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ऋषिरुवाच

निशुम्भंनिहतंदृष्ट्वाभ्रातरंप्राणसम्मितम्। हन्यमानंबलश्चैवशुम्भःक्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥१

ऋषि बोले-

अपने भाई निशुम्भ और सब सेना सेबघ हुआ देखकर शुम्भ क्रोधित होकर देवी से

बोला ॥ १ ॥

बलावलेपदुष्टेत्वंमादुर्गेगर्व्वमावह | श्रन्यासांवलमाश्रित्ययुध्यसेयाऽतिमानिनी॥२

 हे दुष्टा दुर्गे ! दुसरे के बल पर तुम गर्व मत करो। तुम दूसरे के बल पर अश्रित होकर

तो युद्ध करती हो और अपने को बहुत कुछसमझती हो ॥ २ ॥

देव्युवाच

एकैवाहंजगत्यत्रद्वितीयाकाममापरा। पश्यैतादुष्टमय्येवविशन्त्योमद्विभूतयः॥३

देवी बोली-

इस जगत में मैं एक ही हूँ और मुझसे श्रति- रिक्त दूसरी कौन है ? रे दुष्ट ! देख, यह सम्पूर्ण

शक्तियां मुझसे ही रहती हैं ॥ ३ ॥ ऋषिरुवाच

ततःसमस्तास्तादेव्योब्रह्माणीप्रमुखालयम्। तस्यादेव्यास्तनौजग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका || ४

ऋषि बोले-

तब ब्रह्माणी आदि जितनी शक्तियां थीं वे सब देवी के शरीर में लीन होगई और अम्बिका

अकेली रह गई ॥ ४ ॥ देव्युवाच

अहंविभूत्याबहुभिरिहरूपैर्यदास्थिता। तत्संहृतंमयैकैवतिष्ठाम्याजौस्थिरोभव || ५

देवी बोली-

मैं ही अपने विभव से अनेकों रूप में स्थित थी उन सबको मैंने समेट लिया और अब मैं एक हूँ,तू भी ठहर ॥ ५ ॥ ऋषिरुवाच

ततःप्रववृतेयुद्धंदेव्याःशुम्भस्यचोभयोः। पश्यतांसर्व्वदेवानामसुराणाञ्चदारुणम् || ६

ऋषि बोले-

सब देवताओं और असुरों के देखते देखते देवी और शुम्भ का दारुण युद्ध होने लगा ॥ ६ ॥

शरवर्षैःशितैःशस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैवदारुणैः। तयोर्युद्धमभूद्वभूयःसर्व्वलोकभयङ्करम्॥७

तीक्ष्ण बाणों और दारुण अस्त्र शस्त्रों की वर्षा होने लगी. और उस समय उन दोनों का सब संसार को भय उत्पन्न करने वाला युद्ध हुआ ॥ ७ ॥

दिव्यान्यस्त्राणिशतशोमुमुचेयान्यथाम्बिका। बभञ्जतानिदैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्त्तृभिः॥८

अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े उनको दैत्यराज शुम्भ ने अपने शस्त्रों से काटडाला ॥ ८ ॥

मुक्तानितेनचास्त्राणिदिव्यानिपरमेश्वरी। भत्रलीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः॥६

उसदैत्यजिनअस्त्रोंकोछोड़ाउनकोअंबिकाने खेलने मात्र में ही हुंकार आदि शब्दों से काटदिया।६॥

ततःशरशतैर्देवीमाच्छादयतसोऽसुरः। सापि तत् कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेपुभिः॥ १०॥

फिर उस असुर ने सैकड़ों बाणों से. देवी को आच्छादित कर दिया उन सब बापों को और उसके धनुष को देवी ने कुपित होकर काट डाला ||१०||

छिन्नेधनुपिदैत्येन्द्रस्तथाशक्तिमथाददे। चिच्छेददेवीचक्रेणतामप्यस्यकरस्थिताम्॥११

धनुष के कटने पर दैत्यराज ने एक शक्ति उठाई। जबकि वह शक्ति शुम्भशुम्भ के हाथ॥ ११ ॥

ततःखड्गमुपादायशतचन्द्रञ्चभानुमत्। श्रभ्यधावत्तदादेवींदैत्यानामधिपेश्वरः ||१२||

फिर दैत्यराज शुम्भ एक खड्ग और ढाल में ही थी देवी ने उसे अपने वक से काट ल

जिसमें सूर्य के समान शतचन्द्र लगे हुए थे लेकरदेवी के ऊपर झपटा ॥ १२॥

तस्यापततएवाशुखड्गंचिच्छेदचण्डिका। धनुर्मुक्तःशितैर्वाणैश्चचार्ककरामलम् ||१३||

उसके श्राते ही चंडिकाअपने धनुष से छूटे हुए बाणों से उसके खड्ग इसके बाद वह दैत्य श्रश्वहीन और सारथी के और सूर्य की सी छटावाले ढाल को काट दिया ॥१३

हताश्वःससदादैत्यन्निधन्वाविसारथिः। जग्राहमुद्गरंघोरमम्बिकानिधनोद्यतः ||१४||

बिना होगया तथा उसका धनुष भी काट दियागया ।  फिर वह एक भयानक मुग्दर उठाकरअम्विका के मारने को उद्यत हुथा ॥ १४ ॥

चिच्छेदापततस्तस्यमुद्गरंनिशितैःशरैः। तथापिसोऽभ्यधावत्तांमुष्टिमुद्यम्यवेगवान् ||१५||

देवी ने उस मुदुगर को अपने तीच्ण वाणों से काट दिया फिर वह देवी को मुटि से मारने को शीघ्र दौड़ा || १५||

ससुष्टिंपातयामासहृदयेदैत्यपुङ्गवः। देव्यास्तञ्चापिसादेवीतलेनोरस्यताडयत्॥१६॥

दैत्यराजनेदेवीकेहृदयमेंमुष्टिकाप्रहार कियाऔरदेवीनेभीहाथसेउसेछातीमेंमारा॥१६॥

तलमहाराभिहतोनिपपातमहीतलं। सदैत्यराजःसहसापुनरेवतयोत्थितः ||१७||

देवी के करतल के प्रहार से वह पृथ्वी पर गिरपट्टा परन्तु वह दैत्यराज सहसा फिर उठपड़ा ॥१७

उत्पत्यचप्रगृह्योचदेवींगगनसास्थितः। तत्रापिसानिराधारायुयुधेतेनचण्डिका॥१८

उठकर वह देवी को पकड़ कर ऊँचा श्राकाश में ले गया,  परन्तु वहाँ भी निराधार ही देवी ने उस युद्ध किया ||१८||

नियुद्धखेतदादैत्यचडिकाचपरस्परम्। चक्रतुःप्रथमंसिद्ध-मुनिविस्मयकारकम् ||१६||

श्राकाशमें दैत्य और चंडिका देवी का परस्पर ऐसा युद्ध हुआ कि उससे सिद्ध और मुनि लोग विस्मित होगये ॥ १६ ॥

ततांनियुद्धसुचिरंकृत्वातेनाम्विकासह। उत्पात्यभ्रामयामासचिक्षेपधरणीतले॥२०

फिर अंबिका ने बहुत काल तक उस दैत्य से युद्ध करके उसे उछाला और  फिर घुमाकर पृथ्वी पर फेंक दिया ॥ २० ॥

संक्षिसोधरणींप्राप्यमुष्टिमुद्यम्यवेगितः। अभ्यधावतदुष्टात्माचण्डिकानिधनेच्छया ||२१|||

धरणी पर गिर कर वह फिर उठा श्रौर फिर वह दुष्टात्मा मुष्टि तान कर चण्डिकाकोमारने के लिये दौड़ा || २१||

तमायान्तंततोदेवीसर्चदैत्यजनेश्वरम्। जगत्यांपातयामासभित्त्वाशूलेनवक्षसि॥२२॥

तव देवी ने उस दैत्यराज को श्राते हुए देखकर उसको शूल से छातीमें वेध कर पृथ्वी पर गिरा दिया || २२ ||

सगतासुःपपातोयींदेवीशूलाग्रविक्षतः। चालयन्सकलांपृथ्वींसान्धिद्वीपांसपर्व्वताम्॥२३॥

देवीके शल से व्रत होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसके पृथ्वी चलायमान होगई ॥ २३ ॥

ततःप्रसन्नमखिलंहतेतस्मिन्दुरात्मनि। जगत्स्वास्थ्यमतीवापनिर्मलञ्चाभवन्नभः॥२४॥

उस दुष्टात्मा के गिरने से समुद्र, द्वीप और पर्वत सहित सम्पूर्ण मरने पर समस्त संसार प्रसन्न होकर स्वस्थ हुना तथा चाकाश भी उसके भय से निर्मल हो गया ॥२४

उत्पातमेघाःसोलकायेमागासंस्तेशमंययुः। सरितोमार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्रपातिते॥२५॥

मेघों के उत्पात और उल्कापात आदि जो पहिले हुआ करते थे वे उसके मरने से सब शान्त होगये और नदियां सीधी वहने लगीं ॥ २५ ॥

ततोदेवगणाःसर्व्वेहर्षनिर्भरमानसाः। बभूवुर्निहतेतस्मिन्गन्धर्व्वाललितंजगुः॥२६॥

फिर सव देवगण उसके मरने से प्रसन्न होगये और गन्धर्वलोग ललित गीत गाने लगे ॥ २६ ॥

अवादयंस्तथैवान्येननृतुश्चाप्सरोगणाः ववुःपुण्यास्तथावाताःसुप्रभोऽभूद्दिवाकरः।

जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्तदिग्जनितस्वनाः ||२७|

वाजेबजानेलगेऔरअप्सरायेंनाचनेलगीं।हवा चलनेलगी औरसूर्यका प्रकाशबढ़गया। अनिजोशान्तहो गईथीप्रज्वलित होगईतथा दिशाओंमेंजोकोलाहलहोरहाथाशान्तहोगया॥२७

इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंसावर्णिकमन्वन्तरकेदेवीमाहात्म्यमेंशुभवधनामह०वाँअ०समाप्त।