मार्कण्डेय महा पुराण
57
कौटुकिरुवाच
भगवन्कथितन्त्वेतज्जम्बूद्वीपंसमासतः।
यदेतद्भवता प्रोक्तं कर्म्म नान्यत्र पुण्यदम् ॥ १
कौटुकि बोले:-
हे मार्कण्डेय जी । जम्बूद्वीप का वर्णन आपनेपूर्णतया किया तथा आपने यह भी कहा कि वहाँपुण्य का देने वाला कर्म ॥ १ ॥
पापाय वा महाभाग वर्जयित्वा तु भारतम् ।
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यंचान्तश्च गम्यते ॥ २ ॥
और पाप आदिभारत वर्ष के अतिरिक्त कहीं नहीं है । भारत में ही स्वर्ग, मोक्ष, जन्म और मरण है ||२
न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म्मविधीयते ।
तस्माद्विस्तरशो ब्रह्मन् ममैतद्भारतं वद ॥३॥
अन्यत्रवर्षमनुष्यों के लिये कर्म का विधान नहीं है परन्तु भारत वर्ष कर्म भूमि कहलाती है ।
इसलियेहेविप्रवर ! इस भारतवर्ष का वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
येचास्यभेदायावन्तोयथावत्स्थितिरेवच। पोऽयंद्विजशार्दूलयेचास्मिन्देशपर्व्वताः॥४
हे ब्रह्मन् ! इसके भेद, इसकी स्थिति और इसमें जो देश और पर्वत हैं उनका भी वर्णन करिये ॥ ४ ॥
मार्कण्डेयउवाच
भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोध मे । समुद्रान्तरिताज्ञेयास्तेत्वगम्याःपरस्परम्॥५॥
मार्कण्डेयजी बोले-
हे कौटुकि ! भारतवर्ष के नौ भाग ( भेद ) हैं. और यह समुद्र तक फैले हुए है तथा एक दूसरेसे अगम्य हैं ॥ ५ ॥
इन्द्रद्वीपःकशेरुमांस्ताभ्रवर्णोगभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथासौम्योगान्धव्त्रोंवारुणस्तथा।।६
(१) इन्द्रद्वीप (२) कशेरुमान (३) ताम्रवर्ण (४) गभस्तिमान् (५) नागद्वीप (६) सौम्य (७) गान्धर्व और ( ८ ) वारुण ॥ ६ ॥
श्रयन्तुनवमस्तेषांद्वीपःसागरसंवृतः। योजनानांसहस्रंवैद्वीपोऽयंदक्षिणोत्तरात्॥७
नवाँ भारतवर्ष है ये समुद्र से घिरा हुआ है तथा इस द्वीप का विस्तार उत्तर से दक्षिण तक एकहज़ार योजन है ||७|
पूर्वेकिरातायस्यान्तेपश्चिमेयवनास्तथा। ब्राह्मणाःक्षत्रियावैश्याःशूद्राचान्तःस्थिताद्विज८॥
इसके पूर्व में किरात तथापश्चिम में यवन रहते हैं । हे विप्र ! इसमें ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्थित हैं ॥ ८ ॥
इज्याध्यायवणिज्याद्यःकर्म्मभिःकृतपावनाः। तेपांसंव्यवहारश्चएभिःकर्मभिरिष्यते॥९॥
यज्ञ, वेद-और व्यवसाय आदि कर्मों से ये चारों वर्णपवित्र होते हैं तथा इन्हीं कर्मों से इनका व्यवहारभी चलता है ॥ ९ ॥
स्वर्गापवर्गमाप्तिश्चपुण्यंपापंचवैतदा। महेन्द्रोमलयःसाःशुक्तिमातृक्षपर्व्वतः। विन्ध्यश्चपारिपात्रश्चसप्तैवात्रकुलाचलाः॥१०॥
तथा इन्हीं कर्मों से इनको स्वर्ग और अपवर्ग मिलता है तथा पाप और पुण्य होते हैं । महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और परिपत्र ये सात इसमें पर्वत हैं ||१०||
तेषांसहस्रशश्वान्येभूधरायेसमीपगाः॥११॥
तथा इनके समीप और भी हज़ारों पहाड़ हैं ॥११॥
विस्तारोच्छ्रायणोरम्याविपुलाचात्रसानवः। कोलाहलःसर्वैभ्राजोमन्दरोदर्दुराचलः॥१२॥
इनके अतिरिक्त बहुत से लम्बे चौडे, रमणीक, ऊँचेऔर विशाल सानव हैं। कोलाहल, सबैभ्राज,मन्दर, दुर्दराचल ||१२||
वातस्वनोवैद्यतथसैनाकःस्वरसस्तथा। तुङ्गप्रस्थोनागगिरीरोचनःपाएडुराचलः॥१३॥
वातस्वन, वैद्य ुत, मैनाक, स्वरस, तुप्रस्थ, नागगिरि और पाण्डुराचल ॥१३॥
पुष्पोगिरिदुर्ज्जयन्तोरैवतोऽर्बुदएवच। ऋष्यमूकःसगोमन्तःकूटशैलःकृतस्मरः॥१४॥
पुष्पगिरि, दुर्जयन्त, रैवत, अर्बुद, ऋष्यमूक,सगोमन्त, कूटशैल, और कृतस्मर ॥१४॥
श्रीपर्व्वतथकोरश्चशतशोऽन्येचपर्व्वताः। तैर्विमिश्राजनपदाम्लेच्छाचाय्र्याश्चभागशः॥१५
श्रीपर्यंत,कोर तथा अन्य सैकड़ों पर्वत हैं, इन पर्वतों के आस पास म्लेच्छ और श्रार्य जातियाँ रहती ||१५||
तैःपीयन्तेसरिच्छ्रेष्ठायास्ताःसम्यनिबोधमे। गङ्गासरस्वतीसिन्धुचन्द्रभागातथापरा || १६ ||
ये लोग जिन श्रेष्ठ नदियों का जल पीते हैं उनके नाम सुनो, गङ्गा, सरस्वती, सिन्धु औरचन्द्रभागा ॥ १६ ॥
यमुनाचशतद्रुश्चवितस्तेरावतीकुदुः। गोमतीधूतपापाचवादासदृशद्वती॥१७॥
और यमुना, शतद्रु, वितस्ता,इरावती, कुहु, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दशद्वती॥ १७ ॥
विपासादेविकारंक्षुर्निश्चीरागण्डकीतथा। कौशिकीचापगाविमहिमवत्पादनिःसृताः॥१८॥
विपासा, देविका, रक्ष, निश्चीरा, गण्डकी, कौशिकी ये सब नदियाँ हिमालय पर्वत से निकलती हैं ॥१८॥
वेदस्मृतिर्वेदवतीवृत्रघ्नीसिन्धुरेवच। 'वेवासानन्दनीचैवसदानीर॥महीतथा॥१९॥
वेदस्मृति, वेदवती, वृत्रघ्नी, सिन्धु,वेण्वा, नन्दनी, सदानीरा, तथा मही ॥ १९ ॥
पाराचर्म्मण्वतीतापीविदिशावेत्रवत्यपि। शिप्राह्यवर्णीचतथापारिपात्राश्रयाःस्मृताः॥२०
पारा,चमरावती, तापी, विदिशा, वेत्रवती, शिप्रा, और श्रवण इन सब नदियों का उद्मम स्थानपर्वत है ॥ २० ॥
शोणोमहानदश्चैवनर्मदासुरथादिना।
मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथापरा ||२१||
शोण, महानद, नर्मदा, सुरथा अद्विजा, मन्दाकिनी, दशार्णी, चित्रकूटा तथा ॥२१॥
चित्रोत्पलासतमसाकरमोदापिशाचिका। तथान्यापिप्पलिश्रोणिर्विपाशावञ्जुलानदी||२२||
चित्रोत्पला, सतमसा, करमोदा, पिशाचिका, पिप्प- लिश्रोणि, विपाशा, और वंजुला ॥ २२ ॥
सुमेरुजाशुक्तिमतीशकुलीत्रिदिवाक्रमुः। स्कन्धपादप्रसूतावैतथान्यावेगवाहिनी॥२३॥
सुमेरुजा,शुक्तिमती, शकुली, त्रिदिवाक्रमु, स्कन्धपाद प्रसूतातथा वेग वाहिनी ||२३||
शिप्रापयोष्णीनिर्विन्ध्यातापीसनिषधावती। वेरावावैतरणीचैवसिनीवालीकुमुद्वती॥२४॥
शिप्रा, पयोष्णी, निर्विन्ध्या तापी, सनिषधावती वेरवा, वैतरणी, सिनीवाली,कुमुद्वती ॥ २४ ॥
करतोयामहागौरीदुर्गाचान्तःशिरातथा। विन्ध्यपादप्रसूतास्तानद्यःपुण्यजलाःशुभाः॥२५॥
करतोया, महागौरी, दुर्गा, अन्तःशिरा ये सब पुण्य सलिला शुभ नदियाँ विन्ध्याचलपर्वत से निकलीं हैं ॥ २५ ॥
गोदावरीभीमरथाकृष्णवेण्वातथापरा। तुङ्गभद्रासुप्रयोगावाह्याकावेर्य्यथापगा ||२६||
गोदावरी, भीमरथा,कृष्णवेण्वा, तुङ्गभद्रा, सुप्रयोगा, वाह्या,और कावेरी||२६||
लिपादविनिष्क्रान्ताइत्येताःसरिदुत्तमाः। कृतमालाताम्रपर्णीपुष्पजासूत्पलावती॥२७॥
ये उत्तम नदियाँ लिह्यपाद पर्वत से निकली हैं । कृतमाला, ताम्रपर्णी, पुष्पजा और उत्पलावती॥ २७ ॥
मलयाद्रिसमुद्भूताःनद्यःशीतजलास्त्विमाः। पितृसोमर्षिकुल्याचइक्षुकात्रिदिवाचया ||२८|||
ये शीतल जल वाली नदियाँ मलयाचलपर्वत से निकली हैं । पितृसोमा, ऋषिकुल्या, इतुका,औरत्रिदिवा॥२८॥
लाङ्गलिनी वंशकरा महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः ।
ऋषिकुल्या कुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी ॥२९॥
तथालाङ्गलिनीऔरवंशकरा येमहेन्द्रपर्वतसेनिकलतीहैं।ऋषिकुल्या, कुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी॥२९॥
कृपापलाशिनीचैवशुक्तिमत्प्रभवाःस्मृताः।
सर्व्वाःपुण्याःसरस्वत्यःसर्व्वागङ्गाःसमुद्रगाः॥३०॥
और कृपा तथा पलाशिनी इन नदियों की उत्पत्ति शुक्तिमान्पर्वतसेहै। ये सबपुण्यवतीनदियाँ सरस्वती,गङ्गा और समुद्र, में गिरी हैं ॥ ३० ॥
विश्वस्यःमातरःसर्व्वाःसर्व्वाःपापहराःसृताः।
अन्याः सहस्रशश्वोक्ताः क्षुद्रनधो द्विजोत्तम ||३१||
हेक्रौष्टुकि जी ! येसबजगतकीमाताएंहैंतथासबपापोंकोहरणकरनेवालीहैं। भारतवर्षमेंऔरभीछोटी छोटी हज़ारों नदियाँ हैं ॥ ३१॥
प्रादृट्कालवहाःसन्तिसदाकालवहाश्चयाः।
मत्स्याश्वकूटाःकुल्याश्च कुन्तलाः काशिकोशलाः ॥३२॥
इनमेंसेकुछनदियाँतोवर्षाऋतुमेंहीबहतीहैंऔरकुछ सदैव वहा करती हैं । मत्स्यदेश, अश्वकूटा,कुल्या, कुन्तला, काशी और कोशला।।३२।।
अथर्वाश्चार्कलिङ्गाश्चमलकाश्चवृकैःसह। मध्यदेश्याजनपदाःप्रायशोऽमीप्रकीर्त्तिताः॥३३॥
अथर्वश्रकलिङ्ग, मलक और वृक ये सब देश मध्यप्रदेश शीय कहलाते हैं ॥ ३३ ॥
सह्यस्यचोत्तरेयास्तुयत्रगोदावरीनदी।
पृथिव्यामपिकृत्स्नायांसप्रदेशोमनोरमः || ३४ | | |
सह्य पर्वत के उत्तर में जहाँगोदावरीनदीवहतीहै वहप्रदेशसमस्तपृथ्वी में अत्यन्त मनोहर है ||३४||
गोवर्द्धनंपुरंरम्यंभार्गवस्यमहात्मनः। वाहीकावाटधानाश्चआभीराःकालतोयकाः॥३५
मुनि शुक्राचार्यका जो गोवर्द्धन नगर है वह भी परम रमणीक है । वाल्हीक, वाटधान, श्राभीर, कालतोयक ॥ ३५ ॥
अपरान्ताश्चशूद्राश्चपलवाश्चर्म्मखण्डिकाः। गान्धारायवनांश्चैवसिन्धु- सौवीर- मद्रकाः॥३६॥
अपरान्त, शूद्र, पल्लव, चर्मखरिडक, गान्धार, यवन, सिन्धु, सौवीर, मद्र ॥ ३६ ॥
शतद्रुजाःकलिङ्गाश्चपारदाहारभूषिका: । माठराबहुभद्राश्चकैकेयादशमालिकाः ||३७||
शतद्रु, कलिङ्ग,पारद, हारभूपिक। माठर, बहुभद्र, कैकेय और दशमालिक ॥ ३७ ॥
क्षत्रियोनिवेशाश्चवैश्यंशूद्रकुलानिच।
काम्बोजा दरदाश्चैव वर्व्वरा हर्षवर्द्धनाः ||३८|
इनसबदेशोंमेंक्षेत्री, वैश्यऔरशह लोग रहते हैं । काम्बोज, दरद, बर्बर औरहर्षवर्द्धन ||३८||
चीनाश्चैव तु खाराश्च बहुला वाह्यतो नराः । श्रात्रेयाश्चभरद्वाजाःपुष्कलाश्चकशेरुकाः॥३६॥
चीन, खार, बहुल, बाह्यतोनर, श्रात्रेय, भरद्वाज, पुष्कलऔरकशेरुक॥३६॥
लम्पाकाःशूलकाराश्चचुलिकाजागुड़ेंःसह। औषधाश्चानिभद्राश्चकिरातानाञ्चजातय: ४०॥
लम्पाक, शुलकार, चुलिक, जागुड़, श्रौषध और. निभद्र इन देशों में किरात लोग रहते हैं ॥ ४० ॥
माहंसमाकामीरास्तुङ्गनास्तथा । शूलिकाःकुहकाश्चैवजर्णादर्व्वास्तथैवच॥४१॥
तामस, हंसमार्ग, काश्मीर, तुङ्गन, शुलिक, कुहक, ज और दर्व्व ॥४१॥
एतेदेशाछुदीच्यास्तुप्राच्यान्देशान्निबोधमे। अधारकामुदकराअन्तर्गियवहिर्गिराः॥४२॥
ये देश श्रौदीच्यों के रहने केहैं व पूर्वी देशोंको मुझसे सुनो। अधारक, मुदकरअन्तर्गिरी, वहिर्गिर ॥ ४२ ॥
यथामवङ्गा, रङ्गेयामानदामानवर्त्तिकाः। ब्राह्मोत्तराःप्रविजयाभार्गवाज्ञेयमलुकाः ||४३||
प्रवस, रङ्गेय, मानद,मानवर्तिक, ब्राह्मोत्तर प्रविजय, भार्गव, ज्ञेयमल्लक॥४३॥
प्राग्ज्योतिषाश्चमद्राश्चविदेहास्ताम्रलिप्तकाः। मलामगध - गोमन्ताःमाच्याजनपदाःस्मृताः॥४४॥
प्राग्ज्योतिष, मद्र, विदेह, ताम्रलिप्तकं, मल्ल, मगध-गोमन्त ये पूर्वी देश कहलाते हैं ॥४४॥
अथापरेजनपदादक्षिणापथवासिनः। पुण्ड्राश्चकेरलाश्चैवगोलाङ्गूलास्तथैवच॥४५
इनकेअतिरिक्त दक्षिण दिशावतीं देश हैं। पुराडू, केरल,गोलाङ्गुल || ४५ ॥
शैलूपासूपिकाश्चैवकुसुमानामवासका: । महाराष्ट्रामाहिपकाकलिङ्गाचैवसर्व्वशः॥४६॥
शैलुप मूपिक, कुसुम, बासक, महाराष्ट्र, माहिपक, कलिङ्ग ॥४६॥
भीराःसहवैशिक्या, आढक्याशवराश्चये।
पुलिन्दा विध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकः सह ||४७||
आभीर, वैशिक्य, आढक्य, शवर, पुलिन्द, विन्ध्यमौलेय, 'वैदर्भ, दण्डक ||४७||
पौरिकामौलिकाश्चैवअश्मकाभोगवर्द्धनाः। नैपिकाःकुन्तलाअन्धाउद्भिदावनदारकाः || ४८॥
पौरिक, मौलिक, अश्मक, भोगवर्द्धन नैषिक, कुन्तल, अन्ध, उझिज, वनदारक ४८॥
दाक्षिणात्यास्त्वमीदेशाअपरान्तान्निबोधमे। सूर्य्यारिकाःकालिवलादुर्गाश्चानीकटैःसह॥४९॥
ये देश दक्षिणी हैं, अब अपरान्त देशों को सुनो। सूर्य्यारक, कालिवल, दुर्गा, अनीकट ॥४९॥
पुलिन्दाथसुमीनाथरूपपाःस्वापदैःसह। तथाकुरुमिनश्चैवसर्व्वेचैवकठाक्षराः॥५०
पुलिन्दसुमीन, रूपप, स्वापद, कुरुमिन, कठाक्षर ॥ ५० ॥
नासिक्यावाश्चयेचान्येयेचैवोत्तरनर्मदाः। भीरुकच्छा: समाहेयाःसहसारस्वतैरपि॥५१
नासिक्य तथा दूसरे जो नर्मदा के उत्तर में हैं, भीरुकच्छ, समाहेय और सारस्वत ॥५१॥
काश्मीराथसुराष्ट्राचयावन्त्याश्चादैःसह। इत्येते [परान्ताश्चशृणुविन्ध्यनिवासिनः॥५२॥
काश्मीर,सुराष्ट्र अवन्त, अर्बुद, इन देशों के रहने वाले अपरान्त हैं, अव विन्ध्य निवासियों को सुनो ॥५२॥
सरजाश्चकरूपाश्चकेरलाश्चोत्कलैःसह। उत्तमर्णादशार्णाश्चभोज्याःकिष्किन्धकैःसह॥५३॥
सरज, करूष, केरल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज्य, किष्किंधक ॥५३॥
तोशलाःकोशलाचैवत्रैपुरावैदिशस्तथा तुम्बुरास्तुम्बुलाश्चैवपटवोनैषधैःसह॥ ५४॥
कोशल, कोशल, त्रैपुर, वैदिश, तुम्बुर तुम्बुल, पट नैषध ॥ ५४॥
अन्नजास्तुष्टिकासश्चवीरहोत्राह्यवन्तयः।
एते जनपदाः सर्व्वे विन्ध्य पृष्ठनिवासिनः || ५५॥
अन्न, तुष्टिकार, वीरहोत्र, अवन्तीयेलोगइन्हींकेनामपरबनेदेशों में विन्ध्याचल पर्वत की पीठ पर रहते हैं ॥ ५५ ॥
तो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्व्वताश्रयिणश्च ये । नीहाराहंसमार्गाश्चकुरुवोगुर्गणाःखसाः॥५६
व उन देशों को कहूँगा जो पर्वतों पर स्थित हैं, नीहार. हंसमार्ग, कुरव, गुण, खस ॥ ५६ ॥
कुन्तप्रावरणाश्चैवऊर्णादार्व्वासकृत्रकाः। त्रिगर्त्तामालवाश्चैवकिरातास्तामसैःसह॥५७|| |
कुन्तप्रावरण, ऊर्ण, दाव, कृत्रक, त्रिगर्त, मालव, किराततामस॥५७॥
कृतत्रेतादिकश्चात्रचतुर्युगकृतोविधिः।
एतत् तु भारतं वर्षं चतुःसंस्थानसंस्थितम् || ५८
सतयुग आदि चारों युगों से युक्त जिसमें विधि है, इस प्रकार चारों ओर से बसा हुआ भारत वर्ष है ॥ ५८ ॥
दक्षिणापरितोह्यस्यपूर्वेणचमहोदधिः।
हिमवानुत्तरेणास्य काम्मुकस्य यथा गुणः || ५६
जिसके दक्षिण,पश्चिम और पूर्व में समुद्र है उत्तर की रधनुष की प्रत्यंचाकी तरहहिमालय पर्वतहै॥५६॥
तदेतद्भारतंवर्षंसर्व्ववीजंद्विजोत्तम।
ब्रह्मत्वममरेशत्वं देवत्वं मरुतस्तथा ||६०|||
हेविप्रवर ! यह भारतवर्षं ब्रह्मत्व, अमरेशता, देवत्व और मरुद्गणों का कारण है ॥ ६० ॥
मृगपश्वप्सरोयोनिस्तद्वत्सर्व्वेसरीसृपाः। स्थावराणाञ्चसर्व्वेपामितोब्रह्मन्शुभाशुभैः६१॥
मृग,पशु, अप्सरा, सर्प और स्थावर यादि सब योनियाँ हे ब्रह्मन् ! यहीं के शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ करती हैं ॥ ६१ ॥
प्रयातिकर्मभूर्ब्रह्मन्नान्यालोकेषुविद्यते। देवानामपिविप्रर्षेसदैवैषमनोरथः ||६२ ||
हे ब्रह्मन् !लोकों में कर्मभूमि और दूसरी कोई नहीं है । हेविप्र ! देवताओं का सदा यही मनोरथ रहताहै कि ॥ ६२ ॥
अपिमानुष्यमाप्स्यामोदेवत्वात्प्रच्युताःक्षितौ। मनुष्यःकुरुतेतत्तुयन्नशक्यंसुरासुरैः ||६३ | |
वे देवत्व से छूटकर पृथ्वी मेंमनुष्यता को प्राप्त करें क्योंकि मनुष्य वह कर्म कर सकता है जिसको कि देवता और असुर नहींकरसकते॥६३॥
तत्कर्म्मनिगड़ग्रस्तैःस्वकर्म्मख्यापनोत्सुकः। नकिञ्चित्क्रियतेकर्म्मसुखलेशोटहितैः॥६४॥
क्योंकि वे कर्म बन्धन से युक्त हैंतथाअपनेकर्मोंकीप्रशंसाकरानेकी इच्छा रखतेहैं
औरथोड़े सुखसेयुक्त हैंइसकारणवे सुरासुरकुछभीकर्मनहींकरसकते॥६४॥ इतिश्री मार्कण्डेय०मेंनद्यादिवर्णननाम५७त्राँअ०समाप्त।
Summary of chapter 57 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The sacred geography and unique spiritual glory of Bhāratavarsha are celebrated as the exclusive karmabhūmi among all cosmic realms. Mārkaṇḍeya lists the seven holy mountain chains, major sacred rivers such as Gaṅgā, Yamunā, Sarasvatī, and Narmadā, declaring that even devas desire human birth in Bhāratavarsha to attain spiritual liberation through selfless action.