मार्कण्डेय महा पुराण
12
पितोवाच साधु वत्स त्वयाख्यातं संसारगहनं परम् । ज्ञानप्रदानसम्भूतं समाश्रित्य महाफलम् ॥ १
पिता बोले- हे साधु पुत्र ! तुमने ज्ञान-प्रदानरूपी महाफल देकर इस गहन वन रूपी संसार का वर्णन किया ॥ १ ॥ तत्र ते नराः सर्व्वे यथा वै रौरवस्तथा । ' वर्णितास्तान् समाचक्ष्व विस्तरेण महामते ॥
हे महामते ! जिस तरह रौरव है उसी तरह अनेक नरक हैं। जिस तरह तुमने रौरव का वर्णन किया उसी तरह विस्तार पूर्वक सब नरकों का वृत्तान्त वर्णन करो ॥ २ ॥ पुत्र उवाच
रौरवस्ते समाख्यातः प्रथमं नरको मया । महारौरवसंज्ञन्तु शृणुष्व नरकं पितः ॥ ३
पुत्र बोला-- प्रथम नरक रौरव है जिसका हाल मैंने तुमसे वर्णन किया । हे पिता ! श्रथ महा रौरव नरक का वर्णन सुनिये ॥ ३ ॥ योजनानां सहस्राणि सप्त पंच समन्ततः । तत्र ताम्रमयी भूमिरधस्तस्य हुताशनः ॥ ४
वह चारों तरफ़ से बारह हज़ार योजन है, उसकी भूमि तांबे की है और उसके नीचे अग्नि है ॥ ४ ॥ तत्तापतप्ता सर्व्वाशा प्रोद्यदिन्दुसमप्रभा । विभात्यतिमहारौद्रा दर्शनस्पशनादिषु ॥
उसके ताप से स दिशायें तस हैं और उदयकालके चन्द्रमाके समान जिसकी ज्योति है । वह दर्शन और स्पर्शादि के लिये महा भयानक है ॥ ५ ॥ तस्यां बद्धः कराभ्याश्च पद्भ्याञ्चैव यमानुगैः । मुच्यते पापकृन्मध्ये लुठमानः स गच्छति ॥
उसी नरक के बीच में यमदूत हाथ और पाँव बाँधकर पापियों को डाल देते हैं और वह पापी उसमें गिरकर लोटता हूँ ||६|| काकैर्वकैट कोलूकैट विकर्मशकैस्तथा भक्ष्यमापस्तथा द्रुतं मार्गे विकृष्यते ॥ ७
और कौए, बगुले, हुडार, उल्लू, बिच्छू, मच्छर, गिद्ध आदि उसको मार्ग में खींच-खींच कर खाते 'हैं ॥ ७ ॥
दह्यमानः पितर्मातर्ब्रातिस्तातेति चाकुल: । वदत्यसकृदुद्विग्नो न शान्तिमधिगच्छति || ८
वह पापी पीड़ित होकर फिर बाप, मा, भाई, तात आदि को पुकारता है और उद्विग्न होता हुआ कहीं शान्ति नहीं पाता है ॥८ ॥ एवं तस्मान्नरैर्मोक्षो ह्यतिक्रान्तैरवाप्यते । वर्षायुतायुतैः पापं यैः कृतं दुष्टबुद्धिभिः ॥ ६
सहस्रों वर्षों तक दुष्ट-बुद्धि लोग पाप करने के कारण कष्ट भोग कर उससे मुक्त होते हैं ॥ ६ ॥ तथान्यस्तु तमो नाम सोऽतिशीतः स्वभावतः । महारौरववद्दीर्घस्तथा स तमसा वृतः ॥१०॥
इसी प्रकार तम नाम का दूसरा नरक है जो महा रौरव नरक से से भी अधिक दीर्घ है, स्वाभाविकतया जहाँ बहुत सर्दी पड़ती है और जो सदैव अन्धकार से श्रावृत रहता है ॥ १० ॥ शीतार्त्तास्तत्र धावन्तो नरास्तमसि दारुणे । परस्परं समासाद्य परिरभ्याश्रयन्ति च ॥ ११
शीत से व्याकुल वहाँ लोग ऋति दारुण अन्धकार में भागते हैं और एक दूसरे से लिपट कर श्राश्रय की तलाश में भ्रमण करते हैं । दन्तास्तेषाञ्च भज्यन्ते शीतार्त्तिपरिकम्पिताः । क्षुत्तृष्णामबलास्तत्र तथैवान्येऽप्युपद्रवाः ॥१२॥
शीत से प्रार्त होकर काँपते हुए उनके दाँत टूट जाते हैं, भूखं और प्यास से व्याकुल होकर अनेक उपद्रवों से युक्त होते हैं ॥ १२ ॥ हिमखण्डवह वायुर्भिनत्त्यस्थीनि दारुणः । : मज्जासृग्गलितं तस्मादश्नुवन्ति क्षुधान्विताः ॥ १३॥
हवाओं से उड़ कर हिमखण्ड उनकी हड्डियों को तोड़ते हैं और मांस और खून को खाते हैं ॥ १३ ॥ लेलिह्यमाना भ्राम्यन्ते परस्परसमागमे । एवं तत्रापि सुमहान् क्लेशस्तमसि मानवैः ॥१४॥
परस्पर समागम भूख से पीड़ित होकर वे अपने शरीर से गिरे हुए में पापी लोग एक दूसरे का शरीर चाटते हैं, इस कष्ट पाते हैं ॥१४॥ ब्राह्मणश्रेष्ठ यावद्दुष्कृतसंक्षयः ।
निकृन्तन इति ख्यातस्ततोऽन्यो नरोत्तमः ॥१५ |
हे पिता ! जवतक जीवके दुष्कृत प्रकार उस महान् अन्धकार में पापी लोग महान् का क्षय नहीं होता तबतक वह नरकमें रहता है ।इसके अतिरिक्त निकृन्तन नाम का दूसरा नरक है ॥ १५ ॥ तस्मिन् कुलालचक्राणिभ्राम्यन्त्यविरतं पितः । तेष्वारोप्य निकृत्यन्ते कालसूत्रेण मानवाः || १६ ||
हे पिता ! वह कुम्हार के चाक की तरह अविरल रूप से भ्रमता है और वहाँ पापियों को काल सूत्र से काटा जाता है ॥ १६ ॥ यमानुगांगुलिस्थेन चापादतलमस्तकम् । न चैषां जीवितभ्रंशो जायते द्विजसत्तम ||१७||
हे द्विजसत्तम ! यमदूत लोग कालसूत्र अंगुली में लपेट कर उससे पापियों को पाँव से मस्तक तक काट डालते हैं, लेकिन फिर भी उन पापियों की मृत्यु नहीं है ॥ १७ ॥ छिन्नानि तेषां शतशः खण्डान्यैक्यं व्रजन्ति च । एवं वर्षसहस्राणि छिद्यन्ते पापकर्मिणः || १८ ||
उनके शरीरों के सैकड़ों खण्ड हो जाते हैं और वे खण्ड पुनः मिलकर एक हो जाते हैं, इस प्रकार वे पापी हज़ारों वर्ष तक छेदे जाते हैं । तावद्यावदशेषं वै तत्पापं हि क्षयं गतम् । अप्रतिष्ठञ्च नरकं शृणुष्व गदतो मम ॥ १६ ॥
जबतक उनके पाप क्षय होकर निःशेष नहीं होजाते तब तक उनको उस नरकमें रहना पड़ता है। मैं प्रतिष्ठ नाम नरक का हाल कहता हूँ उसको सुनिये ॥ १६ ॥ यंत्रस्थैर्नारिकैर्दुःखमसह्यमनुभूयते
तान्येव तत्र चक्राणि घटीयन्त्राणि चान्यतः ॥ २०
उसमें रहकर मारकी लोग दुःख का अनुभव करते हैं । उसी में चक्र और दूसरे घटीयन्त्र स्थित हैं ॥ २० ॥ दुःखस्य हेतुभूतानि पापकर्म्यकृतां नृणाम् । चक्रेष्वारोपिताः केचिद्भ्राम्यन्ते तत्र मानवाः ॥२१॥
पापी लोग दुः पाने के हेतु चक्र पर बैठा कर घुमाये जाते हैं ॥२॥ यावद्वर्षसहस्राणि न तेषां स्थितिरन्तरा । घटीयन्त्रेषु चैवान्यो बद्धस्तोये यथा घटी ||२२||
जब तक हज़ार वर्ष पूरे नहीं होते तब तक उनक वही स्थिति रहती है । घटीयन्त्र से भी जिस जल का कलश बाँधा जाता है वे बाँधे जाते हैं २२ ॥ भ्राम्यन्ते मानवा रक्तमुद्विगरन्तः पुनः पुनः । मुखविनिष्क्रान्तैः नेत्रैरश्रुविलम्बिभिः ॥२३॥
उन मनुष्योंके घूमते-घूमते रुधिर : लगता है, खों से उनका मुखं चौड़ाया जाता और नेत्रों से उनके आँसू निकला करते हैं ॥ २३ ॥ दुःखानि ते प्राप्नुवन्ति यान्यसह्यानि जन्तुभिः । असिपत्रवनं नाम नरकं शृणु चापरम् ||२४||
उन जीवों द्वारा जो असह्य दुःख हैं वे भोगें जाते हैं | अब असिपत्र वन नामक अन्य नरक का सुनिये ॥ २४ ॥ योजनानां सहस्र' यो ज्वलदग्न्यास्तृतावनिः । तप्ताः सूर्य्यकरैश्च एडैर्यत्रातीव सुदारुणैः ॥२५॥
सहस्र योजन जिसका विस्तार है, और जिसकी पृथ्वी अग्नि से प्रज्वलित है और. प्रचण्ड सूर्य की किरणों से दारुण है ॥
प्रपतन्ति सदा तत्र प्राणिनो नरकौकसः । तन्मध्ये च वनं रम्यं स्निग्धपत्रं विभाव्यते ॥ २६ ॥
लोग सदा ऐसे नरक में गिराये जाते हैं और उस के मध्य में जो वन है उसमें पत्ते तलवार की तेज़ हैं ॥ २६ ॥ पत्राणि तत्र खङ्गानां फलानि द्विजसत्तम । 'श्वानश्च तत्र सबलाः स्वनन्त्ययुतशोभिताः ||२७||
हे द्विजसत्तम ! वहाँ तलवारों पत्ते और फल हैं और वहाँ बड़े-बड़े बलवान् कुत्ते. झुण्ड के झुण्ड, भुंकते रहते हैं ॥ २७ ॥ महावक्त्रा महादंष्ट्रा व्याघ्रा इव भयानकाः । ततस्तद्वनमालोक्य शिशिरच्छायमग्रतः ॥२८॥
जो बड़े वाले हैं और जिनके बड़े दाँत हैं और जो व्याघ्रों समान भयानक हैं। उस बनकी छाया को शीत चढ़ आता है ॥ २८ ॥
: मयान्ति प्राणिनस्तत्र तीव्रतृटपरिपीड़िताः । हा मातर्हा तात इति क्रन्दन्तोऽतीव दुःखिताः॥ २६ ॥
प्राणी वहाँ प्यास से दुःखित होकर 'हा मांता ! हा पिता आदि कहकर विलाप करते हुए अति दुःखी ह हैं ॥ २६ ॥ दह्यमानाङियुगला धरणीस्थेन वह्निना । तेषां गतानां तत्रासिपत्रपाती समीरणः ॥३०॥
श्रग्नि से भूमि के जलती रहने के कारण". वारों की तरह चोट लगती है ॥ ३० ॥ प्रवाति तेन पात्यन्ते तेषां खड्गान्यथोपरि । ततः पतन्ति ते भूमौ ज्वलत्पावकसश्चये ||३१||
पतों क वहाँ पैर जलते हैं । तथा पत्तों के हिलने से तल- ऊपर से गिरना तलवारों की तरह होता है,वे पृथ्वी पर अग्नि के ढेर की तरहं निरते हैं ॥३१
लेलिह्यमाने चान्यत्र व्याप्ताशेषमहीतले ।
सारमेयास्ततः शीघ्रं शातयन्ति शरीरतः ||३२||| जीवोंकी जिल्ला बाहर निकल आने के कारण वे पृथ्वी को चाटते से मालुम होते हैं, कुत्ते शीघ्र ही उनके शरीर से लिपट जाते हैं ॥ ३२ ॥
तेषामङ्गानि रुदतामनेकान्यतिभीषणाः । असिपत्रवनं तात मयैतत् कीर्त्तितं तव ॥ ३३ ॥
उनके ों की यह दशा होने के कारण वे रोते हैं । हे तात ! असिपत्र वन का हाल मैंने तुमसे वयान किया ॥ ३३ ॥ अतः परं भीमतरं तप्तकुम्भं निबोध मे । समन्ततस्तप्तकुम्भा वह्निज्वालासमावृताः ||३४||
श्रव उससे भी परम भीषण तप्तकुंभ - नामक नरक का हाल सुनिये । तप्तकुम्भ के चारों श्रोर अग्नि की ज्वालायें हैं ॥ ३४ ॥ ज्वलदग्निचयोद्वद्वृत्ततैलायश्वर्णपूरिताः तेषु दुष्कृतकर्माणो याम्यैः ह्यधोमुखाः ॥३५॥
वह जलती हुई अग्नि, गर्म तेल और बालू से पूर्ण है । उसमें नीचे मुख किये हुए पापकर्म्मा मनुष्यों को यमदूत फेंक देते हैं ॥ ३५ ॥ काथ्यन्ते विस्फुटाद्गात्र गलन्मज्जजलाविलाः । स्फुरत्कपालनेत्रास्थि-च्छिद्यमाना विभीषणैः ||३६||
वहाँ उनके शरीर के अों का क्वाथ बन जाता है और शरीर गत मज्जा और ।जल जलता है । उनके कपाल, नेत्र और अस्थियों को बड़े - बड़े भयानक ॥ ३६ ॥ गृधैरुत्पाव्य मुच्यन्ते पुनस्तेष्वेव वेगितैः । पुनः सिमसिमायन्ते तैलेनैक्यं व्रजन्ति च ||३७||
गिद्ध उपाड़कर छोड़ देते हैं फिर उनको उसी दशा में करके यमदूतलोग उन्हें खौलते तेल में डाल देते हैं ॥ ३७ ॥ द्रवीभूतैः शिरोगात्र-स्नायु-मांस-त्वगस्थिभिः । ततो याम्यैर्नरैराशु दर्व्या घट्टनघट्टिताः ॥ ३८ ॥
इस से उनका शिर, गात्र, स्नायु, मांस, त्वचा और अस्थियाँ द्रवीभूत हो जाती हैं। फिर यमदूत लोग हाथ में थुवा लेकर उनको उलट-पलट करते हैं ॥ कृतावर्ते महातैले मध्यन्ते पापकर्मिणः । एष ते विस्तरेणोक्तस्तप्तकुम्भो मया पितः ॥ ३६ ॥ इसी प्रकार खौलते हुए तेल के तप्तकुम्भ में पापियों को मथते हैं । हे पिता ! यह मैंने श्रापसे तप्तकुम्भ नामक नरक का वर्णन विस्तार पूर्वक कहा ॥ ३६ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में पिता-पुत्र संवादके अंतर रौरवादिनरकाख्यान नाम बारहवाँ अध्याय समाप्त
Summary of chapter 12 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The narrative vividly describes Yamaloka and the various subterranean hellish realms where departed souls undergo purification for sinful deeds. Yama's messengers guide souls along terrifying paths filled with burning sands and sharp thorns according to their past karma. Realms such as Raurava, Mahāraurava, and Taptakumbha serve as karmic mirrors where cruelties inflicted on others are reaped until the soul's unrighteous impressions are burned away.