मार्कण्डेय महा पुराण
82
ऋपिरुवाच
देवासुरमभृद्युद्धंपूर्णमब्दशतंपुरा। महिपेऽसुराणामधिपेदेवानांचपुरन्दरे॥१॥
ऋषि बोले-
पूर्वकाल में देवताओं और असुरों में पुरे सौवर्ष युद्ध हुआ । उस समय राक्षसों का स्वामीमहिषासुर और देवताओं के स्वामी इन्द्रथे ॥ १ ॥
तत्रासुरैर्महावीय्यैर्देवसैन्यंपराजितम्। जित्वाचसकलान्देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥२
उस समय महावली असुरों ने देवताओं की सेना को पराजित कर दिया और महिषासुर सव देवताओं को जीत कर इन्द्र बन बैठा ॥ २॥
ततःपराजितादेवाःपद्मयोनिंप्रजापतिम्। पुरस्कृत्यगतास्तत्रयत्रेशगरुड़ध्वजी॥३
तव परास्त होकर देवना लोग ब्रह्माजी को आगे करके वहाँ गये जहाँ महादेवजी और गरुड़ध्वज भगवान्विष्णु थे ॥ ३ ॥
यथावृत्ततयोस्तद्वन्महिपासुरचेष्टितम्। त्रिदशाःकथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥४
फिर देवताओं ने उन दोनों से महिषासुरका सब वृत्तान्त तथा जिस प्रकार कि उन का पराजय हुआ वह सब कह सुनाया ||४||
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनांयमस्यवरुणस्यच। श्रन्येषांचाधिकारान्सस्वयमेवाधितिष्ठति॥५
उन्होंने कहा कि सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम श्रीर वरुण तथा और देवताओं पर भी महिषासुरने अधिकार जमा लिया है || ५||
स्वर्गान्निराकृताःसर्व्वेतेनदेवगणाभुवि। विचरन्तियथामत्र्त्यांमहिपेणदुरात्मना॥६
उस दुष्टात्मा महिपासुर से स्वर्ग से निकाले हुए देवता पृथ्वी पर मनुष्यों की तरह घूमते फिरते हैं || ६ |
एतद्वःकथितंसर्व्वममरारिविचेष्टितम्। शरणंचप्रपन्नाःस्मोवधस्तस्यविचिन्त्यताम्॥
इस प्रकार, हमने आपके प्रति उस देवताओं के शत्रु का वृत्तान्त कहा। हम आपकी शरण आये हैं, श्रापउसके अव वथ की चिन्ता करें ॥ ७ ॥
इत्थंनिशम्यदेवानांवचांसिमधुसूदनः। चकारकोपंशम्भुवभ्रुकुटीकुटिलाननौ॥८
देवताओं के इस प्रकार वचन सुनकर विष्णु भगवान् श्रीर महादेवजी ने क्रोध किया जिससे कि उनकीभ्रकुटी और मुख तन गये ॥ ८॥
ततोऽतिकोपपूर्णस्यचक्रिणोवदनात्ततः। निश्चक्राममहत्तेजोब्रह्मणःशङ्करस्यच॥६
इसके अनन्तरकोउपयुक्त भगवान् विष्णु के मुख से एक महान् तेज निकला तथा उसी प्रकार ब्रह्मा और शङ्कर केमुख से भी एक तेज निकला ॥६॥
अन्येषाञ्चैवदेवानांशक्रादीनांशरीरतः। निर्गतंसुमहत्तेजस्तच्चैक्यंसमगच्छत ||१०||
और भी इन्द्र यादि देवताओं के शरीर से महातेज निकल कर सब का तेज एक स्थान पर इकट्ठा होगया ॥ १० ॥
अतीवतेजसःकूटंज्वलन्तमिवपर्व्वतम्। ददृशुस्तेसुरास्तत्रज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥११
तब उन देवताओंों ने देखा कि वह अत्यन्त तेज जलते हुए पहाड़ के समान होगया और दिशायेंज्वालाओं से व्याप्त होगई ॥ ११ ॥
अतुलंतत्रतत्तेजःसर्व्वदेवशरीरजम्। एकस्थंतदभून्नारीव्याप्तलोकत्रयंत्विया॥१२॥
सब देवताओं के शरीर से निकला हुआ वह अतुल तेज एक स्थान पर एकत्रित होकर नारीरूप होगया । वह स्त्रीतीनों गुणों से युक्त थी ॥ १२ ॥
यदभूच्छाम्भवंतेजस्तेनाजायततन्मुखम्। याम्येनचाभवन्केशाबाहवोविष्णुतेजसा ||१३||
महादेवजी के नेज से उसका मुख हुआ था तथा यम के तेज से केश और विष्णु के तेज से भुजायें हुईं ॥ १३ ॥
सौम्येनस्तनयोर्युग्मंमध्यंचैन्द्रेणचाभवत्। चारुणेनचजङ्घोरूनितम्बस्तेजसाभुवः॥१४॥
चंद्रमा के तेज से दोनों स्तन, इन्द्र के तेज से मध्यभाग वरुण के तेज से जंघा और पृथ्वी के तेज से नितंब हुए ॥ १४ ॥
ब्रह्मणस्तेजसापादौतदङ्गुल्योऽर्कतेजसा।
वसूनाञ्चकराङ्गुल्यःकौवेरेणचनासिका॥१५॥
ब्रह्माकेतेजसेपाँव, सूर्यकेतेजसे अँगुलियां, वसुत्रोंकेतेजसेहाथोंकीअँगुलियां औरकुबेरकेतेज
सेनासिकाहुई॥१५॥
तस्यास्तुदन्ताःसम्भूताःप्राजापत्येनतेजसा। नयनत्रितयंजज्ञेतथापावकतेजसा॥१६॥
दक्ष प्रजापति के तेज से दाँत उत्पन्न हुए तथा अग्नि के तेज से तीनों नेत्र हुए ॥ १६ ॥
भुवौचसन्ध्ययोस्तेजःश्रवणावनिलस्यच। अन्येषांचैवदेवानांसम्भवस्तेजसांशिवा॥१७॥
दोनों संध्याओं के तेज से उनकी कुटियाँ और वायु के तेज से कान, उत्पन्न हुए । उपरोक्त तथा अन्य देवताओं के तेज से वह शिवा उत्पन्न हुई ||१७||
ततःसमस्तदेवानांतेजोराशिसमुद्भवाम्। तांविलोक्यमुदंप्रापुरमरामहिषार्द्दिताः॥१८॥
महिषासुरसे पीड़ितहुए वे सच देवता समस्त देवताओं के तेज से उत्पन्न हुई उस देवी को देखकर हर्पित हुए ||१८||
शूलंशूलाद्विनिष्कृष्यददौतस्यैपिनाकधृक्। चक्रंचदत्तवान्कृष्णःसमुत्पाद्यस्वचक्रतः॥१६॥
उस समय महादेवजी ने अपने शूल में से एकशुल निकाल कर उनको दिया तथा विष्णुने अपने चक्रमें से एक चक्र निकाल कर देवी को दिया ॥ १६ ॥
शंखञ्चवरुणःशक्तिददौतस्यैहुताशनः। मारुतोदत्त्वांश्चार्प - बाणपूर्णेतथेषुधी॥२०॥
वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति और वायु ने धनुष बाणों से भरे हुए दो तीरकश दिये ॥२०॥
वज्रमिन्द्रःसमुत्पाद्यकुलिशादमराधिपः।
ददौतस्यैसहस्राक्षोघण्टामैरावताद्वजात्॥२१॥
देवताओं के स्वामी इन्द्र ने अपने वज्र में से निकाल कर एक वज्र देवी को दिया तथा उन्हीं सहस्र चनु वाले इन्द्र ने अपने ऐरावत हाथी का धण्टा भीउनको देढिया ॥ २१ ॥
कालदण्डाद्वयमोदण्डंपाशंचाम्बुपतिर्ददौ। प्रजापतिश्चाक्षमालांददौब्रह्माकमण्डलुम् ||२२||
यम ने अपने कालदण्ड में- प्रजापति ने अक्षमाला और ब्रह्मा ने कमण्डलु दिया
से एक दण्ड और वरुण ने पाश दिया तथा दक्ष॥ २२ ॥
समस्तरोमकूपेषुनिजरश्मीन्दिवाकरः। कालश्चदत्तवान्खड्गंतस्याश्चर्म्मचनिर्मलम्२३
सूर्य ने उनके सब रोम कूपों में किरणों का समावेश किया तथा काल ने एक तलवार औरसुन्दर एक ढाल उनको दी ॥ २३ ॥
क्षीरोदश्चामलंहारमजरेचतथाम्बरे। चूड़ामणितथादिव्यंकुण्डलेकटकानिच॥२४॥
क्षीर समुद्र ने एक निर्मल हार तथा दिव्याम्बर दिया तथा उसनेएक चूड़ामणि, दिव्य कुण्डल और पहुँचियाँ भीदीं ||२४||
अर्द्धचन्द्रंतथाशुभ्रंकेयूरान्सर्व्ववाहुषु। नूःपुरौविमलौतद्वव्यग्रैवेयकमनुत्तमम् ||२५||
श्रर्द्धचन्द्रमा के समान स्वच्छ केयूर,.सव भुजाओं में स्वच्छ वाजूबन्द और एक उत्तमकण्ठहार ||२५||
अंगुरीयकरत्नानिसमस्तास्वङ्गुलीषुच। विश्वकर्माददौतस्यैपरशुञ्चातिनिर्म्मलम् ||२६||
तथा सच अँगुलियों की अंगूठियां ये सव रत्न भी उसने दिये । विश्वकर्मा ने एक निर्मल परशुदिया ||२६||
अखायनेकरूपाणितथाऽभेद्यञ्चदंशनम्। अम्लानपङ्कजांमालांशिरस्युरसिचापराम्॥२७.
और अनेक प्रकारके अस्त्र शस्त्र, श्रभेद्य, कवच तथा सिर और हृदय की निर्मल कमलों की माला भी दी ॥ २७ ॥
अददज्जलधिस्तस्यैपङ्कजंचाविशोभनम्। हिमवान्वाहनंसिंहंरत्नानिविविधानिच२८॥
समुद्र नेएक अत्यन्त सुन्दर कमल देवी को दिया तथा हिमालय पर्वतने वाहन के लिये सिंह और अनेकोंरत्न दिये ॥ २८ ॥
ददावशून्यंसुरयापानपात्रंधनाधिपः। शेषश्चसर्व्वनागेशोमहामणिविभूषितम्। नागहारंददौतस्यैधन्तेयःपृथिवीमिमाम् ||२६||
कुबेर ने सुरा से भरा हुआ एकपात्र दिया । सव नागों के स्वामी शेषनाग ने जोकि इस पृथ्वी को धारण किये हुये हैं महामणि से युक्त एक नागद्दार देवी को दिया ॥ २६ ॥
अन्यैरपिसुरैर्देवीभूषणैरायुधैस्तथा। सम्मानिताननादोच्चैःसाट्टहासंमुहुर्मुहुः॥३०॥
श्रौर भीदेवताओं ने देवी को आभूषणों और आयुधों से सम्मानित किया और इसके बाद वह देवी
ऊँचे स्वर से अट्टहास करने लगी ॥ ३० ॥
तस्यानादेनघोरेणकृत्स्नमापूरितंनभः। श्रमायतातिमहताप्रतिशब्दोमहानभूत्॥३१॥
उसके घोर नाद से सम्पूर्ण श्राकाश व्याप्त होगया और समस्त दिशाओं में उस नाद का प्रतिशब्द होनेलगा ॥३१॥
चुक्षुभुःसकलालोकाःसमुद्राश्चचकम्पिरे।
चचाल वसुधा चेलुः सकलाच महीधराः ||३२||
उस समय सम्पूर्ण लोक क्षोभ को प्राप्तहुये और समुद्र कम्पायमान होगये । पृथ्वी औरसम्पूर्ण पर्वत भी चलायमान होगये ॥ ३२ ॥
जयेति देवाश्व मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् ।
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्त्तयः ॥ ३३ ॥
तव देवता लोग हर्पित होकर उस सिंह-वाहिनी देवी से वोले कि श्रापकी जय हो। और भक्ति से नम्र होकर सुनियों ने भी देवी की स्तुति की ॥ ३३ ॥
दृष्ट्वासमस्तंसंक्षुब्धंत्रैलोक्यममरारयः। सन्नद्धाखिलसैन्यास्तेसमुत्तस्थुरुदायुधाः॥३४॥
सम्पूर्ण त्रैलोक्य को क्षुभित देखकर देवताओं के वैरी राक्षस अपने-अपने श्रायुधों को लेकर सेनाओंके सहित युद्ध के लिये उपस्थित होगये ॥ ३४ ॥
यःकिमेतदितिक्रोधादाभाष्यमहिषासुरः। अभ्यधावततंशब्दमशेषैरसुरैष्टतः॥३५॥
महिषासुर भी क्रोध से युक्त होकर और "श्रहा यह क्या है ? यह कहकर अनेक असुरों को लेकर
उधर की तरफ दौड़ा जिधर से कि वह शब्द श्रारहा था ॥ ३५ ॥
सददर्शततोदेवींव्याप्तलोकत्रयांत्विषा। पादाक्रान्त्यानतभुवंकिरीटोल्लिखिताम्बराम् ||३६||
उसने देवी को तीनों लोकों मेंव्याप्त होते हुए देखा तथा उस यह भी देखा कि उनके पाँवों के भार से पृथ्वी 'झुक गई है तथा उनके कुण्डलों की ज्योति से श्राकाश व्याप्त हो रहा है||३६||
क्षोभिताशेपपातालांधनुर्ज्यानिस्वनेनताम्। दिशोभुजसहस्रेणसमन्ताद्वयाप्यसंस्थिताम् ||३७|| |
उनके धनुष खींचने की श्रावाज़ से अनेकोंलोक और पाताल चलायमान होगये थे तथा वे
चारों ओर विराजमान थीं ॥ ३७ ॥
ततःप्रववृतेयुद्धंतयादेव्यासुरद्विषाम्। शस्त्रास्त्रैर्बहुधामुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ||३८||
फिर उस देवी एक हज़ार भुजाओं से युक्त होकर सब दिशाओं मेंके साथ राक्षस युद्ध में प्रवृत्त होगये और शस्त्र श्रस्त्रोंसे उस समय दिशायें प्रदीप्त हो रही थीं ||३८||
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्योमहासुरः। युयुधेचामरश्वान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः॥३६
चिक्षुर नाम महिषासुर का सेनापति और दूसरा चामर नाम राक्षस जो बहुतसी चतुरंगिणी सेना
के सहित था, ये दोनों देवी से खूब लड़े ॥३६॥
रथानामयुतैःपभिरुदग्राख्योमहासुरः। श्रयुध्यतायुतानाश्चसहस्ररेणमहाहनुः ||४०||
उदग्र नाम महा असुर साठ हजार रथ लेकर चढ़ा तथा महाहनु नाम राक्षस ने एक करोड़ सेना केसाथ देवी से युद्ध किया ॥ ४० ॥
पंचाशद्रियनियुतैरसिलोमामहासुरः। श्रयुतानांशतैःपभिर्वास्कलोयुयुधेरखे॥४१॥
श्रसिलोमा नाममहा असुरने पाँच करोड़ सेना लेकर और वाष्फल : ने साठ लाख सेना के साथ रण में युद्ध किया ॥४१॥
गज-वाजिसहस्रोधैरनेकैःपरिवारितः। हृतोरथानांकोट्याचयुद्धेतस्मिन्नयुध्यत॥४२ ||
हज़ारों घोड़ों और हाथियों से घिरा हुआ वह श्राया और करोड़ों रथों के साथ उसने रणमें युद्धकिया ||४२ ||
बिडालाक्षोऽयुतानाञ्चपंचाशद्भिरथायुतैः। युयुधेसंयुगेतत्रस्थानांपरिवारितः।४३ ||
विडाल नाम असुर पाँच लाख रथ लेकर श्राया और युद्ध करने लगा ||४३||
श्रन्येचतत्रायुतशोरथ-नाग - हयैताः। युयुधुःसंयुगेदेव्यासहतत्रमहासुराः॥४४॥
और भीअनेकों महाअसुर दस-दस हजार रथ, हाथी और घोड़े लेकर श्राये और देवी के साथ युद्ध करनेलगे ॥ ४४ ॥
कोटिकोटिसहस्रैस्तुस्थानांदन्तिनांतथा। हयानांवृतोयुद्धेतत्राभून्महिषासुरः || ४५
फिर करोड़ों हजार रथ, हाथी और घोड़े लेकर युद्धस्थल में महिपासुर श्राया ॥४५॥
तोमरैर्भिन्दिपालैश्चशक्तिभिर्मुषलैस्तथा। युयुधुःसंयुगेदेव्याखड्गैःपरशुपट्टिशैः॥४६॥
राक्षसगण तोमर, भिंदिपाल, शक्ति, मुशल, खड्ग, परश और पट्टिशों से देवी के साथ गुद्ध करने लगे || ४६॥
केचिश्चचिक्षिपुःशक्तीःकेचित्पाशांस्तथापरे। देवींखड्गप्रहारैस्तुतेतांहन्तुंप्रचक्रमुः॥४७
कोई राक्षस शक्ति फेंकते थे और कोई पाश फेंकते और कोई खड्ग के प्रहार से देवीका वधकरनाचाहते थे॥४७॥
सापिदेवीततस्तानिशस्त्राrयस्त्राणिचण्डिका। लीलयैवमचिच्छेदनिजशस्त्रास्त्रवर्षिणी || ४८॥
और वह चण्डिका देवी भी उनरंत्र शस्त्रोंको अपने अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से कुतूहलमात्रमें काट देती थी ॥४८॥
अनायस्ताननादेवीस्तूयमानासुरर्षिभिः।
मुमोचासुरदेहेषुशस्त्राण्यस्त्राणिचेश्वरी।४६
तब वहाँ ऋषि और देवताश्राये और देवी की स्तुति करने लगे । वह ईश्वरीअपने अस्त्र-शस्त्रों को उन राक्षसों के ऊपर छोड़रही थी ॥ ४६ ॥
सोऽपिक्रुद्धोधुतसटोदेव्यावाहनकेशरी। चचारासुरसैन्येषुवनेष्विवहुताशनः॥५०
देवी का वाहन सिंह भी क्रोधित होकर असुरों की सेना में इस प्रकार घूम रहा था
जिस प्रकार कि वन में अग्नि फैल जाती है ॥५०॥
निश्वासान्मुमुचेयांश्चयुध्यमानारणेऽम्बिका | तएवसद्यःसम्भूतागणाःशतसहस्रशः॥५१
फिर युद्ध करते हुए अम्बिका ने अपनी श्वास से लाखों गण उत्पन्न किये ॥५१॥
युयुधुस्तेपरशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः। नाशयन्तोऽसुरगणान्देवीशक्त्युपटहिताः॥५२॥
वे गए परशों, भिंदि-पाल, तलवार और पट्टिशों से युद्ध करने और राक्षसों का नाश करने लगे । देवता लोग भी देवीकी शक्ति से उत्साहित होकर ॥ ५२ ॥
अवादयन्तपटहान्गणाःशंखास्तथापरे। मृदङ्गांश्चतथैवान्येतस्मिन्युद्धमहोत्सवे॥५३॥
खुशी से नगाड़े बजाने लगे। उस युद्ध के उत्सव में कोई देवता शंख और कोई मृदङ्ग बजा रहे थे ॥ ५३ ॥
ततोदेवीत्रिशूलेनगदयाशक्तिवृष्टिभिः। खड्गादिभिश्चशतशोनिजघानमहासुरान् ||५४ |
फिर देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति और तलवार के प्रहार से सैकड़ों बड़े असुरों का बंध कर डाला ॥५४
पातयामासचैवान्यान्घण्टास्वनविमोहितान्। श्रसुरान्सुविपाशेनबद्ध्वाचान्यानकर्षयत्॥५५॥
देवी ने बहुत से असुरों को गिरा दिया और दूसरों को घण्टे के खर से मोहित करके पाश में बाँधकरखींच लिया ॥ ५५ ॥
केचिद्विद्वधाकृतास्तीक्ष्णैःखड्गपातैस्तथापरे। विपोथितानिपातेनगदयाभुविशेरते ||५६
कुछ दैत्य तलवार की तीक्ष्ण धार से कट गये, कुछ गदां के प्रहार से मारे गये.और कुछ अचेत होकर भूमि पर पड़ गये ॥ ५६ ॥
वेमुश्चकेचिद्रुधिरंमुषलेनभृशंहताः। केचिन्निपातिताभूमौभिन्नाःशूलेनवक्षसि॥५७॥
कोई मूशल की मार से आहत होकर रुधिरं वमन कर रहे थे और कोई शूलसे छाती में चोट खाकर टुकड़े २ होकर पृथ्वी पर गिर पड़े थें ॥ ५७ ॥
निरन्तराःशरौघेणकृताःकेचिद्रणाजिरे। सेनानुकारिणःप्राणान्मुमुचुस्त्रिदशार्द्दनाः॥५८॥
वहुतसे वाणों की मार से उस राङ्गण में गिर पड़े कुछ असुर जो सेना के श्रागे-आगे चल रहे थे बाणों सेकट कर गिर पड़े ||१८||
केषाञ्चिद्वाहवश्चिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे। शिरांसिपेतुरन्येषामन्येमध्येविदारिताः॥५६॥
कुछ की भुजायें और कुछके गले कट गये । कुछ के शिर कट कर गिर पड़ेऔर कुछ बीच में से कट गये ॥ ५६ ॥
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरेपेतुरुर्व्वयांमहासुराः।
एकबाह्रक्षिचरणाःकेचिद्देव्याद्विधाकृताः॥६०
कुछ महाराक्षस जंघाओं के कट जाने से पृथ्वी पर गिर पड़े कुछ की भुजा, किसी की आँख अथवा किसी का पाँव कट गया । कुछ को देवी ने काट कर दो करदिये ॥ ६० ॥
छिन्नेऽपिचान्येशिरसिपतिताःपुनरुत्थिताः। कवन्धायुयुधुर्देव्यागृहीतपरमायुधाः॥६१॥
कुछ शिर के कट जाने पर भी फिर उठ बैठे और उन धड़ों ने ही हथियार लेकर देवीके साथ युद्ध किया ॥ ६१॥
ननृतुश्चापरेतत्रयुद्धेतूर्यलयाश्रिताः। - कबन्धाश्छिन्नशिरसःखड्ग-शक्त्यृष्टिपाणयः॥६२॥ तिष्ठतिष्ठेतिभाषन्तोदेवीमन्येमहासुराः ||६३
उस युद्ध में वे चौताला के साथ नृत्य कर रहे थे और शिर कटेहुए कबन्ध हाथों में खङ्ग, शक्ति और ऋष्टि लिये हुए तथायुद्ध कर रहे थे ||६२-६३||
पातितैरथनागाश्वैरसुरैश्चवसुन्धरा। अगम्यासाऽभवत्तत्रयत्राभूत्समहारणः || ६४||
जहाँ पर कि महा युद्धऔर भी महादैत्य 'ठहरो, ठहरो' कहते हुए देवीसेहुआ था वह भूमि रथों, हाथियों, घोड़ों औरराक्षसों के गिरने से अगम्या होगई थी ॥ ६४ ॥
शोणितौघामहानद्यःसद्यस्तत्रविसुस्रुवुः। मध्येचासुरसैन्यस्यवारणासुरवाजिनाम् ||६५ ||
उसअसुर सेना के बीच में होकर हाथी, घोड़ों और दैत्यों के रुधिर से एक महान् नदी बह निकली ॥६५
येनतन्महासैन्यमसुराणांतथाम्बिका।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तु दारुमहाचयम् ||६६||
जिसप्रकारअनितृणोंकेदेरकोक्षणभरमेंभस्म कर डालती है उसी प्रकार अम्बिका ने असुरों की
उस महासैन्य को शीघ्रही नष्ट कर डाला ॥ ६६ ॥
सचसिंहोमहानादमुत्सृजन्धुतकेशरः। शरीरेभ्योऽमरारीणामसुनिवविचिन्वति॥६७॥
जब वह सिंह धुतकेशर महानाद करता था तब मानो राक्षसों का प्राण निकल जाता था ॥ ६७ ॥
देव्यागणैश्चतैस्तत्रकृतंयुद्धंतथाऽसुरैः। यथैषांतुतुषुर्देवाःपुष्पदृष्टिमुचोदिवि॥६८॥
देवीकेगणोंपरजोकिवहाँअसुरोंसेयुद्धकर रहेथेदेवताओंनेप्रसन्नहोकरआकाशसेपुष्पवृष्टिकी॥६८॥.
इतिश्री मार्कण्डेय०मेंसावर्णिकमन्वंतरमेंदेवीमाहात्म्यमेंमहिषासुरसैन्यवधनाम८२वाँश्र०स०।
Summary of chapter 81 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
In the opening chapter of the sacred Devī Māhātmya, King Suratha, stripped of his kingdom by treacherous ministers, meets the merchant Samādhi in the forest, who was cast out by his greedy family. Puzzled by why their minds still harbor affection for those who wronged them, they seek refuge with Sage Medhā. The sage reveals that all beings are enchanted by Yoganidrā, the illusory power of Supreme Devī Mahāmāyā. He recounts how at the beginning of creation, when demons Madhu and Kaiṭabha emerged from Bhagavān Vishṇu's earwax to slay Brahmā, Brahmā offered the supreme Yoganidrā Stuti. Awoken from His cosmic slumber, Bhagavān Vishṇu battled the demons for five thousand years and vanquished them upon His thighs.