मार्कण्डेय महा पुराण
130
मार्कण्डेयउवाच
इतितापसवाक्यंसश्रुत्वालज्जापरोनृपः। धिङ्सांचारान्धमित्युक्त्वानिश्वस्यजगृहेधनुः१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
तपस्वी के इस प्रकार वचन सुनकर राजा ' मरुत बड़े लज्जित हुए । उन्होंने अपनेको श्रविवेकी
और अन्ध आदि कहकर लम्बी सांस ली औरधनुष उठा लिया ॥ १ ॥
ततःसत्वरितंगत्वातमौर्व्वस्याश्रमंप्रति। ववन्देशिरसावीरांमातरंपितुरात्मनः॥२
फिर उन्होंने शीघ्र श्रौर्व्वमुनि के आश्रम पर पहुँच कर अपनी दादी 'वीराको शिर से प्रणाम किया ||२||
तापसांथयथान्यायंतैश्वाशीर्भिरभिष्टुतः। दृष्ट्वाचतापसान्सप्तनागैर्देष्टान्सुतानभुवि॥३
उन्होंने न्यायपूर्वक तपस्वियों को प्रणाम किया जिन्होंने कि आशीर्वाद देकर राजा की स्तुति की। सात मुनिकुमारों को सर्पों द्वारा काटे जाने से पृथ्वी पर पड़ा हुआ देखकर ||३||
निनिन्दात्मानमसकृत्पुरस्तेषांमहीपतिः। उवाचचैतदद्याहंमद्वीर्य्यमवमन्यताम्॥४
उन्होंने अपने को बहुत धिक्कारा और फिर महाराज मरुत ने उनसे कहा कि आप लोग ब
मेरे पराक्रम को देखिये ॥ ४ ॥
यत्करोमिभुजङ्गानांदुष्टानांब्राह्मणद्विषाम्। तत्पश्यतुजगत्सर्व्वंसंदेवासुरमानुषम्॥५
अब इन ब्राह्मणों के शत्र दुष्ट सर्पों का जो कुछ मैं करता हूँ वह देवता', राक्षस और मनुष्य सहित सब जगत् देखे ॥५॥ मार्कण्डेयउवाच
इत्युक्त्वाजगृहेकोपादत्रंसंवर्त्तकंनृपः। नाशायाशेषनागानां पातालोविविचारिणाम् ||६||
मार्कण्डेयजीबोले- यहकहकरमहाराजमरुत्तनेक्रोधकरने पातालऔरपृथ्वीमेंविचरनेवालेनागोंका करने के लिये सम्बर्त नाम अस्त्र को उठा लिया।६॥
ततोजज्वालसहसानागलोकःसमन्ततः। महास्त्रतेजसावित्रदह्यमानोऽनिवारितः॥७
हे विप्र ! तब उस महान् श्रस्त्र के तेज से सहसा .. नागलोक चारों ओर से जलने लगा, यद्यपि उस अनि के निवारण करने का प्रयत्न किया गया तोभी वह जलता ही रहा ||७||
हाहातातेतिहामातर्हाहावत्सेतिसम्प्रभे। तस्मिन्नवकृतेवाचःपन्नगानामयाभवन्॥८
उस स्त्र से उत्पन्नहुए विभ्रम से हा तात ! हा माता ! हा वत्स ! यादि कह कहकर नाग लोग चिल्लाने लगे ॥८ ॥
केचित्ज्वलद्भिःपुच्छाग्रैःफणैरन्यभुजङ्गमाः। गृहीतपुत्रदाराचत्यक्ताभरणवाससः॥६॥
कुछ सर्पों की पूंछ जलगई और कुछ के फरा-1. ऐसी दशा में वे अपने वस्त्राभूषणों को छोड़कर
अपने त्री पुत्रों के साथ ॥ ६ ॥
पातालमुत्सृज्यययुःशरणंभामिनींतदा। मरुत्तमातरंपूर्व्वंययादत्तंतदाऽभयम् ||१०
पाताल छोड़कर महाराज मरुत्त की माता भामिनी की शरण में गये उनके पास पहुंच कर भय से श्रातुर हुए सपा ने जिसने कि पहिले उनको अभयदान दिया था। ९०॥
सुपेत्योरगाःसर्व्वेसमरणामंभयातुराः। जगद्गदमिदंप्रोचुःस्मर्य्यतांनःपुरोदितम्॥११॥
प्रणाम करते हुए गद्गद वाणीले भामिनीले कहा, "श्रापने जो हमसे पहिले प्रतिज्ञा की थी उसको
स्मरण कीजिये" ॥११॥
रणमाभ्यचितंपूर्व्वंयदस्माभीरसातले। स्यकालोऽयमायातस्त्राहिवीरप्रजायिनि॥१२॥
हमने जब पाताल में प्रणाम करके आपकी पूजा की थी तो श्रापने हमको बचनदिया था, उसका समय आया हैं । हे वीर वअपनेजननी ! अब हमारी रक्षा करो ॥१२॥
नोनिवार्यतांराज्ञिप्राणैःसायोज्यमस्तुनः। ह्यतेसकलोलोकोनागानामखवह्निना॥१३॥
हे महारानी !!पुत्र को रोक कर हमारे प्राणों की रक्षाकीजिये । आपके पुत्र के अस्त्र की अग्नि से समस्तनागलोक जल रहा है ||१३||
वंसन्दह्यमानानामस्माकंतनयेनते। मृतेशरणंनान्यत्कृपांकुरुयशस्त्रिनि ||१४||
आपके पुत्र हम लोगोंको दग्ध कर रहे हैं, आपके अतिरिक्त हम किस की शरण में जाँय । हे यशस्विनी ! कृपा करो ||१४||
मार्कण्डेयउवाच
तेश्रुत्वावचस्तेषांसंस्मृत्यादौचभाषितम्। तरमाहसासाध्वीससम्भ्रममिदंवचः॥१५॥
मार्कण्डेयजी बोले-
उनके यह वचन सुनकर उस साध्वी ने अपनी प्रतिज्ञाका स्मरणकिया और अपने पति वीक्षित: से बोली || १५ || भामिन्युवाच
र्श्वमेवतवाख्यातंपातालेयजङ्गमैः। तमभ्यर्थनापूर्व्वंममासीत्तनयंप्रति॥१६
भामिनी बोली-
मैं आपसे पहिले ही कह चुकी हूँ कि किस प्रकार पाताल में नागों ने मेरी पूजा करके हमारेपुत्रके प्रति अपने भय को कहा था ॥१६॥
इमेऽभ्यागताभीतादह्यन्तेतस्यतेजसा। मेतेशरणंपूर्व्वंदत्तमेभ्योमयाऽभवम् ||१७||
वे उस के तेज से दग्ध होते हुए भयभीत होकर यहाँ पर मेरी शरण में आये हैं और मैं इनको अभय दानदे चुकी हूँ ॥१॥
मांशरणमापन्नास्तेत्वांशरणमागताः। थग्धर्म्मचरणायाताहंशरणंतव॥१८॥
चूंकि ये मेरी शरण में आये हैं इसलिये ये आपकी शरण में हुए कारण- मेरा और आपका धर्माचरण एक ही है और मैं भी आपकीशरण हूँ ||१८||
नवारयपुत्रंत्वंमरुतंवचनात्तव। चाभ्यर्थितोऽवश्यंशममभ्युपयास्यति ||१६||
इसलिये आप अपनी श्राज्ञासे अपने: पुत्र मरुत को रोकिये। साथ ही मेरे कहने पर भी वह अवश्य शान्त होजायगा ॥१६॥ श्रवीचिदुवाच
राधेनियतंमरुतःक्रोधमागतः।
दुर्निवर्त्त्यमहं मन्ये तस्य क्रोधं सुतस्य ते ॥२०॥
श्रवीक्षितवोले- . नागोंकेमहानअपराधकरनेपरमरुतक्रोध हुआ है । मैं समझता हूँ कि तुम्हाक्रोध निवृत्त होना कठिन है ||२०||
नागाऊचुः
शरणागतास्तववयंप्रसादःक्रियतांनृप। क्षतस्यार्त्तपरित्राण- निमित्तंशस्त्रधारणम्॥२१॥
नाग वोले-
हे राजन् ! हम आपकी शरण में आये हैं, हम पर दया करें | क्षत्रिय लोग दुःखीजनों की रक्षा के
निमित्त ही शस्त्र धारण करते हैं ॥ २१ ॥ मार्कण्डेयउवाच
नागानांतद्वचःश्रुत्वाभूतानांशरणैषिणाम्। तयाचाभ्यर्थितःपत्न्याप्राहावीक्षिन्महायशाः।२२
मार्कण्डेयजी बोले-
...शरण में आये हुए नागों के वे वचन तथा अपनी पत्नी की प्रार्थना सुनकर यशस्वी श्रवीक्षित
ने कहा ॥ २२ ॥
गत्वाब्रवीमितंभद्रेतनयंत्वरयातव। परित्राणायनागानांनत्याज्याःशरणागताः॥२३॥
हे भद्रे ! मैं अभी जाकर नागों की रक्षा के लिये तुम्हारे पुत्रों से कहता हूँ । शरणागतों को त्यागना उचित नहीं ||२३||
नोपसंहरतेशस्त्रंयदिमद्वचनान्नृपः। तदस्त्रैर्वारयिष्यामितस्यास्त्रंतनयस्यते॥२४॥
यदि मेरे कहनेपर राजा अपने अस्त्र को शान्त न करेंगे तो मैं तेरे पुत्र के अस्त्रों को अपने अस्त्रोंसे निवारण करहूँगा।२४ मार्कण्डेयउवाच
ततोगृहीत्वासधनुरवीक्षित्क्षत्रियोत्तमः।
भार्यया सहितः प्रायात् त्वरावान् भार्गवाश्रमम् २५ मार्कण्डेयजीबोले- फिरक्षत्रियश्रेष्ठश्रवीक्षितधनुषकोउठाकर | स्त्रीसहितशीघ्रभार्गवमुनिकेश्राश्रमपरपहुँचे॥२५ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंमरुत्तचरित्र ( २ ) नामका१३०वांअध्यायसमाप्त।"
Summary of chapter 130 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The magnificent Yajna of King Marutta is immortalized as the pinnacle of ancient royal grandeur. Sage Samvarta officiated as the chief priest, and the devas personally attended—Indra drinking the Soma juice, the Maruts serving food on golden vessels, and the Gandharvas singing celestial praises.