मार्कण्डेय महा पुराण
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कौटुकिरुवाच भगवन्विस्तरात्सर्व्वंममैतत्कथितंत्वया। करन्धमस्यचरितमवीक्षिच्चरितञ्चयत्॥१॥
कौटुकिजी बोले-
हे भगवन् ! आपने मुझसे महाराज करन्धम व राजकुमार वीक्षित का चरित्र विस्तार पूर्वककहा ||१||
त. नृपतेर्मरुत्तस्यमहात्मनः। श्रोतुमिच्छामिचरितंश्रूयतेसोऽतिचेष्टितः॥२
अब मैं वीक्षित के पुत्र मरुतका चरित्रसुनना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि महाराज मरुत्तबड़े चेष्टावान् थे ॥ २ ॥
चक्रवर्त्तीमहाभागःशूरःकान्तोमहामतिः। धर्म्मविद्धर्म्मकृच्चैवसम्यक्पालयिताभ्रुवः॥३॥
उनंचक्रवर्ती, महाभाग,शूरवीर, रूपवान्, वुद्धिमान्, धर्मज्ञ, धर्मात्मा ने पृथ्वीका भलीभांति पालनकिया॥३॥ मार्कण्डेयउवाच
सपित्रासमनुज्ञातंराज्यंप्राप्यपितामहात्। धर्मतःपालयामासपितापुत्रानिवौरसान्॥४
मार्कण्डेयजी बोले--
इन्द्र पिताकी श्राज्ञानुसार उन्होंने पितामहसे ज्य प्राप्त कर प्रजा का औरस पुत्र की भांति पर्वकपालन किया ॥ ४ ॥
इयाजसुबहून्यज्ञान्यथावत्स्वाप्तदक्षिणान्। ऋत्विक्पुरोहितादेश- रम्यचित्तोमहीपतिः॥५
उन महाराज मरुत्त ने ऋत्विक पुरोहित आदि के आदेश से प्रसन्न चित्त हक वहुत से यज्ञ किये और ब्राह्मणों को दक्षिणा दी ॥५
तस्याप्रतिहतंचक्रमासीदद्वीपेषुसप्तसु। गतिश्चाप्यनवच्छिन्नाख- पाताल - जलादिषु॥६
उसका राज्य सातों द्वीपों में अखण्ड था तथा श्राकाश, पाताल और जल आदि में उसकी गति
श्रवाध थी ॥ ६ ॥
ततःप्राप्यधनंविमयथावत्स्वक्रियापरः। यजत्समहायज्ञैर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥७
हे चित्र ! फिर उन्होंने धन संग्रह करके यथावत् अपनी क्रियाओंों में तत्पर होकर
महायज्ञ किये और इन्द्र आदि देवताओं का पूजन,किया ॥ ७ ॥
इंतरेचयथावर्णाःस्वेस्वेकर्म्मण्यतन्द्रिताः। तंदुपात्तधनाश्चक्रुरिष्टापूर्त्तादिकाःक्रियाः॥८
उनके राज्य में चारों वर्ण अपने-अपने वर्ण और श्राश्रम में प्रवृत्त होकर महाराज से धन
लेकर अरिष्टनाशक क्रियाएँ करते थे ॥ ८ ॥
पाल्यमानामहीतेनमरुत्तेनमहात्मना। पस्पर्द्धत्रिदशावास-वासिभिर्द्विजसत्तम॥६
हे श्रेष्ठ द्विज ! उन महात्मा मरुत्त ने पृथ्वी का भली प्रकार पालन किया। उनके ऐश्वर्यसे इन्द्रादिक देवतानों को महाराज से स्पर्द्धा होने लगी ॥ ६ ॥
तेनातिशायिताःसर्व्वेकेवलंनमहीक्षितः। यज्विनादेवराजोऽपिशतयज्ञाभिसन्धिभिः॥१०
उसने सवप्रजात्रों को धन आदि देकर अपने से भी अधिक कर दिया, अन्तर केवल इतना ही था कि वे राजा न कहलाते थे । उन्होंने सौ यज्ञ करके देवराज को भी अतिक्रमण किया ॥ १० ॥
ऋत्विक्तस्यतुसंवर्त्तोबभ्रुवाङ्गिरसःसुतः। भ्रातावृहस्पतेर्विप्रमहात्मातपसांनिधिः॥११॥
हे विम ! उसके पुरोहित अङ्गिरा मुनि के पुत्र, वृहस्पति के भाई. तपोनिधि महात्मा संवर्त हुए ॥ ११ ॥
सौवर्णोमुञ्जवान्नामपर्व्वतःसुरसेवितः। पातितं तेन तच्छुङ्ग हृतं तस्य महीपतेः । १२
देवतानों से सेवित मुञ्जवान् नाम पर्वत सुवर्ण का था । महाराज मरुत्त उसका शिखर तोड़कर अपने घर ले आये ॥ १२ ॥
तेनयस्याखिलंयज्ञेभूमिभागादिकंद्विज मासादाचकृताःशुभ्रास्तपसासर्व्वकाञ्चनाः॥१३
हे द्विज ! उन्होंने उस सुवर्ण से यज्ञ का भूमिभाग तथा महल इत्यादि सौने के वनवाये ॥ १३ ॥
गाथाश्चाप्यत्रगायन्तिमरुत्तचरिताश्रयाः। सातत्येनर्षयःसर्व्वेकुर्व्वन्तोऽध्ययनंयथा॥१४
मरुत्त के चरित्र की इन गाथाश्र को ऋषि लोग इस प्रकार गाते थे जिस प्रकार कि वेदाध्ययन किया जाता है ॥ १४ ॥
मरुत्तेनसमोनाभूद्रयजमानोमहीतले। सदःसमस्तंयद्यज्ञेप्रासादाचैवकाश्चनाः॥१५॥
इस पृथ्वी परमरुत्त के समान कोई यह करने वाला राजा नहीं हुआ जिसकी कि यज्ञशालायें और महल सुवर्ण के बने हुए थे ||१५||
श्रमाद्यदिन्द्रःसोमेनदक्षिणाभिर्द्विजातयः। विप्राणांपरिवेष्टारःशक्राद्यास्त्रिदशोत्तमाः ||१६||
उनके यक्षों में इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त होगये और ब्राह्मणों को जो दक्षिणा दी गई उससे देवताओं सहित इन्द्र बहुत लज्जितहुए ॥ १६ ॥
यथायज्ञेमरुत्तस्यतथाकस्यमहीपतेः। सुवर्णमखिलंत्यक्त'रत्नपूर्णगृहेद्विजैः॥१७॥
जिस प्रकार राजा मरुत्त के यक्ष हुए उस प्रकार किसी अन्य राजा के न हुए, कारण- ::
ब्राह्मण लोग जिनके घर रत्नादिकों से पूर्ण थे,सुवर्ण को यज्ञों में ही छोड़ जाते थे ॥ १७ ॥
प्रासादादिसमस्तश्चसौवर्णंतस्ययत्कृतौ। वयोवर्णाह्यलभ्यन्ततस्मात्केचित्तथाददुः१८॥
उनकेमहल और यक्षों में ब्राह्मणों द्वारा छोड़े हुए उस सुवर्ण को अन्य वर्गों के लोग लेखाये श्रीर उन्होंने उसमें से दान पुण्य किया ॥ १८ ॥
तेनंत्यक्तेनशिष्टा'ये'जनाःपूर्णमनोरथाः। चचज्ञानयजन्त्येवदेशेदेशेपृथक्पृथक्॥१६॥
उस छोड़े हुए धन को पाकर उन लोगों के मनोरथ सफल होगये और उन्होंने उस धन के द्वारा देश विदेशों मेंअनेकों यज्ञ किये ॥ १६ ॥
स्यैिवंकुर्व्वतोराज्यंसम्यक्पालयतःमजाः। उपस्वीकश्चिदभ्येत्यतमाहमुनिसत्तम ||२०||
हे मुनिसत्तम ! उसके इस प्रकार प्रजा को पालते तथा राज्य करते हुए किसी तपस्वी ने आकर उससे कहा ॥ २० ॥
पेतुर्मातातवाहेदंदृष्ट्वातापसमण्डलम्।। बेपाभिभूतमुरगैर्मदोन्मचैर्नरेश्वर॥२१॥
है. नरेश्वर ! तुम्हारे पिता की माता ने तपस्वियों के. समूह को मदोन्मत्त सर्पों के त्रिय से व्याकुल देख कर जो कुछ मुझसे कहा है वह सुनो ॥ २१ ॥
पितामहस्तेस्वर्यातःसम्यक्सम्पाल्यमेदिनीम्। पश्चरणशक्ताऽहमिहचौर्चाश्रमेस्थिता॥२२॥
तुम्हारे पितामह भली प्रकार पृथ्वी का पालन कर स्वर्ग को गये और मैं औौजी के आश्रम पर रह
कर तपस्या करती हूँ ॥ २२ ॥
साहंपश्यामिचैकल्यंतत्रराज्यंप्रशासतः। पितामहस्यतंनाभूदयत्पूर्व्वेषाश्चतेनृप॥२३॥
मैं देखती हूँ कि तुम्हारे राज्य में जो विकलता पितरों को हैं वह तुम्हारे पितामहंके राज्यमें न थी ||२३||
नूनंप्रमत्तोभोगेषुसक्तोवाऽविजितेन्द्रियः। चारान्धतायतस्तेषांदुष्टादुष्टंनवेत्सियत् ||२४||
तुम निश्चय ही भोगों में उन्मत्त हो रहे हो अथवा इन्द्रियों के वशीभूत होकर इतने अन्धे हो रहे हो कि साधु और असाधु को नहीं पहिचानते ||२४||
पातालादभ्युपेतैस्तुभुजगैर्दशशालिभिः। दष्टासुनिसुताःसप्तदूषिताश्चजलाशयाः ||२५||
पाताल से श्राकर सप ने सात मुनि कुमारों को काट खाया है तथा जलाशयों को अपने विपसे दूषित कर दिया ||२५||
स्वेदमूत्रपुरीषेणदूषितंचहुतंहविः। अपराधंसमुद्दिश्यदत्तोनागवलिश्चिरात् ||२६||
चूंकि पहिलेसे ही नागों की बलि दी जाती अतः इसको अपराध समझकर सर्पों ने होम
और हवियों को अपने पसीने, मूत्र और विष्ठा सेदूपित किया है ||२६||
एतेसमर्थसुनयोभस्मीकत्तुभुजङ्गमान्। किन्त्वेषांनाधिकारोऽत्रत्वमेवात्राधिकारवान्॥२७
वे मुनि उन सर्पों को भस्म करने के समर्थ हैं किन्तु इसका उनको अधिकार
नहीं है, इसका अधिकार केवल तुमको ही है॥२७॥
तावत्सुखंभूपतिजैभोंगजंप्राप्यतेनृप। अभिषेकजलंयावन्नसृर्दिनविनिपात्यते ||२८||
जब तक राजकुमारों का अभिषेक नहीं होता है तब ही तक उनको सुख हो सकता है ||२८||
कानिमित्राणिकःशत्रुर्ममशत्रोर्वलंकियत्। कोऽहंकेमन्त्रिणःपक्षेकेवाभूपतयोमम॥२६॥
राज्याभिषेक होने पर उनको सोचना चाहिये कि मेरे मित्र कौन हैं, शत्रु कौन हैं तथा शत्रुओं की सेना कितनी है, मैं कौन हूँ तथा मेरे पक्षमें कितने राजाहैं ? ॥ २६ ॥
विरक्तोवापरैर्भिन्नःपरेषामपिकीदृशः। कःसम्यगत्रनगरेविषयेवाजनोमम ||३०||
कौन विरक्त है, कौन दूसरों से अलग तथा कौन उनमें मिला हुआ है ? इस नगरमें कौन
मनुष्य विषय भोग में लिप्त हैं ? ॥ ३० ॥
धर्मकर्म्माश्रयीमूढःकःसम्यगपिवर्त्तते। 'कोदण्ड्यःपरिपाल्यःकःकेवापेक्ष्यानरामया३१
यहाँ कौनधर्म, कर्म में प्रवृत्त हैं तथा कौन मूर्ख हैं ? किसको दण्ड देना चाहिये, कौन पालन करने योग्य हैं, तथा किस मनुष्य को निर्वासित कर देना चाहिये॥३१॥
सन्धिभेदभयादत्रदेशकालमवेक्षता चारांश्चचारयेदन्यैरज्ञातान्भूपतिश्वरैः॥३२॥
राजाको साम, दाम, दण्ड, भेद करके श्राच• रंग करते हुए देश काल का विचार रखना चाहिये
तथा दूतों की भी नियुक्ति कर प्रजा का हाल जानना चाहिये ||३२||
चिवादिषुसर्व्वेषुचरान्दद्यान्महीपतिः ||३३||
सब मन्त्रियों पर भी राजा को चाहिये कि गुप्तचरों को लगा दे ||३३||
इत्यादौभूपतिर्नित्यंकर्म्मख्यासक्तमानसः। नयेद्दनंतथारात्रिंनतुभोगपरायणः ||३४||
आरम्भ से ही राजा को इन कार्यों में ध्यान देना चाहिये, उसको दिन रात्रि भोगों में लिप्त न रहना चाहिये ||३४||
राज्ञांशरीरग्रहणंनभोगायमहीपते।
क्लेशाय महतेपृथ्वीस्वधर्म्मपरिपालने ॥३५॥ |
हेराजन् ? राजाओंकाशरीरभोगकरनेके लियेनहींहोताहै।उनकोअपनाधर्मऔर पृथ्वी का पालन करने में बड़ा क्लेश होता है ||३५||
सम्यक्पालयतःपृथ्वींस्वधर्मश्चमहीपते। इहक्लेशोमहान्स्वर्गेपरमंसुखमक्षयम् ||३६||
राजाओं को भली भांति पृथ्वी का तथा अपने धर्म का पालन करते हुए इस संसार में महान कष्ट
होता है परन्तु स्वर्ग में पहुंच कर उनको अक्षयसुख होता है ॥ ३६ ॥
तदेतदवयुध्यत्वंहित्वाभोगान्नरेश्वर। पालनायक्षितेःक्लेशमङ्गीकत्तुमिहार्हसि॥३७॥
हे नरेश्वर ! अतः यह सब समझकर तुमको भोगोंको छोड़कर पृथ्वीके पालन, के लिये क्लेश को अङ्गीकार करना चाहिये ॥३७॥
इतिवृत्तमृषीणांयदव्यसनंत्वयिशासति। भुजङ्गहेतुकंभूपचारान्धोनापिवेत्सितत्॥३८॥
तुम्हारे शासन में जो व्यसन है उसके कारण ऋपियों की यह दशा है । हे राजन् ! तुम सधैँ ।
द्वारा मुनि कुमारों के मरण का वृत्तान्त भी नहीं,जानने हो ? ॥ ३८ ॥
बहुनात्रकिमुक्तेनदुष्टेदण्डोनिपात्यताम्। शिष्टान्पालयराजंस्त्वंधर्म्मपद्भागमाप्स्यसि३६॥
श्रधिककहनेसेक्याहै, दुष्टों कोदण्डदीजियेऔरसज्जनोंकापालनकीजिये जिससेकिहेराजन् ! उनकेधर्मकाछटा. भाग तुमकोमिले॥३६॥
रक्षन्पापमखिलंदुष्टैरविनयात्कृतम्। समवाप्स्यस्यसन्दिग्धंयदिच्छसिकुरुष्वतत्॥४०॥
यदि तुम प्रजा की रक्षा न करोगे तो जो पाप दुष्टों के दुर्विनय से होगा 'उस के निस्संदेह तुम भागी होओगे, श्रव. जो तुम्हारी इच्छा हो करो ||४०||
एतन्मयोक्तसकलंयत्तवाहंपितामही। कुरुष्वैवंस्थितेयत्तेरोचतेवसुधाधिप॥४१॥ | |
हे पृथ्वीपति ! यह मैंने श्राप से वह सव कहा जो आपकी दादी ने आप से कहने के लिये मुझसे कहा था ऐसी स्थिति में जो आपको अच्छा लगे वह करें* ॥४१॥
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंमरुत्तचरित्रनाम१२हवांश्र०स०।
Summary of chapter 129 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
King Marutta protects forest sages from demonic intrusions, entering into conflict with Nagas and rakshasas. Through his powerful bow and divine mantras, Marutta forces the invaders to seek peace and make restitution to the hermits.