृदय और शत्रुओं के नाशकरने वाला है ||२६||

तदिदंगृह्यतांशीघ्रमशेषास्त्रपरायणम्। ततोजहिदुरात्मानमेनंब्रह्मसमागतम् ||२७||

इसलिये इसको जो सम्पूर्णअस्त्रों का काम देता है आप ग्रहण कीजिये और ब्राह्मण के शाप के कारण श्राये हुए इस दुष्टको मारिये ॥ २७ ॥

मार्कण्डेयउवाच

तथेत्युक्तेततस्तेनवार्युपस्पृश्यतस्यतत्। अस्त्राणांहृदयंपादात्सरहस्यनिवर्त्तनम् ||२८||

मार्कण्डेयजी बोले-

यह कहकर उसने हाथ में जल लेकर अस्त्रोंके हृदय को उसके रहस्य निवर्तन सहित स्वरोचिको दे दिया ॥ २८ ॥

एतस्मिन्नन्तरेरक्षस्तत्तदाभीषणाकृतिः। नईमानोमहानादमाजगामत्वरान्वितः ||२६||

इसी अवसर में वह भीषण आकार वाला राक्षस घोर गर्जन करता हुआ शीघ्रही वहाँ आ पहुँचा ॥ २६ ॥

मयाभिभूताकिंत्राणमुपैतिद्रुतमेहिमे। भक्षायकिंचिरेणेतिब्रुवाणंतंददर्शसः॥३०

मुझ से भयभीत हुनाकोई भी तेरी रक्षा नहीं करेगा, शीघ्र मेरे पास श्राजिससे मैं तुझे खाऊ । इस प्रकार बोलते हुए उसको स्वरोचि ने देखा ॥ ३० ॥

स्वरोचिश्चिन्तयामासदृष्ट्वातंसमुपागतम्। गृह्णात्वेषवचःसत्यंतस्यास्त्वितिमहामुनेः॥३१॥

उसको पास आयाहुआ देखकर स्वरोचिने सोचाकि यदि इसको यह राक्षस पकड़ ले तो महामुनि का वचन भी सत्यहोजाय ॥३१॥

जग्राहसमुपेत्यैनांत्वरयासोऽपिराक्षसः। त्राहित्राहीतिकरुणंविलपन्तींसुमध्यमाम् ||३२||

   उस राक्षस ने शीघ्रही उस मनोरमा के पास श्राकर उसको पकड़ लिया और वह सुन्दरी करुणा पूर्वक विलाप करने लगी कि "मुझेबचाइये, मुझे बचाइये” ||३२||

ततःस्वरोचिःसंक्रुद्धचण्डास्त्रमतिभैरवम्। दृष्ट्वानिवेश्यतद्रक्षोददर्शानिमिषेक्षणः ||३३||

  तब स्वरोचि ने क्रुद्ध होकर उस भीषण चण्डास्त्र को शीघ्र उस राक्षस। की ओर चला दिया ॥ ३३ ॥

तदाभिभूतःसतदातांमुत्सृज्यनिशाचरः। प्रसीदशाम्यतामस्त्रंश्रूयताञ्चेत्यभाषत॥३४॥

उससे डरकर निशा- चर ने मनोरमा को छोड़ दिया और वह कहनेलगा कि आप प्रसन्न होकर इस अस्त्र को शान्त करेंऔर मेरी बात सुनें ||३४||

मोक्षितोऽहंत्वयाशापादतिघोरान्महाद्युते। | प्रदत्तादतितीत्रेणब्रह्ममित्रेणधीमता॥३५

  हे महान तेजस्वी 1 मुझको तुमने बुद्धिमान् ब्रह्ममित्र के दिये हुए अतिघोरशाप से बचा लिया ॥ ३५ ॥

।उपकारीनमेत्वत्तोमहाभागाधिकोऽपरः। | येनाहंसुमहाकष्टान्महाशापाद्विमोक्षितः ||३६||

 हे महाभाग ! तुमसे अधिक मेरा और कोई उपकारी नहीं है जो कि तुमने महान् शाप के घोर कष्ट से मुझको मुक्त किया है ॥ ३६ ॥

स्वरोचिरुवाच

ब्रह्ममित्रेणमुनिनाकिंनिमित्तंमहात्मना।

द शप्तस्त्वं कीदृशचैव शापो दत्तोऽभवत् पुरा ||३७||

स्वरोचिबोले- महात्माब्रह्ममित्रंनेतुमकोकिसकारणसेशाप दियाथायहकहो॥३७॥

राक्षसउवाच

ब्रह्ममित्रोऽष्टधाच्छिन्नमायुर्वेदमधीतवान्। त्रयोदशाधिकारंचप्रगृह्याथर्व्वणोद्विजः ||३८||

राक्षस बोला-

ब्राह्मण ब्रह्ममित्रने अष्टाङ्ग सहित आयुर्वेदश्रौर तेरहों अधिकार सहित अथर्ववेद का अध्ययनकिया है ||३८|

क. अहंचेन्दीवराक्षेतिख्यातोऽस्याजनकोऽभवम्। तविद्याधरपतेःपुत्रोनलनाभस्यखड्गिनः॥३६

| मैं इन्दीवराक्ष नाम इस मनोरमा का पिता हूँ और विद्याधरों के पंति नलनाम कापुत्र हूँ ||३६||

वामयाचयाचितःपूर्वंब्रह्ममित्रोऽभवन्मुनिः। श्रायुर्वेदमशेषंमेभगवन्दातुमर्हसि॥४०॥

 मैंने पहिले ब्रह्ममित्र मुनि से याचनाकी थी कि हे भगवन् ! श्रायुर्वेदको सम्पूर्णतः मुझेपढ़ाइये ॥ ४० ॥

यदातुबहुशोवीरमंश्रयावनतस्यमे।

न मादादयाचितो विद्यामायुर्वेदात्मिकां मम ॥ ४१ ॥

हेबीर ! यद्यपिमैंनेउनसेबहुतअनुनयविनयपढ़ानेकेलियेकियापरन्तुउन्होंनेमुझे आयुर्वेद न पढ़ाया ॥४१॥

.हेनिष्पापस्वरोचि ! शिष्येभ्योददतस्तस्यमयान्तर्धानगेनहि। आयुर्वेदात्मिकाविद्यागृहीताभूत्तदानघ॥४२॥

 जब वे शिष्यों को पढ़ाते थे उस समय अन्तर्धान होकर मैंने उस श्रायुर्वेद विद्या को प्राप्त किया ४२॥

गृहीतायान्तुविद्यायांमासैरष्टाभिरन्तरात्। ममातिहर्षादभवद्धासोऽतीवपुनःपुनः ||४३||

छिपे हुए रहकर मैंने ग्राठ महीने में वह विद्या पढ़ ली। इसके बाद मुझे बड़ा हर्ष हुआ और मैं वार२हंसने लगा ॥४३॥

प्रत्यभिज्ञायमांहासान्मुनिःकोपसमन्वितः।

चिकम्पिकन्धरः माह मामिदं परुपाक्षरम् ||४४ | |

मुझकोहंसतेहुएदेखकरमुनि समझगयेऔरक्रोधसंयुक्तकम्पितंशरीरहोकर कठोरशब्दोंमेंकहनेलगे॥४४॥

राक्षसेनैवयस्मान्मेत्वयाऽदृश्येनदुर्मते। हृताविद्याaatr मामवज्ञायवैकृतः॥४५॥

 हे दुर्बुद्धि ! राक्षस की तरह तूने अदृश्य होकर विद्या पढ़ ली है और श्रव तू हँसकर मेरा अपमान करता है ॥ ४५ ॥

विद्यावहासय

तस्मात्त्वंराक्षसःपापमच्च्छापेननिराकृतः। भविष्यसिनसन्देहःसप्तरात्रेणदारुणः ||४६ ||

इसलिये तू मेरे शाप से सात रातके भीतर एकदारुण राक्षस होजायगा ||४६||

इत्युक्तेमणिप्राताद्यरुपचारःप्रसादितः। समामाहपुनर्विमस्तत्क्षरणान्मृदुमानसः॥४७॥

उनके ऐसा कहने पर मैंने प्रणाम यादि अनुनय विनयसे उनको प्रसन्न किया तो फिर कोमल हृदय होकर मुनि ने मुझ से कहा॥४७॥

यन्मयोक्तमवश्यंतद्भाषिगन्धर्व्वमान्यथा। किन्तुत्वंराक्षसोभूत्वापुनःस्वंप्राप्स्यसेवपुः || ४८

 हे गन्धर्व जो मैंने कहा है वह तो अवश्य होगा, परन्तु तुम राक्षस होकर पुनः इस शरीर कोप्राप्त करोगे ||१८||

नष्टस्मृतिर्यदाक्रुद्धःस्वमपत्यंचिखादिपुः। निशाचरत्वंगन्तासितदखानलतापितः॥४६॥

अपनी स्मृति को खोकर क्रोध के वश होकर जब तू अपनी लड़की के खानेको उद्यत

होगा तब किसी के अत्र की अग्नि के ताप से तेराराक्षसपन चला जायगा ॥४६॥

पुनःसंज्ञामपाप्यस्वामवाप्स्यसिनिजंवपुः। तथैवस्वमधिष्ठानंलोकेगन्धर्व्वसंज्ञिते॥५०॥

फिर होश में आकर :तू अपने शरीर को प्राप्त करेगा  और गन्धर्वलोकको जायगा ॥ ५० ॥

सोऽहंत्वयामहाभागमोक्षितोऽस्मान्महाभयात्। निशाचरत्वाद्वयद्वीरतेनमेप्रार्थनांकुरु॥५१॥

  हे महाभाग ! तुमने मुझे इस राक्षसत्व रूपी महाभय से मुक्त किया है इसलिये !श्रव मुझसे वर माँगो ||५१||

इमांतेतनयांभाय्यांप्रयच्छामिप्रतीच्छताम्। श्रायुर्वेदवसकलस्त्वष्टाङ्गोयोमयाततः।

मुनेः सकाशात् सम्प्राप्तस्तं गृह्णीय महामते ॥ ५२ ॥

इसकन्याकोतुम्हें देताहूँइसेग्रहणकरोऔरअनसहितआयुर्वेद जोमैंनेमुनिसेपढ़ाहैवहभीग्रहणकरो॥५२॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्त्याप्रददौविद्यांसचदिव्याम्बरोज्ज्वलः। 'सग्भूषणधरोदिव्यंपुराणंवपुरास्थितः॥५३॥

मार्कण्डेयजी बोले—

यह कहकर उसने वह विद्या स्वरोचि को दे दी और श्राप सुन्दर माला और श्राभूषण श्रादि

धारण करके पूर्ववत् अपने गन्धर्व रूप मेंहोगया ||५३||

दत्त्वाविद्यांततःकन्यांसदातुमुपचक्रमे। तमाहसातदाकन्याजनितारंस्वरूपिणम्॥५४॥

 उस विद्या को देकर कन्या को देने का जब गन्धर्व ने प्रायोजन किया तो वह कन्या

श्रपने पिता से कहने लगी ॥ ५४ ॥

अनुरागोमयाऽप्यत्रतातातीवमहात्मनि।। दर्शनादेवसज्जातोविशेषेणोपकारिणि॥५५||

हे तात ! इसमहात्मा में जो कि मेरे विशेष उपकारी हैं  दर्शन सेही मेरी प्रीति होगई ॥५५॥

किन्त्वेपामेसंखीसाचमत्कृतेदुःखपीड़िते। तोनाभिलपेभोगान्भोक्तुमेतेनवैसमम् ||५६

किन्तु मेरी दो सखियाँमेरे ही कारण दुःख से पीड़ित हैं इसलिये में उन को इस अवस्था में छोड़कर भोग विलास करनानहीं चाहती ॥ ५६ ॥

रुषैरपिनोशक्याकर्त्तमित्थंनृशंसता। प्रभावरुचिरैर्मादृक्कथंयोषित्करिष्यति॥५७॥

ऐसी निर्दयता तो पुरुष भी प्रकटकरने को समर्थ नहीं हैं  जिसमें मैं तो स्त्री हूँ जोस्वभाव से ही कोमल होती है ॥ ५७ ॥

हंयथातेदुःखार्त्तेमत्कृतेकन्यकेपितः। थास्थास्यामितद्दुःखेतच्छोकानलतापिता५८॥

हे पिता !जिस तरह वे दोनों सखियां मेरे कारण दुःखित होगई हैं उसी तरह मैं भी उनके दुःख की शोकानिमें जलती हुई स्थित रहूँगी ॥ ५८ ॥

स्वरोचिरुवाच

आयुर्वेदप्रसादेनतेकरिष्येपुनर्न। [ख्यौतवमहाशोकंसमुत्सृजसुमध्यमे || ५६||

स्वरोचि वोले--

हे सुन्दरी ! तुम शोक को छोड़ दो, आयुर्वेद प्रसाद से मैं तुम्हारी दोनों सखियों का नयाजीवन कर दूंगा ॥५६॥

मार्कण्डेयउवाच

तःपित्रास्वयंदत्तांतांकन्यांसविधानतः।

उपयेमेगिरौतस्मिन्स्वरोचिश्चारुलोचनाम् ||६०||

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर पिता ने उस कन्याको विधि पूर्वक प्रदान किया और स्वरोचि ने उस सुन्दरी से उसी पर्वत

पर विधि पूर्वक विवाह किया ॥ ६० ॥

वृत्तान्तुतांतदाकन्यामभिसान्त्वयचभाविनीम्। नगामदिव्ययागत्यागन्धर्व्वःस्वपुरंततः॥६१

उस कन्याको प्रदान करने के बाद गन्धर्व ने उस भाविनीको अनेक प्रकार से सांत्वना दी और श्राप दिव्यं गति से गन्धर्वलोक को चला गया ||६१||

चापिसहितस्तन्वचातदुद्यानंतदाययौ। कन्यकायुगलंयत्रतच्छापात्तुगदातुरम्॥६२॥

स्वरोचिभी सुन्दरी सहित उस उद्यानमें गये जहाँ मनोरमा की दोनों सखियाँ मुनि के शाप से रोगयुक्त हुईपड़ी थीं ॥ ६२ ॥

ततस्तयोःसतत्त्वज्ञोरोगघ्नैरोषधैरसैः। चकारनीरुजेदेहेस्वरोचिरपराजितः॥६३॥

फिर महात्मा स्वरोचिने रोगनाशक औषधियों के रससे उन दोनों सखियों का शरीरनीरोग कर दिया ॥ ६३ ॥

ततोऽतिशोभनेकन्येविमुक्तेव्याधितःशुभे। स्त्रकान्त्योद्दयोतिदिग्भागंचक्रांतेतन्महीधरम्६४॥

रोगरहित होनेके कारण..वे दोनों सखियां अत्यन्त शोभित होने लगीं औरउन्होंने अपनी कान्ति की ज्योति से उस पर्वत कोसब दिशाओं में प्रकाशित कर दिया ॥ ६४ ॥ इतिश्रीमार्कण्डेय०मेंस्वारोचिषमन्वन्तर ( २ ) नाम६३वाँ०समाप्त |