मार्कण्डेय महा पुराण
111
मार्कण्डेयउवाच
एवम्प्रभावोभगवाननादिनिधनोरविः। यस्यत्वंक्रोष्टुकेभक्त्यामाहात्म्यंमयिपृच्छसि॥१॥
मार्कण्डेयजी बोले-
हे कौटुकि ! श्रादिदेव भगवान् सूर्य का जिन का माहात्म्य तुम भक्ति पूर्वक पूछते हो प्रभाव इसप्रकार का है ॥ १ ॥
परमात्मासयोगीनांयुञ्जतांचेतसांलयम्। क्षेत्रज्ञःसांख्ययोगानांयज्ञेशोयज्विनामपि॥२
वह योगियों के परमात्मा श्रौर उनके चित्त के लयस्थान हैं । वे सांख्य-योगियों के क्षेत्र और यज्ञ करने वालों के यशेश्वर हैं ||२||
सूर्याधिकारंवहतोविष्णोरीशस्यवेधसः। मनुस्तस्याभवत्पुत्रश्चिन्नसर्व्वार्थसंशयः। मन्वन्तराधिपोविप्रयस्यसप्तममन्तरम्॥३॥
सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा और महेश के अधिकारों को वहन करते हैं । सावर्णि नाम उनके पुत्र सव संशय का नाश करके सातवें मन्वन्तर के स्वामी मनु हुए॥३॥
इक्ष्वाकुर्नाभगोरिष्टोमहाबलपराक्रमाः। नरिष्यन्तोऽथनाभागःपूपधोधृष्टएवच॥४॥
इक्ष्वाकु ! नाभग, रिष्ट तथा महावली और पराक्रमी नरिष्यन्त, नाभाग, पूपध और धृष्ट ॥ ४
एतेपुत्रामनोस्तस्यपृथग्राज्यस्यपालकः। विख्यातकीर्त्तयःसर्व्वेसर्व्वेशास्त्रास्त्रपारगाः॥५।
सावर्णि मनुके यह विख्यात कीर्तिवाले और शास्त्र विशारद पुत्र पृथक-पृथक राज्य के पालक हुए ||५||
विशिष्टतरमन्विच्छन्मनुःपुत्रंतथापुनः। मित्रावरुणयोरिष्टिंचकारकृतिनांवरः || ६ ||
फिर मनु ने और अधिक सन्तान उत्पन्न होने की इच्छा से मित्रावरुण नाम श्रेष्ठ यज्ञ किया ॥ ६ ॥
यंत्र चापहृते होतुरपचारान्महामुने । इला'नामसमुत्पन्नामनोःकन्यासुमध्यमा || ७||
हे कौटुकि मुनि ! यज्ञ में होम करनेके समय होता केउपचारसेमनुकेइलानामकीएक'सुन्दरी.कन्या उत्पन्न हुई ॥ ७ ॥
तांदृष्ट्वाकन्यकांतत्रसमुत्पन्नांततोमनुः। तुष्टाचमित्रावरुणौवाक्यचेदमुवाचह॥८
फिर मनु ने उस कन्या को उत्पन्न हुई देखकर मित्रावरुण को सन्तुष्ट किया श्रौर यह कहा ॥ ८ ॥
भवत्प्रसादात्तनयोविशिष्टोंमेभवेदिति। कृतेमखेसमुत्पन्नातनयाममधीमतः॥६॥
आपकी कृपा से मेरे एक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होवे | यज्ञ के करने पर मेरे एक कन्या उत्पन्न हुई ||६||
यदिप्रसन्नौवरदौतदियंतनयामम। प्रसादाद्भवतोःपुत्रोभवत्वतिगुणान्वितः॥१०
यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना चाहते हैं तो यह कन्याही श्रापके प्रसाद से अति गुणी पुत्र होजाय ॥ १० ॥
तथेतिचाभ्यामुक्तेतुदेवाभ्यांसैवकन्यका। इलासम्भवत्सद्यःसुद्युम्नइतिविश्रुतः॥११॥
मित्रावरुण नाम दोनों देवताओं के 'तथास्तु' कहने पर वह कन्या इला पुत्र होकर सुद्युम्न नाम से प्रसिद्ध हुई ॥११॥
पुनश्चेश्वरकोपेणमृगव्यामटतावने । 'स्त्रीत्वमासादितंतेनमनुपुत्रेणधीमता॥१२॥
फिर एक दफा वन में श्राखेट करते हुए खु महादेवजी के कोप से खीत्व को प्राप्त होगया ॥१२
पुरूरवसनामानंचक्रवर्त्तिनमूज्जितम्। जनयामासतनयंयत्रसोमसुतोयुधः ||१३||
चन्द्रमा के पुत्र वुध ने उससे पुरूरवा नाम म वली और चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न किया ॥ १३ ॥
जातेसुतेपुनःकृत्वासोऽश्वमेथंमहाक्रतुम्। पुरुषत्वमनुप्राप्तःसुद्युम्नःपार्थिवोऽभवत् || १४ ||
के उत्पन्न होजाने पर उसने अश्वमेध नाम : किया जिससे सुद्युम्न फिरसे पुरुपत्व पाकर जहुआ ||१४||
सुद्युम्नस्यत्रयःपुत्राउत्कलोविनयोगयः। पुरुषत्वेमहावीर्यायज्वनःपृथुलौजसः॥१५॥
पुरुपत्व प्राप्त होनेपर महाराज सुद्य स्न के उत्कल, विनय और राय नामक तीन पुत्रः बढ़े
पराक्रमी, यज्ञ करने वाले और तेजस्वी हुए ॥१५॥
पुरुषत्वेतुयेजातास्तस्यराज्ञस्त्रयःसुताः।
भुस्ते महीमेतां धर्मे नियतचेतसः ॥१६॥
पुरुषत्व पाने पर जो तीन पुत्र राजा सुधुस्त हुए उन्होंने धर्म में चित्त को स्थित करके इस पृथ्वी का पालन किया ॥१६ ॥
स्त्रीभूतस्यतुयोजातस्तस्तुराज्ञःपुरूरवाः। नसतंभमहीभागंयतोबुबसुतोहिसः॥१७॥
राजा के स्त्रीत्व कीदशा में जो पुरूरवा नाम पुत्र उत्पन्न हुआ उसको बुध का पुत्र होने के कारण राज्य का कोई भागन मिला ॥१७॥
ततोवशिष्ठवचनात्प्रतिष्ठानंपुरोत्तमम्। तस्मैदत्तंसराजाभूत्तत्रातीषमनोहरे || १८ ||
परन्तु गुरु वशिष्ट के कहने से राजा सुद्युम्न ने पुरुरवा को प्रतिष्ठान नामक एक
सुन्दर नगर दे दिया और वह उसी अत्यन्त मनोहर नगर का राजा होगया ||१८|
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंवंशानुक्रमनाम१११वांअ०समाप्त |
Summary of chapter 111 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The text lays out the systematic genealogical succession of the solar monarchs descending from Vaivasvata Manu, including Ikshvāku, Nimi, Nābhāga, and Saryāti, who established famous royal dynasties across Bhāratavarsha.