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कौटुकिरुवाच विस्तरात्कथितंब्रह्मन्ममस्वारोचिषंत्वया। मन्वन्तरंतथैवाष्टौयेपृष्टानिधयोमया॥१

क्रौष्टुकिजी बोले-

हे ब्रह्मन् ! आपने मुझसे स्वारोचिष मन्वन्तर का हाल विस्तार पूर्वक कहा और जो मैंने श्राठों

निधियां पूँछीं उनको भी आपने बताया ||१||

स्वायम्भुवंपूर्व्वमेवमन्वन्तरमुदाहृतम्। मन्वन्तरंतृतीयंमेकथयोत्तमसंज्ञितम्॥२

मार्कण्डेय उवाच

आपनेपहिले स्वायम्भुव मन्वन्तर का वर्णन भी मुझसेकिया, व उत्तम नाम तीसरे मन्वन्तर को मुझसे कहिये ॥ २ ॥ मार्कण्डेयजीबोले-

उत्तानपादपुत्रोऽभूदुत्तमोनामनामतः। सुरुच्यास्तनयःख्यातोमहाबलपराक्रमः॥३

उत्तानपाद राजा के सुरुचि नाम स्त्रीसे महान वली और पराक्रमशाली उत्तम नाम का पुत्र हुआ ॥३

धर्मात्माचमहात्माचपराक्रमधनोनृपः। अतीत्यसर्व्वभूतानिवौभानुपराक्रमः॥४

वह राजा धर्मात्मा, महात्मा और पराक्रमी था तथा वह सब प्राणियों में सूर्य के समान तेजस्वी था ॥४॥

समःशत्रौचमित्रेचपुरेपुत्रेचधर्म्मवित | दुष्टेचयमवत्साधौसोमवच्चमहामुने॥५

हेमहामति क्रोष्टुकिजी ! वह धर्मज्ञ शत्रु और मित्र तथा प्रजा और पुत्र को समान समझता था।

 वहदुष्टों के लिये यम और सज्जनों के लिये चन्द्रमा केसमान था ॥ ५ ॥

बाभ्रवीबहुलांनामउपयेमेसधर्म्मवित्। उत्तानपादतनयःशचीमिन्द्रइवोत्तमः॥६

उत्तानपाद के पुत्र धर्मज्ञ उत्तमबहुला नाम सुन्दरी से उसी तरहं विवाह किया जिस प्रकार कि इन्द्र ने शची से किया था ॥ ६ ॥

ख्यातामंतीवतस्यासीदद्विजवर्यमनःसदा। स्नेहवच्छशिनोयद्वद्रोहिण्यांनिहितास्पदम्।।७।

हे द्विजश्रेष्ठ ! जिस प्रकार चन्द्रमा रोहिणी में प्रीति रखते हैं उसी प्रकार उत्तमने बहुला में अपना चित्तलगाया ॥ ७ ॥

अन्यमयोजनासक्तिमुपैतिनहितन्मनः। स्वप्नेचैवतदालम्विमनोऽभूत्तस्यभूभृतः॥८

  उसे राजा की श्रासक्ति और किसी काम में न होती थी  तथा स्वप्न में भी वह दन्तःचित्त होकर उसी को देखता था ॥ ८ ॥

सचतस्याःसुचार्व्वङ्गन्यादर्शनादेवपार्थिवः। ददातिस्पर्शनंगात्रेगात्रस्पर्शेचतन्मयः॥६

 वह राजा उस सुन्दरी को देखते ही शरीर से शरीर का आलिङ्गन करके तन्मय होजाता था ||९ ||

श्रोत्रोद्वेगकरंवाक्यंप्रियमप्यवनीपतेः। तस्यापिभरिसम्मानंमेनेपरिभवंततः॥१०

बहुला काशब्द सुनते ही राजा को बहुत उद्वेग होता था परन्तु वह उसको सुनकर बहुत प्रसन्न होता था॥ १० ॥

अवमेनेस्रंजंदत्तांशुभान्याभरणानिच। उत्तस्थावङ्गपीडेवपिवतोऽस्यवरासवम्॥११॥

बहुला का अधरामृतं पान करते समय उस को माला तथा श्राभूषण कष्टदायक मालुम होते थे

श्रतः वह उनको उतार कर रख देता था ॥ ११॥

भुञ्जताचनरेन्द्रेणक्षणमात्रंकरेधृता। बुभुजेस्वल्पकंभक्ष्यंद्विजनातिमुदावती ||१२||

राजा खाते समय भी उसका हाथ पकड़ कर थोड़ा सा खालिया करता था, परन्तु वह स्त्री प्रसन्न नथी ॥ १२ ॥

एवंतस्यानुकूलस्यनानुकूलामहात्मनः। प्रभूततरमत्यर्थंचक्रेरागंमहीपतिः ॥१३॥

राजा का प्रेम बहुलामें अधिक था परन्तु ऐसे अनुकूल महात्मा से भी वह अनुकूल न थी ।१३

अथपानगतोभूपःकदाचित्तांमनस्विनीम्। सुरापूतंपानपात्रंग्राहयामाससादरः || १४ ||

एक दफा सुरा पीते हुए राजा ने सुरासे भंग हुआ हुआ एक पात्र सम्मानपूर्वक उस सुन्दरी को दिया॥१४॥

पश्यतांभूमिपालानांवारमुख्यैःसमन्वितः। मर्गीयमाणमधुरैर्गेयगायनतत्परैः। ॥१५॥

उस समय वहाँ राजाओं और मुख्यः मुख्य मनुष्योंका समारोह था तथा बहुतसे गायक मधुरस्वर से गीत गारहे थे ||१५||

सातुनेच्छतितत्पात्रमादातुंतत्पराङ्मुखी। समक्षमवनीशानांततःक्रुद्धःसपार्थिवः || १६

उसने उस पात्र कोलिया और अपना मुँह फेर लिया। समस्तराजाओं के सामने अपमानित होनेके कारण राजाको बड़ा क्रोध आया ॥ १६॥

उवाचद्वाःस्थमाहूयनिश्वसन्नुरगोयथा। निराकृतस्तयादेव्याप्रिययापतिरप्रियः ||१७||

क्रोध में सर्प की तरहफुसकार लेते हुए उसने द्वारपालों को बुलाकर कहा कि इस देवी ने मुझे श्रप्रिय समझ कर मेराअपमान किया है ॥ १७ ॥

द्वाःस्यैनांदुष्टहृदयामादायविजनेवने। परित्यजाशुनैतत्तेविचार्य्यंवचनंमम || १८ ||

मार्कण्डेयउवाच

  हे द्वारपालो ! शीघ्र हीइस दुष्टश को निर्जन वनमें लेजाकर छोड़ धों,यह मेरा वचन है, तुम इसमें कुछ विचार न करो !

मार्कण्डेयजी बोले-

ततोनृपस्यवचनमविचार्य्यमवेक्ष्यसः। द्वाःस्थस्तत्याजतांसुभ्रूमारोप्यस्यन्दनेवने॥१९॥

फिर राजाकी श्राज्ञा सुनकर वे द्वारपाल बिना देखे और विचारे हुए उस सुन्दरी को रथ में बैठाकर लेगये और वनमें छोड़ श्राये ॥ १६ ॥

साचतंविपिनेत्यागंनीतातेनमहीभृता। श्रदृश्यमानातंमेनेपरंकृतमनुग्रहम् ||२०||

राजा सेत्यक्त होकर और उस वनमें छूटकर उसने अपने को धन्य माना कि अव उस राजाको मैं दिखाई नदूँगी ||२०||

सोऽपितत्रानुरागार्त्तिदह्यमानात्ममानसः। औत्तानपादिर्भूपालोनान्यांभार्य्यामविन्दत२१॥

 परन्तु राजा उत्तम उसके प्रेम में विल रहने लगा और उसने अन्य स्त्रीकी इच्छा न की॥२१॥

सस्मारतांसुचार्व्वङ्गीमहर्निशमनिवृतः। चकारचनिजंराज्यंप्रजाधर्मेणपालयन् ||२२||

राजा दिन रात उस सुन्दरीके ध्यानमें रहताथा।  इसके साथही वह अपने राज्य में प्रजा कीधर्मपूर्वक पालन करता था ||२२||

मजाःपालयतस्तस्यपितुःपुत्रानिवौरसान्। श्रागत्यब्राह्मणःकश्चिदिदमाहार्त्तमानसः॥२३॥

जिस तरह पिताअपने पुत्र का पालन करता है उसी प्रकार उत्तमंप्रजा का भरणपोषण करता था ।

 एक दफा दुःखीहुए किसी ब्राह्मण ने राजा से श्राकर कहा ॥ २३ ॥

ब्राह्मणउवाच

महाराजभृशार्तोऽस्मिश्रूयतांगदतोमम। नृणामार्त्तिपरित्राणमन्यतोननराधिपात्॥२४॥

ब्राह्मणं बोला-

हे महाराज ! मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरी बात सुनिये, क्योंकि राजा के अतिरिक्त मनुष्योंके दुःखकौन दूर कर सकता है ॥ २४ ॥

ममभार्य्याप्रसुप्तस्यकेनाप्यपहृतानिशि। गृहद्वारमनुदुघाट्यतोसमानेतुमर्हसि ||२५||

रात्रि के समयकिसी ने द्वार खोलकर मेरी सोती हुई स्त्री को हरण कर लिया है, उसे श्रापही लाने को समर्थ हैं ॥२५॥ राजोवाच

नवेत्सिकेनापहताकवानीतातुसाद्विज।

यतामिविग्रहेकस्यकुतोवाप्यानयामिताम् ||२६||

राजा उत्तम वोले-

हे ब्राह्मण ! जब तुम ही नहीं जानते हो कि किसने तुम्हारी स्त्री को हरण किया और वह उसे

कहाँ ले गया तो फिर मैं किसको पकड़ और उसे कहाँ से लाऊँ ? ॥ २६ ॥

ब्राह्मणउवाच

तथैवस्थगितद्वारिप्रसुप्तस्यमहीपते। हृताहिभार्य्याकिंकेनेत्येतद्विज्ञायतेभवान् || २७

ब्राह्मण बोला -

हे राजन् ! सोतेहुए किसीने द्वार खोलकर मेरी स्त्री को चुरा लिया है यह कोई नहीं जानता, आप ही इसको जान सकते हैं ||२७||

त्वंरक्षितानोनृपतेपड्भागादानवेतन: धर्मस्यतेननिश्चिन्ताःस्वपन्तिमनुजानिशि२८||

हे राजन् ! अपनीश्राय का छटा भाग हम आपको अपनी रक्षा के लिये देते हैं और इसी धर्म से मनुष्य रात्रि मेंबेखटके सोते हैं ||२८||

राजोवाच

नतेदृष्टामयाभार्य्यायादृग्रूपाचदेहतः। वयश्चैवसमाख्याहिकिंशीलाब्राह्मणीचते॥२६॥

राजा बोले-

मैंने तुम्हारी ब्राह्मणी को शरीर व रूप से नहीं देखा है, तुम उसकी वस्था और शील श्रादिको बतात्रो ॥ २६ ॥

ब्राह्मणउवाच

कठोरनेत्रासात्युच्चाहस्त्रबाहुःकृशानना। विरूपरूपाभूपालननिन्दामितथैवताम् ||३०||

ब्राह्मण बोला-

हे राजन् ! उसके नेत्र कठोर हैं, वह वहुत ऊँची है तथा उसकी बाहु छोटी-छोटी हैं, उसकामुख कृश है  और वह कुरूप है तो भी मैं उसकीनिन्दा नहीं करता हूं ॥ ३० ॥

वाचिभूपातिपरुषानसौम्यासाचशीलतः। इत्याख्यातामयाभार्थ्यासाकारादुर्निरीक्षणा३१||

 हे राजन् ! उसकी वाणी कठोर और स्वभाव दुष्ट है । मेरी स्त्री जिस का रूप देखने योग्य नहीं है इस प्रकार की है ॥ ३१ ॥

मनागतीतंभूपालतस्याश्चप्रथमंवयः। तादृग्रूपाहिमेभार्य्यास॒त्यमेतन्मयोदितम् ||३२|||

हे पृथ्वीपते ! उसकी पहिली अवस्था व्यतीत हो चुकी है। इस प्रकार की मेरी स्त्री है जिसकोकि मैं सत्य कहता हूँ ||३२||

राजोवाच अलंतेब्राह्मणतथाभाय्र्यामन्यांददामिते। सुखायभार्य्याकल्याणीदुःखहेतुर्हितादृशी ||३३||

राजा बोले-

हे ब्राह्मण ' वह स्त्री तुम्हारे दुःख का कारणथी, उसे रहने दो।  मैं तुम्हारे सुख के निमित्तदूसरी भद्र स्त्री देता हूँ ||३३||

कल्येसुरूपताविमकारणंशीलमुत्तमम्। रूपशीलविहीनायात्याज्यासातेनहेतुना॥३४

ब्राह्मणउवाच

 हे विम ! पत्नी बनाने में रूप और शील मुख्य कारण है । रूप और शीलरहित स्त्री त्याज्य है ॥ ३४ ॥

रक्ष्याभार्यामहीपालइतिनश्रुतिरुत्तमा। भार्य्यायांरक्ष्यमाणायांप्रजाभवतिरक्षिता ||३५||

ब्राह्मण बोला--

हे राजन् ! उत्तम श्रुति यही कहती है कि पत्नी की अवश्य रक्षा करनी चाहिये क्योंकि भार्यासे हीपुत्र की उत्पत्ति होती है ||३५||

श्रात्माहिजायतेतस्यांसारक्ष्यातोनरेश्वर। प्रजायांरक्ष्यमाणायामात्माभवतिरक्षितः ||३६||

हे राजन् ! स्त्री कीरूप पुत्र उत्पन्न होता है और पुत्र से अपनी रक्षा श्रवश्य रक्षा करनी चाहिये क्योंकि उससे आत्माहोती है ||३६||

उस्यामरक्ष्यमाणायांभवितावर्णसङ्करः। नपातयेन्महीपालपूर्व्वान्स्वर्गादधःपिवन् ||३७||

हे पृथ्वीपति ! उसकी रक्षा न करनेसे उसके वर्णसङ्कर पुत्र उत्पन्न होता है  जो किपितरों को स्वर्ग से भी गिरा देता है ॥ ३७ ॥

धर्म्महानिधातुदिनसभार्य्यस्यभवेन्मम। नत्यक्रियाणांविभ्रंशात्सचापिपतनायमे ||३८||

स्त्रीके बिना दिन पर दिन मेरे धर्म की हानि होगीतथा नित्य क्रियाओं की हानि होने पर मेरा पतन होजायेगा ||३८||

तस्याञ्चपृथिवीपालभवित्रीममसन्ततिः। तवंपड़भागदात्रीसाभवित्रीधर्म्महेतुकी॥३६॥

हे नृपति | उससे मेरी सन्तति:होगी जोकि आपको छठा भाग देगी तथा मेरे धर्मका कारण होगी ॥ ३६ ॥

तदेतत्तेमयाख्यातापत्नीयामेहृताप्रभो। तांसमानयरक्षायांभवानधिकृतोयतः ||४०||

 हे प्रभु ! जिस तरह मेरी स्त्री हरी गई वह मैंने आपसे कहदिया ।  अब उसको लाकर मेरी रक्षा करना आपके अधिकारमें है ४० ॥

मार्कण्डेयउवाच

सतस्यैवंवचःश्रुत्वाविसृष्यचनरेश्वरः। सर्वोपकरणैर्युक्तमारुरोहमहारथम्॥४१

मार्कण्डेयजी बोले--

वह राजा ब्राह्मण के वचन सुनकर तथा मनमें विचार करके सब साज-सामान के साथ रथ परचढ़ा ॥ ४१ ॥ इतंश्वेतश्चतेनासौपरिवभ्राममेदिनीम्।। ददर्शचमहारण्येतापसाश्रममुत्तमम्॥४२॥

उसने पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते हुए एक बड़े वनमें तपस्वी का एक उत्तम श्राश्रम देखा॥४२ ॥

अवतीर्य्यचतत्रासौप्रविश्यददृशेमुनिम्। कौश्यांदृष्यांसमासीनंज्वलन्तमिवतेजसा॥४३॥

उसने वहाँ उतर कर एक श्राश्रम में प्रवेश किया और सूर्य के समान तेजस्वी तथा कुशासनपर बैठे हुए एक मुनि को देखा ॥ ४३ ॥

स. दृष्ट्वानृपतिंप्राप्तंसमुत्थायत्वरान्वितः। सम्मान्यस्वागतेनैवशिष्यमाहार्घमानय ||४४||

नृप कोआया हुआ देखकर मुनि शीघ्रता से उठे और सम्मानपूर्वक उनका स्वागत करके शिष्यसे बोलेंकि अर्घ्य लाभो ॥ ४४ ॥

तमाहशिष्यःशनकैर्दातव्योऽर्धोऽस्यकिंमुने। तदाज्ञापयसंचिन्त्यतवाज्ञांहिकरोम्यहम् ||४५||

शिष्य ने मुनि से कहा कि इनको अर्घ्य दिया जाय या नहीं, यह विचार कर श्राज्ञा दीजिये, श्राप जो आज्ञा देंगे वही मैं करूंगा || ४५ |

ततोऽवगतवृत्तान्तोभूपतेस्तस्यसद्विजः। सम्भाषासनदानेनचक्रेसम्मानमात्मवान् ||४६ ||

 उस मुनिने फिर ध्यानसे राजाका वृत्तान्त जानकर अर्घ्य के लिये निषेध करदियां  और वातचीत से तथा श्रासन देकर राजाका सम्मान किया ||४६॥

ऋषिरुवाच

किंनिमित्तमिहायातोभवान्किंतेचिकिर्षितम् |

उत्तानपादतनयं वेद्मि त्वामुत्तमं नृप ॥४७॥

ऋषि बोले-

हे राजन् ! आप किस निमित्त से यहाँ श्रायेहैंतथाआपकीक्याइच्छाहै ? मैंजानताहूँआपमहाराज उत्तानपाद के पुत्र उत्तमं हैं ॥ ४७ ॥ राजोवाच

ब्राह्मणस्यगृहाद्भार्य्याकेनाप्यपहृतामुने। श्रविज्ञांतस्वरूपेणतामन्वेष्टुमिहागतः॥४८॥

राजा वोले—

हे मुनिजी ! किसी ने ब्राह्मण के घर से उसकी,स्त्री हरण करली है उसको ही ढूंढता हुआ मैं यहाँ आ पहुंचा ॥ ४८ ॥

पृच्छामियत्तेतन्मेत्वंप्ररणतस्यानुकम्पया। अभ्यागतस्याथगृहंभगवन्वक्तुमर्हसि ||४६

 हे भगवन् ! मैं विनयपूर्वक एक वात आपसे पूछता हूँ, आप दया करके मुझेवताइये क्योंकि मैं आपके घर पर आया हूँ ॥ ४६ ॥

ऋषिरुवाच

पृच्छमामवनीपालतत्प्रष्टव्यमशङ्कितः। वक्तव्यञ्चेत्तवमयाकथयिष्यामितत्त्वतः॥५०॥

ऋषि बोले-

हे महीपाल ! जो कुछ श्रापको पूछना हो वह निःशङ्क होकर पूछिये । उसको तत्त्वतः मैं  आपको बतलाऊँगा ॥ ५० ॥ .

राजोवाज गृहागताययोमद्यंप्रथमेदर्शनेमुने। त्वयासमुद्यतोदातुंकथंसोऽर्धोनिवर्त्तितः॥५१

राजा बोले--

हे ऋषि ! जब मैं आपके घर पर श्राया था तो देखते ही आपने अर्ध्य देने को कहा था, वह अर्ध्यफिर क्यों नहीं दिया गया - १ || ५१||

 विद्दर्शनेनरभसादाक्षप्तोऽयंमयानृप। यदातदाहमेतेन्शिष्येणप्रतिवोधितः॥५२॥

ऋषि बोले-

हे राजन् ! श्रापको देखकर जल्दी में मैंने अर्घ्य, देने की आज्ञा देदी थी परन्तु फिर इस शिष्य नेमुझे बोध कराया ॥ ५२ ॥

एषवेत्तिजगत्यत्रःमत्प्रसादादनांगतम्।

यथाहं समतीतंच वर्त्तमानञ्च सर्व्वतः ॥ ५३ ॥

जिसप्रकारमैंभूत,भविष्यऔरवर्तमानकाहालजानताहूँ उसीप्रकार मेरी कृपा से यह शिष्य भी जानता है ॥ ५३ ॥

आलोच्याज्ञापयेत्युक्तेततोज्ञातंमयापितत्। ततोनदत्तवानर्धमहंतुभ्यंविधानतः॥५४॥

जब इस शिष्य ने कहा कि विचार करके श्राज्ञादीजिये, तब मैंने श्रापका सब वृत्तान्त मनमें जान

लिया और श्रापको विधानपूर्वक अर्ध्य न दिया ।५४॥

सत्यंराजन्त्वमर्घाहःकुलेस्वायम्भुवस्यच। तथापिनार्घयोग्यंत्वांमन्यामोवममुत्तमम् ||५५||

हे राजन् ! यह सत्य है कि आप स्वायम्भुव केकुल में उत्पन्न होकर अर्ध्य के अधिकारी हैं

 परन्तुहम आपको अर्घ्य के योग्य नहीं मानते हैं ||५५||

राजोवाच किंकृतंहिमयाब्रह्मन्ज्ञानादज्ञानतोऽपिवा। येनत्वत्तोऽर्धमहमिनाहमभ्यागतविरात्॥५६.

राजा वोले-

हे ब्रह्मन् ! मैंने ज्ञान से अथवा अज्ञान से कौनसा पाप किया है  जिससे इतने दिन बाद आये हुएमुझको आप अर्ध्य के प्रयोग्य समझते हैं ||५६||

ऋषिरुवाच किंविस्मृतंयेयत्पत्नीत्वयात्यक्ताचकानने। परित्यक्तस्तमासार्द्धंत्वयाधर्मोनृपाखिलः॥५७॥

ऋषि बोले-

हे राजन् ! क्या आप भूल गये कि आपनेपत्नी को वन में छोड़ने से उसके साथ सम्पूर्ण

धर्मों को भी छोड़ दिया है ? ॥ ५७ ॥

पक्षेणकर्म्मणोहान्याप्रयात्यस्पर्शतांनरः। विएसूत्रैर्वार्षिकीयस्यहानिस्तेनित्यकर्म्मणः || ५८ |

जिस मनुष्यकी एक पक्षतक क्रियाओं की हानि हुई हो उसको स्पर्श नहीं करना चाहिये, जिसके नित्यकर्मों की | हानि एक वर्ष तक हुई हो उसका तो कहना ही क्या है ॥ ५८ ॥

पत्न्यानुकूलयाभाव्यंयथाशीलेऽपिभर्त्तरि। दुःशीलापितथाभार्य्यापोषणीयानरेश्वर || ५६||

 हे नरेश्वर ! जिस प्रकार पुरुष का कर्तव्य है कि अनुकूल और सुशीला स्त्री का पालन

करे, उसी प्रकार दुःशीला स्त्री का भी पोषणकरना मनुष्य को उचित है ॥ ५६ ॥

प्रतिकूलाहिसापत्नीतस्यविमस्ययाहृता। तथापिधर्म्मकामोऽसौत्वामुदयातितरांनृप॥६०॥

 हे राजन् ! इस ब्राह्मण की स्त्री र्याप इसे प्रतिकूल चलती थीपरन्तु धर्म की वामना से ये ब्रा आपसे अपनीस्त्री की याचना करता है ||६०||

चलतःस्थापयस्यन्यान्स्वधर्मेषुमहीपते। त्वांस्वधर्माद्विचलितंकोऽपरःस्थापयिष्यति॥६१

 हे पृथ्वीपते ! श्राप तो धर्म करने वालों को धर्म में स्थित करते हो परन्तु जब आप ही धर्म से विचलित होते हैं तोश्रापको कौन धर्म में स्थापित करेगा ॥ ६१ ॥

मार्कडेयउवाच विलक्ष्यःसमहीपालइत्युक्तस्तेनधीमता। तथेत्युक्त्वाचपप्रच्छहृतांपत्नींद्विजन्मनः॥६२॥

मार्कण्डेयजी बोले–

वह राजा ऋषि की यह बात सुनकर लज्जित हुआ और फिर ब्राह्मण की पत्नीकी चोरीके विषयमें पूछने लगा ॥ ६२ ॥

भगवन्केननीतासापत्नीविप्रस्यकुत्रवा। श्रतीतानागतंवंतिजगत्यवितथंभवान् ||६३ ||

 हे भगवन् ! ब्राह्मण की वह पत्नी किसने ली है तथा वह श्रत्र कहाँ है ? श्राप भूत, भविष्य और वर्तमान को जानते हैं, इसलिये कहिये ॥ ६३ ॥

ऋषिरुवाच

तांजहाराद्रितनयोबलाकोनामराक्षसः। द्रक्ष्यसेचाद्यतांभूपउत्पलावतकेबने॥६४

ऋषि बोले-

हे राजन् ! उस ब्राह्मणी को आदि के पुत्रवलाक नाम राक्षस ने चुराया है । आप उसकोआज ही उत्पला वर्तक वन में देख सकेंगे ॥ ६४ ॥

गच्छसंयोजयाशुत्वंभार्य्ययाहिद्विजोत्तमम्।

मा पापास्पदतां यातु त्वमिवासौ दिने दिने ॥६५ |

आपजाइयेऔरशीघ्रइसश्रेष्ठब्राह्मणकोइसकी पत्नीदिलवाइयेजिससेदिनपरदिनआपकीतरह यहभीपापकाभागीनबने॥६५॥ : इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंउत्तममन्वंतरनाम६हवाँअध्यायसमाप्त !