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मार्कण्डेयवाच

आदित्यावसवोरुद्राःसाध्याविश्वेमरुद्गणाः। भृगवोऽङ्गिरसथाष्टौयत्रदेवगणाःस्मृताः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

वैवस्वत मन्वन्तर में श्रादित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, विश्वेगण, मरुद्गण, भृगुगण

और अङ्गिरसगण ये आठ देवताओंके गए कहाये॥ १ ॥

श्रादित्यावसवोरुद्राविज्ञेयाःकश्यपात्मजाः। साध्याश्चवसवोविश्वेधर्म्मपुत्रगणास्त्रयः॥२

श्रादित्य, वसु और रुद्रगण कश्यप के पुत्र हैं तथा साध्य, मरुत और विश्वेगण देवताओं केधर्मपुत्र कहे गये हैं ॥ २ ॥

भृगोस्तुभृगवोदेवाःपुत्राह्यङ्गिरसःसुताः। एषसर्गश्च मारीचो विज्ञेयः साम्प्रतं द्विजः ॥ ३ ॥

भृगुगरा भृगु के पुत्र हैंऔरअंगिरस अंगिराऋषिकी सन्तान है ।  हेद्विज । यह सर्ग मारीच नाम है जो इस समयतक वर्तमान है

ऊर्ज्जस्वी नाम चैवेन्द्रो महात्मा यज्ञभागभुंकू | अतीतानागतायेचवर्त्तन्तेसाम्प्रतञ्चये || ४ ||

और इस मनु के इन्द्र महात्माऊर्जस्त्रीहैं जोकियज्ञभागकेभोक्ताहैंऔरजोइन्द्र होचुके हैं, होने वाले हैं अथवा जो वर्तमान हैं॥४॥

सर्व्वेतेत्रिदशेन्द्रास्तुविज्ञेयास्तुल्यलक्षणाः। सहस्राक्षाःकुलिशिनःसर्व्वएवपुरन्दराः॥५

 उन सबको समान लक्षणवाला जाननाचाहिये वे सब एकहज़ार श्रांख वाले, वज्रको धारण करने.

वाले तथा पुरन्दर नाम से प्रसिद्ध होनेवाले हैं ॥ ५ ॥

मघवन्तोवृषाःसर्व्वेशृङ्गिणोगजगामिनः। तेशतक्रतवःसर्व्वेभूताभिभवतेजसः || ६ ||

 वे सब इन्द्र मधवान् शृङ्गी और गजगामी हैं ।  उनमें से हर एक ने सौ यज्ञ किये हैंतथा वे सब तेजस्त्री हैं ॥ ६ ॥

धर्म्माद्यःकारणैःशुद्धैराधिपत्यगुणान्विताः। भूतभव्यभवन्नाथाःशृणुचैतत्रयंद्विज॥७

ये इन्द्र धर्मादि शुद्ध आचरणों करके स्वामित्व को प्राप्त हुए हैं तथा भूत भविष्यत् और वर्तमानपर आधिपत्य करते हैं वहे द्विज ! इस मन्वन्तर के त्रैलोक्य को सुनो ॥७॥

भूर्लोकोऽयंस्मृताभूमिरन्तरीक्षंदिवःस्मृतम्। दिव्याख्यश्चतथास्वर्गस्त्रैलोक्यमितिगद्यते॥८

भूर्लोक पृथ्वी, दिवलोक अंतरिक्ष और दिव्यलोक स्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध हैं और यही इस मन्वंतरके त्रैलोक्य हैं ॥ ८ ॥

त्रिचैववशिष्ठश्चकाश्यपश्चमहानृषिः। गौतमथभरद्वाजोविश्वामित्रोऽथकौशिकः॥६

श्रत्रि, वशिष्ठ, काश्यप, गौतम भरद्वाज तथा कौशिक विश्वामित्र ॥ ६ ॥

तथैवपुत्रोभगवानृचीकस्यमहात्मनः। नमदग्निस्तुसप्तैतेमुनयोऽत्रतथान्तरे ||१०||

औरभगवान् ऋचीक के पुत्र यमदाग्नि यही सात इस मन्वन्तर के सप्तर्षि हैं ॥ १० ॥

इक्ष्वाकुर्नाभिगश्चैवधृष्टःशर्यातिरेवच। नरिष्यन्तश्चविख्यातोनाभगोदिष्टएवच॥११

इक्ष्वाकु, नाभग, धृष्ट,शर्याति, नरिष्यन्त, दिष्ट ॥ ११॥ करूपश्चपृषभ्रश्चवसुमान्लोकविश्रुतः मनोर्वैवस्वतस्यैतेनवपुत्राःप्रकीर्त्तिताः॥१२॥

करूप, पृपध औरवसुमान यही नौ पुत्र वैवस्वत मनु के संसार मेंप्रसिद्ध हैं ॥ १२ ॥

वैवस्वतमिदंब्रह्मन्कथितंतेमयान्तरम्। अस्मिन्श्रुतेनरःसद्यःपठितेचैवसत्तम।

मुच्यते पातकैः सर्वैः पुण्यश्च महदश्रुते || १३ | |

हेब्रह्मन् ! इसप्रकारमैंनेश्रापसेवैवस्वतमन्वन्तरकहा। इसकोसुनने सेयापढ़नेसे मनुष्यसवपापों से छूटकर महान्पुण्यकोप्राप्तकरताहै॥१३॥

इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंसावर्णिकमन्वन्तरमेंवैवस्वतकीर्तननाम७६वाँअध्यायसमाप्त।