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मार्कण्डेयउवाच

"एवंसूर्यस्तवंकुर्व्वन्विश्वकर्मादिवस्पतेः। तेजस: पोड़शंभागंमण्डलस्थमधारयत्॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

इस प्रकार सूर्यकी स्तुति करते हुए वि ने उस तेज के सोलहवें भाग को मण्डलस्थ कदिया ॥१॥

शातितैस्तेजसोभागैर्दशभिःपञ्चभिस्तथा। अतीवकान्तिमच्चारुभानोरासीततदावपुः॥२॥

उस तेज के पन्द्रह भागों के कट से सूर्य भगवान् का शरीर श्रति कान्तियुक्त

सुन्दर होगया ॥ २ ॥

शातितञ्चास्ययत्तेजस्तेनचक्रंविनिम्मितम्। विष्णोःशूलंचशर्व्वस्यशिविकाधनदस्यच। दण्डःप्रेतपतेःशक्तिर्देवसेनापतेस्तथा॥३

जो पन्द्रह भाग तेज किया गया था, उससे विष्णु का सुदर्शन चक्र महादेव का शूल, कुबेर की पालकी । यमराज क दरड, देवताओं के सेनापति की शक्ति ॥ ३ ॥

श्रन्येषाञ्चैवदेवानामायुधानिसविश्वकृत्। चंकारतेजसाभानोर्भासुरापरिशान्तये॥४॥

तथा और देवताओं के अनेक श्रायुध विश्वकर्मा ने के उस तेज से असुरोंका नाश करनेके लिये बनायें॥ ४ ॥

इतिशातिततेजाःसशुशुभेनातितेजसा। वपुर्दधारमार्त्तण्डःसर्व्वावयवशोभनम्॥५॥

अधिक तेज के अलग होजाने से सूर्य का तेज सह्य होगया और वे अत्यन्त शोभायमान अवयवों से युक्त होकर सुन्दर शरीर वाले होगये॥ ५ ॥

सददर्शसमाधिस्थःस्वांभाय्यांबड़वाकृतिम्। धृष्यांसर्व्वभूतानांतपसानियमेनच || ६

  तव उन्होंने समाधिस्थ होकर अपनी स्त्री को घोड़ी के रूप में सब प्राणियों से अलग तप मेंलवलीन देखा || ६||

उत्तरांश्चकुरून्गत्वाभूत्वाऽश्वोभानुरागमत् सांचदृष्ट्वातमायान्तंपरपुंसोविशङ्कया || ७

फिर सूर्य घोड़े का रूप धारण कर कुरुक्षेत्र की उत्तर दिशा में जहां कि उनकी स्त्री थी गये और संज्ञाभी उनको श्राया हुआ देख कर परपुरुष की आशंका से ॥ ७ ॥

जगामसम्मुखेतस्यपृष्ठरक्षणतत्परा। ततश्चनासिकायोगंतयोस्तत्रसमेतयोः || ८

अपने पिछले भांग की रक्षा करती हुई उनके सन्मुख श्राई, तब वहाँ उन दोनों की नाक से नाक : मिलग़ई ॥ ८ ॥

'ढ़वायाञ्चतत्तेजोनासिकाभ्यांविवस्वतः। देवौतंत्रसमुत्पन्नावश्विनौभिषजांवरौ॥६॥

सूर्य भगवान् का जो तेज़ नाक के मार्ग से घोड़ीके उदरमें गया उससे देवताओंके वैद्य दोनों अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥

'नासत्यदत्रोंतनयावश्ववक्त्त्राद्विनिर्गतौ। मार्त्तण्डस्यसुतावेतावत्ररूपधरस्यहि॥१०॥

अश्वरूपधारी मार्तण्ड के नासत्य और दस्र नामक दोनों पुत्र अश्विनी केमुख से उत्पन्न हुए | ॥ १० ॥

रेतसोऽन्तेचरेवन्तःखड्गोधन्वीतनुत्रधृक्। प्रश्वारूढःसमुद्रभृतोवारण- तूसमन्त्रितः॥११॥

तथा अन्त में उनके वीर्य से खड्ग और धनुष धारण किये, अश्व पर चढ़े हुए, वाण और तरकश लिये रेवन्तं नाम पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ११ ॥

ततःस्वरूपममलंदर्शयामासभानुमान्। तस्यशान्तंसमालोक्यसारूपंमुदमाददे ||१२||

फिर सूर्य ने अपने निर्मल स्वरूप को दिखाया और संज्ञा उनके उस शान्त स्वरूप को देखकर अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुई ||१२

'स्वरूपधारिणीमांसनिनायनिजालयम्। संज्ञांभाय्यीप्रीतिमतींभास्करोवारितस्करः॥१३॥

फिर संज्ञा ने भी अपना असली स्वरूप धारण किया और सूर्य भगवान उसको अपने घर लिया

कर लेगये । फिर संज्ञा और सूर्य में परस्पर प्रीतिरहने लगी ॥ १३॥

ततःपूर्व्वसुतोयोऽस्याःसोऽभूद्वैवस्वतोमनुः। द्वितीयश्चयमःशापाद्धर्म्मदृष्टिरनुग्रहात्॥१४॥

उनका सबसे ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु हुआ और दूसरा पुत्र यम शापके कारण पिता

के से धर्म दृष्टि हुआ ॥ १४ ॥

यमस्तुतेनशापेनभृशंपीड़ितमानसः। धर्मोऽभिरोचतेयस्माद्धर्म्मराजस्ततःस्मृतः॥१५॥

छाया केशॉप से यमराज के चित्त को बड़ा क्लेश हुआ | उनकी धर्म में रुचि होने के कारण वे धर्मराज कहलाये ॥१५॥

कुंमपो : मांसमादायपादतस्तेमहीतलम्। पतिष्यन्तीति शापान्तं तस्य चक्रे पिता स्वयम् ||१६||

उनकेपितानेयहकहकरकितुम्हारे पाँवकेमाँसकोकीड़ेपृथ्वीतलपरलेजाँयगे उनके शाप का अन्त कर दिया ॥,१६ ॥

धर्मदृष्टियतश्चासौसभोमित्रेतथाऽहिते। ततोनियोगेतंयाम्येचकारतिमिरापहः॥१७॥

उस समयसे यम धर्मदृष्टि होकर शत्रु और मित्रको समभाव से देखने लगे, तव सूर्य ने उनको दक्षिण दिशा मेंले जाकर ॥१७॥

तस्मैददौपिताविप्रभगवान्लोकपालताम्। पितृणासाधिपत्यंचपरितुष्टोदिवाकरः॥१८॥

लोकपाल बनाया तथा भगवान् दिवाकर ने प्रसन्न होकर उन्हें पितरों का श्रधिपत्य भी दिया || १८ ||

यमुनाश्चनदींचक्रेकलिन्दान्तरवाहिनीम्। अश्विनौदेवभिषजौकृतौपित्रामहात्मना॥१६

फिर महात्मा पिता ने यमुना  को कलिन्द देश में नदी के रूप में वहने की श्राशा

दी तथा दोनों अश्विनी कुमारों को देवताओं कावैद्य बनाया ॥ १६ ॥

गुह्यकाधिपतित्वेचरेवन्तोविनियोजितः। एवमप्याहचततोभगवाँलोकभावितः।। स्वमप्यशेषलोकस्यपूज्योवत्सभविष्यसि ||२०||

रेवन्त को गुह्यकों का स्वामित्व दिया तथा भगवान् सूर्य ने उससे यह भी कहा,

" हे वत्स ! तुम समस्त लोकों द्वारा पूजित होगे"॥२०॥

अरण्यादिमहादाव- वैरि-दस्युभयेषुच। त्वांस्मरिष्यन्तियेमर्त्यामोक्ष्यन्तेतेमहापदः॥२१

वन, अग्नि, वैरी और चोर आदि के भयमें जो लोक तुम्हारा स्मरण करेंगे वे कठिन विपत्तिसे छुटकारा पायेंगे ॥ २१ ॥

क्षेमंबुद्धिसुखंराज्यमारोग्यंकीर्त्तिमुन्नतिम्। नराणांपरितुष्टस्त्वंपूजितःसम्प्रदास्यसि ||२२।

  जो मनुष्य तुम्हारा पूजन करेंगे उनको तुम प्रसन्न होकर क्षेम, बुद्धि, सुख, राज्य श्रारोग्य, कीर्ति और उन्नति प्रदानकरोगे ॥२२ ॥

छायासंज्ञासुतश्चापिसावर्णःसुमहायशाः। भाव्यःसोऽनागतेकालेमनुःसावर्णकोऽष्टमः ||२३||

और छाया के पुत्र जो महान् यश वाले सावर्णिक हैं वे भविष्य में आठवें मनु होंगे ||२३

मेरुपृष्ठेतपोघोरमद्यापिचरतेप्रभुः। भ्राताशनैश्वरस्तस्यग्रहोऽभूच्छासनाद्रवेः ||२४||

सावर्णिक प्रभु मेरु पर्वत पर अव भी तपस्या करते हैं | उनके भाई शनैश्वर उनकी आज्ञा से ग्रह हुए॥२४ ॥

यवीयसीतुयाकन्यादित्यस्याभूद्धद्विजोत्तम। अभवतसासरिच्छ्रेष्ठायमुनालोकपावनी ||२५||

 हे द्विज श्रेष्ठ ! सूर्य की जो छोटी कन्यायमुना थी वह लोकों को पवित्र करने वाली श्रेष्ठनदी हुई || २५ ||

यस्तुज्येष्ठोमहाभागःसर्गोयस्येहसाम्प्रतम्। विस्तरंतस्यवक्ष्यामिमनोववस्वतस्यह ||२६||

सूर्य के ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनुका यह सर्ग है, इसका मैं विस्तारपूर्वक वर्णन करूंगा ||२६||

इदंयोजन्मदेवानांशृणुयाद्वापठेतवा। विवस्वतस्तनूजानांरवेर्माहात्म्यमेवच ||२७||

विवस्वान के पुत्रों के जन्म और भगवान् : सूर्य के माहात्म्य को जो पढ़ता या सुनता है ||२७||

आपदंप्राप्यमुच्येतप्रामुयाच्चमहायशः। अहोरात्रकृतंपापमेतच्छमयतेश्रुतम्।

माहात्म्यमादिदेवस्य मार्तण्डस्य महात्मनः ||२८||

वहआपत्तिसेमुक्तहोकरमहान्यशकोप्राप्त करताहै।आदिदेवमहात्मामार्तण्डकेमाहात्म्यको दिन रात्रि सुनने से पापका शमन होता है ॥२८॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंरवि-माहात्म्यनाम१०८वाँश्र०स०।