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इत्येषतामसःसगोंब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। रुद्रसर्गंप्रवक्ष्यामितन्मेनिगदतःशृणु॥१॥

श्रव्यक्तजन्माब्रह्माजीकातामससर्गतोयह हुना,अवउनकेरूद्रसर्गकोकहताहूँसुनो॥१॥

तनयाश्चतथैत्राष्टौपन्यःपुत्राश्चतेतथा। कल्पादावात्मनस्तुल्यंसुतंप्रध्यायतःप्रभोः || २

जयप्रभुब्रह्माजीनेकल्पकेआदिमेंअपनेसमानपुत्रउत्पन्नकरनेकाविचारकियातोउनकेउ पुत्रऔरआठपुत्रियांउत्पन्नहुईऔरवेपुत्रियां उनआठपुत्रोंकीस्त्रियांहुईं॥२॥

प्रादुरासीदथाऽस्यकुमारोनीललोहितः। रुरोदसुस्वरंसोऽयद्रवंश्चद्विजसत्तम॥३

हेविश्व! ब्रह्माजीकेअङ्कसेजोनीलवर्णपुत्रहुआवहदौड़ करबड़ेऊंचेखरसेरोनेलगा॥३॥

किंरोदिपीततंब्रह्मारुदन्तंप्रत्युवाचह। नामदेहीतितंसोऽयप्रत्युवाचजगत्पतिम्॥४

ब्रह्माजी ने उस रोते हुए पुत्र से पूछा कि तुम क्यों रोते हो ? उसने कहा कि मेरा नाम रखिये ।इसपर जगत् के स्वामी ब्रह्माजी उससे बोले ||४ ||

रुद्रस्त्वंदेवनाम्नासिमारोदीय्र्यमाह। एवमुक्तस्ततःसोऽयसंप्तकृत्योरुरोदह॥५

ततोऽन्यानिददौतस्मैसप्तनामानिवैप्रभुः। स्थानानिचैषामष्टानांपत्नीःपुत्रांश्चवैद्विज॥६

तव प्रभु ब्रह्माजी ने उन सातों के नाम भी रखदियेइन आठों के स्थान तथा इनकी स्त्री और पुत्रों के नाम भी सुनो ॥ ६ ॥

भवंसर्व्वंतथेशानंतथापशुपतिप्रभुः भीममुग्रंमहादेवमुवाचसपितामहः॥७

पितामह ने उनके भव, सर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उम्र और महादेव ये सात नाम रक्खे ||७||

सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च । चक्रेनामान्यथैतानिस्थानान्येषांचकारह॥८

 इस प्रकार नामकरण करके उनकास्थान भी निश्चित किया ||८||

दीक्षितोब्राह्मणःसोमइत्येतास्तनवःक्रमात्।

सुवर्चला तथैवोमा विकेशी चापरा स्वधा ॥ ९

सूर्य, जल, पृथ्वी,अग्नि, वायु, आकाशऔरचन्द्रमायेक्रमशः ब्रह्माजीकेउपरोक्तसातपुत्रोंकेस्थानहैंतथा सुवला, उमा, विकेशी, स्वधा॥९॥

तथाइनकेपुत्रक्रमशःशनिश्चर स्वाहादिशस्तथादीक्षारोहिणीचयथाक्रमम्। सूर्य्यादीनांद्विजश्रेष्ठरुद्राद्यैर्नामभिःसह॥१०॥

श्रर स्वाहा, दिशा, दीक्षा और रोहिणी, हे क्रौष्टकिजी ! ये रुद्र सहित सूर्यादिक ब्रह्माजी के आठ पुत्रों की कमसे स्त्रियाँ हुई ॥१० ॥ शनैश्चरस्तथाशुक्रोलोहिताङ्गोमनोजवः। स्कन्दःसर्वोऽथसन्तानोबुधश्चानुक्रमात्सुतः११॥। -

ऊर्जा नाम की स्त्री से सात पुत्र हुए, ( १ ) रज, रजोगात्रोर्ध्वबाहुश्च: : सबलवानवस्तथा ॥२-५॥ ( २ ) गात्र, (३) ऊर्ध्वबाहु, (४) सबल, (५) शुक्र, मङ्गल मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान और

बुध हुए ||११||

एवम्प्रकारोरुद्रोऽसौसतींभार्य्यामविन्दत। दक्षकोपाच्चतत्याजसासतीस्वंकलेवरम्॥१२॥

इसी प्रकार रुद्र ने सती को अपनी- स्त्री बनाया जिसने दक्ष के क्रोध करने के कारण

अपने शरीरको छोड़ दिया ॥ १२॥

हिमबद्दुहितासाभून्मेनायांद्विजसत्तम।

तस्याभ्रातातुमैनाकःसखाम्भोधेरनुत्तमः। उपयेमेपुनश्चैनामनन्यांभगवान्भवः॥१३॥

हे विप्रवर ! वह मेनासे हिसवानकी पुत्री हुई, उसका भ्रांता मैनाक हुआ जिसका मित्र समुद्र है और फिर इन पार्वती- जी ने स्वयं भगवान शिव के साथ विवाह किया ।१३।

देवौधाताविधातारौभृगोःख्यातिरसूयत। श्रियंचदेवदेवस्यपत्नीनारायणस्यया॥१४॥

भृगु की स्त्री ख्याति से धाता और विधाता नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए और देवदेव नारायणजी की

स्त्री लक्ष्मीजी हुई ॥ १४ ॥

श्रायतिर्नियतिश्चैवमेरोःकन्येमहात्मनः। धाताविधात्रोस्तेभाय्यैतयोर्जातौसुतावुभौ ||१५||

महात्मा मेरु की दोनों कन्यायें यति और नियंतिधाता और विधाताकी स्त्रियां हुई और उनसे क्रमशः दो पुत्र हुए ॥ १५ ॥

प्रारणश्चैवमृकण्डुश्चपितामममहायशाः। मनस्विन्यामहंतस्मात्पुत्रोवेदशिरामम॥१६॥

प्राण और मेरा पिता मृकण्डु । मृकराडु का विवाह मनखिनी से हुआ जिससे मेरी उत्पत्ति हुई और

मेरे पुत्र का नाम वेदशिरा है ॥ १६ ॥

धूम्रवत्यांसमभवत्पारणस्यापिनिबोधमे। प्राणस्यद्यतिमान्पुत्रउत्पन्नस्तस्यचात्मजः।१७-|

धूम्रवती सेप्राण की जो सन्तान हुई उसको सुनो। प्राण का पुत्र द्य तिमान् हुआ तथा द्युतिमान का छोटा भाई॥ १७ ॥

अजराश्चतयोःपुत्राःपौत्राश्चबहवोऽभवन्। पत्नीमरीचेःसम्भूतिःपौर्णमासमसूयत ||१८||

अजरा हुया, उन दोनों के बहुत से पुत्र और नाती हुए और मरीचि की स्त्री संभूति से पूर्णमास नाम का पुत्र हुआ ॥ १८ ॥

विरजाःपर्व्वतश्चैवतस्यपुत्रौमहात्मनः। तयोःपुत्रांस्तुरक्षिष्येवंशसंकीर्तनेद्विज ||१९||

महात्मा पूर्ण- मास के विरजा और पर्वत नाम के दो पुत्र हुए । हे द्विज ! इन दोनों के पुत्रों के नाम वंश वर्णन मैं कहूंगा ॥ १९॥

स्मृतिवाङ्गिरसःपत्नीप्रसूताकन्यकास्तथा।

सिनीवालीकुश्चैवराकाचानुमतीतथा॥२०।।

श्रङ्गिरा की स्त्री स्मृति के कन्यायें उत्पन्न हुईं जिनके नाम हैं सिनीवाली, कुहू, राका,भानुमती तथा ॥ २० ॥

अनुसूयातथैवात्रेर्जज्ञेपुत्रानकल्मषान्। सोमंदुर्व्वासमञ्चैवदत्तात्रेयश्चयोगिनम् ||२१||

श्रनुसया जिसने श्रत्रि मुनि से विवाह किया जिसके पुण्यात्मा सोम,दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय पुत्र हुए ||२१||

मीत्यांपुलस्त्यभार्य्यायांदचोलिस्तत्सुतोऽभवत्। पूर्वजन्मनिसोऽगस्त्यःस्मृतःस्वायम्भुवेऽन्तरे ||२२||

पुलस्त्य की प्रीति नाम स्त्री से बच्चोलिक नाम पुत्र उत्पन्न हुआ जो पूर्वजन्म के स्वायंसुर मर

के नाम से विख्यात थे ॥ २२ ॥ कर्द्दमश्वार्व्ववीरथसहिष्णुश्चसुतत्रयम्। क्षमातुसुपुचेभार्य्यापुलहस्यप्रजापतेः॥२३॥

कर्द्दम, अर्धवीर और सहिष्णु ये तीनों पुत्र पुलह प्रजापति की स्त्री क्षमा से उत्पन्न हुए ||२३|| क्रतोस्तुसन्नतिर्भार्यावालिखिल्यानसूयत। पष्टिर्यानिसहस्राणिऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् |२४||

ऋतु की खो सन्नति हुई जिससे वालिखिल्य लोग उत्पन्न हुए, ये ही साठ हज़ार ऊर्ध्वरेतस ऋषि हुए ॥ २४ ॥

उर्जायान्तुवशिष्ठस्यसप्ताजायन्तवैसुताः। सुतपाःशुक्रइत्येतेसर्व्वेसप्तर्षयःस्मृताः। योऽसावग्निरभीमानीब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः ||२६||

वशिष्ठ की( ६ ) सुतपा, (७) शुक्र ये ही सप्तर्षि कहलाते हैं, और ब्रह्मा के प्रथम पुत्र जो  अनि हैं ||२६||

तस्मात्स्वाहासुतान्लेभेत्रीनुदारौनसोद्विज। पावकंपवमानंचशुचिश्चापिजलाशिनम् ||२७||

उनके स्वाहा से परम उदार और तेजस्वी तीन पुत्र हुए - ( १ ) पावक, (२) पवमान

और तीसरा जन्म का भोजन करनेवाला शुचि ||२७||

तेषान्तुसन्ततावन्येचत्वारिंशच्चपंचच। कथ्यन्तेबहुशश्चैतेपितापुत्रत्रयंचयत् ||२८||

उनके पैंतालीस सन्तान हुई, तथा तीन पुत्र और पिता सहित ॥ २८ ॥

एवमेकोनपंचाशद्दुर्जयाःपरिकीर्तिताः। पितरोब्रह्मणासृष्टायेव्याख्यातामयातव ||२९||

वे उनंचास दुर्जय हुए | हे विश्वर ! ब्रह्माजी ने जो पितरों को सृजा वह मैंने तुमसे वर्णन करदिया है ||२९||

अग्निष्वात्तावर्हिषदोऽनग्नयःसामयश्चये। तेभ्यःस्वधासुतेजज्ञेमेनांवैधारिणींतथा॥३०

निवाता, बर्हिषद,अग्नि और साग्नि इनसे स्वधा के दो कन्यायें हुई ( १ ) मेना और ( २ ) धारिणी ३०

तेउभेब्रह्मवादिन्यौयोगिन्यौचाप्युभेद्विज। उत्तमज्ञानसम्पन्नेसबैःसमुदितेगुणैः॥३१

हे द्विज ! वे दोनों उत्तम ज्ञान से युक्त, सर्वगुण सम्पन्न, ब्रह्मवादिनी हुई ॥ ३१ ॥

इत्येषादक्षकन्यानांकथितापत्यसन्ततिः।

श्रद्धावान् संस्मरन्नेतानानपत्योऽभिजायते ||३२|

ब्रह्माजी की कन्याओं की सन्तति का यही वर्णन है, जो इसको श्रद्धा पूर्वक  स्मरण करता है उसके सन्तान उत्पन्न होती है इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंरुद्रसर्गाभिधाननाम५२वांअध्यायसमाप्त |