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अलर्क उवाच

गवन् योगिनश्चय्यां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ब्रह्मवर्त्यन्यनुसरन् यथा योगी न सीदति १।।

श्रलर्क बोले- हे भगवन् ! मैं तवपूर्वक योगियों की चर्या सुनना चाहता हूँ जो कि वह ब्रह्म मार्ग में प्रवृत्त हुआ योग क्लेश को प्राप्त नहीं होता है ॥२॥

दत्तात्रेय उवाच

मानापमानौ यावेतौ मीत्युद्व गरौ नृणाम् तावेव विपरीतार्थी योगिनः सिद्धिकारकौ

दत्तात्रेय वोले-r मान और अपमान मनुष्यों को क्रमशः प्रीति और उद्वेग उत्पन्न करते हैं, इनका विपरीत अर्थ समझने वाले योगियों को सिद्धि प्राप्त होती है ॥२॥

मानापमानौ यावेतौ तावेवाहुर्विषामृते अपमानोऽमृतं तत्र मानस्तु विषमं विषम्

मान और अपमान क्रमशः अमृत और विष हैं, को विपम विष समझे

चक्षुःपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् अत्यपूतां वदेद्वाणीं बुद्धिपूतञ्च चिन्तयेत्

नेत्र से देखकर पाँव योगी को चाहिये कि अपमानको अमृत और मान रक्खे, वस्त्र से छान कर जल पिये, सत्यतापूर्वक वचन बोले और बुद्धिपूर्वक चिन्तवन करे आतिथ्य - श्राद्ध-यज्ञेषु देवयात्रोत्सवेषु च महाजनश्च सिद्ध्यर्थं न गच्छेद्योगवि  त् कचित् ||२||

श्रातिथ्य समय, श्राद्ध, यज्ञ, देवयात्रा और उत्सव लिये न जावे

व्यस्ते विधूमे व्यङ्गारे सर्व्वस्मिन् भुक्तवर्जने टेत योगविद्भक्ष्यं न तु त्रिष्वेव नित्यशः ||

क्लेश के समय, जिस समय के समय योग का जानने वाला कभी अर्थ - सिद्धि रसोई न हो रही हो अथवा जब सब लोग भोजन कर चुके हों इन समयों में योगी भिक्षा न मांगे

यथैवमवमन्यन्ते जनाः परिभवन्ति च तथा युक्तश्चरेद्वयोगी सतां वत्स न दूषयन्

जिससे कोई उसका अपमान न कर सके योगी कर उसपर चलना चाहिये

भैक्ष्यं चरेद्रगृहस्थेषु यायावरगृहेषु च श्रेष्ठा तु मथमा चेति वृत्तिरस्योपदिश्यते

जो सद्गृहस्थ को उत्तम लोगों के बताये हुए मार्ग में दोष न लगा.श्रेष्ठ हों उनसे भिक्षा मांगे क्योंकि इसी को 'पहिली वृत्ति बतलाया है

अथ नित्यं गृहस्थेषु शालीनेषु चरेद्रयतिः श्रद्दधानेषु दान्तेषु श्रोत्रियेषु महात्मसु

श्रतः योगी को उन्हीं गृहस्थों में जाना चाहिये जो धनी, श्रद्धावान्, पवित्र, पडित और महात्मा हों

श्रत ऊर्ध्वं पुनश्वापि श्रदुष्टापतितेषु च भैक्ष्यच विवर्णेषु जघन्या वृत्तिरिष्यते १०

इनके अति- रिक्त जो गृहस्थी दुए और पतित न हों उनके पास भी योगी जा सकता है परन्तु हीन वर्णों से भिक्षा मांगना नीच वृत्ति है १०

भैक्ष्यं यवागूं तक्रं वा यो यावकमेव वा फलं मूलं प्रियंगुं वा करण-पिण्याक- शक्तवः ११॥

यवागू, तक्र, दूध, यावक, फल मूल वेर श्रीर सच ११

इत्येते च शुभाहारा योगिनः सिद्धिकारकाः तत् प्रयुञ्जयान्मनिर्भक्त्या, परमेण समाधिना १२ ||

ये ही श्राहार योगियों को शुभ और सिद्धिदायक हैं, इसलिये एकाग्र चित्त होकर भक्ति पूर्वक यही भोजन करे १२

अपः पूर्वं सकृत् प्राश्य तूष्णीं भूत्वा समाहितः प्राणायेति ततस्तस्य प्रथमा ह्याहुतिः स्मृता १३॥

निःशब्द होकर पहिला ग्रास हाथ में लेकर 'प्राणायनमः' यह कहकर उसको भोजन कर ले, इसको प्रथम आहुति कहते हैं ॥१३॥

अपानाय द्वितीया तु समानायेति चापरा

उदानाय चतुर्थी स्याद्व्यानायेति च पश्चमी १४

'अपानाय स्वाहा' यह कहकर दूसरा 'समानाय स्वाहा' कहकर तीसरा 'उदानाय स्वाहा' कहकर चौथा श्रौर 'व्यानाय स्वाहा' कहकर पाँचवाँ ग्रास   खाना चाहिये, इनको क्रमशः दूसरी तीसरी चौथी और पाँचवीं प्राहुति कहते हैं ||१४||

प्राणायामैः पृथक् कृत्वा शेषं भुञ्जीत कामतः श्रपः पुनः सकृत् प्राश्यं आचम्य हृदयं स्पृशेत्॥ १५॥

इसी तरह अलग अलग प्राणायाम करके सव श्रन को खाले और  फिर हाथ धोकर जल पीवे और हृदय को स्पर्श करे ||१५||

अस्तेयं ब्रह्मचर्य्यञ्च त्यागोऽलोभस्तथैव च व्रतानि पञ्च भिक्षूणामहिंसा परमाणि व १६

 चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, त्याग, श्रलाभ. तथा श्रहिंसा, ये भिक्षुकों के पाँच परम व्रत हैं

अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचमाहारलाघवम् नित्यस्वाध्याय इत्येते नियमाः पंच कीर्त्तिताः॥ १७॥

क्रोध न होना, गुरु की सेवा, पवित्रता, थोड़ा : भोजन और नित्य स्वाध्याय, यहीं पाँच उनके. नियम हैं १७

सारभूतमुपासीत ज्ञानं यत् कार्य्यसाधकम् ज्ञानानां बहुता येयं योगविघ्नकरा हि सा || १८ ||

जो ज्ञान सारभूत हो और कार्य का साधक हो उसकी उपासना करनी चाहिये क्योंकि ज्ञान का बाहुल्य योग में विघ्न करने वाला होता है १८

इदं ज्ञेयमिदं ज्ञेयमिति यस्तृषितश्चरेत् अपि कल्पसहस्रषु नैव ज्ञेयमवाप्नुयात् १६

जो योगी तृष्णासे पूर्णहो यह जानने योग्य है, यह जानने योग्य है इसमें फँसा रहे वह सहस्र कल्प में भी ज्ञेय को नहीं जान सकता है |

त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः विधाय बुद्ध्या द्वाराणि मने। ध्याने निवेशयेत् २०॥

 योगी को चाहिये कि सङ्ग को छोड़कर, क्रोध को जीत कर, थोड़ा श्राहार करता हुआ, जितेन्द्रिय  हो और शरीर के चारों कर मन को ध्यान में लगावे २०

शून्येष्वेवावकाशेषु गुहासु च वनेषु च नित्ययुक्तः सदा योगी ध्यानं सम्यगुपक्रमेत् ॥२१॥

योगी को ) चाहिए कि सदा एकान्त में, श्रवकाश स्थान में, गुफाओं में और वनों में अच्छी तरह ध्यान करे !!

वाग्दण्डः कर्म्मदण्डश्च मनोदण्डच ते त्रयः यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः||२२||

 वाग्दण्ड, कर्मदराड और मनोदण्ड ये तीनों दण्ड जिस योगी के नियत हैं वही महायती त्रिदण्डी है ॥ २२

सर्व्वमात्ममयं यस्य सदसज्जगदीदृशम् गुणागुणमयं तस्य कः प्रियः को नृपामियः ||२३||

 हे राजन् ! सत्, श्रसत् तथा गुण और श्रगुणयुक्त इस संसार को जो योगी अपनी श्रात्मा कौन अप्रिय है ? २३

विशुद्धबुद्धिः समलोष्ट्रकाञ्चनः समस्तभूतेषु च तत्समाहितः स्थानं परं शाश्वतमव्ययंच परं हि मत्वा न पुनः प्रजायते ||२४||

विशुद्ध बुद्धि होकर लोहे में ही निहित जानता है उसको कौन प्रिय और चौर सोनेको जो एकसा समझे और सब प्राणियों को एक समान जाने, ऐसा योगी परम शाश्वत स्थान को जाकर फिर जन्म नहीं लेता है ||२४||

वेदाः श्रेष्ठाः सर्व्वयज्ञक्रियाश्च यज्ञाज्जप्यं |

ज्ञानमार्गश्च जप्यात् ज्ञानाद्ध्यानं सङ्गरागव्यपेतं |

तस्मिन् प्राप्ते शाश्वतस्योपलब्धिः २५

सब से श्रेष्ठ हैं, वेदों से यश क्रियायें श्रेष्ठ हैं, यज्ञसेऔर राग से बर्जित ध्यान उत्तम है जिसके करने जप और जप से ज्ञान श्रेष्ठ है तथा ज्ञान से सङ्ग से परब्रह्म की प्राप्ति होती है ||२५||

समाहिता ब्रह्मपरोऽप्रमादी शुचिस्तथैकान्तरतिर्य-

तेन्द्रियः समाप्नुयाद्वयोगमिमं महात्मा विमुक्ति- ३ मामोति ततः स्वयोगतः ॥२६॥

 समबुद्धि, पर- ब्रह्म में संलग्न, प्रमाद से रहित, पवित्र, एकान्त, प्रेमी, जितेन्द्रिय होकर जो योगका अभ्यास करतां है वह महात्मा अपने योग के कारण मुक्ति को प्राप्त करता है २६ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में योगिचर्य्या नाम ४१वाँ अध्याय समाप्त