मार्कण्डेय महा पुराण
44
सुबाहुरुवाच
यदर्थं नृपशार्दूल त्वामहं शरणं गतः । तन्मया सकलं प्राप्तं यास्यामि त्वं सुखी भव ॥ १ ॥
सुवाहु बोले-
हे राजन् ! जिस श्राशय के लिए मैं आपकी शरण में आया था वह पूरा होगया, अब मैं जाता हूँ, आप सुखी हों ॥ १ ॥
काशिराज उवाच
किं निमित्तं भवान् प्राप्तो निष्पन्नोऽर्थश्च कस्तव । सुबाहो, तन्ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ॥
काशिराज बोले-- हे सुबाहु | किस लिये श्राप मेरे पास श्राये थे और कौनसा श्राशय श्रापका सफल हुआ मुझसे कहो, मुझे बड़ा कौतूहल है ॥ २ ॥
समाक्रान्तमलर्केण पितृपैतामहं महत् । राज्यं देहीति निज्जित्य त्वयाहमभिचोदितः || ३
पहिले आपने मुझसे कहा था कि अलर्क ने मेरे बाप-दादे का राज्य हड़प कर लिया है उसे जीतकर मुझे दो ॥
ततो मया समाक्रम्य राज्यमस्यानुजस्य ते । एतंत् ते वशमानीतं तद्भुङ्क्ष्व स्वकुलोचितम् ॥ ४
इसपर मैंने तुम्हारे छोटे भाई से राज्य जीतकर अपने वशमें किया अब तुम इसे लो और भोगो ॥ सुवाहुरुवाच
काशिराज निबोध त्वं यदर्थमयमुद्यमः । कृतो मया भवांश्चैव कारितोऽत्यन्तमुद्यमम् ॥
हे काशिराज ! जिस कारण यह उद्यम मैंने मेरा छोटा भाई अलर्क जो तत्वज्ञ है सांसारिक किया और आपसे कराया उसे सुनिये ॥ ५ ॥
भ्राता ममायं ग्राम्येषु शक्तो भोगेषु तत्त्ववित् । विमूढ़ौ वाधवन्तौ च भ्रातरावग्रजौ मम ॥
यह भोगों में आसक्त होरहा था। मेरे दो बड़े भाई भी पहिले मूर्ख थे लेकिन पीछे उनको बोध हुआ || ६ ||
तयोर्मम च यन्मात्रा वाल्ये स्तन्यं यथा मुखे । तथावबोधो विन्यस्तः कर्णयोरवनीपते ॥ ७
हे राजन् ! उन दोनोंको तथा मुझको माताने वाल्या- वस्था से जब हम स्तन का दूध पीतेथे और कानों से बात समझने लगे, उपदेश किया ||७||
तयोर्मम च विज्ञेयाः पदार्था ये मता नृभिः । प्रकाश्यं मनसो नीतास्ते मात्रा नास्य पार्थिव ॥ ८
उनदोनों ने और मैंने वह पदार्थ प्राप्त किया जिसको सव कोई नहीं जानते हैं और जिससे हृदय में प्रकाश होता है परन्तु यह बात अलर्कको न हुई ॥८॥
यथैकसार्थयातानामेकस्मिन्नवसीदति दुःखं भवति साधूनां तथास्माकं महीपते ॥ ६ ॥
जिस प्रकार साधुओं को धन से सुख की प्राप्ति नहीं होती उसी प्रकार हे राजन् ! हमको भी धनसे दुख होता है ॥ ॥
गार्हस्थ्यमोहमापन्ने सीदत्यस्मिन् नरेश्वर । सम्वन्धिन्यस्य देहस्य विभ्रति भ्रातृकल्पनाम् ॥ १०॥
हे राजन् ! इस देह के सम्बन्धरूप भाई में स्थित श्रात्मा गृहस्थ के मोह में फँस कर दुख पाता था ॥१०॥
ततो मया विनिश्चित्य दुःखाद्व राग्यभावना । भविष्यतीत्यस्य भवानित्युद्योगाय संश्रितः ॥ ११॥
इस पर मैंने यह निश्चय करके कि इसको दुःख से वैराग्य की भावना होगी श्राप से उद्योग कराया ॥११॥
तदस्य दुःखाद्वैराग्यं सम्बोधादवनीपते । ।
समुद्भूतं कृतं कार्य्यं भद्रं तेऽस्तु ब्रजाम्यहम् ॥१२॥
हे राजन् ! इसको दुःख से ज्ञान और ज्ञान से वैराग्य हुआ । मैं इसी कार्य के
लिये आपके पास आया था और वह पूरा होगयाअव आपका कल्याणहो मैं जाता हूँ ॥१२॥
उष्ट्वा मदालसागर्भे पीत्वा तस्यास्तथा स्तनम् । नान्यनारीसुतैर्यातं वर्त्म यात्विति पार्थिव ॥१३॥
मदालसा के गर्भ में रहकर और उसका दूध पीकर जिससे दुसरी स्त्रीका पुत्र न होऊँ वह उपाय करना चाहता हूँ ॥ १३ ॥
विचार्य्य तन्मया सर्व्वं युष्मत्संश्रयपूर्व्वकम् । कृतं तच्चापि निष्पन्नं प्रयास्ये सिद्धये पुनः || १४
मैं यह विचार कर यहाँ श्राया जो आपके आश्रय से पूर्ण हुआ अब मैं योगकी सिद्धि
के लिये जाता हूँ ॥ १४ ॥ उपेक्ष्यते सीदमानः स्वजनो वान्धवः सुहृत् ।
यैर्नरेन्द्र न तान् मन्ये सेन्द्रिया विकला हि ते || १५
हे राजन् ! जो लोग स्वजनों, वान्धवों और मित्रोंको उनके दुःखमें छोड़
देते हैं उनको मैं सुखी नहीं समझता हूं और उन की इन्द्रियां सदैव विकल रहती हैं ॥ १५॥
सुहृदि स्वजने वन्धौ समर्थे योऽवसीदति । धम्र्म्मार्थ-काम-मोक्षेभ्यो वाच्यास्ते तत्र न त्वसौ ॥
एतत् त्वत्सङ्गमाद्भूप मया कार्य्यं महत् कृतम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि ज्ञानभाग्भव सत्तम ॥ १७ ॥
स्वजनों मित्रों और भाई-बन्धुत्रों के सुखी होते हुए जो मनुष्य स्त्रयं दुःखी है उसी को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं उनको नहीं जो सुखी हैं | हे राजन् ! आपके संसर्ग से मैंने यह महान कार्य किया, आपका कल्याण हो, मैं जाता हूँ । आप भी श्रात्मज्ञानी हो जाओ ॥ १७ ॥
काशिराज उवाच
उपकारस्त्वया साधोरलर्कस्य कृतो महान् । क कथं न करोषि स्वमानसम् ॥१८॥
काशिराज बोले- हे साधु ! तुमने अलर्क का तो बड़ा उपकार किया परन्तु मेरे उपकार के निमित्त व मन क्यों नहीं लगाते हो ॥ १८
फलदायी सतां सद्भिः सङ्गमो नाफलो यतः । तस्मात् त्वत्संश्रयाद्वयुक्ता मया प्राप्ता समुन्नतिः ॥ १६ ॥
साधुओं की सङ्गति मनुष्यों को सदा फल देने वाली होती है, वह कभी नहीं होती इसलिये आपकी कृपा से मेरी उन्नति हुई ॥ १६ ॥
सुबाहुरुवाच धर्मार्थकाममोक्षाख्यं पुरुषार्थचतुष्टयम् । तत्र धर्मार्थकामास्ते सकला हीयतेऽपरः ||२०||
सुबाहु वोले-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष यही चार पुरुषार्थ जिनमें धर्म, अर्थ और काम तो आपके हैं ही, परन्तु मोक्ष नहीं है ॥ २०॥
'तत् ते संक्षेपतो वक्ष्ये तदिहैकमनाः शृणु । श्रुत्वा च सम्यगालोच्य यतेथाः श्रेयसे नृप ॥ २१ ॥
उसको भी मैं संक्षेप में कहता हूँ, आप एकाग्र चित्त होकर सुनिये । उस को सुनकर और शालोचना करके अपने कल्याण के लिये यत्न कीजिये ॥ २१॥
ममेति प्रत्ययो भूप न काय्र्योऽहमिति त्वया । सम्यगालोच्यधर्मो हि धर्माभावे निराश्रयः ॥ २२ ॥
हे राजन् ! मैं हूँ या यह मेरा है, यह ममत्व कभी न करो और धर्म पूर्वक रहो, कारण-धर्म के अभाव में मनुष्य श्राश्रय हीन हो जाता है ॥ २२ ॥ कस्याहमिति संज्ञेयमित्या
लोच्य त्वयात्मना । वाह्यान्तर्गतमालोच्यमालोच्यापररात्रिषु
'मैं कौन हूँ' इसको जान कर जयके बाहर और भीतर जो आत्मा है उसको उसी तरह देखो जिस तरह योगी लोग उसे रात्रि में देखते हैं ॥ २३ ॥
अव्यक्तादिविशेषान्तम विकारमचेतनम् व्यक्ताव्यक्त' त्वया ज्ञेयं ज्ञाता कचाहमित्युत ||२४||
उस आत्मा को जानो जिसका श्रदि, मध्य और अन्त अव्यक्त है, जो विकार व अचेतन हैं, जो व्यक्त और श्रव्यक्तहै तथा मैं कौन हूँ यह भी समझो ||२४||
एतस्मिन्नेव विज्ञाते. विज्ञातमखिलं त्वया । अनात्मन्यात्मविज्ञानमस्व स्वमिति मूढ़ता ॥२५॥
इसके जानने पर ही आप यह समझ लो कि आपने सब कुछ जानलिया, जो आत्मा नहीं है उसको आत्मा कहना अथवा जो धृन किसी का नहींहै उसे अपना कहना मूर्खता है
सोऽहं सर्व्वगतो भूप लोकसंव्यवहारतः । मयेदमुच्यते सर्व्वं त्वया पृष्टो व्रजाम्यहम् ॥ २६
है राजन् ! वह मैं सर्वव्यापी हूँ लेकिन लौकिक व्यवहार से आपके पूछने पर यह सब मैंने कहा, श्रथ मैं जाता हूँ ॥ २६ ॥
एवमुक्त्वा ययौ धीमान् सुवाहुः काशिभूमिपम् । काशिराजोऽपि सम्पूज्य सोऽलकं स्वपुरं ययौ ॥ २७॥
काशी नरेश से इस प्रकार कहकर विद्वान् सुबाहु चले गये और काशिराजभी श्रलर्क का सम्मान करके अपने नगरको गये ||२७||
अर्कोऽपि सुतं ज्येष्ठमभिषिच्य नराधिपम् । वनं जगाम सन्त्यक्त-सर्व्वसङ्गः स्वसिद्धये ॥ २८ ॥
अलर्क भी अपने ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक करके दुनियां के सङ्ग को छोड़ कर श्रात्मसिद्धि के लिये वनको चले गये ॥ २८॥
ततः कालेन महता निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः । प्राप्य योगद्धिमतुलां परं निव्र्वाणमाप्तवान् ||२६||
फिर वह अलर्क बहुत काल तक निश्चिन्त और अवाध योग करके अतुल ऋद्धि को प्राप्त कर परम निर्वाण पद को पहुँचे ॥ २६ ॥
पश्यन् जगदिदं सर्व्वं सदेवासुरमानुपम् । पाशैर्गुणमयैर्वद्धं बध्यमानञ्च नित्यशः ॥३०॥
देवता, असुर र मनुष्यों से युक्त इस संसारको देखकर कि यह गुणरूपी पाशोंसे बँधा हुआहै और : नित्य बँधता ही जाता है तथा ॥ ३० ॥
पुत्रादिभ्रातृपुत्रादि-स्वपारक्यादिभावितैः । आकृष्यमाणं करणैर्दुःखार्त्तं भिन्नदर्शनम् ||३१||
पुत्र, भाई, बन्धुओं के मोह में दुःखित होकर इन्द्रियाँ पारे के :समान श्रार्त रहती हैं ॥ ३१
अज्ञानपङ्कगर्भस्थमनुद्वारं महामतिः । आत्मानश्च समुत्तीर्ण गाथामेतांमगायत । ३२ ||
और लोग श्रज्ञानरूपी कीचड़में फँसे हुए हैं कि जिससे उद्धार होना कठिन है तथा अपने को उससे निकला हुआ देखकर उन्होंने यह गीत गाया ॥ ३२॥
अहो कष्टं यदस्माभिः पूर्वं राज्यमनुष्ठितम् । इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥३३॥
हमारी पहिले जो राजा की स्थिति थी वह कितनी कष्टमय थी । मुझे पीछे ज्ञान हुआ कि योग की अपेक्षा कोई दूसरा सुख नहीं ||३३|| जड़ उवाच
तार्तेनं त्वं समातिष्ठ मुक्तये योगमुत्तमम् । प्राप्स्यसे येन तद्ब्रह्म यत्र गत्वा न शोचसि ॥३४॥
जड़ ( सुमति ) बोले-· हे पिता ! इसलिये आप मोक्ष प्राप्ति के लिये उत्तम योग को करो जिससे कि ब्रह्मकी प्राप्ति हो, उसको पाकर आपको कोई शोक न होगा ॥ ३४ ॥
ततोऽहमपि यास्यामि किं यज्ञैः किं जपेन मे । कृतकृत्यस्य करणं ब्रह्मभावाय कल्पते ||३५||
अब मैं भी जाता हूँ, मुझे यज्ञ और जप से क्या ? कृतकृत्य को वही करना चाहिये जिससे ब्रह्म की प्राप्ति हो ॥ ३५ ॥
त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्याहं निद्वन्द्वो निष्परिग्रहः । प्रयतिष्ये तथा मुक्तौ यथा यास्यामि निरृतिम् ॥ ३६
आपकी आज्ञा लेकर मैं निश्चिन्त और बाधा रहित होकर मुक्ति के लिये चेष्टा करूँगा जिससे कि निवृत्ति को प्राप्त होऊँ ॥
पक्षिण ऊचुः एवमुक्त्वा स पितरं प्राप्यानुज्ञां ततश्च सः । ब्रह्मन् जगाम मेधावी परित्यक्तपरिग्रहः ॥३७॥
हे जैमिनिजी ! जड़ अपने पिता से यह कहकर और उनकी श्राज्ञा प्राप्त कर सांसारिक बन्धन को छोड़ बनको चलागया ||३७||
सोपि तस्य पिता तद्वत् क्रमेण सुमहामतिः । वानप्रस्थं समास्थाय चतुर्थाश्रममभ्यंगात् ||३८||
उसका महावुद्धिमान् पिता भी उसी तरह क्रम से वाणप्रस्थ श्राश्रम में पहुँचकर और बाद इसके चौथे श्राश्रममें प्राप्तहुआ ३८ ॥
तंत्रात्मजं समासाद्य हित्वा वन्धं गुणादिकम् ।
प्राप सिद्धिं परां प्राज्ञस्तत्कालोपात्तसम्मतिः ||३६||
वह विद्वान् ब्राह्मण अपने पुत्रसे ज्ञान प्राप्त कर और गुण श्रादिक बन्धनों को त्यागकर परम
सिद्धि को पहुँच गया ॥ ३६ ॥
एतत् ते कथितं ब्रह्मन् यत्पृष्टा भवता वयम् ।' विस्तरं यथावच किमन्यच्छोतुमिच्छसि ||४०||
हे जैमिनिजी ! जो कुछ श्रापने हमसे पूछा वह हमने विस्तार पूर्वक यथार्थरूपसे आपको बताया, अब आप और क्या सुनने की इच्छा करते हैं ? ॥ ४० ॥
इति श्रीमार्कण्डेय में पिता-पुत्र संवाद में जड़ोंपाख्यान नाम ४४वाँ अ० समाप्त ।
Summary of chapter 44 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Having heard the complete spiritual discourse of the son, the father attains supreme enlightenment and merges his consciousness in the Absolute. The four celestial birds conclude this primary section, and Maharshi Jaimini offers immense gratitude to the birds for illuminating all his doubts with divine clarity.