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कौटुकिरुवाच

समासात् कथिता सृष्टिः सम्यग्भगवता मम देवादीनां भवं ब्रह्मन् विस्तरात् तु ब्रवीहि मे

कौटुकिजी बोले- हे भगवन् ! आपने सृष्टि को तो विस्तारपूर्वक मुझसे कहा श्रव देवताओं की उत्पत्ति का हाल मुझे विस्तारपूर्वक बताइये मार्कण्डेय उवाच

कुशलाकुशलैर्ब्रह्मन् भाविता पूर्व्वकर्म्मभिः ख्याता तया ह्यनिर्मुक्ताः मलये ह्युपसंहृताः

मार्कण्डेयजी बोले- हे ब्रह्मन् ! पूर्व जन्म में किये हुए शुभ कर्मों से बाद में कुशल ही होती है। शुभ कर्म करने वाले प्रलयकाल में नष्ट हो जाने पर पुनः जन्म लेने पर पुण्यवान ही होते हैं

देवाद्याः स्थावरान्ताच मजा ब्रह्मचतुर्विधाः ब्रह्मणः कुर्व्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसास्तदा || ३

हे विप्रवर ! सृष्टि को रचते समय ब्रह्मा ने अपने मानस से देवताओं से लेकर स्थावर पर्यंत चार प्रकार की सृष्टि रचनेकी और मनुष्य, इन चार प्रकार की सृष्टि रचने की इच्छा की ||३||

ततो देवासुरपितृन् मानुषांश्च चतुष्टयम् सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्

इसके अनन्तर देवता, असुर, पितर इच्छा से ब्रह्मा ने जल के साथ अपनी श्रात्मा को जोड़ दिया ॥४

युक्तात्मनस्तमोमात्रा उद्रिक्ताभूत् प्रजापतेः सिसृक्षोर्जघनात् पूर्व्वमसुरा जज्ञिरे ततः

युक्तात्मा होने पर ब्रह्मा की तमो- मात्रा बलवती हुई और उनकी जंघाओं से असुरों की उत्पत्ति हुई

उत्ससर्ज ततस्तान्तु तमोमात्रात्मिकां तनुम् सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत ||

फिर ब्रह्मा ने उस तमोमात्रा 'युक्त शरीर को त्यागदिया जिससे वह शरीर फिर रात्रि होगया ६॥

अन्यां तनुमुपादाय सिसृक्षुः प्रीतिमाप सः सत्त्वोद्रेकास्ततो देवा मुखतस्तस्य जज्ञिरे

फिर दूसरा शरीर धारण कर प्रीत संयुक्त सृष्टि रचने की इच्छा की तो सतोगुण के उद्रेक से ब्रह्मा के मुख से देवताओं की सृष्टि हुई ||७||

उत्ससर्ज च भूतेशस्तनुं तामप्यसौ विभुः सा चापविद्धा दिवस सत्त्वमायमजायत ||

फिर ब्रह्माजी ने उस शरीर को भी छोड़ दिया तो वही शरीर सतोगुणयुक्त दिन होगया ॥६

सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम् पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे

किया और अपने को पितृवत् मानते हुए पितरोंकीइसके बाद सत्वमात्रा युक्त दूसरा शरीर धारण सृष्टि की

सृष्ट्वा पितृनुत्ससर्ज तनुं तामपि स प्रभुः सा चोत्सृष्टाभवत् सन्ध्या दिननक्तान्तरस्थिता १०||

पितरों की सृष्टि करके प्रभु ब्रह्माजी ने उस शरीर को भी छोड़ दिया जो दिन और रात्रि के वीचका काल जो संध्या है वह होगयां 

रजोमात्रात्मिकामन्यां तनुं भेजेऽथ स प्रभुः ततो मनुष्याः सम्भूता रजोमात्रासमुद्भवाः ॥११॥

इसके अनन्तर प्रभु ब्रह्माजी ने रजोगुण पूर्ण दूसरा शरीर धारण किया जिससे रजोगुणयुक्त मनुष्य उत्पन्न हुए ११

सृष्ट्वा मनुष्यान् स विभुरुत्ससर्ज तनुं ततः ज्योत्स्ना समभवत् सा च नक्तान्तेऽहर्मुखे च या १२

मनुष्यों को उत्पन्न कर ब्रह्माजी ने उस शरीर को भी छोड़ दिया और वह शरीर रात्रि के अन्त और दिन के आदि का ज्योत्स्ना काल होगया ||१२||

इत्येतास्तनवस्तस्य देवदेवस्य धीमतः ख्याता रात्र्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च वै द्विज १३

हे द्विजवर ! रात्रि, दिन, संध्या और ज्योत्स्ना ( प्रातःकाल ) ये देवादिदेव ब्रह्माजी के ही शरीर कहलाते हैं १३

ज्योत्स्ना सन्ध्या तथैवाहः सत्त्वमात्रात्मकं त्रयम् तमोमात्रात्मिका रात्रिः सा वै तस्मात् त्रियामिका १४

ज्योत्स्ना, सन्ध्या और दिन ये तीनों सतोगुणयुक्त हैं तथा रात्रि तमो- गुणी है इसीलिये ये त्रियामिका कहलाती है ॥१४॥

तस्माद्देवा दिवा रात्रावसुरास्तु वलान्विताः ज्योत्स्नागमे च मनुजाः सन्ध्यायां पितरस्तथा १५॥

इस कारण दिन में देवता और रात्रि में असुर वलवान होते हैं तथा इसी प्रकार ज्योत्स्नामें मनुष्यों और सन्ध्या में पितरों को समझना चाहिये १७५॥

भवन्ति बलिनोsधृष्या विपक्षाणां न संशयः तद्विपर्य्ययमासाद्य प्रयान्ति च विपर्य्ययम् ||१६||

अपने-अपने समय में ये बली होते हैं और निःसंदेह शत्रुत्रों से पराजित नहीं होते हैं, इससे उल्टाचलनेपर विपरीत फल होता है १६

ज्योत्स्ना रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै प्रभोः। ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपश्रितानि तु ॥१७॥

ज्योत्स्ना, रात्रि,  दिन और सन्ध्या ये चारों तीनों गुणोंसे युक्त प्रभुब्रह्माजी के शरीर हैं १७

चत्वार्येतान्यथोत्पाद्य तनुमन्यां प्रजापतिः रजस्तमोमयीं रात्रौ जगृहे क्षुत्तृडन्वितः १८

इन चारों को उत्पन्न करने के पश्चात् ब्रह्मा ने रजोगुण और तमोगुण से युक्त रात्रि में भूख और प्यास से पीड़ित दूसरा शरीर धारण किया १८

तदन्धकारे क्षुत्क्षामानसृजद्भगवानजः विरूपान् श्मश्रुलानत्तुमारब्धास्ते च तां तनम् १६

उस अन्धकारमें भगवान् अजन्मा ब्रह्माजी ने बड़ी भयानक दाढ़ी, मूँछवाली क्षुधा की उत्पत्ति की जो कि उससमय ब्रह्माजी को खाने कोउद्यत हुई १६

रक्षाम इति तेभ्योऽन्ये य ऊचुस्ते तु राक्षसाः खादाम इति ये चोचुस्ते यक्षा यक्षराद्विज ||२०||

जिन लोगों ने यह कहा कि रक्षा करो ब्रह्मा को मत खाओ वे राक्षस कहलाये और जो यह कहकर चिल्लाये कि ब्रह्मा को खाजाओ वह यक्षगण हुए २०

तान् दृष्ट्वा प्रियेणास्य केशाः शीर्य्यन्त वेधसः समारोहणहीनाश्च शिरसो ब्रह्मणस्तु ते सर्पणात् तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादयः स्मृताः २१

फिर ब्रह्माने उसको प्रिय भाव से देखा तो उनके बाल झड़ गये और फिर उनके शिरपर बाल नहीं आये पृथ्वी पर गिरते ही वे बाल सर्प होगये तथा हीन उत्पत्ति के कारण वे अहि भी कहलाते हैं २१

सर्पान् दृष्ट्वा ततः क्रोधात् क्रोधात्मानो विनिर्ममे वर्णेन कपिलेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः ॥२२॥

उन सप को देखकर ब्रह्माजीको क्रोध हुआ और उनके  क्रोध से उप्रभूत, कपिलवर्ण, विशेष मांसाहारी लोग पैदा हुए २२

ध्यायतो गां ततस्तस्य गन्धर्व्वा जज्ञिरे सुताः 'जज्ञिरे पिवतो वाचं गन्धर्व्वास्तेन ते स्मृताः २३

फिर ब्रह्मा ने वाणी का ध्यान करते हुए गन्धर्व पुत्रों को उत्पन्न किया। चूँकि इनको ब्रह्माने वाणी का पान करते हुए सृजा था इसलिये यह गन्धर्व कहलाये ||२३||

श्रष्टास्वेतासु सृष्टीसु देवयोनिषु स प्रभुः ||२४||

इस प्रकार ब्रह्माजी ने इन आठ देवयोनियों की रचना की ||२४||

ततः स्वदेहतोऽन्यानि वयांसि पशवोऽसृजत् मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसवावयोऽसृजत् गावश्चैवादराद्वब्रह्मा पार्खाभ्याञ्च विनिर्ममे २५||

इसके बाद अपने देहसे पक्षियों और पशुओंको उत्पन्न किया । उन्होंने मुख से बकरी, छाती से भेड़ तथा दोनों पावों और उदर से गाय को उत्पन्न किया २५

पद्भ्याञ्चाश्वान् समातङ्गान् सभाञ्चशकान् मृगान् उष्ट्रानश्वतरांश्चैव नानारूपाश्च जातयः २६

तथा दोनों पाँवोंसे घोड़ों, हाथियों, गधों, खरगोशों, हरिणों, ऊँटों और अश्वतरों को पैदा किया तथा नाना जाति की ||२६||

प्रोषध्यः फलमूलिन्या रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे ||२७||

औषधियों और मूलफलोंकी रचना अपने रोमों से की ||२७|| एवं पश्वोषधीः सृष्ट्वा यजच्चाध्वरे विभुः तस्मादादौ तु कल्पस्य त्रेतायुगमुखे तदा २८

इस प्रकार पशुओं और औषधियों की रचना करके ब्रह्मा ने यज्ञ की रचना की इसलिये कल्प के आदि में त्रेतायुग में यज्ञ मुख्य है ॥२८॥

गौरजो महिषो मेषः श्वाश्वतरगर्दभाः एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यांच निबोध मे॥ २६

गाय, बकरा, भैंसा, भेड़, घोड़ा,. अश्वतर और गदहा ये सव ग्रामपशुहैं श्रव जङ्गली पशुओं को सुनो २६

श्वापदं द्विखुरं हस्ती वानराः पक्षिपंचमाः यदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः ३०

श्वापद अर्थात् व्याधादि, दो खुर वाले जैसे घोड़ा वगैरह, हाथी और बन्दर ये चारों प्रकार के पाँचवें पक्षी, छठे जलचर और सातवें सर्प आदि ये जङ्गली सृष्टि है ||३०||

गायत्रीञ्च भ्यूचंचैव त्रिदृत् साम रथन्तरम् अग्निष्टोमंच यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ३१

गायत्री, ऋग्वेद, त्रिवृत्, साम, रथान्तर और यशोंमें अग्नि- ष्टोम ये ब्रह्मा के प्रथम मुख से उत्पन्न हुए ३१

यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः स्तोमं पंचदशं तथा

वृहत्साम तथोक्तञ्च दक्षिणादसृजन्मुखात् ३२

यजुर्वेद, त्रिष्टुभछन्द, स्तोत्र और पन्द्रह वृहत्साम  ब्रह्माजी के दक्षिण मुख से निकले ३२॥

सामानि जगतीच्छन्दः स्तोमं पंचदशं तथा

वैरूपमतिरात्रञ्च निर्ममे पश्चिमान्मुखात् ||३३||

सामवेद, जगतीछन्द, तथा पन्द्रह स्तोत्र, वैरूप और अति- रात्र ब्रह्माजी के पश्चिम मुख से उत्पन्न हुए ३३

एकविंशमथर्व्वाणमाप्तोय्यमाणमेव च अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ३४||

इक्कीस अथर्वण, अमा, अनुष्टुप छन्द और वैराज को ब्रह्माजी ने अपने उत्तर मुख से सृजा ३४ विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च वर्यासि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् विभुः ||३५||

विजली, वज्र, मेघ, रोहिणी, इन्द्र धनुष और पक्षियों को भगवान् ब्रह्माजी ने कल्प के आदि में सृजा ||३५||

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्व्यं देवासुरपितृन् प्रजाः ३६

ब्रह्माजी ने उच्चावच भूतों को अपने शरीर से उत्पन्न किया तथा देवता, असुर, पितर और मनुष्य इन चारों को पहिले रचा ॥३६॥

ततोऽसृजत् स भूतानि स्थावराणि चराणि च यक्षान् पिशाचान् गन्धर्व्वींस्तथैवाप्सरसांगणान् ॥३७

इसके  अनन्तर स्थावर और जङ्गम प्राणियोंको तथा यक्षों,पिशाचों, गन्धर्वों और उसी प्रकार अप्सराणों को उत्पन्न किया ||३७||

नर- किन्नर - रक्षांसि चयः पशु-मृगोरगान् अव्ययंच व्ययंचैव यदिदं स्थाणु जङ्गमम् ||३८||

तथा नर, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग, उरग, अव्यय, व्यय, स्थावर और जगम यादि की रचना की ||३८|| तेषां ये यानि कर्माणि प्राक् सृष्टेः प्रतिपेदिरे तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः || ३६ ||

इनमें जो जिसका कर्म पहिले था वही सृष्टि होने पर हुआ तथा बार- वार जन्म लेने पर भी वही हुआ ३६

हिंस्राहिंस्र मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात् तत् तस्य रोचते ॥४०॥

हिंसा और अहिंसा, मृदुत्व और क्रूरता, धर्म और अधर्म सत्य और झूठ इनका परस्पर सम्बन्ध स्थापित हुआ ||४०||

इन्द्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः नानात्वं विनियोगंच धातैव व्यदधात् स्वयम् ॥४१॥

इन्द्रियों के अर्थ भूतों में और शरीरों प्रभु ब्रह्माजी ने नाना प्रकार का संयोग स्थित किया ४१

नाम रूपंच भूतानां कृत्यानाञ्च प्रपंचनम्

वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां चकार सः || ४२ ||

 ब्रह्माजी ने आदि में ही जीवोंके नाम रूप तथा कर्मों के प्रपञ्च और देवताओंके वेदशब्द आदि की रचना की ४२

ऋषीणां नामधेयानि याथ देवेषु सृष्टयः

शर्व्वय्र्यन्ते प्रसूतानामन्येषाञ्च ददाति सः ४३

जो नाम कि ऋषियों के पहिले थे तथा जो सृष्टि देवताओं की थी उसीके प्रकार रात्रि के अन्त होने पर ब्रह्माजी फिर वनांते हैं ||४३||

यथर्त्तादृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्य्यये दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ४४

जिस प्रकार रजःस्वला स्त्री ऋतुकाल में जैसा रूप देखती है वैसा ही बालक उसके उत्पन्न होता है उसी प्रकार युगादि में जिसका जो भाव था उसको ||४४||

एवंविधाः सृष्टयस्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः सर्व्वय्र्यन्ते प्रयुद्धस्य कल्पे कल्पे भवन्ति वै ४५

उसी प्रकार श्रव्यक्तजन्म ब्रह्माजी ने रात्रि व्यतीत होने पर जाग कर प्रत्येक कल्प में रचा ४५

इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में सृष्टि- प्रकरण नाम ४८वाँ अध्याय समाप्त