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मार्कण्डेयउवाच

राजाभूभुविविख्यातःस्वराष्ट्रोनामवीर्य्यवान्। अनेकयज्ञकृत्प्राज्ञःसंग्रामेष्वपराजितः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

पृथ्वी पर स्वराष्ट्रनाम एक बड़ा बलवान् राजाहुआ  जिसने अनेक यज्ञ किये और जो संग्रामों मेंपराजित न हुआ ॥ १

तस्यायुःसुमहत्प्रादात्मन्त्रिणाराधितोरविः। पत्नीनाञ्चशतंतस्यधन्यानामभवत्द्विज॥२

मन्त्रों से आराधित सूर्यनेउसको बड़ी आयु प्रदान की ।  हे द्विज ! उसकेसौ पत्नियाँ बड़ी पतिव्रता हुई ॥ २ ॥

तस्यदीर्घायुषःपत्न्योनातिदीर्घायुषोमुने। कालेनजग्मुनिवनंभृत्य - मन्त्रिजनास्तथा॥३॥

 हे क्रौष्टुकि ! यद्यपि वह दीर्घायु था परन्तु उसकी स्त्रियों की अवस्था अधिक न निकली जो कि समय पाकर मृत्यु को प्राप्त होगई और इसी प्रकार धीरेधीरे राजा के मन्त्री और सेवक भी मरगये ॥ ३ ॥

सभाय्र्याभिस्तथायुक्तोभृत्यैश्चसहजन्मभिः। उद्विग्नचेताःसम्मापवीर्य्यहानिमहर्निशम् || ४ |

स्त्रियों तथा सेवकादिकों के मरने से राजा दिन रात उदास रहने लगा जिससे कि वह चलहीनहोता गया ||४||

तंवीर्य्यहीनंनिभृतैभृत्यैस्त्यक्तंसुदुःखितम्।

अनन्तरोविमद्दख्योराज्याच्च्याक्तिवांस्तदा ||५||

सेवकों और मन्त्री श्रादिकों से विहीन राजा बहुत दुःखित और बलहीन होगया और उसको विमर्द नाम राजा ने राज्य से च्युतंकर दिया || ५||

राज्याच्च्युतंसोऽपिवनंगत्वानिव्र्विणमानसः। तपस्तेपेमहाभागोवितस्तापुलिनेस्थितः॥६॥

राज्य से च्युत होकर वह राजा विरक्त होकर वितस्ता नदी के किनारे तप करनेलगा ॥ ६ ॥

ग्रीष्मेपञ्चतपाभूत्वावर्षास्त्रभ्रङ्कपाशिकः। जलशायीचशिशिरेनिराहारोयतव्रतः॥७॥

गर्मी की ऋतु में वह पाँचों श्रग्नियां तपता तथा वर्षा ऋतु में भीगता था और जाड़ों मेंवह निराहार रहकर जल में शयन करता था ॥७॥

ततस्तपस्यतस्तस्यप्रादृट्कालेमहाप्लवः। बभूवानुदिनंमेषैर्वर्षद्भिरनुसन्ततम्॥८॥

वर्षा ऋतु में एक बार उसके तप करते हुए निरंतरवरमते हुए मेघों ने इतनी वृष्टि की कि जलार्णव'होगया ॥८

नदिग्विज्ञायतेपूर्व्वादक्षिणावानपश्चिमा। नोत्तरातमसासर्व्वमनुलिप्तभिवाभवत्॥६

उस समय उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम श्रादि किसी दिशा का ज्ञान न होता थाऔर सर्वत्र अँधेरा छाया ॥ ६ ॥

ततोऽतिप्लवनेभूपःसनद्या: प्रेरितस्तटम्। मार्थयन्नपिनावापहियमाणोऽतिवेगिना॥१०

उस नदी के तटपर जलात्रि में राजा के दुःखित होकर प्रार्थनाकरने पर भी कोई ठिकाना न मिला ॥ १० ॥

अथदूरेजलौघेनहियमाणोमहीपतिः। श्राससादजलेराँहींसपुच्छेजगृहेचताम्॥११॥

वहराजा उस जलार्णव में बहुत दूरतक वहा चलागया: कि जल में उसको एक हरिणी मिल गई जिसको कि उसने पूँछ से पकड़ लिया ||११||

तेनप्रवेनसययाबुह्यमानोमहीतले। इतश्चेतश्चान्धकारेआससादतटंततः॥१२॥

फिर उस जलमें डूबते उछलते हुए हरिणी के सहारे से राजा नदी के तट पर पहुँच गया ॥ १२ ॥

विस्तारिपङ्कमत्यर्थंदुस्तरंसनृपस्तरन्। तथैवकृष्यमाणोऽन्यद्रव्यंवनमवापसः॥१३

फिर कीचड़और दुस्तर दलदल को पार करके वह हरिणी राजा को एक दूसरे रमणीक वन में लेगई ॥ १३ ॥

तत्रान्धकारेसारौहीचकर्षवसुधाधिपम्। पुच्छेलग्नंमहाभागंकृशंधमनिसन्तता॥१४

पूंछ को पकड़े हुए वह भाग्यवान् राजा हरिणी द्वारा अन्धकार में बहुत दृरतक खींचा गया जिससे कि वह अत्यन्त थक गया ॥ १४ ॥

तस्यांश्च। स्पर्शसम्भूतामवापमुदमुत्तमाम् । सोऽन्धकारेप्रमन्भूयोमदनाकृष्टमानसः || १५ |

 उस हरिणी के स्पर्श से राजा को आनन्द प्राप्त हुआ और उस इन्धकार मे घूमते हुए उसको कामदेव  नेआकृष्टकरलिया॥१५॥

विज्ञायसानुरागंतंपृष्ठस्पर्शनतत्परम्। नरेन्द्रंतद्वनस्यान्तःसामृगीतमुवाचह॥१६॥

राजा के अनुरागऔरपीठ के स्पर्श करने यादि को जानकर उस हरिणी ने राजा से कहा ||१६||

किंपृष्ठचेपथुमताकरेणस्पृशसंमम। श्रन्यथैवास्यकार्य्यस्यसञ्जातानृपतेगतिः॥१७

हे राजन् ! श्राप कामासक्त होकर हाथ से मेरी पीठ को क्यों सिराते हैं, इससे कार्य के करने से आपका सत्कर्म नष्ट होजायेंगा ॥१७

नास्थानेवोमनोयातंनागम्याहंतवेश्वर | किन्तुत्वत्सङ्गमेविनमेषलोलःकरोतिमे॥१८॥

हे प्रभु! आपने अनुचित स्थान में चित्त को नही लगाया है और मैं आपके लिये श्रगम्या भी नही

हूँ परन्तु मेरे थापके सङ्गम में लोल विडालते हैं ॥ १८ ॥

मार्कण्डेयउवाच

इति श्रुत्वा वचस्तस्या मृग्याश्च जगतीपतिः । जातकौतुहलोरौहीमिदंवचनमत्रवत्॥१६॥

मार्कण्डेयजी बोले-

उस मृगी के यह वचन सुनकर राजा को बड़ कौतूहल हुआ और वे उस हरिणी से यह वचनबोले ॥ १६ ॥

राजोवाच

कात्वंब्रूहिमृगीवाक्यंकथंमानुषवद्वद | कश्चैवलोलोयोविघ्नंत्वत्सङ्गेकुरुतेमम॥२०॥

राजा बोले--

हे हरिणी । यह तुम क्या कहती हो और मनुष्य की तरह किस प्रकार बोलती हो; और यह

लोल कौन है जो मेरे और तुम्हारे सम में विघ्न डालता है ? ॥ २० ॥

मृग्युवाच

अर्हतेदयिताभूपभागासमुत्पलावती। भार्थ्याशताग्रमहिषीदुहितादृढधन्वनः॥२१॥

मृगी बोली

हे राजन् ! मैं उत्पलावती नाम तुम्हारी पहिली स्त्री हूं जो कि दृढधन्वा की पुत्री और तुम्हारी सौ

रानियों में अग्रणी थी ॥२१॥ राजोवाच

किन्तुयावत्कृतंकर्म्मयेनेमांयोनिमागता। पतिव्रताधर्मपरासाचेत्थंकथमीदृशी ||२२||

राजा वोले-

तू तो अत्युत्कृष्ट पतिव्रत धर्म के पालने वाली थी फिर तूने ऐसा कौनसा कर्म किया जिससे यहयोनि पाई ॥ २२ ॥ मृग्युवाच

श्रहंपितृगृहेबालासखीभिःसहितावनम्। इन्तुंगताददशैँकंमृगंमृग्यासमागतम् ||२३||

मृगी बोली-

पितां के घर पर एक समय बाल्यावस्था में अपनी सखियों के साथ खेलने को बन में गई तो

वहाँ हरिणी के साथ एक मृग को देखा ॥ २३ ॥

ततःसमीपवर्त्तिन्यामयासाताड़ितामृगी। सयात्रस्तागतान्यत्रक्रुद्धःप्राहततोमृगः॥२४॥

जब वह मृगी मेरे पास आई तो मैंने उसे मारा और मेरे डर से वह दूर चलीगई जिससे क्रोधितहोकर वह मृग बोला ॥ २४ ॥

सूढ़ेकिमेवंमत्तासिधिक्तेदौःशील्यमीदृशम्। आधानकालोयेनायंत्वयामेविफलीकृतः ||२५||

 हे मूर्खे ! तू इतनी प्रमत्त क्यों है ? तेरी इस दुष्टता को धिक्कार है कि तूने मेरे गर्भाधान करनेका समय विफल करदिया ॥२५

वाचंश्रुत्वाततस्तस्यमानुषस्येवभाषतः। भीतातमब्रवंकोऽसीत्येतांयोनिमुपागतः || २६

मनुष्य की तरह उसको बोलते हुए सुनकर मैं डर गई और मैंने उससे पूछा कि तुम कौन हो औरइस योनि में किस तरह प्राप्त हुए ॥ २६॥

ततःसप्राहपुत्रोऽहमृषेर्निटतिचक्षुषः। सुतपानाममृग्यान्तुसाभिलाषोमृगोऽभवम् ||२७||

वह बोलाकि मैं निवृत्तिचतुष नाम ऋषि का पुत्र हूँ और मेरा नाम सुतपा है । इस मृगी से भोग करने कीइच्छा से मैं हरिण होगया || २७||

इमाञ्चानुगतःप्रेम्णावाञ्छितवानयाबने। स्वयावियोजितादुष्टेतस्माच्छापंददामिते॥२८॥

मैं इस हरिणीको बहुत चाहता हूँ और यह भी मुझसे प्रीति रखती हैं । हे दुष्टे ! तूने इससे मेरा वियोग करादिया इसलिये तुझे मैं शाप देता हूँ ||२८||

मयाचोक्तंतवाज्ञानादपराधःकृतोमुने। प्रसादंकुरुशापंमेनभवान्दातुमर्हति ||२६||

मैंने कहा;कि हे मुनि ! अज्ञान से मैंने आपका यह अपराध किया है। कृपा करें और आप मुझे शाप न दें !!

इत्युक्तःप्राहमांसोऽपिमुनिरित्थंमहीपते। नप्रयच्छामिशापंतेयद्यात्मानंददामिते॥३०॥

 हे राजन् ! मेरे ऐसा कहने पर वह मुनि कहने लगा...कि मैं तुझे शाप न दूँगा परन्तु मैं तुझें अपनीआत्मा देता हूँ ॥ ३० ॥

मयाचोक्तमृगी. नाहंमृगरूपधरावने। लप्स्यसेऽन्यांमृगींतावन्मयिभावोनिवर्त्यताम्३१

मैंने उस मृगरूपी मुनि से कहा कि मैं हरिणी नहीं हूँ |  तूं दूसरी हरिणी कीइच्छा कर तथा मुझसे ऐसा भाव मत रख ॥ ३१ ॥

इत्युक्तःकोपरक्ताक्षःसमाहस्फुरिताधरः। नाहंमृगीत्वयेत्युक्तंमृगीमूढ़ेभविष्यसि ||३२||

जब मैंने उससे ऐसा कहा तब क्रोधसे उसके होठ काँपने लगे और आँखें लाल होगई । वह बोला,

सूर्खे ! जो तू यह कहती हैं कि मैं मृगी नहीं हूँ सो तूमृगीही होगी ||३२||

भृशंप्रव्यथितामरणम्यमुनिमत्रत्रम् |

स्वरूपस्थमतिक्रुद्धं प्रसीदेति पुनः पुनः ||३३||

फिर अत्यन्त दुःखित होकर मैंने उस कुद्ध हुए मुनि को प्रणाम कर वार-बार कहा कि मुझपर कृपा कीजिये ॥ ३३ ॥

बालांनभिज्ञावाक्यानांततःप्रोक्तमिदंमया। पितर्य्यसतिनारीभिर्नियतेहिपतिःस्त्रयम् ||३४||

  मैं बालिका हूँ,अज्ञानता में मैंने यह वचन कह दिये । जिस नारी का पिता नहीं होता है वह स्त्री अपना वर स्वयंचुन लेती है ||३४||

सतितातेकथञ्चाहंवृणोमिमुनिसत्तम। सपराधाथवापादौप्रसीदेशनमाम्यहम् ||३५||

मेरा पिता मौजूद है ऐसी दशा मैं हे मुनिसत्तम ! मैं आपको किस तरह वरू । मैं आपके चरणों में नमस्कार करती हूँ, मेरा अपराध क्षमा कीजिये ॥ ३५ ॥

मसीदेतिप्रसीदेतिप्रणतायामहामते। इत्थंलालप्यमानायाःसप्राहमुनिपुङ्गवः ||३६||

जब मैंने प्ररणत होकरबार-बार कहा कि थाप मुझ पर प्रसन्न हों  तब वहमुनिसत्तम मुझसे बोले ||३६||

नभवत्यन्यथाप्रोक्तंममवाक्यंकदाचन | मृगीभविष्यसिमृतावनेऽस्मिन्नेवजन्मनि ||३७||

मेरा कहा हुआ कभीअन्यथा नहीं हो सकता ।  मरने पर तू इस वन मेंअवश्य मृगी होगी ॥ ३७ ॥

मृगत्वेचमहाबाहुस्तवगर्भमुपैष्यति। लोलोनाममुनेःपुत्रःसिद्धवीर्य्यस्यभाविनि ||३८||

 हे भाविनी ! जब तू हरिणी का जन्म धारण करलेगी तब सिद्ध वीर्य मुनि के पुत्र लोल तेरे गर्भ से उत्पन्न होंगे ॥ ३८ ॥

जातिस्मराभवित्रीत्वंतस्मिन्गर्भमुपागते। स्मृतिंप्राप्यतथावाचंमानुपीमीरयिष्यसि ||३६||

उसके गर्भ में श्राते ही तुमको पूर्वजन्म की स्मृति होजावेगी और उस स्मृति के कारण तू मनुष्य कीतरह बोलेगी ||३६||

तस्मिन्जातेमृगीत्वात्त्वंविमुक्तापतिनार्चिता। लोकानवाप्स्यसिमाप्यायेनदुष्कृतकर्मभिः॥४०॥

लोल के उत्पन्न होते ही तूहरिणी की योनि से छूटकर पति से पूजित हो तू उन लोकों को जायगी जिनको कि अत्यन्त दुष्कर तप श्रादि करके भी लोग नहीं पाते हैं ॥ ४० ॥

सोऽपिलोलोमहावीर्य्यःपितृशत्रून्निपात्यवै जित्वावसुन्धरांकृत्स्नांभविष्यतिततोमनुः॥४१॥

  वह बलवान् लोल पिता के शत्रुओं को मार कर संपूर्ण पृथ्वी को जीतेंगे और मनु पद को प्राप्त होंगे ॥ ४१ ॥

एवंशापमहंलब्ध्वामृतातिर्यक्त्वमागता। त्वत्संस्पर्शाच्चगर्भोसौसम्भूतोजठरेमम॥४२॥

उसी शाप के कारण मैं मरकर तिर्य्यक योनि में प्राप्त हुई हैं। हे राजन् ! मेरे उदर में आपके स्पर्शसे यह गर्भ ठहर गया है ॥ ४२॥

यतोब्रवीमिनास्थानेतवयातंमनोमयि। नचाप्यगम्योगर्भस्थोलोलोविघ्नंकरोत्यसौ॥४३॥

 इसी से मैं कहती हूँ कि आपने अनुचित स्थान में अपना मन नहीं लगाया है तथा मैं आपसे श्रगम्या भी नहीं हूँपरन्तु गर्भ में स्थित लोल विघ्न करते हैं ॥ ४३ ॥ मार्कण्डेयउवाच

एवमुक्तस्ततःसोऽपिराजाप्राप्यपरांमुदम्। पुत्रोममारीन्जित्वेतिपृथिव्यांभवितामनुः४४ ||

मार्कण्डेयजी बोले

यह सुनकर राजा को अत्यन्त आनन्द हुना कि उनका पुत्र शत्रुओं को जीतकर पृथ्वी पर मनुहोगा ॥ ४४ ॥

ततस्तंसुपुवेपुत्रंसामृगीलक्षणान्वितम्। तस्मिन्जातेचभूतानिसर्व्वाणिप्रययुर्मुदम्॥४५॥

फिर उस मृगी ने अच्छे लक्षणों सेरक्त एक पुत्र को उत्पन्न किया  जिसके उत्पन्न होतेही सब प्राणियों को प्रसन्नता हुई ॥ ४५ ॥

विशेषतश्चराजासौपुत्रेजातेमहावले। साविमुक्तामृगीशापात्मापलोकाननुत्तमाना॥४६

और विशेष श्रानन्द राजाको उस महाबली पुत्र के उत्पन्न होने से हुआ । वह हरिणी भी वन्धन से मुक्तहोकर उत्तम लोकों को गई ॥ ४६ ॥

ततस्तस्यर्पयःसर्व्वेसमेत्यमुनिसत्तम। अवेक्ष्यभाविनीमृद्धिंनामचक्रुर्महात्मनः॥४७॥

  हे मुनिसत्तम ! फिर सव ऋषि उसके पास आये और उस महात्मा पुत्र को ऋद्धियों से युक्त देखकर उसका नामरखने लगे ॥४७॥

तामसींभजमानायांयोनिमातर्य्यजायते। तमसाचाहतेलोकेतामसोऽयंभविष्यति॥४८

इसकी उत्पत्ति तामसी योनि में प्राप्त माता से हुई है और इसके उत्पन्न होने के

समय संसार में अँधेरा छागया था अतः इसकानाम तामस होगा ॥४८॥

ततःसतामसंस्तेनपित्रासंवर्द्धितोवने।

जातबुद्धिरुवाचेदं पितरं मुनिसत्तम ॥ ४६ ॥

हेकौटुकिमुनि ! इसकेअनन्तरउसतामसकोउसकेपितानेउसीवनमें पाला । जब तामस में बुद्धि का उदय हुआ तबवह अपने पिता से वोला ॥ ४६ ॥ कस्त्वंतातकथंवाहंपुत्रोमाताचकामम। किमर्थमागतश्चत्वमेतत्सत्यंब्रवीहिमे॥५०

हे तात ! तुमकौन हो, मैं किस तरह तुम्हारा पुत्र हूँ तथा मेरी माता कौन है और श्राप किस कारण से यहाँ आयेहुए हैं यह सब सत्य सत्य मुझसे कहिये ॥ ५० ॥

मार्कण्डेयउवाच

ततःपितायथावृत्तंस्वराज्यच्यावनादिकम्। तस्याचष्टेमहाबाहुःपुत्रस्यजगतीपतिः॥५१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

सत्य-सत्यतव पिता ने अपने राज्य से च्युत होने आदि से लेकर जो वृत्तान्त था वह सब अपने महावलीपुत्र को कह सुनाया ॥५१॥ श्रुत्वातत्सकलंसोऽपिसमाराध्यचभास्करम्। अवापदिव्यान्यस्त्राणिससंहाराग्यशेषतः॥५२||

उस सब वृत्तान्त कोसुनकर उसने सूर्य की आराधना की और उनसे दिव्य अस्त्रों तथा उनके चलाने की विद्या कोग्रहण किया ||५२||

कृतास्त्रस्तानरीन्जित्वापितुरानीयचान्तिकम्। अनुज्ञातान्मुमोचाथतेनस्वंधर्ममास्थितः॥५३

वह उन अस्त्रों से सव शत्रुओंको जीतकर पिता के समीप ले आया और उनकी ज्ञा से शत्रुओं को छोड़कर अपने धर्म कार्य मेंस्थित हुआ || ५३ ॥

पितापितस्यस्वान्लोकांस्तपोयज्ञसमज्जितान्। विसृष्टदेहःसम्प्राप्तोदृष्ट्वापुत्रमुखंसुखम्॥५४

उसका पिता भी तप यज्ञ आदिकरके और  अपने पुत्र का मुख देखकर सुखपूर्वकशरीर त्याग कर परलोक को गया ॥ ५४ ॥

जिल्लासमस्तांपृथिवींतामसाख्यःसपार्थिवः। तामसाख्योमनुरभूत्तस्यमन्वन्तरंशृणु॥५५॥ ||

तामसनाम उस राजा ने समस्त पृथ्वी को जीत लिया और वह तामस मनु के नाम से विख्यात हुश्रा अव उसके मन्वन्तर को सुनो ॥ ५५ ॥

येदेवायत्प्रतियश्चदेवेन्द्रोयेतथर्पयः। येपुत्राश्चमनोस्तस्यपृथिवीपरिपालकाः ||५६||

 उस मन्वंतर में जो देवता, उनके स्वामी, देवेन्द्र और ऋषि तथा उस मनु के पुत्र जो राजा हुए उनको सुनो ॥ ५६ ॥

सत्यास्तथान्येसुधियःसुरूपाहरयस्तथा। एतेदेवगणास्तत्रसप्तविंशतिकामुने॥५७॥

उस मन्वन्तर में सुधि सुरूप और हर आदि सत्ताईस देवता गण हुए ||५७||

महावलोमहावीर्यःशतयज्ञोपलक्षितः। शिखिरिन्द्रस्तथातेपांदेवानामभवद्विभुः || ५८

शिखि नाम महाबलीऔर पराक्रमी राजा सौ  यज्ञों को करके उन देवताओं का इन्द्र हुआ ||५८||

ज्योतिर्द्धामापृथुःकाव्यश्चैत्रोऽग्निर्वलकस्तथा। पीवरथतथाब्रह्मन्सप्तसप्तर्षयोऽभवन्॥५६

  हे ब्रह्मन् ! ज्योतिधर्मा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वलक और  पीवर ये हीसात सप्तर्षि हुए ॥ ५६॥

नरःक्षान्तिःशान्त-दान्त- जानु- जङ्घादयस्तथा।

पुत्रास्तु तामसस्यासन् राजानः सुमहाबलाः ||६०||

तामसकेपुत्रनर, क्षान्ति शान्त, दान्त, जानुजंघआदिमहाबलीराजाहुए॥६०॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंतामसमन्वन्तरनाम७४वाँश्र०समाप्त।