मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेय उवाच
ततस्तस्मान्नदीमध्यात्समुत्तस्थौमनोरमा।
प्रम्लोचा नाम तन्वङ्गी तत्समीपे वराप्राः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजीबोले- इसकेअनन्तरनदीकेमध्यमेंसेएकसुन्दरऔरमनोहरअप्सराप्रम्लोचानामनिकली॥१॥
साचोवाचमहात्मानंरुचिसुमधुराक्षरम्। प्रश्रयावनतासुभ्रःप्रम्लोचावैवराप्सराः॥२
वह सुन्दर अप्सरा प्रम्लोचा विनय पूर्वक मधुर वाणी से महात्मा रुचि से वोली ॥ २ ॥
अतीवरूपिणीकन्यामत्सुतातपतां वर। जांतावरुणपुत्रेणपुष्करेण महात्मना ॥ ३ ॥
मेरी एकअत्यन्त सुन्दरी कन्या है जो कि वरुण के पुत्रमहात्मा पुष्कर से उत्पन्न हुई है ॥ ३ ॥
तांगृहारणमयादत्तांभार्य्यार्थेवरवर्णिनीम्। मनुर्महामतिस्तस्यांसमुत्पत्स्यतितेसुतः || ४
उस सुन्दर वर्ण वाली कन्या को श्राप पत्नी रूप से ग्रहण कर, उससे श्रापके एक पुत्र महाबुद्धिमान मनु होगा ||४ मार्कण्डेयउवाच
तथेतितेनसाप्युक्तातस्मात्तोयाद्वपुष्मतीम्। उज्जहारततःकन्यांमालिनींनामनामतः॥५
मार्कण्डेयजी बोले-
'ऐसा ही होगा' इस प्रकार रुचि के कहने परउस अप्सरा ने मालिनी नाम एक सुन्दर कन्या
को जल में से निकाला ॥ ५ ॥
नद्याश्चपुलिनेतस्मिन्सरुचिमुनिसत्तमः। जग्राहपारिंगविधिवत्समानाय्यमहामुनीन् || ६
सुनिवर रुचि नेवहुत से मुनियों को बुला कर नदी के किनारे विधिवत् उस कन्या से पाणिग्रहण किया ॥ ६ ॥
तस्यांतस्यसुतोजज्ञेमहावीर्योमहामतिः। राँच्योऽभवत्पितुर्नाम्नाख्यातोऽत्रवसुधातले॥७॥
उस कन्या से उसके महाबलवान् और बुद्धिमान् एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो कि पृथ्वी पर पिता के
नाम पर रौच्य नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ७ ॥
तस्यमन्वन्तरेदेवास्तथासप्तर्षयश्चये। तनयाश्चनृपाश्चैवतेसम्यक्कथितास्तव॥८॥
उसके मन्वन्तर में देवता, सप्त ऋषि तथा उसके पुत्र जो राजा लोग हुए उनको मैं भली प्रकार तुम से कहचुका हूँ ॥ ८ ॥
धर्मवृद्धिस्तथारोग्यंधनधान्यसुतोद्भवः। नृणांभवन्यसन्दिग्धसस्मिन्मन्वन्तरेश्रुते॥६
इस मन्वन्तर के सुनने से मनुष्यों के लिये निस्संदेह धर्म की वृद्धि, आरोग्य, धन,
धान्य और पुत्रादि की प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
पितुस्तवतथाश्रुत्वापितृणाञ्चतथागणान्। सर्व्वान्कामानवाप्नोतितत्प्रसादान्महामुने ||१०|||
हे महामुनि कौटुकिजी ! पितरों तथा गणों की स्तुति सुनने से उनके प्रसाद से सब कामनायें सफलहोतीहैं॥१०॥
इतिश्री मार्कण्डेयपुराणकेरौच्यमन्वन्तरमेंमालिनीपरिणयनाम६८वांअ०समाप्त।
Summary of chapter 97 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Pleased by Ruci's devout stuti, the Pitṛs emerge from the sky in radiant, shining forms and grant him divine boons. They promise him a noble, celestially beautiful wife and declare that his son will become the ninth patriarch, Raucya Manu, ruling over a glorious cosmic age.