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मार्कण्डेय उवाच

रुचिःप्रजापतिःपूर्व्वंनिर्म्ममोनिरहङ्कृतः। त्रस्तोमितशायीचचचारपृथिवीमिमाम् || १ ||

मार्कण्डेयजीबोले- पूर्वकालमेंप्रजापतिरुचिनिर्ममऔर निरभिमानीहोकरइधरउधरपृथ्वीपरघूमतेथे तथा वेशयन भीबहुत कमकरतेथे॥१॥

श्रनग्निमनिकेतं तमेकाहारमनाश्रमम् । विमुक्तसङ्गःतंदृष्ट्वाप्रोचुस्तत्पितरोमुनिम्॥२॥

विनाश्रग्नि, विना गृह, एक वार भोजन करते हुए, बिना याश्रम, विना सङ्गति ऐसे उस मुनि को देखकरपितरलोगउससेवोले॥२॥ 'पितरऊचुः

वत्सकस्मात्त्वयापुण्योनकृतोदारसंग्रहः। स्वर्गापवर्गहेतुत्वादवन्धस्तेनानिशंविना॥३

पितर बोले-

हे वत्स ! तुमने विवाह करके पुण्य क्यों न किया और मोक्ष का कारण है. विवाह के बिना जीव बन्धन से नहीं छूटता ॥ ३ ॥

गृहीसमस्तदेवानांपितृणाश्चतथार्हणाम्। ऋषीणामतिथीनाञ्चकुर्व्वन्लोकानुपाश्नुते॥४

गृहस्थीलोगसमस्तदेवताओं, पितरों, ऋपियों औरअतिथियोंकीपूजाकरकेउत्तमलोकोंकोप्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥

स्वाहोच्चारणतोदेवान्स्वधोच्चारणतःपितृन्। विभजत्यन्नदानेनभूताद्वयानतिथीनपि॥५

स्वाहा का उच्चारण करने से देवता, स्वधा कहने से पितर तथा अन्न का भाग देने से भूत और अतिथि आदि तृप्त होते हैं॥ ५ ॥

सत्वंदैवादृणादबन्धंबन्धमस्मरणादपि। वामपिमनुष्येभ्योभूतेभ्यश्चदिनेदिने || ६

अतः तुम देवताओं के, हमारे, मनुष्यों के और भूतों के ऋण के बन्धन में दिन प्रतिदिन बंधते हो॥ ६ ॥

अनुत्पाद्यसुतान्देवानसन्तर्प्यपितृस्तथा। अकृत्वाचकथंमौढ्यात्सुगतिंगन्तुमिच्छसि॥७

पुत्रों को उत्पन्न किये बिना, देवताओं का पूजन किये बिना, पितरों का तर्पण किये बिना तुमः

इस मूखता से किस प्रकार उत्तम गति को प्राप्तकरोगे ? ॥ ७ ॥

क्लेशमेकैककंपुत्रमन्यामोऽत्रभवेत्तव। मृतस्यनरकंतद्वत्क्लेशमेवान्यजन्मनि॥८

  हे पुत्र ! हम यह जानते हैं कि तुम्हारे विवाह न करने से हमको और तुमको क्लेश होगा। मरनेपर तुम नरक को जानोगे और दूसरा जन्म लेने पर भी तुमको दुःख प्राप्त होगा ||८

 रुचिरुवाच

परिग्रहोऽतिदुःखायपापायाधोगतिस्तथा। भवत्यतोमयापूर्व्वंनकृतोदारसंग्रहः॥६

रुचि वोले-

विवाह से अत्यन्त दुःख और पाप होता है, और उस पाप से मनुष्य अधोगति को प्राप्त होताहै, इसीलिये मैंने विवाह नहीं किया ॥ ६ ॥

आत्मनःसंयमोयोऽयंक्रियतेसुनियन्त्रणात्। समुक्तिहेतुर्नभवत्यसावपिपरिग्रहात्॥१०॥

भली प्रकार नियन्त्रण करके जो आत्मा का संयम किया जाता है उससे मुक्ति होती है, विवाह करने सेऐसा नहीं हो सकता ॥ १० ॥

प्रक्षाल्यतेऽनुदिवसंयदात्मानिष्परिग्रहः। ममत्वपङ्कदिग्धोऽपिचित्ताम्भोभिर्वरंहितत्॥११

विवाह न करने वाले प्रति दिन अपनी आत्मा की ममत्व रूपी कीचड़ को विरक्त चित्तरूपी जलसे धोते हैं ॥ ११ ॥

अनेकभवसम्भूत-कर्म्मपङ्काङ्कितोबुधैः। आत्मासद्वासनातोयैःप्रक्षाल्योनियतेन्द्रियैः॥१२

जितेन्द्रिय बुधजन अनेक जन्मों के कर्म रूपी कीचड़ से सनी हुई आत्मा को सवासना रूपी जल से घोते हैं ॥ १२ ॥ . पितरऊचुः

युक्तंप्रक्षालनंकर्त्तुमात्मनोनियतेन्द्रियैः। किंन्तुमोक्षायमार्गोऽयंयत्रत्वंपुत्रवर्त्तसे॥१३॥

पितर बोले-

यह ठीक है कि आत्मा को जितेन्द्रिय होकर स्वच्छ किया जाता है । किन्तु हे पुत्र ! जिस मार्ग

का तुम अनुसरण करते हो वह मोक्ष का है ॥१३॥

परन्तुदानैरशुभंनुद्यतेऽनभिसन्धितैः। फलैस्तथोपभोगैश्चपूर्वकर्म्मशुभाशुभैः॥१४॥

ऋणों को अदा करने से पाप का क्षय होता है । पूर्व जन्म के किये हुए शुभ और अशुभ कर्मों का

उपभोग विना किसी फल की इच्छा के करनाचाहिये ॥ १४ ॥

एवंनवन्धोभवतिकुर्व्वतःकरुणात्मकम्। नचवन्धायतत्कर्म्यभवत्यनभिसन्धितम्॥१५॥

बिना कारणके कर्म करनेसे श्रात्मा को बन्धन नहीं होता । बिना फल की इच्छा से किये हुए कर्म से भी आत्मा को बन्धन नहीं होता ||१५||

पूर्व्वकर्मकृतंभोगेःक्षीयतेऽहर्निशंतथा। सुखदुःखात्मकैर्वत्सपुण्यापुण्यात्मकंनृणाम्॥१६॥

मनुष्यों का पाप-पुण्यात्मक पूर्व जन्म कृत कर्म सुख-दुःखात्मक भोगोंसे दिन रात क्षीण होताहै ॥ १६ ॥

एवंप्रक्षालयतेप्राज्ञैरात्मावन्धैश्वरक्ष्यते। त्वेवमविवेकेनपापपङ्केनगृह्यते॥१७॥

इसी प्रकार बुद्धिमान लोग आत्मा का प्रक्षालन करते हैं और बन्धनों से बचते हैं, और इस प्रकार उनकी आत्मा अविवेक और पापरूपीकीचड़ में नहीं फंसती ॥ १७ ॥ रुचिरुवाच

विद्य] पठ्यतेवेढेकर्म्ममार्गःपितामहाः।

तत् कथं कर्म्मणो मार्गे भवन्तो योजयन्ति माम् १८॥

रुचिवोले- हेपितरों ! यदिवेद-कथितकर्म-मार्गसेश्रविद्या होती है तो किस प्रकार आप मुझे उस मार्ग में प्रेरित करते हैं ? ॥ १८ ॥ पितरऊचुः

अविद्यासत्यमेवैतत्कर्म्मणैतन्मृषावचः। किन्तुविद्यापरिप्राप्तोहेतुःकर्म्मनसंशयः॥१६॥

पितर बोले-

हे वत्स ! यह सत्य है कि कर्म मार्ग में अविद्या होती है परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि कर्मही विद्याप्राप्ति का हेतु है ॥ १६ ॥

विहिताकरणात्पुंभिरसद्धिःक्रियतेतुयः। संयमोमुक्तयेसोऽन्तेप्रत्युताधोगतिप्रदः॥२०॥

श्रसत् पुरुषों से वेद केविरुद्ध किया जाता है वह, तथा वह संयम जो ऐसेलोग मुक्ति के लिये करते हैं नरक का देने वाला है || २०||

प्रक्षालयामीतिभवान्वत्सात्मानन्तुमन्यते। विहिताकरणोद्भूतैःपापैस्त्वन्तुविदह्यसे॥२१

  हे वत्स ! तुम तो यह मानते हो कि मैंश्रात्मा को प्रक्षालित करता हूँ परन्तु वस्तुतः तुम

विहित कर्म को न करने के पाप से दग्ध होते हो ॥२१

विद्याप्युपकारायविषवज्जायतेनृणाम्। अनुष्ठिताभ्युपायेनबन्धायान्यापिनोहिसा॥२२॥

विहित कर्म को करने से विद्या भी उसी प्रकार उपकार करती है जिस प्रकार कि शोधा हुआ विष

अमृत का कार्य करता है । विहित कर्म को छोड़ देने से विद्या भी आत्मा को बन्धन देती है ॥२२ ॥

तस्माद्वत्सकुरुष्वत्वंविधिवद्दारसंग्रहम्। माजन्मविफलंतेऽस्तुअसम्प्राप्यतुलौकिकम्२३॥

हे वत्स ! इसलिये तुम विधि पूर्वक विवाह करो । जिससे कि लौकिक कर्म छोड़ने से तुम्हारा जन्मनिष्फल न होहोजाय ||२३||

रुचिरुवाच वृद्धोऽहंसाम्प्रतंकोमेपितरःसम्प्रदास्यति। भाय्यीतथादरिद्रस्यदुष्करोदारसंग्रहः॥२४॥

रुचि बोले-

हे पितरो ! मैं इस समय वृद्धहूँ, मुझको कौन कन्या देगा ? दरिद्री को विवाह करना बड़ा दुष्कर होता है ॥ २४ ॥ पितरऊचुः

अस्माकंपतनंवत्सभवतश्चाप्यधोगतिः। नूनंभाविभवित्रीचनाभिनन्दसिनोवचः ||२५||

पितर बोलेहे वत्स ! यदि तुम हमारे कथनानुसार न करोगे तो हमारा पतन और तुम्हारी अधोगति होगी ||२५

मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्त्वापितरस्तस्यपश्यतोमुनिसत्तम।

बभूवुः सहसाऽदृश्या दीपा वाताहता इव ॥ २६ ॥

मार्कण्डेयजीबोले- हेकौटुकिमुनि ! पितरलोगउससेयहकह करइसप्रकारसहसाश्रदृश्यहोगयेजिसतरहकिवायुकेलगनेसे दीपकबुझजाता॥२६॥

इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंरुचिउपाख्याननामहश्वाँअध्यायस०।