मार्कण्डेय महा पुराण
84
ऋषिरुवाच
शक्रादयःसुरगणानिहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनिसुराविलेचदेव्या। तांतुष्टुवुःप्रणतिनम्रशिरोऽधरांसा वाग्भिःमहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः॥१॥
ऋषि बोले-
देवी द्वारा उस दुष्टात्मा श्रति बलवान् महि- पासुर के सेना सहित नष्ट होने पर इन्द्रादिक
सव देवता विनय पूर्वक शिर तथा कन्धोंको भुका कर, हर्ष से पुलकायमान होकर देवी की स्तुतिकरने लगे ॥ १ ॥
देव्याययाततमिदंजगदात्मशक्त्या निःशेपदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ २.
जिस देवी ने कि अपनी शक्ति से सब जगत को व्याप्त कर रक्खा है और जो . देवतागणों के तेज से उत्पन्न है उस सम्पूर्ण देवता . और महर्षियों से पूजित देवी को हम भक्ति पूर्वक
प्रणाम करते हैं, वह हमारा कल्याण करें ॥ २ ॥
यस्याःप्रभावमतुलंभगवाननन्तो ब्रह्माहरश्चनहिवक्तुमलंवलश्च। साचण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु || ३ ||
जिसकेप्रभावऔरवलकोभगवान्विष्णु, ब्रह्मा औरमहादेवजीकहनेकोअसमर्थहैं, वहदेवी समस्तजगतकापालनकरनेकेलियेपापजन्य भयकोनाशकरनेमेंअपनीबुद्धिरक्खे॥३॥
याश्रीःस्वयंसुकृतिनांभवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनांकृतधियांहृदयेषुबुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् || ४ ||
जोपुण्यवान्लोगोंकेघरमेंलक्ष्मी, पापियोंके घरमेंदरिद्र, श्रीमान्लोगोंकेहृदयमेंबुद्धि, स्वजनोंमेंश्रद्धा, कुलीनोंमेंलज्जारूपसेस्थित रहतीहैउसदेवीकोहमप्रणामकरतेहैं।वह विश्वकापालनकरे॥४॥
किंवर्णयामतवरूपमचिन्त्यमेतत् किंचातिवीर्य्यमसुरक्षयकारिभूरि। किंचाहवेषुचरितानितत्रातियानि सर्व्वेषुदन्यसुरदेवगणादिकेषु॥५॥
हम आपके इसअचिन्त्य स्वरूप तथा असुरों को तय करने वाले पराक्रम और सब असुर और देवताओं में श्रेष्ठ चरित्र को किस प्रकार वर्णन कर सकते हैं ॥ ५ ॥
हेतुःसमस्तजगतांत्रिगुणापिदोष- र्नज्ञायसेहरिहरादिभिरप्यपारा | सर्वाश्रयाखिलमिदंजगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ ६ ॥
श्रापसमस्तसंसारकीकारणंसतोगुण, रजो:गुणऔरतमोगुणसेयुक्त, रागादिदोषोंसे रहितहैं, आपकी महिमाकापारविष्णुऔर शिवआदिदेवताओंनेभीनहींपायाहै, आप सबकी आयतथा यहजगत आपका अंशभूत श्रापविकाररहिततथापरमआदिप्रकृति॥६॥
यस्याःसमस्तसुरतासमुदीरणेन
तृप्तिंप्रयातिसकलेषुमखेषुदेवि। स्वाहासिवैपितृगणस्यचतृप्तिहेतु- रुच्चासेत्वमतएवजनैःस्वधाच॥७
हे देवि ! आपके नाम से यज्ञों में सबहैं देवता तृप्ति को प्राप्त होते हैं । खाहा और स्वधा
यह आप ही के नाम हैं, खाहा से पितर गण और स्वधा से हम देवता लोग तृप्त होते हैं ॥ ७ ॥
यामुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहात्रताच अभ्यस्यसेसुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः। मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोप-
विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि || ८ ||
आपमुक्तिकीहेतुऔरअचिन्त्यहैंतथासत्य, दया, ब्रह्मचर्यादिकनियमआपकेसाधन मोक्षार्थी मुनिलोग समस्त दोषोंसेरहित होकर आपकोहीब्रह्मज्ञानरूपीविद्यासमझतेहैं।हे देवि ! श्राप परम भगवती विद्याहैं॥८॥
शब्दात्मिकासुविमलर्ग्यजुषांनिधान- मुट्टीतरम्यपदपाठवतांचसाम्नाम्। देवीत्रयीभगवतीभवभावनाय
वार्त्ता च सर्व्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥ ६ ॥
हेदेवि ! आपयजुर्वेदकीविमलऋचाओं तथाप्रणवयुक्तसुन्दरपदपाठावलीऔरसामवेद 'केमन्त्रोंरूपीतीनोंवेदमयीशब्दात्मिकारूपहैं। श्रापजगतकावन्धनकाटनेवालीवार्तातथा समस्तजगतकासङ्कटहरनेवालीहैं॥६॥
मेधासिदेविविदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासिदुर्गभवसागरनौरसङ्गा। श्रीःकैटभारिहृदयैककृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥१०॥
हे देवि ! श्रापमेधाऔरसमस्तशास्त्रजाननेवाली सरस्वतीहैंतथादुर्गमसंसारसागरसेपार करनेवालीनौकारूपदुर्गाआपहीहैं।भगवान् केहृदयमेंरहनेवालीलक्ष्मीऔरमहादेवजीके श्रद्धामेंरहनेवालीगौरीआपहीहैं॥१०॥
ईपत्सहासममलंपरिपूर्णचन्द्र- निम्वानुकारिकनकोत्तमकान्तिकान्तम्। अत्यद्भुतंमहतमाप्तरूपातथापि
वक्त्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरे || ११||
कुछमुस्करातेहुएतथापूर्णमासीकेचन्द्रमाकेसमान कान्तिमानऔरसुवर्णकेसमानचमकतेहुए आपकेमुखकोदेखकरमहिषासुरकारणमेंक्रोध शान्त नहुआयहबड़ाआश्चर्यहै॥११॥
दृष्ट्वातुदेविकुपितंभ्रुकुटीकराल - मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवियन्नसद्यः। मारणान्मुमोचमहिपस्तदतीवचित्रं कैर्जीव्यतेहिकुपितान्तकदर्शनेन॥१२॥
देवि ! आपकी क्रोध युक्त कराल भौहें और उदय-काल के लाल चन्द्रमा के समान मुख को देखकर 'महिषासुर ने उसी समय प्राणों को क्यों न छोड़ दिया यह बड़ा आश्चर्य है, क्योंकि क्रुद्ध यमराजके दर्शन कर कौन जीवित रह सकता है ? ॥ १२ ॥
हे देविप्रसीदपरमाभवतीभवाय सद्योविनाशयसिकोपवतीकुलानि। विज्ञातमेतदधुनैवयदस्तमेत- नीतंबलंसुविपुलंमहिषासुरस्य॥१३॥
हे देवि ! श्राप प्रसन्न हों, आप परम दयालु हैं ।श्राप क्रुद्ध होकर हमारे शत्रुओं का शीघ्र नाश कर
देती है, ये तो हमने अभी जान लिया है । कारण-आपने महिषासुर की विशाल सेना का नाश करदिया है ॥ १३ ॥
तेसम्मताजनपदेषुधनानितेपां तेषांयशांसिनचसीदतिधर्म्मवर्गः। धन्यास्तएवनिभृतात्मजभृत्यदारा येषांसदाभ्युदयदाभवतीप्रसन्ना॥१४॥
हे देवि ! जिन लोगों पर आप प्रसन्न हैं वे ही लोग धन्य होते हैं, उन्हीं को मान्य
समझा जाता है तथा वे ही धन और यशोपार्जन करते हैं, उन्हीं को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
प्राप्त होते हैं तथा उन्हीं के सेवक, स्त्री, पुत्र यादि श्रभ्युदय को प्राप्त होते हैं ||१४||
धम्मर्चारिणदेविसकलानेिसदैवकर्मा- रायत्यादृतःप्रतिदिनंसुकृतीकरोति। स्वर्गंप्रयातिचततोभवतीप्रसादा-
लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ १५॥
हे देवि । आपकी दया ही से सब धर्म और कर्म प्रति दिन किये जाते और सफल होते हैं । आपकी कृपा से लोग स्वर्ग में जाते हैं तथा तीनों लोकमें फलदाता आप ही हैं ॥ १५ ॥
हेदुर्गे ! जोआपकाविपत्तिमें दुर्गेस्मृताहरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थै: स्मृतामतिमतीवशुभांददासि | दारिद्र्यदु:खभयहारिणिकात्वदन्या सर्वोपकारकरणायसदार्द्रचित्ता॥१६॥
स्मरण करते हैं उनका श्राप सङ्कट हरण कर लेती हैं और जो स्वस्थ अवस्था में आपका स्मरण करते हैं उनको आप और भी शुभ करती हैं । थापके अतिरिक्त दरिद्र, दुःख और भय के हरने वाली कौन है । आप सवपर उपकार करने के लिये सदादयालु-चित्त रहती हैं ॥ १६ ॥
एभिर्हतैर्जगदुपैतिसुखंतथैते कुर्व्वन्तुनामनरकायचिरायपापम्।
संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
सत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ||१७||
हेदेवि ! आपनेइन राक्षसोंकोइसलियेमाराहैकिइनकेमारनेसे जगतकोसुखहोगाऔरदूसरेयेपापी, नारकीहैं यहसंग्राममेंमृत्युकोप्राप्तहोकरस्वर्गमें पहुँचजाँय॥१७॥
दृष्ट्वकिंनभवतीप्रकरोतिभस्म सर्व्वासुरानरिषुयत्प्रहिणोषिशस्त्रम् | लोकान्प्रयान्तुरिपवोऽपिहिशस्त्रपूता इत्थंमतिर्भवतितेष्वपितेऽतिसाध्वी || १८
हे देवि ! क्या आप दृष्टिमात्र से ही देवताओं के वैरियोंका नाश नहीं कर सकत थीं जो आपने उन पर शस्त्र प्रहार किया ? परन्तु आप तो शत्रुओं पर भी दया करती हैं ऐसा |हमारा मत है, कारण- आपने अपने शस्त्रों से राक्षसों को पवित्र कर स्वर्ग में पहुँचाया ॥ १८ ॥
खंडगप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोत्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेनदृशोऽसुराणाम्। यन्नागताविलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ १६ ॥
हेदेवि ! राक्षसोंकीआंखआपकेखड्गऔर शूलकीकान्तिसेनफूटींकारण- वेश्रर्द्धन्द्रमा युक्तआपके
मुखकोदेखरहींथीं॥१६॥
दुट्टतवृत्तशमनंतवदेविशीलं रूपंतथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः। वीर्य्यञ्चहन्तुहृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपिप्रकटितैवदयात्वयेत्थम् ||२०||
हे देवि !आपका शील पापियों का पाप नाश करने के लिये है और रूप आपका ऐसा है कि जिसकी तुलना नहीं की जासकती है । दैत्यों को मारने वाले आप के पराक्रम से आपकी वैरियों के प्रति भी दयाप्रगट होती है ॥ २० ॥
केनोपमाभवतुतेऽस्यपराक्रमस्य रूपंचशत्रुभयकार्थ्यतिहारिकुत्र। चित्तेकृपासमरनिष्ठुरताचदृष्ट्वा त्वय्येवदेविवरदेभुवनत्रयेऽपि॥२१॥
हे देवि ! आपके पराक्रम और शत्रु को भय देने वाले रूप की उपमा किसे की जाय । हे वरदायिनी देवि ! वित्त में दया और प्रकट रूप से युद्ध में निष्ठुरता यह तीनों लोक में
सिवायं श्रापके और किसमें है ॥ २१ ॥
त्रैलोक्यमेतदखिलंरिपुनाशनेन त्रातंत्वयासमरमूर्द्धनितेऽपिहत्वा। नीतादिवंरिपुगणाभयमप्यपास्त- मस्माकमुन्मदसुरारिभवंनमस्ते ||२२||
हे देवि !शत्रुओं का नाश करके आपने तीनों लोकों की रक्षा की है और समर में मारकर उनको स्वर्ग में पहुंचाया हमारा सब भय आपने दूर कर दिया, इसके लिये हम आपको प्रणाम करते हैं ॥ २२ ॥
शूलेनपाहिनोदेविपाहिखड्गेनचाम्बिके। घण्टास्वनेननःपाहिचापज्यानिस्वनेनच॥२३॥
हे देवि !अम्बिके! शूल से, खड्ग से, घण्टा के स्वर से तथा धनुष खींचने के शब्दसे हमारी रक्षा कीजिये ||२३
प्राच्यांरक्षप्रतीच्याञ्चचण्डिकेरक्षदक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्यउत्तरस्यांतथेश्वरि ||२४||
हे चरिडके हे ईश्वरी ! अपने शूल को घुमाकर पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में हमारी रक्षाकीजिये ॥ २४ ॥
सौम्यानियानिरूपाणित्रैलोक्येविचरन्तिते। यानिचात्यर्थघोराणितैौरक्षास्मांस्तथाभुवम् ||२५||
श्रौर सौम्य रूप से जिससे कि आप तीनों लोकों में घूमती हैं तथा दूसरे अत्यन्त भयानकरूप से हमारी तथा पृथ्वी की रक्षा कीजिये ||२५||
खड्गशूलगदादीनियानिचास्त्राणितेऽम्बिके। - करपल्लवसङ्गीनितैरस्मान्रक्षसर्व्वतः॥२६॥
हे अम्बिके ! आपके हस्तं कमश में जो तल- वार, शूल गदा आदि श्रत्र हैं उनसे हमारी सर्वत्ररक्षा कीजिये ॥ २६ ॥ ऋषिरुवाचं
.एवंस्तुतासुरैर्दिव्यैःकुसुमैर्नन्दनोद्भवैः। श्रर्चिताजगतांधात्रीतथागन्धानुलेपनैः॥२७॥
ऋषि बोले- इसप्रकारदेवताओंनेजगन्मातादेवीकी नन्दनवनोत्पन्न दिव्य पुष्पों से तथा चन्द्रनादि केलेप से पूजा की ॥ २७ ॥
भक्त्या ममस्तैत्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता । माहप्रसादसुमुखीसमस्तानप्रणतान्सुरान् ||२८||
फिर समस्त देवताओं नेदेवीको दिव्य धूपसे पूजितकिया और वह सुमुखीकृपा करकेप्रणामकरते हुएउनदेवताओंसेवोली। देव्युवाच
नियतांत्रिदशाःसर्वेयदस्मत्तोऽभिवाञ्चितम्।
ददाम्यहमितिमीत्या स्तवैरेभिः सुपूजिता ||२६||
देवी बोली-
हे देवताओ ! पोलिये, श्रव श्राप मुझसे क्या श्रभिलापाकरतेहैंआपनेमेराभलीभांतिपूजनकिया है इसलिये प्रीति पूर्वक मैं वही दूँगी जो फि आप मांगगे ॥ २६ ॥
देवाऊचुः भगवत्याकृतंसर्व्वंनकिञ्चिदवशिष्यते। यदयंनिहतःशत्रुरस्माकंमहिपासुरः ||३०||
देवता बोले-
हे भगवती ! आपने सब कुछ कर दिया, श्रव कुछ शेष नहीं है क्योंकि हमारा शत्रु महिषासुरथा वह आपने मार दिया ॥३०॥
यदिवाबरोदेयस्त्वयास्माकंगहेश्वरि। संस्मृतासंस्मृतात्वंनोहिंसेथाःपरमापदः ||३१||
हे महेश्वरी ! यदि आप हमको वर देना ही चाहती हैं तो हमने श्राप का स्मरण किया है शीर भविष्य में जय हम श्राप का स्मरण करें तभी श्राप हमारे दुःखों को निवारण कीजिये ||३१||
यथमर्त्यःस्तवैरेभिस्त्वांस्तोष्यत्यमलानने। तस्यवित्तर्द्धिविभवैर्थनदारादिसम्पदाम्। हृदयेऽस्मन्प्रसन्नात्वंभवेथाःसर्व्वदाम्बिके ||३२||
हे विमलामुखी ! जो मनुष्य आपकी इस स्तोत्र से स्तुति करे उसके धन धान्य, स्त्री
श्रादि की वृद्धि के लिए श्राप सदैव उसपर प्रसन्नहोकर सहायता करें ॥ ३२ ॥ ऋषिरुवाच
इनिप्रमादितादेवैर्जगतोऽर्थेतथात्मनः। तयत्युक्त्वाभद्रकालीवभूवान्तर्हितानृप ||३३||
ऋषि बोले-हे मुरथ ! देवताओं ने जगत के तथा अपने हित के लिये देवी को प्रसन्न किया और भद्रकाली यह कहकर कि 'ऐसा ही होगा' अन्तर्ध्यान होगई||३३||
इत्येतत्कथितंभूपसम्भूतासायथापुरा। देवीदेवशरीरेभ्योजगत्रयहितैपिणी॥२४॥
हे राजन ! जिस प्रकार कि पूर्व काल में देव- तानों के शरीर से तीनों लोकों की हितैषिणी देवोंकी उत्पत्ति हुई वह सब मैंने आपसे कही ॥ ३४ ॥
पुनत्रगौरीदेहासासमुद्भूतायथाभवत्। चवायदुष्टदैत्यानांतथाशुम्भनिशुम्भयोः ||३५||
फिर वह दुष्ट दैत्यों तथा शुम्भ निशुम्भ का वव करने के लिये गौरी रूप से उत्पन्न हुई ॥ ३५ ॥
रक्षणायचलोकानांदेवानागुपकारिणी।
तच्छृणुष्व मयाख्यातं यथावत् कथयामि ते ||३६||
वह गौरी की उत्पत्ति लोकों की रक्षा के लिये और देवताओं के उपकार के लिये हुई, उसको में यथावत् कहता है सुनो ||३६|| इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंसावर्णिकमन्वन्तरमेंमहिषासुरवधसमाप्तिनाम८४वांअ०समाप्त।
Summary of chapter 83 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Mahishāsura, assuming terrifying illusory forms of an elephant, a lion, a giant warrior, and a wild buffalo, fiercely attacked the Divine Mother. The Goddess, stepping upon the demon with Her lotus foot and piercing his throat with Her sharp trident, struck him down with Her sword as his true form attempted to emerge from the buffalo's mouth. Upon Mahishāsura's death, the demonic forces fled in terror, and the three worlds resounded with joy and divine celebration.