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मार्कण्डेयउवाच

कदाचिद्राजपुत्रोऽसौमृगयामचरद्वने। मृगान्विध्यन्वराहांश्चशार्दूलादींश्चदंष्ट्रिणः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

एक वार मृगया के लिये गये हुए राजकुमार अवक्षित वन में विचर रहे थे और हरिण, शूकर,

सिंह, चीते श्रादि का शिकार कर रहे थे ||१||

शुश्रावसहसाशब्दत्राहित्राहीतियोषितः। विक्रोशन्त्याःसुबहुशोभयगद्गदमुच्चकैः ||,२

वहाँ पर उन्होंने बड़े ऊँचे स्वर से एक स्त्री के रोने की आवाज़ सुनी। मुझे बचाओ, मुझे बचाओ, ऐसीश्रवाज़ आरही थी ॥ २ ॥

माभैंर्माभैरितिवदन्राजपुत्रःसवेगितः। चोदयामासतुरगंयतःशब्दःसमागतः॥३

मत डरो ! मत डरो ! यह कहते हुए राजकुमार ने उधर ही घोड़े को शीघ्रता से बढ़ाया जिधर से आवाज़ आरही थी ।३॥

ततश्चसापिचुक्रोशकन्यकाविजनेवने। गृहीतादनुपुत्रेणदृढ़केशेनमानिनी॥४

फिर उस निर्जन वनमें दनुके पुत्र दृढ़केशसे पकड़ी हुई वह कन्या रोती हुई इस प्रकार कह रही थी |४॥

करन्धमसुतस्याहंभार्य्याचाहमवीक्षितः। हरत्यनार्योविपिनेपृथिवीशस्यधीमतः॥५

मैं महाराज करन्धम के पुत्र श्रवीक्षित की स्त्री हूँ ।मुझको यह दुष्ट हरण कर लिये जाता है ॥ ५ ॥ यस्यसर्व्वेमहीपालास्तथागन्धर्व्व- गुह्यकाः। नसमर्थाःपुर: स्थातुंतस्यभार्य्याहृतास्म्यहम् ||६||

जिस वीक्षित के सामने कोई राजा, गन्धर्व,गुह्यक खड़े होने को समर्थ नहीं हैं उसकी स्त्री मैं

इस प्रकार हरण की जा रही हूँ ||६|

यस्यमृत्योरिथक्रोधःशक्रस्येवपराक्रमः। करन्धमसुतस्यैषातस्यभार्य्याहृतास्म्यहम्॥७

जिसका क्रोध मृत्यु के समान और पराक्रम इन्द्र के समान है उस महाराज करन्धम के पुत्र की पत्नी मैं इस प्रकारहरण की जारही हूँ ॥ ७ ॥

मार्कण्डेयउवाच

इत्याकर्ण्यमहीपाल - तनयःसशरासनी। चिन्तयामासकिमिदंममभार्य्यात्रकानने॥८

मार्कण्डेयजी वोले---

इस प्रकार यह सुनकर धनुपधारी वीक्षित यह सोचने लगे कि इस वन में मेरी स्त्री कहाँ सेश्राई ॥ ८ ॥

मायेयंरक्षसांनूनंदुष्टानांकाननौकसाम्। अथवागतएवाहंसर्व्वंवेत्स्यामिकारणम्॥६

ऐसा प्रतीत होता है कि यह वन मेंरहने वाले दुष्ट राक्षसों की माया है परन्तु जब कि मैं यहाँ पर श्रांही गया हूँ, मैं इसका कारणजान लूंगा ॥ ६ ॥ मार्कण्डेयउवाच

त्वरितःसततोगत्वाददर्शातिमनोरमाम्। काननेकन्यकामेकांसर्व्वालङ्कारभूषिताम्॥१०॥

मार्कण्डेयजी बोले--

फिर शीघ्र ही उन्होंने उस वनमें पहुंच कर 'सब आभूषणों से युक्त एक अत्यन्त मनोहर कन्या को देखा ॥ १०॥

गृहीतांदनुपुत्रेणदृढ़केशेनदण्डिना। त्राहित्राहीतिकरणंविक्रोशन्तींपुनःपुनः॥११॥

उसको दनुके पुत्र हढ़केश ने पकड़ रक्खा था और वह रोती हुई "वचाश्रो, वचाश्रो" ऐसा वार वार कह रही थी ॥ ११ ॥

माभैरितिसतामाहहवोऽसीतिचतंवदन्। शासतीमां महीं दुष्टः को भूपेऽत्र करन्धमे ।

यस्य प्रतापावनता भुवि सर्व्वे महीक्षितः ॥ १२॥

उन्होंनेउसकन्यासेनडरनेकेलियेकहकरउसराक्षसकहा. " तुम मारे जानोगे, जिन महाराज करन्धम

के प्रताप से स राजा लोग नम्र होकर रहते हैं उनके राज्य में कोई दुष्ट नहीं रह सकता ॥ १२ ॥

वतस्तमागतंदृष्ट्वागृहीतबरकार्मुकम्। मांत्राहीत्याहतन्वङ्गीहतास्म्येषेतिचासकृत्१३॥

फिर धनुष लेकर उनको श्राते हुए देखकर उस तुन्दरी ने कहा कि मुझे बचाइये, यह दुष्ट मुझे

हरण कर लिये जाता है ||१३||

राङ्गाकरन्यमस्याहंस्तुषाभाय्र्याप्यवीक्षितः। हृतास्म्येतेनदुष्टेनसनाथानायवद्वने॥१४-

 मैं महाराज करन्धम श्री पुत्रवधू और वीक्षित की स्त्री हूँ और इस वन में अनाथ की तरह इस दुष्ट द्वारा हरण की जा रही हूँ ||१४||

मार्कण्डेयउवाच

ततो विममृपे वाक्यमवीक्षित् त त्योदितम् ।

कथमेषा हि मे भार्य्या स्नुषा वातस्य वा कथम् १५॥

मार्कण्डेयजी बोले-

उस कन्या के ये वाक्य सुनकर राजकुमार अक्षित यह सोचने लगे कि यह महाराज की

पतोह और मेरी स्त्री किस प्रकार हुई ||१५||

त्रयवामोचयास्येतांतन्वींवेत्स्यामितत्पुनः। क्षत्रियैर्धार्य्यतेशस्त्रमार्त्तानांत्राणकारणात् ||१६||

फिर सोचा कि पहिले इसे छुडालूं और पीछे यह सब मालूम करूँगा । त्रिय लोग पीड़ितों की रक्षा के निमित्त ही शस्त्र धारण करते हैं ॥ १६ ॥

ततःक्रुद्धोऽब्रवीद्वीरोदानवंतंसुदुर्म्मतिम्। जीवनगच्छविमुच्यैनामन्यथानभविष्यसि॥१७॥

  वे क्रुङ होकर उस दुर्बुद्धि तन्त्र से बोले, " इसको छोड़ कर अपने घर जाओ, अन्यया तुन्हारा जीवन नरहेगा ।" ॥ १७ ॥

ततःसतांविहायोच्चैर्दण्डमुत्क्षिप्यदानवः। तमप्यधावत्सोऽप्येनंशरवर्षैरवाकिरत्॥१८॥

 वह दैत्य उस कन्या को छोड़ कर एक ऊँचा दएड लेकर श्रीक्षित की और दौड़ा और वीक्षित ने भी उसको सैकड़ों तीरोंसे ढक दिया।१८॥

सवार्यमाणोवाणवैर्दानवोऽतिमान्वितः। राजपुत्रायविशेषदण्डंशंकुशतावृतम्॥१६॥

उन बालों को दिवारण करते . हुए उस मदोन्मत्त राज्ञल ने राजकुमार पर तीरोंसे ढके हुए उस दएड को चला दिया ॥ १६ ॥

तमापतन्तंचिच्छेद्शरैर्भृपसुतस्ततः। सोऽप्यासन्नंगृहीत्वोच्चैर्द्रुममाजौव्यवस्थितः॥२०॥

उल गिरते हुए दण्ड को राजकुमार ने वाणों से काट डाला और फिर वह दैत्य एक ऊँचे पेड़को उखाड़ कर वहाँ पर स्थित ह ॥ २० ॥

सृजतःशरवर्षाणितंचिक्षेपततोद्रुभन्। सचतंतिलशचक्रेभलैःकार्मुकमोचितैः॥२१॥

वह पेड़ उस दैत्य ने वालों की वर्ग करते हुए त्रवीक्षित के ऊपर फैश। परन्तु अपने धनुष से छोड़े हुए वाणों द्वारा श्रदीक्षित ने उस पेड़ को टुकड़े २ कर दिया॥२१॥

विक्षेपचशिलांराजपुत्रायदानवः। सापिमोघापपातोर्व्यामुज्झितातेनलाघवान्॥२२॥

फिर दैत्य ने राजकुमार पर एक शिला फेंकी जो कि उस राक्षस की निर्बलता से राजकुमार को न

लग कर पृथ्वी पर गिर पड़ी ॥ २२ ॥

राजपुत्रायकुपितोयद्यविक्षेपदानवः। तद्तच्चिच्छेदवाणौषैर्भूभृत्स्नुःसलीलया ||२३||

क्रुद्ध होकरदानव ने जो जो हथियार राजकुमार पर फेंके उन सबको राजकुमार ने अपने बाणों से कौतूहल में ही काट डाला ॥२३॥

ततोविच्छिनदण्डोताँविच्छिन्नसकलायुवः। मुष्टिमुद्यम्यसक्रोधोराजपुत्रमधावत ||२४||

फिर तो सब श्रायुधले रहित  होकर वह रास मुष्टिका तान कर राजकुमार पर दौड़ा ॥२४॥

तस्यापततएवासौकरन्यमतुतःशिरः। छित्त्वावेतपत्रेणपातयामासवैभुवि॥२५॥

राजकुमार वीक्षित ने उस दैत्य का शिर तलवार से काट कर  पृथ्वी पर गिरा दिया || २५ ||

तस्मिन्विनिहतेदेवैर्दानवेदुष्टचेष्टिते। करन्यमसुतःसर्वैःसाधुसाध्वितिभावितः॥२६॥

उसदुष्टदानवकेमरनेपरसब देवताओंनेराजकुमारवीक्षितकोसाधुवाद दिया॥२६॥

वरंवृणीष्वेतितदादेवैरुक्तोनृपात्मजः। वत्रेपुत्रंमहावीर्य्यंपितुःप्रियचिकीर्षया ||२७||

देवताओं ने कहा, " हे राजकुमार !वर माँगो ।" श्रवीक्षित ने पिता की इच्छानुसार देवताओं से एक पराक्रमी पुत्र माँगा ॥ २७ ॥ देवाऊचुः

भविष्यतिहितेपुत्रश्चक्रवर्त्तीमहाबलः। अस्यामेवहिकन्यायांमोक्षितायांत्वयानघ||२८||

देवता बोले-

हे निष्पाप ! इस कन्या से जिसको कि तुमने छुड़ाया है, तुम्हारे एक महावली पुत्र होगा ||२८|| राजपुत्रउवाच

पित्राहंसत्यपाशेनबद्धइच्छाम्यहंसुतम्। राजभिर्निज्जितेनाजौत्यक्तोमेदारसंग्रहः ||२६||

राजकुमार बोले-

पिता के प्रति सत्य के पाश में बँध कर मैं पुत्र की इच्छा करता हूँ । राजाओं द्वारा परास्त होने

पर मैंने स्त्री न ग्रहण करनेकी प्रतिज्ञा की थी ॥२६॥

साचमेयावतात्यक्ताविशालनृपतेःसुता। तयाचमत्कृतेत्यक्तोमासृतेनरसङ्गमः ||३०|||

मैंने राजा विशाल की कन्या को जो कि मेरी याचना कर रही थी छोड़ दिया, परन्तु उसने

मेरे कारण किसी दूसरे पुरुष से विवाह न किया॥३०॥

तत्कथंतामपास्याद्यविशालतनयामहम्। नृशंसात्माकरिष्यामिअन्यनारपरिग्रहम् ||३१||

अतः किस प्रकार राजा विशालकी कन्या को छोड़ कर मैं कठोर हृदय होकर दूसरी स्त्री को ग्रहणकरूँ ? ॥ ३१ ॥ देवाऊचुः इयमेवहितेभार्य्या श्लाघ्यतेयात्वयासदा। विशालस्यसुतासुभ्रूस्त्वत्कृतेयाश्रितातपः॥३२॥

देवता बोले

यह ही तुम्हारी सुन्दर पत्नी विशालकी कन्या है जिसकी कि तुम सदा प्रशंसा करते रहते हो

और जिसने कि तुम्हारे कारण तपस्या की है ||३२||

तस्यामुत्पत्स्यतेवीरःसप्तद्वीपप्रसाधकः। यष्टायज्ञसहस्राणांचक्रवत्तींसुतस्तव ||३३||

हे वीर ! इसी से तुम्हारे एक पुत्र होगा जो सातों द्वीप का चक्रवतीं राजा होगा तथा वह हज़ारों

यज्ञों का करने वाला होगा ॥ ३३ ॥ मार्कण्डेयउवाच

इत्युच्चार्य्यययुर्देवाकरन्धमसुतंद्विज। सोऽप्याहतांतदापत्नींकथ्यतांभीरुकिंत्विदम्॥३४॥

मार्कण्डेयजी बोले-

हे कौटुकिजी ! देवता लोग श्रवीक्षित से यह कह कर चले गये । इसके बाद अवीक्षित ने उस

स्त्री से कहा, "हे भीरु ! तुम अपना वृत्तान्तसुनांनो" ||३४||

साचास्मैकथयामासत्यक्ताहंभवतायदा। त्यक्तबन्धुजनारण्यंनिर्व्वेदात्समुपागता।३५॥

स्त्री ने वीक्षित से कहा कि जब आपने मुझे छोड़ दिया तो दुःखी होकर मैंने भाई बन्धुओं को छोड़कर वन की राह ली ॥ ३५ ॥

तत्राहंतपसावीरक्षीणमायंकलेवरम्। | त्यक्तुकामासमभ्येत्यदेवदूतेनवारिता ||३६||

 हें वीर ! वहाँ तप से मेरा शरीर क्षीण होगया, और जब मैंने शरीर त्यागने का विचार किया तब एक देवदूत ने आकर मुझे रोका ॥ ३६ ॥

भविष्यतिचपुत्रस्तेचक्रवर्त्तीमहाबलः। प्रीणयिष्यतियोदेवानसुरांचहनिष्यति॥३७:

देवदूतने मुझसे कहा कि तुम्हारे एक महावली चक्रवर्ती पुत्र होगा जो देवताओं को प्रसन्न और असुरों कासंहार करेगा ॥ ३७ ॥

इतिदेवाज्ञयातेनदेवदूतेनवारिता। नसन्त्यक्तवतीदेहंत्वत्सङ्गममनोरथा॥३८॥

देवताओं की श्राज्ञानुसार उस देवदूत ने मुझे रोका और तुम्हारे मिलने की श्राशा में मैंने देह का त्याग न किया ॥ ३८ ॥

परश्वश्चमहाभागस्नातुंगङ्गाहदंगता।

अवतीर्णाविकृष्टास्मिवृद्धनागेनकेनचित्॥३६॥

 हे महाभाग ! एक वार मैं गड़ा कुण्ड पर स्नान करने गई और जब मैं जल में उतरी तो एक वृद्ध नाग मुझे जल में खींच कर लेगया ॥ ३६ ॥

ततोरसातलंनीतातेनतत्रचमेपुरः। 'नागाःसहस्रशस्तस्थुर्नागपत्न्यःकुमारकाः॥४०॥

फिर वह नाग मुझे रसातल में लेगया, जहाँ कि हजारों नाग, नागपत्नी और नागकुमारये ॥४०॥

तुष्टुवुमींसमभ्येत्यमामन्येऽपूजयंस्तथा। ययाचिरेसविनयंनागामामङ्गनास्तथा॥४१॥

कुछ नाग-ने मेरी श्राराधना की और कुछ ने स्तुति । सुझ से उन नाग और नागपत्नियों ने एक नम्रतापूर्वकयाचना की ||४१॥

प्रसादंकुरुसर्वेषांत्वमस्माकंसुतस्त्वया। अपराधमुपेतानां सन्निवार्य्यो वधोन्मुखः ||४२ | |

श्रापकापुत्रजिसकाकिहम अपराधकरेंगेजबहमकोमारनेकोउद्यतहोतब श्रापउसे ऐसाकरनेसे  रोकनेकीकृपाकरें॥४२॥

अपराधंकरिष्यन्तित्वत्पुत्रस्यानिलाशनाः। तन्निमित्तंनिवाय्र्योऽसौप्रसादःक्रियतामिति॥४३॥

हम नाग लोग श्रापके पुत्र का अपराध करेंगे, उस को श्राप निवारण करदें, आपकी यही कृपा हमको चाहिये ||४३||

तथेतिचमयाप्रोक्तेदिव्यैःपातालभूषणैः। भूषिताहंतथापुष्पैर्गन्धवासोभिरुत्तमैः॥४४॥

जब मैंने उनसे ऐसा करनेको स्वीकार करलिया तब उन्होंने मुझे पाताल के दिव्य श्रा

भूपणों तथा पुष्प, सुगन्धि और उत्तम वस्त्र श्रादि से विभूषित किया ||४४ ||

समानीतातथालोकमिमंतेनानिलाशिना। पुरायथाकान्तिमतीपूर्व्ववद्रूपशालिनी॥४५॥

फिर वही वृद्ध नाग मुझे इस लोक में पहुंचा गया और मैं पहिले की तरह कान्तिमान् तथा रूपवती होगई ॥ ४५ ॥

इतिरूपवतींदृष्ट्वासर्व्वालङ्कारभूषिताम्। जग्राहहदकेशोऽयंहर्तुकामःसुदुर्म्मतिः ||४६ ||

सय भूषणों से युक्त मुक्त रूपवती को देखकर इन दुष्ट दृढ़केश ने हरण करने की इच्छा से मुझे पकड़लिया ||४६ ||

युष्मद्वबाहुवलेनाहंराजपुत्रविमोक्षिता। तत्प्रसीदमहाबाहोमांप्रतीच्छत्वयासमः। भूर्लोकंराजपुत्रोऽन्योनास्तिसत्यंब्रवीम्यहम्४७||

हेराजकुमार ! मेराछुटकाराश्रापके बाहुबलसेहुआहै।हेमहाबाहु ! इसलियेकृपा करमुझकोग्रहण कीजिये।मैंसत्यकहतीहूँ। संसारमेंश्रापकेतुल्यदूसराराजकुमारनहींहै॥४७॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंअवीक्षितचरित्र ( ५ ) नाम१२६वाँअध्यायसमाप्त।