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पुत्रावूचतुः

स राजपुत्त्रः सम्प्राप्य वेगादात्मपुरं ततः पित्रोविवन्दिपुः पादौ दिदृक्षुश्च मदालसाम् १।।

नागपुत्र बोले- वह राजकुमार पिता को प्रणाम करने के लिये तथा मदालसा को देखने की इच्छा से शीघ्र ही अपने नगर में श्राया ||१|| ददर्श जनमुद्विममपहृष्टमुखं पुरः पुनश्च विस्मिताकारं प्रहृष्टवदनं ततः

उसने देखा कि नगर के निवासी उद्विग्न हो रहे हैं तथा उनके मुख पर विपाद के चिह्न हैं परन्तु राजकुमार को देखकर वे प्रसन्न मुख होगये अन्यमुत्फुल्लनयनं दिष्ट्या दिष्टय तिवादिनम् परिष्वजन्तमन्योन्यमतिकौतूहलान्वितम् ३"।।

लोग एक दूसरे से आँखों में बातें कर रहे थे और "कल्याण हो" " कल्याण हो" ऐसा कह रहे थे वे एक दूसरे से मिलकर कौतूहलवश हो रहे थे ||३|| चिरं जीवोरुकल्याण हतास्ते परिपन्थिनः पित्रोः प्रह्लादय मनस्तथास्माकमकण्टकम् ४।।

वे राजकुमार से कहते थे कि तुम चिरञ्जीव रहो तथा तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे शत्रुओं का नाश हो पिता को प्रसन्न करके हमको निष्कण्टक कीजिये इत्येवंवादिभिः पौरैः पुरः पृष्ठे च संहृतः तत्क्षणप्रभवानन्दः प्रविवेश पितुर्गृहम्

इस प्रकार कहते हुए नगर निवासी उनको श्रागे, पीछे तथा चारों ओर से घेरे हुए थे और वह सब को तत्क्षण श्रानन्दित करता हुआ पिता के घर को गया

पिता च तं परिष्वज्य माता चान्ये च बान्धवाः चिरं जीवेति कल्याणीददुस्तस्मै तदाशिषः

उसको पिता, माता तथा अन्य बांधवों ने छाती से लगाया और चिरंजीव रहो, तुम्हारा कल्याण हो इस प्रकार कहकर आशीर्वाद दिया ॥ प्रणिपत्य ततः सोऽथ किमेतदिति विस्मितः पमच्छ पितरं तात सोऽस्मै सम्यक् तदुक्तवान्

इसके बाद वह प्रणाम करके पिता से पूछने लगा कि यह उदासी क्यों छाई हुई है ? पिता ने उसको भली भांति सव वात बतलाई २ सभाय्यां तां मृतां श्रुत्वा हृदयेष्टां मदालसाम् पितरौ च पुरो दृष्ट्रा लज्जाशोकान्धिमध्यगः || ८।।

वह अपनी प्राणेश्वरी पत्नी मदालसा का मरण सुनकर तथा माता पिता और नगरवासियों को देखकर लज्जा और शोक के सागर में डूब गया चिन्तयामास सा वाला मां श्रुत्वा निधनं गतम् तत्याज जीवितं साध्वी धिङ्मां निष्ठुरमानसम्

वह सोचने लगा कि उस साध्वी स्त्री ने मेरी मृत्यु के विषय में सुनकर अपने जीवन को त्याग दिया, मुझ निष्ठुर हृदयको धिक्कार है ॥६॥ नृशंसोऽहमनाय्योऽहं विना तां मृगलोचनाम् मत्कृते निधनं प्राप्तां यज्जीवाम्यतिनिघृणः १०

मैं क्रूर हूँ, कठोर हूँ और उस मृगनयनीके बिना जिसने मेरे लिये अपने प्राणोंको त्यागदिया मेरा जीवित रहना श्रति निघृ है॥१०॥ पुनः स चिन्तयामास परिसंस्तभ्य मानसम्

मोहोद्गममपास्याशु निश्वस्योच्छ्वस्य चातुरः वह सोचता हुआ कभी अपने मनको धैर्य देता और कभी मोहवंश होकर श्रातुरता से लम्बी २ श्वास लेता ११ मृतेति सा तन्निमित्तं त्यजामि यदि जीवितम् किं मयोपकृतं तस्याः श्लाघ्यमेतत्तु योषिताम्॥ १२

वह मेरे लिये मर गई यदि मैं भी अपने प्राणों का त्याग करता हूँ तो इससे उसका कुछ उपकार न होगा और इससे स्त्रियों में कुछ प्रशंसा भी न होगी १२ यदि रोदिमि वा दीनो हा प्रियेति वदन् मुहुः तथाप्यश्लाघ्यमेतन्नो वयं हि पुरुषाः किल १३

| यदि दीन होकर "हा प्रिये, हा प्रिये” कह कर रोता हूँ तो इसमें मेरी प्रशंसा नहीं है कारण - हम पुरुष हैं १३ अथ शोकजड़ो दीनो सजा हीनो मलान्वितः विपक्षस्य भविष्यामि ततः परिभवास्पदम् || १४।।

यदि दुःख से मैं जड़ अथवा दीन हो जाऊँ और श्रीहीन होकर मलिन हो जाऊँ तो शत्रुपक्ष द्वारा दवाया जाऊँगा १४ मयारिशातनं कार्य्यं राज्ञः शुश्रूषणं पितुः जीवितं तस्य चायत्तं सन्त्याज्यं तत् कथं मया १५॥

शत्रुओं का नाश तथा राजा जो पिता हैं उनकी सेवा मुझको करना चाहिये इसलिये उनके जीते जी उनको छोड़कर कैसे जाऊँ ? ||१५||

किन्त्वत्र मन्ये कर्त्तव्यस्त्यागो भोगस्य योषितः प्स चापि नोपकाराय तन्वङ्ग्याः किन्तु सर्व्वथा १६

किन्तु अन्य स्त्रियों से भोग के त्याग को मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ, यद्यपि उस ॥ सुन्दरी का मैं इससे कोई उपकार नहीं कर रहा हूँ. १६

मया नृशंस्यं कर्त्तव्यं नेोपकार्य्यपकारि च या मदर्थेऽत्यजत् प्राणांस्तदर्थेऽल्पमिदं मम ॥१७॥

मैं बड़ा क्रूर हूँ, उपकारी न होकर मैं अप- कारी हूँ | जिसने मेरे लिये प्राणों को छोड़ दिया उसके लिये ये मेरे प्राण भी तुच्छ हैं १७ पुत्रावूचतुः इति कृत्वा मर्ति सोऽथ निष्पाद्योदकदानिकम् क्रियाश्चानन्तरं कृत्वा प्रत्युवाच ऋतध्वजः १८

नागपुत्र वोले-

यह मत स्थिर करके उसने मदालसा को के ऋतुध्वज ने कहा १८ ऋतध्वज उवाच यदि सा मम तन्वङ्गी न स्याद्भार्य्या मदालसा

अस्मिन् जन्मनि नान्या मे भवित्री सहचारिणी १६

ऋतध्वज वोले- यदि इस जन्म में सुन्दरी मदालसा मेरी स्त्री न रही तो अब कोई दूसरीखी मैं ग्रहण न करूँगा ||१६|| तामृते मृगशावाक्षीं गन्धर्व्वतनयामहम् न भोक्ष्ये योषितं काश्चिदिति सत्यं मयोदितम् ||२०||

तिलांजलि दी और इसके अनन्तर क्रिया-कर्म कर मैं यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूं कि उस मृग- नयनी, गन्धर्व कन्या मदालसा के मरने के बाद मैं श्रव किसी दूसरी स्त्री से भोग न करूँगा २० सद्धर्म्मचारिणीं पत्नीं तां मुक्त्वा गजगामिनीम् काञ्चिन्नाङ्गीकरिष्यामीत्येतत् सत्यं मयोदितम् २१।

सहधर्मिणी, गजगामिनी उस पत्नी को छोड़कर व मैं किसी स्त्री को अङ्गीकार न करूँगा, यह मैं सत्य कहता हूँ २१ पुत्रावूचतुः परित्यज्य च स्त्रीभोगान् तात सर्व्वास्तया विना

क्रीड़न्नास्ते समं तुल्यैर्वयस्यैः शीलसम्पदा ||२२||

नागपुत्र वोले- मदालसा के न रहने पर उस शीलसम्पन्न राजकुमार ने स्त्री- भोग तथा समान अवस्था वालों के साथ खेल कूद आदि सब छोड़ दिया २२ एतत् तस्य परं कार्य्यं तात तत् तेन शक्यते कर्त्तुमत्यर्थदुष्प्राप्यमीश्वरैः किमुतेतरैः ||२३||

हे पिता ! उसके इस गुरुतर कार्य को कौन करने को समर्थ है इस दुष्प्राप्य कार्य को ईश्वर के अतिरिक्त कौन कर सकता है ? २३ जड़ उवाच

इति वाक्यं तयेाः श्रुत्वा विमर्षमगमत् पिता विमृष्य चाह तौ पुत्त्रौ नागराट् प्रहसन्निव २४

सुमति बोले- उन पुत्रों से इस बात को सुनकर नागराज उनके पिता को इससे क्रोध हुआ और उन्होंने मुस्कराते हुए अपने लड़कों से कहा ||२४|| नागराडश्वतर उवाच यद्यशक्यमिति ज्ञात्वा न करिष्यन्ति मानवाः कर्म्मयुद्यममुद्योगहान्या हानिस्ततः परम् २५।।

नागराज अश्वतर बोले- यदि लोग यह मानकर कि यह काम करने में उद्योग दिन पर दिन कम होगा २५ श्रारभेत नरः 'कर्म्म स्वपौरुपमहापंयन  निष्पत्तिः कर्म्मणो दैवे पौरुषे च व्यवस्थिता २६

इसलिये हम असमर्थ हैं कार्य ही न करें तो उनके कर्म का मनुष्य अपने पौरुप के अनुसार कर्म करें क्योंकि है २६।। : तस्मादहं तथा यत्नं करिष्ये पुत्त्रकावितः तपश्चयी समास्थाय यथैतत् साध्यते चिरात् ||२७||

हे पुत्रो | इसलिये मैं तप में स्थित होकर पौरुष से ही कर्म की निष्पत्ति व्यवस्थित की गई ऐसा यत्न करूंगा कि जिससे ये कार्य शीघ्र ही सिद्ध हो जाय २७॥ जड़ उवाच एवमुक्त्वा स नागेन्द्र: प्लक्षावतरणं गिरेः तीर्थं हिमवतो गत्वा तपस्तेपे सुदुश्चरम् ||२८|

जड़ ( सुमति ) ने कहा—

नागराज अश्वतर यह कहने के बाद प्लक्ष पर्वत से उतर कर हिमालय पर्वत के तीर्थ पर जा कठिन तपस्या करने लगे २८ तुष्टाव गीर्भिव ततस्तत्रं देवीं सरस्वतीम् तन्मना नियताहारो भूत्वा त्रिसवनाप्लुतः २६

और स्तुति, प्रार्थना आदि से वहाँ देवी सरस्वती को संतुष्ट किया और अपना मन उनके चरणों में लगाकर नियमित आहार करना आरम्भ किया ||२६|| अश्वतर उवाच जगद्धात्रीमहं देवीमारिराधयिषुः शुभाम् स्तोष्ये प्रणम्य शिरसा ब्रह्मयोनिं सरस्वतीम् ||३०||

अश्वतर नागराज बोले- मैं जगत की माता शुभ देवी की आराधना करता हूँ और ब्रह्मयोनि सरस्वती को शिर से प्रणाम कर उनकी स्तुति करता हूँ ||३०|| सदसदेवि यत् किञ्चिन्मोक्षवचार्थवत् पदम् तत् सव्र्व्वं त्वय्यसंयोगं योगवर्दोष संस्थितम् ॥३१

हे देवि ! सत्, सत्, मोक्ष, अर्थ संयोग और योग जो कुछ है वह सब आपसे ही स्थित है ३१ त्वमक्षरं परं देवि यत्र सर्व्वं प्रतिष्ठितम् अक्षरं परमं देवि संस्थितं परमाणुवत् ||३२||

हे देवि ! आप परम अक्षर हैं जिसमें सर्व सृष्टिमात्र स्थित है और हे देवि ! उस परम अक्षर में संसार पर- माणुवत् स्थित है ||३२|| अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वञ्चैतत् क्षरात्मकम् दारुण्यवस्थितो वह्निभीमाच परमाणवः ३३

और अक्षर ब्रह्म और तर विश्व में आप उसी प्रकार स्थित हैं जिस प्रकार काष्ठ में श्रग्नि और पृथ्वी में रेणु ३३ तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगचेदमशेषतः श्रकाराक्षरसंस्थानं यत्तु देवि स्थिरास्थिरम् ||३४||

तथा इसी तरह श्रापमें ब्रह्म और सम्पूर्ण जगत् भी स्थित है । आप में ही श्रोंकार भी स्थित है तथा श्रापही चल और अचल हैं ||३४|| तत्र मात्रात्रयं सर्व्वमस्ति यद्देवि नास्ति च यो लोकास्त्रयो वेदात्रैविद्यं पावकत्रयम् ||३५||

हे देवि ! तीन मात्राएँ आपमें ही हैं। तथा तीन लोक, तीन वेद, तीन विद्या और तीन अनि ३५ त्रीणि ज्योतींषि वर्णाश्च त्रयो धर्म्मागमस्तथा यो गुणास्त्रयः शब्दास्त्रयो वेदास्तथाश्रमाः ||३६||

तीन ज्योतिष, तीन वर्ण, धर्मशास्त्र, तीन गुण, तीन शब्द, वेद तथा श्राश्रम||३६|| त्रयः कालांस्तथावस्थाः पितरोऽहर्निशादयः एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति ॥३७॥

तीन काल तथा अवस्थायें, पितर तथा दिन रात्रि और तीन मातायें हे देवि सरस्वती ! आप का ही रूप हैं ३७ विभिन्नदर्शिनामाद्या ब्रह्मणो हि सनातनाः सोमसंस्था हविःसंस्थाः पाकसंस्थाय सप्त याः॥ ३८

विभिन्न दर्शियों के लिये श्राप श्राद्य, ब्रह्म और सनातनहें चन्द्रमा, हविष्य और पाक श्रादि जो सात उच्चारण ३८ तास्त्वदुवारादेवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः 'अनिर्देश्यं तथा चान्यदद मात्रान्वितं परम् ||३६||

ब्रह्म- वादियों द्वारा किये जाते हैं वह सब श्राप ही हैं । आपका स्थान अनिश्चित है तथा थाप श्रर्द्धमांत्रा से युक्त तथा उससे परे हैं ||३६|| श्रविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवज्जितम् तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम् न चास्येन च तज्जिया ताम्रोष्ठादिभिरुच्यते ४०

आप विकाररहित अक्षय, दिव्य और परिणाम रहित हैं श्रतः मैं आपके इस परम रूप का वर्णन नहीं कर सकता, अगर मेरी जिह्वा व होठ तांबेके हों तो भी मैं ऐसा करने में असमर्थ हूँ ॥४०॥ इन्द्रोऽपि वसवो ब्रह्मा चन्द्राका ज्योतिरेव च विश्वासं विश्वरूपं विश्वेशं परमेश्वरम् ||४१ | |

इन्द्र, वसुः ब्रह्मा, चंद्रमा, सूर्य, ज्योति भी आपके ही रूप हैं समस्त विश्व का स्थान आप में है, आप विश्वरूप, विश्वेश तथा परमेश्वर हैं ॥४१॥ सांख्यवेदान्तवादोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम् श्रनादिमध्यनिधनं सदसन्न सदेव यत् ४२

सांख्य, वेदांत और वेदों की शाखाओं ने यह स्थिर किया है आप श्रादि मध्य और अन्त से रहित है और जिस प्रकार श्राप सत् से रहित हैं उसी प्रकार असत् से भी एकन्त्वनेकं नाप्येकं भवभेदसमाश्रितम् श्रनाख्यं षड्गुणाख्यञ्च वर्गाख्यं त्रिगुणाश्रयम् ४३

आप एक तथा अनेक हैं और एक नहीं भी हैं,  संसार का भेद शाप में श्राश्रित है। आप श्रवर्ण- नीय हैं तथा पढ़गुण, चारों वर्ग और त्रिगुण से युक्त हैं ४३ नानाशक्तिमतामेकं शक्तिवैभविकं परम् सुखासुखं महासौख्य- रूपं त्वयि विभाव्यते ४४

आप नाना शक्ति से संपन्न तथा एक शक्ति वैभव त है सुख, दुःख और महा- सुख आदि का रूप आपमें ही स्थित है ४४ एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलंच यत् अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच द्वैते व्यवस्थितम् ४५

हे देवि ! संपूर्ण सृष्टि श्राप ही में व्याप्त है तथा श्राप श्रद्वैत हैं और द्वैत की व्यवस्था भी आप में ही है ॥ ४५ ये नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये ये वा स्थूला ये च सूक्ष्मातिसूक्ष्माः ये वा भूमौ येऽन्तरीक्षेऽन्यतो वा तेषां तेषां त्वत्त एवोपलब्धिः ४६

जो अर्थ, नित्य, अनित्य, स्थूल, सूक्ष्म अति सूक्ष्म श्रादि: हैं या जो कुछ पृथ्वी में अथवा श्राकाश में है उसकी उत्पत्ति आप ही से है ॥४६॥ यच्चामूर्त्तं यच्च मूर्त्त समस्तं यद्वा भूतेष्वेकमेकंच किंचित् यद्दिव्यस्ति क्ष्मातले खेऽन्यतो वा त्वत्सम्वन्धं त्वत्स्वरैर्व्यजनैश्च ॥४७॥

जो कुछ मूर्त्त, श्रमूर्त्त, समस्त अथवा सब प्राणियों में एक और

अनेक है और जो श्राकाश, पाताल, और पृथ्वी आदि है अथवा स्वर और व्यञ्जन इस सवका आपसे संबन्ध है ४७ एवं स्तुता तदा देवी विष्णोर्जिहा सरस्वती प्रत्युवाच महात्मानं नागमश्वतरं ततः ४८।।

इस प्रकार स्तुति किये जाने पर विष्णु की जिह्वा देवी सरस्वती महात्मा नागराज अश्वतर से बोलीं ॥४८ || सरस्वत्युवाच वरं ते कम्बलभ्रातः प्रयच्छाम्युरगाधिप तदुच्यतां प्रदास्यामि यत् ते मनसि वर्त्तते ||४६ ||

सरस्वती बोली-- हे कम्बलके भ्राता नागराज ! तुम्हाराकल्याण हो जो कुछ तुम्हारी अभिलाषा है वह माँगो, मैं तुमको वर दूँगी ||४६ श्रश्वतर उवाच सहायं देहि देवि त्वं पूर्वं कम्बलमेव मे समस्त स्वरसम्बन्धमुभयोः सम्प्रयच्छ च ॥५०॥

 अश्वतर बोले- हे देवि ! जिस प्रकार तुमने पहिले कम्बल को सहायता दी थी उसीप्रकार मेरी भी सहायता करो मुझको सम्पूर्ण स्वर और सम्बन्धों का ज्ञान प्रदान करो ५०

सरस्वत्युवाच

सप्त स्वरा ग्रामरागाः सप्त पन्नगसत्तम गीतकानि च सप्तैव तावतीचापि मूर्च्छनाः ॥५१॥

सरस्वती बोली- - हे नागराज ! सातों स्वर, सातों ग्राम, राग, सातों गीत और सातों मूर्च्छना ५१

वाला कोनपंचाशत् तथा ग्रामत्रयंच यत्

एतत् सर्व्वं भवान् गाता कम्बलश्च तथानघ || १२ |||

उनंचास ताल, तीन ग्राम, जैसे कि कम्बल को प्राप्त हैं. वैसे ही तुमको होंगे ५२ हे

ज्ञास्यसे मत्प्रसादेन भुजगेन्द्रापरं तथा चतुर्विधं पदं तालं त्रिप्रकारं लयत्रयम् ||५३ ||

नागराज ! मेरे प्रसादसे तुमको चारों पद, तीनों ताल तथा तीनों लयों का भी ज्ञान प्राप्त होगा ||२३||

यतित्रयं तथा तोद्य मया दत्तं चतुर्विधम् एतद्भवान् मत्प्रसादात् पन्नगेन्द्रापरंच यत् ५४

हे नागराज ! तीनों यति और चारों त्रोटक भी मैंने तुमको दिये, तथा मेरे प्रसाद से और भीः ५४

स्यान्तर्गतमायत्त स्वरव्यञ्जनसम्मितम् तदशेषं मया दत्तं भवतः कम्बलस्य च ५५

इसके अनन्तर जो स्वर और व्यंजन का विस्तार है तथा जिसको मैंने तुम्हारे भाई कम्बल को दिया है वह तुम्हेंप्राप्त होगा ५५

तथा नान्यस्य भूर्लोके पाताले चापि पन्नग प्रणेतारौ भवन्तौ च सर्व्वस्यास्य भविष्यतः -पाताले देवलोके च भूर्लोके चैव पन्नगौ ५६

तथा इस गान-विद्या में जिस प्रकार तुम दोनों भाई श्रेष्ठ होगे उसप्रकार भूलोक, पाताल, स्वर्ग तथा नागलोक में कोई दूसरा न होगा ५६

जड़ उवाच

इत्युक्त्वा सा तदा देवी सर्व्वजिंहा सरस्वती जगामादर्शनं सद्यों नागस्य कमलेक्षणा || ५७||

सुमति ( जड़-पुत्र ) वोले-

यह कहकर वह सर्वजिहा सरस्वती शीघ्र ही कमल नयन नागराज में प्रवेश करगई ५७

तयोश्च तद्यथावृत्तं भ्रात्रोः सर्व्वमजायत विज्ञानमुभयोरग्रंथ पदतालस्वरादिकम् ५८

वे दोनों भाई भी पदं, ताल और स्वर आदिके विज्ञान में सर्वश्रेष्ठ हुए ५८

ततः कैलास शैलेन्द्र-शिखर स्थितमीश्वरम् पतकैः सप्तभिर्नागौ तन्त्रोलयसमन्वितौ ||२६||

फिर कैलाश पर्वत पर स्थित महादेवजी की सांतों. गीतों के साथ जो तन्त्री और लय से युक्त थे, दोनों नागों ने ५६

श्रारिराधयिषु देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् प्रचक्रतुः परं यत्नमुभौ संहतवाकलौ मातर्निशायां मध्याह्न सन्ध्ययोश्चापि तत्परौ ६०

काम- नाशी हर की आराधना की और प्रातःकाल, दुपहर और सन्ध्या के समय तत्पर रहकर परम यत्न से दोनों ने शिव को पूजा ॥६०॥

तयोः कालेन महंता स्तूयमानो वृषध्वजः तुतोष गीतकै स्तौ च माहेशी गृह्यतां वरः ६१

उन दोनों के बहुत    तक स्तुति करने पर महादेवजी उनके गीत- बांध से सन्तुष्ट होकर बोले कि मुझसे वर ग्रहण करो ||३१||

ततः प्रणम्याश्वतरः कम्बलेन समं तदा व्यज्ञापयन्महादेव शितिकण्ठमुमापतिम् ॥६२॥

तब नागराज अश्वतर और कम्वल नीलकण्ठ, उमापति महादेवजी को प्रणामकर कहा ६२

यदि नौ भगवान् प्रीतों देवदेवस्त्रिलोचनः ततो यथाभिलपितं वरमेनं प्रयच्छ नौ || ६३

हे देवदेव ! हे त्रिलोचन ! यदि आप हम दोनों पर प्रसन्न हैं तो जो हमारी इच्छा है हमको वर दीजिये ६३

मृता कुवलयाश्वस्य पत्नी देव मदालसा | तैनैव वयसा सद्यो : दुहितृत्वं प्रयातु मे ६४

हे देव ! कुवलयाश्व की पत्नी मदालसा की मृत्यु हो चुकी है, उसी अवस्था वाली शीघ्र मेरे एक पुत्री हो ६४

जातिस्मरा यथा पूर्व्वं तद्वत्कान्तिसमन्विता योगिनी योगमाता च मद्गेहे जायतां भव ||६||

वह सुन्दरी योगिनी अथवा योगमाता जो कुछ भी थी, उसी कान्ति और रूप में मेरे घर में प्रगट होवें ||६५||

महादेव उवाच

यथोक्तः पन्नगश्रेष्ठ सर्व्वमेतद्भविष्यति

मत्मसादादसन्दिग्धं शृणु चेदं भुजङ्गम || ६६ ||

महादेव बोले-

हे नागराज ! जो कुछ तुमने कहा वह मेरे  प्रसाद से निश्चयही होगा तथा हे सर्पराज ! सुनो६६

श्राद्धे तु समनुप्राप्ते मध्यमं पिण्डमात्मना

भक्षयेथाः फणिश्रेष्ठ शुचिः प्रयतमानसः ||६७||

हे नागराज ! श्राद्ध के दिन मध्यम पिंड को शुद्ध और पवित्र मन से भक्षण कर लेना ६७

भक्षिते तु ततस्तस्मिन् भवतो मध्यमात् फणात् समुत्पत्स्यति कल्याणी तथारूपा यथा मृता ६८

उसको खाते ही तुम्हारे मध्यम फरण से उसी रूप की स्त्री उत्पन्न होगी जिस रूप की कि मदालसाथी ६८

: कामञ्चममभिध्याय कुरु त्वं पितृतर्पणम् तत्क्षणादे सा सुभ्रूः श्वसतो मध्यमात् फरगात् समुत्पत्स्यति कल्याणी तथारूपा यथा मृता ६६

इस अभिलाश को ध्यान में रखकर तुम पिता का तर्पण करो तो उसी क्षण तुम्हारे मध्यम फरा से श्वास लेते ही वह सुन्दरी जिस रूप में मृत मदालसा थी उत्पन्न होगी ६६ एतच्छ्रुत्वा ततस्तौ तु प्रणिपत्य महेश्वरम् रसातलं पुनः प्राप्तौ परितोषसमन्वितौ ७०

यह सुनकर वे दोनों महादेवजीको प्रणाम करके संतुष्ट हो रसातल को चले गये ॥७०॥

तथा च कृतवान् श्राद्ध' स नागः कम्बलानुजः

पिण्डञ्च मध्यमं तद्वद्वयथावदुपभुक्तवान् ७१

तथा उन कम्बल के छोटे भाई नागराज अश्वतर ने श्राद्ध किया और मध्यम सी प्रकार भक्षण करलिया जिस प्रकार शिवजी ने कहा था ७१

तञ्चापि ध्यायतः कामं ततः सा तनुमध्यमा जज्ञे निश्वसतः सद्यस्तदुरूपा मध्यमात् फणात् ७२

तथा उस का ध्यान किया, फिर वह मदालसा के समान सुन्दरी शीघ्र ही उनके मध्यम फण से श्वास लेते ही प्रगट होगई ॥७२॥

न चापि कथयामास कस्यचित् स भुजङ्गमः अन्तगृहे तां सुदतीं खीभिर्गुप्तामधारयत् ॥७३॥

उन नागराज ने किसी से इस बात को न कहा और उस सुन्दरीको गुप्त रूप से अन्तःपुर में रक्खा ॥७३॥

तौ चानुदिनमागम्य पुत्रौ नागपतेः सुखम् ऋतध्वजेन सहितौ चिक्रीड़ातेऽमराविव ७४।

वे दोनो नाग पुत्र नित्य प्रति वहाँ जाकर ऋतध्वज के साथ देवताओ की तरह क्रीडा करते थे।।

एकदा तु सुतौ प्राह नागराजो मुदान्वितः यन्मया पूर्व्वमुक्तन्तु क्रियते किं न तत् तथा ॥७५॥

एक दिन उन नागराज ने प्रसन्न होकर अपने पुत्रो से कहा कि जो कुछ मैंने तुमसे करने को कहा था वह तुमने अब तक क्यो नही किया

स राजपुत्रो युवयोरुपकारी ममान्तिकम् कस्मान्नानीयते वत्सावुपकाराय मानदः ७६

हे पुत्रो ! अपने उपकारी उस राजकुमार को मेरे पास क्यों नहीं लाये, ऐसे मान देने वाले का उपकार करना चाहिये ७६

एवमुक्तौ ततस्तेन पित्रा स्नेहवता तु तौ गत्वा तस्य पुरं सख्यू रेमाते तेन धीमता ॥७७॥

पिताके स्नेह पूर्वक ऐसा कहने पर वे दोनों अपने मित्र के नगर को गये और उसके साथ खेल कूद करने लगे ७७

ततः कुवलयाश्वं तौ कृत्वा किञ्चित् कथान्तरम् अब्रूतां मणयोपेतं स्वगेहगमनं प्रति ७८

फिर उन्होंने कुछ कथान्तर करके कुवलयाश्व से प्रेम पूर्वक अपने घर चलने को कहा ७८

तावाह नृपपुत्त्रोऽसौ नन्विदं भवतोगृहम् धन-वाहन-वस्त्रादि यन्मदीयं तदेव वाम् ७६।।

इसपर उस राजकुमार ने उन दोनों से कहा कि यह घर भी निश्चय ही आपका है तथा धन, वाहन, वस्त्र आदि जो कुछ मेरे हैं वे आपके ही हैं ॥७६॥

यत्तु वां वाञ्छितं दातुं धनं रत्नमथापि वा तहीयतां द्विजसुतौ यदि वां प्रणयो मयि ॥८०॥

हे नागपुत्रो ! जो कुछ आप धन, रस्न आदि देना चाहें वह यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं तो दीजिये

एतावताहं दैवेन वञ्चितोऽस्मि दुरात्मना यद्रवद्धयां ममत्वं नो मदीये क्रियते गृहे ॥८१॥

मुझ दुरात्मा को देव ने इतना वश्चित रक्खा कि आपकी मेरे घर पर समता नं हुई ||

यदि वां मत्प्रियं कार्यमनुग्राह्योऽस्मि वां यदि तद्धने मम गेहे च ममत्वमनुकल्प्यताम् ॥८२

यदि आप ऐसा कार्य करके जो मुझको प्रिय हो मुझे अनुग्रहीत करना चाहते हैं तो मेरे घर और धन को अपना समझिये ८२

युवयोर्यन्मदीयं तन्मामकं युवयोः स्वकम् एतत् सत्यं विजानीतं युवां प्रारणा वहिश्वराः ८३

श्रापका घर मेरा है और मेरा आपका है हे नागपुत्रो ! यह सत्य जानिये कि आप मेरे प्राण हैं ८३

पुननैवं विभिन्नार्थं वक्तव्यं द्विजसत्तमौ मत्प्रसादपरौं प्रीत्या शास्ति हृदयेन मे

हे नाग-

पुत्रो ! व फिर ऐसी भेद की बात न कहिये | मेरा तुमसे अत्यन्त प्रेम है और तुम मेरे हृदय में रहते हो ८४ ततः स्नेहार्द्रवदनौ तावुभौ नागनन्दनौ ऊचतुनृपतेः पुत्त्रं किंचित् प्रणयकोपितों ॥८५॥

यह सुनकर वे नागपुत्र स्नेह से पुलकित हो गये श्री राजकुमार से कुछ प्रेमपूर्ण रोप से बोले ॥८५॥ ऋध्वज न सन्देहो यथैवाह भवानिदम् तथैव चास्मन्मनस नात्र चिन्त्यमतोऽन्यथा ८६

हे ऋतध्वज ! जो कुछ श्रापने कहा है इसमें सन्देह नहीं हैं यही बात हमारे मन में है तथा और कुछ चिन्ता भी नहीं है ८६

किन्त्वावयोः स्वयं पित्रा प्रोक्तमेतन्महात्मना द्रष्टुं कुवलयाश्वं तमिच्छामीति पुनः पुनः ।।८७|

किन्तु हमारे महात्मा पिता ने स्वयं बार-बार कहा है कि मैं कुवलयाश्व को देखना चाहता हूं ८७

ततः कुवलयाश्वोऽसौ समुत्थाय वरासनात् यथाह तातेति वदन् प्ररणाममकरोदवि ||८८||

इसपर कुवलयाश्व सिंहासनसे उठा और यह कह कर कि पिताजी ने मुझे याद कियाहै, उसने पृथ्वी पर भुक कर प्रणाम किया || कुवलयाश्व उवाच धन्योऽहमति पुण्योऽहं कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया यत् तातो मामभिद्रष्टुं करोति प्रवणं मनः ८६।।

तदुत्तिष्ठत गच्छामस्तामाज्ञां क्षणमप्यहम् नातिक्रान्तुमिहेच्छामि पद्भ्यां तस्य शपाम्यहम्ह०॥

कुवलयाश्त्र वोले- मैं धन्य हूँ तथा मेरे समान दूसरा पुण्यवान् कौन है जो कि तात ने मुझे देखने की इच्छी की | इसलिये उठिये, मैं श्रापके साथ पैदल ही चलूंगा। मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन क्षण भर भी नहीं करना चाहता ६० 'जड़ उवाच एवमुक्त्वा ययौ सोऽथ सह ताभ्यां नृपात्मजः प्राप्तश्च गोमती पुण्यां निर्गम्य नगरादहिः | ६१

जड़ ( सुमति ) बोले- यह कहकर वह राकुमार उनके साथ चला और पहिले ही नगर के बाहर पुण्यवती गोमती नदी पर पहुँचा ६१ तन्मध्येन ययुस्ते व नागेन्द्रनृपनन्दनाः मेने च राजपुत्त्रोऽसौ पारे तस्यास्तयोगृ हम् ६२।।

वे नागपुत्र राज- कुमार को अपने घर ले जाने के लिये गोमती के पार गये ||१२|| ततवाकृष्य पातालं ताभ्यां नीतो नृपात्मजः पाताले ददृशे चोभौ स पन्नगकुमारकौ फरणामणिकृतोद्योतौ व्यक्तस्वस्तिकलक्षणौ ॥६३

उस राजकुमार को वे दोनों पाताल में ले गये और पाताल में उस राजकुमार ने दोनों नागपुत्रों को देखा कि उनके फण में मणि का प्रकाश हो रहा है और उनमें सर्पों के से लक्षण व्यक्त हो रहे हैं ||१३|| विलोक्य तौं सुरुषाङ्गौ विस्मयोत फुललोचनः विहस्य चाब्रवीत् प्रेम्णा साधु भो द्विजसत्तम ६४॥

उन सुन्दर स्वरूप वालों को  देखकर राजकुमार के नेत्र विस्मय से विकसित होगये और वह प्रेमसे हँसकर बोले कि नागपुत्रो ! खूब हुआ ६४ कथयामासतुस्तौ च पितरं पन्नगेश्वरम् शान्तमश्वतरं नाम माननीयं दिवौकसाम् ६५।

उन दोनों नागपुत्रों ने नागराज अश्वतर अपने पिता से जो शान्त और देवताओं से भी मान्य थे कह दिया ६५ रमणीयं ततोऽपश्यत् पातालं स नृपात्मजः कुमारैस्तरुणैट द्ध रुरगैरुपशोभितम् ६६

तब राजकुमार ने पाताल को कुमार, तरुण और वृद्ध सर्पों से सुशोभित देखा ६६ तथैव नागकन्याभिः क्रीड़न्तीभिरितस्ततः चारुकुण्डलहाराभिस्तार भिर्गगनं यथा ॥६७॥

उसी प्रकार इधर-उधर क्रीड़ा करती हुई नाग कन्यात्रों को भी देखा। उन के सुन्दर कुण्डल और हार इस तरह शोभित हो रहे थे जिस प्रकार आकाशमें तारागण ॥६७॥ गीतशब्दैस्तथान्यत्र वीणा - चेणुस्त्रनानुगैः मृदङ्ग परणवातोद्य हारिवेश्मशताकुलम् ६८|| कहीं गीत, कहीं बीणा, वेणु आदि के शब्द से युक्त, त” मृदश, पणव यादि वाद्यों की ध्वनि से प्रत्येक घर॥ ६८   वीक्षमाणः स पातालं ययौ शत्रुजितः सुतः ह ताभ्यामभीष्टाभ्यां पन्नगाभ्यामरिन्दमः ||६||

वह शत्रु जित का पुत्र पाताल में देखता हुआ अपने मित्र नागपुत्रों के साथ चला जाता था ६६

तः प्रविश्य ते सर्व्वे नागराजनिवेशनम्

दृशुस्ते महात्मानमुरगाधिपतिं स्थितम् |१०० || |

फिर उन सबने नाग- राज के महल में प्रवेश किया और वहाँ महात्मा नागेन्द्र अश्वतर को बैठा हुआ देखा १००

व्यमाल्याम्बरधरं मणिकुण्डलभूपणम् वच्छमुक्ताफललता -हारिहारोपशोभितम् ||१०१ ||

नागराज दिव्य मालायें, वस्त्र, मणि, कुण्डल आदि पहने हुए थे, और उनके हार इस तरह शोभित  हो रहे थे जैसे लता वाले वृक्ष में मुक्ताफल १०१ यूरिणं महाभागमासने सर्व्वकाञ्चने णिविद्रुमवैद्य जालान्तरितरूपके||१०२ ||

वे नागराज सोने के मयूरासन पर बैठे हुए थे, उस सिंहासन में मणि, मूँगे और वैद्य्यों का जाल पुरा हुआ था १०२ ताभ्यां दर्शितस्तस्य तातोऽस्माकमसाविति रः कुवलयाश्वोऽयं पित्रे चासौं निवेदितः १०३ |

दोनों नागपुत्रों ने राजकु- मार से कहा कि हमारे पिता यही हैं तथा अपने पिता से निवेदन किया कि यही वीर कुवलयाश्व. १०३ तो ननाम चरणौ नागेन्द्रस्य ऋतध्वजः सुत्थाप्य बलाद्गाढं नागेन्द्रः परिषस्वजे ||१०४ |

फिर तध्वज ने नागराज के चरणों में प्रणाम किया और नागराज ने उसे उठाकर उसका गाढ़ आलिङ्गन लिया १०४ [र्दिन चैनमुपाघ्राय चिरं जीवेत्युवाच सः नहतामित्रवर्गच पित्रोः शुश्रूषणं कुरु १०५।

नागराज ने उसके मस्तक को संघकर आशीर्वाद दिया कि चिरञ्जीव रहो तथा तुम अपने शत्रुओं को मारकर पिता की सेवा करो १०५ त्स धन्यस्य कथ्यन्ते परोक्षस्यापि ते गुणाः चितो मम पुत्राभ्यामसामान्या निवेदिताः॥१०६॥

हे वत्स ! तुमको धन्य है, तुम्हारे असाधारण गुणों को तुम्हारे पीछे मेरे लड़कों ने मुझे बताया है १०६ वमेवानेन वर्द्धेथा मनोवाक्कायचेष्टितैः नीवितं गुणिनः श्लाघ्यं जीवन्नेव मृतोऽगुणः १०७॥

तुम्हारी मन वचन, शरीर और उद्यम से वृद्धि हो, क्योंकि गुणियों का जीवन ही प्रशंसनीय है और गुण- हीनों का जीवन मृत के समान हैं १०७ वान् निवृतिं पित्रोः शत्रूणां हृदयज्वरम् रोत्यात्महितं कुर्व्वन् विश्वासञ्च महाजने १०८

गुण-वान् पुत्र माता पिता को निश्चिन्त कर देता तथा शत्रुओं के हृदय में ज्वर के समान है. वह अपनी भलाई करता हुत्रा वृद्धजनों में विश्वास उत्पन्न करता है १०८ वता: पितरो विप्रा मित्रार्थिविकलादयः ान्धवाञ्च तथेच्छन्ति जीवितं गुणिनश्चिरम्॥ १०६

देव, पितर, ब्राह्मण, अभ्यागत और दुःखी आदि तथा भाई, बन्धु उस गुणी का चिरकाल तक जीवन चाहते हैं १०६ रिवादनिवृत्तानां दुर्गतेषु दयावताम् णिनां सफलं जन्म संश्रितानां विपतेः ॥११०॥||

और जिनका अपवाद नहीं है तथा जो दुःखितों पर दया करते हैं, ऐसे गुणियों का विपत्ति में पड़े लोगों की सहायता करने के कारण जन्म सफल है ११०

जड़ उवाच

वमुक्त्वा स तं वीरं पुत्त्राविदमथाब्रवीत् जां कुवलयाश्वस्य कर्त्तुकामो भुजङ्गमः १११||

जड़ ( सुमति ) बोले- वह नागराज उस वीर कुवलयाश्व से यह कहकर अपने पुत्र से बोले कि कुवलयाश्व की पूजा करो १११

नानादिकक्रमं कृत्वा सर्व्वसेव यथाक्रमम् |

धुंपानादिसम्भोगमाहारंच यथेप्सितम् ११२ ||

क्रम से स्नानादि करके सवं लोग मधुपान श्रादि भोगयुक्त भोजन करो ११२  कुवलयाश्वेन हृदयोत्सवभूतया थिया स्वल्पकं कालं स्थास्यामो हृष्टचेतसः ॥११३॥

प्रसन्न चित्त होकर कुवलयाश्व की प्रसन्नता के लिये कुछ काल वैठकर बातचीत करेंगे ॥११३॥ . तुमेने च तन्मौनी वचः शत्रुजितः सुतः तथा चकार नृपतिः पन्नगानामुदारधीः ११४ ||

शत्रुजितः के पुत्र ऋतध्वज ने भी जिस प्रकार फिर नागराज ने कहा मान लिया ११४

समेत्य तैरात्मज - भूपनन्दनै- महोरगाणामधिपः स सत्यवाक् .. मुदान्वितोऽन्नानि मधूनि चात्मवान् यथोपयोगं युभुजे स भोगभुक् ॥११५॥

फिर-सत्य- वादी नागराज ने अपने पुत्रों व राजकुमार के साथ प्रसन्नचित्त होकर नों और मधुओं का इच्छानुसार भोजन किया ११५ इति श्रीमार्कण्डेय पुराण में मदालसोपाख्यान नाम तेईसवाँ अध्याय समाप्त