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मार्कण्डेय उवाच

यत्तुकिम्पुरुषंवर्षंतत्प्रवक्ष्याम्यहंद्विज। यत्रायुदशसाहस्रंपुरुषाणांवपुष्मताम्॥१

मार्कण्डेयजी वोले-

हे कौटुकिजी ! किम्पुरुप नामक वर्ष का वर्णन श्रव मैं करता हूँ जहाँकि पुरुषोंकी श्रायु दस हज़ारवर्ष है ॥ १ ॥

अनामयाशोकाश्चनरायंत्रतथास्त्रियः। पुक्षःपण्डयतत्रोक्तःसुमहान्नन्दनोपमः || २

 वहाँ पुरुष स्त्रियां शोक रहित औरप्रसन्न चित्त हैं ।  उस वर्ष में प्लक्ष नामक एकविशाल वन है जो नन्दनवन के समान है ॥ २ ॥

तस्यतेवैफलरसंपिवन्तःपुरुषाःसदा। स्थिरयौवननिष्पन्नाःस्त्रियोत्पलगन्धिकाः॥३

उसी बनके फलों का रस पीते हुए वहाँ के पुरुष सदा युवा वने रहते हैं तथा इसी कारण से वहाँ

की स्त्रियों में कमल की सुगन्धि श्राती है ॥३॥

अतःपरंकिम्पुरुषाद्धरिवर्षंप्रचक्ष्यते। महारजतसङ्काशाजायन्तेतत्रमानवाः || ४

पुरुष के बाद हरिवर्ष का वृत्तान्त कहता हूँ जहाँ पुरुष चांदी के समान कान्तिमान हैं ॥ ४ ॥

देवलोकच्युताःसर्व्वेदेवरूपाश्चसर्व्वशः। हरिवर्षेनराःसर्व्वेपिबन्तीक्षुरसंशुभम्॥५॥

देवता-के लोकों से गिरकर लोग देवरूप होकर उस वर्ष मैं जाते हैं हरिवर्ष में सब लोग ईख का रस पीते हैं||५||

नजरावाघतेतत्रनजीर्य्यन्तेचकर्हिचित्। तावन्तमेवतेकालंजीवन्त्यथनिरामयाः || ६ ||

वहाँ लोगोंको वृद्धावस्था नहीं सताती है और न ने जीर्ण होते हैं । जब तक वे जीवित रहते हैं

तब तक रोग रहित रहते हैं ||६||

मेरुवर्षंमयाप्रोक्तंमध्यमंयदिलावृतम्। नतत्रसूर्य्यस्तपतिनतेजीर्य्यन्तिमानवाः॥७

अब मेरु वर्ष केइलावर्त खराड का वर्णन करते हैं जहां न तो सूर्य तपता है और न मनुष्य वृद्ध होते हैं ॥ ७ ॥

लभन्तेनात्मलाभञ्चरश्मयश्चन्द्र-सूर्य्ययोः। नक्षत्राणांग्रहाणाञ्चमेरोस्तत्रपराद्युतिः॥८

चन्द्रमाऔर सूर्य की किरण वहां लोग अपने लाभ के लिये लेते हैं तथा नक्षत्रों और ग्रहों का प्रकाश मेरु पर्वतके परे होता है ॥ ८ ॥

पद्मप्रभापद्मगन्धाजम्बूफलरसाशिनः। पद्मपत्रायताक्षास्तुजायन्तेतत्रमानवाः॥६॥

वहाँ के मनुष्यों को कान्तिकमल के समान है तथा उनमें से कमल की सी सुगन्धि आती है । वे लोग जम्बू फल के रस की ! पीते हैं और उनके नेत्र कमल के समान हैं ॥ ६ ॥

वर्षाणान्तुसहस्राणितत्राप्यायुत्रयोदश। सरावाकारसंस्तारोमेरुमध्येइलावृते॥१०॥

वहां लोगों की आयु तेरह हज़ार वर्ष की होती है, इलावर्त के मध्य में जो मेरु पर्वत है उसका श्राकारढकने का सा है ॥ १० ॥

मेरुस्तत्रमहाशैलस्तदाख्यातमिलादृतम्। रम्यकंवर्षमस्माच्चकथयिष्येनिबोधतस्॥११॥

वहांपर मेरु नामका विशाल पर्वत है जिसको इलावृत भी कहते हैं ।  अव मैंरम्यक वर्ष को कहता हूँ उसको सुनो ॥ ११॥

वृक्षस्तत्रापिचोत्तुङ्गोन्यग्रोधोहरितच्छदः।

तस्यापितेफलरसंपिबन्तोवर्त्तयन्तिवै॥१२॥

 वहां पर हरे पत्ते वाला बड़ा ऊँचा एक बरगद का पेड़ है जिसके कि फलों के रस को पीकर वे लोगजीवित रहते हैं ||१२||

वर्षायुतायुषस्तत्रनरास्ततुफलभोगिनः। रतिप्रधानविमलाजरादौर्गन्ध्यवज्जिताः॥१३

वहां पर मनुष्य दस हज़ारवर्ष की आयु वाले होते हैं । वे स्वच्छ तथा रति मेंकुशल होते हैं ।

 उन लोगों को बुढ़ापा और दुर्गंधकभी नहीं श्राती ॥ १३ ॥

तस्मादथोत्तरंवर्षंनाम्नाख्यातंहिरण्मयम्। हिरण्वतीनदीतत्रप्रभूतकमलोज्ज्वला॥१४

उसके उत्तर में हिरण्मयनाम एक वर्ष है  जहां पर कि स्वच्छ हिररावतीनदीकमलों से युक्त विद्यमान है ॥ १४ ॥

महाबलाःसतेजस्काजायन्तेतत्रमानवाः। यक्षरूपामहासत्त्वाधनिनःप्रियदर्शनाः || १५ ||

यहांपर मनुष्यबड़े वलवान्, तेजस्वी, यक्ष के समान, पराक्रमी,धनी और प्रीतियुक्त होते हैं ॥१५॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंभुवनकोषनाम६०वांअध्यायसमाप्त | 61

कौटुकिरुवाच

कथितंभवतासम्यक्यत्पृष्टोऽसिमहामुने। भूसमुद्रादिसंस्थानंप्रमाणानितथाग्रहाः॥१॥

कौटुकिजी बोले-

हे मार्कण्डेयजी ! जो कुछ मैंने पूछा वह आप ने पृथ्वी, समुद्र आदि की स्थिति तथा ग्रह श्रादि

सबका वर्णन किया ॥ १ ॥

तेषाञ्चैवप्रमाणंचनक्षत्राणाञ्चसंस्थितिः। भूरादंयत्रयालोकाःपातालान्यखिलान्यपि॥२

ग्रहों के प्रमाण, नक्षत्रोंकी स्थिति,  भू आदिक तीनों लोक और सव पाताल ॥२॥

स्वायम्भुवंतथाख्यातंमुनेमन्वन्तरंमम। तदन्तराण्यहंश्रोतुमिच्छेमन्वन्तराणिवै। मन्वन्तराधिपान्देवानृषींस्तत्तनयान्नृपान्॥३

और स्वायंभुव मन्वन्तर का वृत्तान्त भी आपने मुझसे कहा । इसके वाद व मैं मन्वंतरों

तथा मन्वन्तरों के राजा, देवता, राजर्षि और उन के पुत्रों का वर्णन सुनने की इच्छा करता हूँ ॥ ३ ॥

मार्कण्डेयउवाच

मन्वन्तरंमयाख्यातंतवस्वायम्भुवञ्चयत्।

स्वारोचिपाख्यमन्यत् तु शृणु तस्मादनन्तरम् ॥ ४ ॥

मार्कण्डेयजीबोले- मैंनेआपसेस्वायंभुवमन्वन्तरकावर्णन किया  अवदूसरेमन्वन्तरस्वारोचिषकोमुझसेसुनो॥४ कश्चिद्विजातिगवरःपुरेऽभूदरुणास्पदे। वरुणायास्तटे farm रूपेणात्यश्विनावपि॥५॥

वरुणानदीकेतटपरस्थितश्ररुणास्पदनगरमें अश्विनीकुमारोंकेसमानरूपवान्कोईब्राह्मणरहताथा॥५॥

मृदुस्वभावः सदृट्टतोवेदवेदाङ्गपारगः। सदातिथिप्रियोरात्रावागतानांसमाश्रयः || ६ ||

वह ग्राह्मण कोमल स्वभाव वालासच्चरित्र, वेदवेदाङ्ग विशारद , सदैव श्रतिथियोंक कोप्रियतथारात्रिमेंआनेवालोंकोआश्रयदेनेवाला था ॥ ६ ॥

तस्यबुद्धिरियंत्वासीदहंपश्येवसुन्धराम्। अतिरम्यवनोद्यानांनानानगरशोभिताम्॥७॥

एक दिन उस ब्राह्मणको यह बुद्धि उपजी कि वह पृथ्वी को अत्यन्त रमणीक चन, उद्यान और शोभायमान नगरों सहित देखे ॥ ७ ॥

अथागतोऽतिथिःकश्चित्कदाचिततस्यवेश्मनि नानौषधिप्रभावज्ञोमन्त्रविद्याविशारदः॥८

इसी समय उसके घर पर एक अतिथि श्राया जो नाना प्रकार की श्रौषधियों के प्रभाव तथा मन्त्र

विद्या को खूब जानता था ॥ ८ ॥

अभ्यर्थितस्तुतेनासौश्रद्धापूतेनचेतसा। तस्याचख्यौसदेशांश्चरम्याणिनगराणिच॥६॥

श्रद्धापूर्वक पवित्रचित्त से अतिथि की अभ्यर्थना करके उसने उनसे पूछा कि वह कौनसे रमणीक नगर या देशसे धाये॥६॥

वनानिनद्यःशैलांश्चपुण्यान्यायतनानिच। सततोविस्मयाविष्टःप्राहतंद्विजसत्तमम्॥१०॥

वन, नदी, पर्वत और बहुत से पुण्य तीर्थों को उसने बताया जिस पर आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण ने उससे कहा १०

श्रनेकदेशदर्शित्वेनातिश्रमसमन्वितः त्वंनातिवृद्धोवयसानातिवृत्तश्चयौवनात्। कथमल्पेनकालेनपृथिवीमटसिद्विज॥११

हे विप्रदेव ! अनेकदेशों को देखने पर आपको थकावट नहीं हुई:मालुम होती है ।  आप न वहुत वृद्धहै और न युवाहैं, इतने अल्प काल में आपने किस प्रकार पृथ्वीका भ्रमण कर लिया ||११||

ब्राह्मणउवाच

मन्त्रोपधिप्रभावेणविमाप्रतिहतागतिः। योजनानांसहस्रहिदिनार्थेनव्रजाम्यहम् ||१२||

ब्राह्मण बोला-

हे विप्र ! मन्त्रों और औषधियों के प्रभाव से मेरी गति अनियन्त्रित है। मैं आधे दिन में एक

हज़ार योजन चलता हूँ ॥ १२॥

 मार्कण्डेयउवाच ततःसविमस्तंभूयःप्रत्युवाचेदमादरात्। श्रद्धधानोवचस्तस्यब्राह्मणस्यविपश्चितः॥१३॥

मार्कण्डेयजी बोले--

उस महात्मा तिथि की बातों में श्रद्धा रखते हुए उस ब्राह्मणने फिर मानपूर्वक उससे कहा ||१३||

ममप्रसादंभगवन्कुरुमन्त्रप्रभावजम्। द्रष्टुमेतांमममहीमतीवेच्छाप्रवर्त्तते॥१४॥

हे भगवन् ! मेरे ऊपर दया करके उस मन्त्र को मुझसे कहिये, इस पृथ्वी को देखने की मेरी घड़ीइच्छा है ॥ १४ ॥

प्रादात्सब्राह्मणश्चास्मैपादलेपमुदारधीः। अभिमन्त्रयामासदिशंतेनाख्याताञ्चयत्नतः॥१५)

तब उस उदार अतिथि ब्राह्मण ने उसको पादलेप दे दिया तथा उसकी बताई हुई दिशाओं को अभिमन्त्रित करके वह चला गया ||१५

तेनानुलिप्तपादोऽथसद्विजोद्विजसत्तम। हिमवन्तमगाद्वद्रष्टुंनानाप्रस्रवणान्वितम्॥१६॥

हे द्विजसत्तम ! उस लेप को पाँव में लगाकर वह ब्राह्मण अनेक भरनों से युक्त हिमालय पर्वत कोदेखने के लिये गया ||१६||

सहस्रयोजनानांहिदिनार्द्धेनव्रजामियत्। श्रयास्यामीतिसञ्चिन्त्यतदर्द्धनापरेणहि || १७||

उसने सोचा कि यादिन में एक हजार योजन जाऊँगा तथा दिन केदूसरे श्राधे भाग में वहां से लौट आऊँगा ॥ १७ ॥

सम्प्राप्तोहिमवत्पृष्ठनातिश्रान्ततनुर्द्विज। विचचारततस्तत्रतुहिमाचलभूतले॥१८॥

 वह ब्राह्मण विना भ्रम के ही हिमालय की पीठ पर पहुंच कर वहां विचरने लगा ||१८|

पादाक्रान्तेनतस्याथतुहिनेनचिलीयता। प्रक्षालितःपादलेप: परमौषधिसम्भवः॥१६॥

वह परमोपधि पादप चलने से तथा बर्फ से धुलकर विलीनहोगई ॥ १६ ॥

तोजढ़गतिःसोऽथइतश्चेतश्चपर्यटन्। ददर्शातिमनोज्ञानिसानूनिहिमभूभृतः॥२०॥

 इसके बाद वह जड़गति होकर इधर उधर घूमने लगा तो उसने हिमालय पर्वत के एक अत्यन्तं मनोरम स्थान को देखा ॥ २० ॥

सिद्धगन्धर्च्चजुष्टानिकिन्नराभिरतानिच। क्रीड़ाविहाररम्याणिदेवादीनामितस्ततः॥२१॥

वहां पर सिद्ध, गन्धर्व और किन्नर विहार कर रहे थे तथा देवताओं की क्रीड़ाके रमणीक स्थान इधरउधर बने हुए थे ||२१||

दिव्याप्सरोगणशतैराकीर्णान्यवलोकयन्। नातृप्यतद्विजश्रेष्ठःप्रोद्भूतपुलकोमुने॥२२॥

सैकड़ों दिव्य अप्सरात्रों सेघिरे हुए उस स्थान को देखकर ब्राह्मण की तृप्ति न हुई, वह पुलकायमान हो गया ॥ २२ ॥

क्वचित्प्रस्रवरणाद्भ्रष्टजलपातमनोरमम् 1 प्रनृत्यच्छिखिकेकाभिरन्यतश्चनिनादितम् ||२३||

कहींभरनों से गिरते हुए जल का मनोहर दृश्य था,कहींमोरनाचरहेथे तथावहस्थानसुन्दरपक्षियों की ध्वनि से गुञ्ज रहा था ॥ २३ ॥

दात्यूहकोयष्टिकाद्यैःकचिच्चातिमनोहरैः। पुंस्कोकिलकलालापैःश्रुतिहारिभिरन्वितम् ||२४||

कोयलआदि के प्रति मनोहर श्रालापों से वह स्थानअत्यन्त रम्य हो रहा था ॥ २४ ॥

मकुलतरुगन्धेनवासितानिलवीजितम्। मुदायुक्तःसददृशेहिमवन्तंमहागिरिम् ||२५.

प्रफुल्लित वृक्षों की सुगन्ध से भरी हुई हवा से युक्त उस स्थानको हिमालय पर्वत पर उस प्रसन्न चित्त ब्राह्मणने देखा||२५||

दृष्ट्राचैतंद्विजसुतोहिमवन्तंमहाचलम्। वोद्रक्ष्यामीतिसञ्चिन्त्यमतिंचक्रेगृहंप्रति॥२६

महापर्वत हिमवान् को देखकर ब्राह्मणने सोचाकि कल फिर आकर देखूँगा, अव घर को चलूं||२६||

विभ्रष्टपादलेपोऽथचिरेणजड़ितक्रमः। चिन्तयामासकिमिदंमयाज्ञानादनुष्ठितम्॥२७॥

परन्तु पादलेप के धुल जाने से वह जड़गति होगया और चल न सका । फिर उसने सोचा कि

अनजान में मैंने यह क्या किया ? ॥ २७ ॥

यदिप्रलेपोनष्टोमेविलीनोहिमवारिणा। शैलोऽतिदुर्गमश्चायंदूरञ्चाहमिहागतः॥२८॥

वर्फ से मेरा पादलेप धुलगया । यह पर्वत अत्यन्त दुर्गमहै और मैं अति दूर यहां श्रायगा हूँ ॥ २८ ॥

प्रयास्यामिक्रियाहानिमग्निशुश्रूषणादिकम्। कथमत्रकरिष्यामिसङ्कटंमहदागतम् ||२६||

अग्नि पूजा आदि नित्यक्रिया भी मैं व कैसे करूँगा ?यह तो महान् सङ्कट आ गया ॥ २६ ॥

इदंरम्यमिदंरम्यमित्यस्मिन्वरपर्व्वते। सक्तदृष्टिरहंतृप्तिंनयास्येऽब्दशतैरपि॥३०

इस रमणीकपर्वत पर यह रमणीक है वह रमणीक है यह देखतेहुए मुझे सैकड़ों वर्षों में भी तृप्ति न होगी ॥ ३० ॥

किन्नराणांकलालापाःसमन्ताच्छ्रोत्रहारिणः। प्रफुल्लुतरुगन्धांश्चघ्राणमत्यन्तमृच्छति॥३१॥

चारों ओर किन्नरों के सुन्दर गायनों से मेरे कानश्रासक्त हो रहे हैं तथा फूले हुए वृक्षों की सुगन्धिसे मेरी नाक को महान सुख होरहा है ॥३१॥

सुखस्पर्शस्तथावायुःफलानिरसवन्तिच। हरन्तिप्रसभंचेतोमनोज्ञानिसरांसिच ||३२||

यहाँकी वायु के सुखस्पर्श से, रसदार फलों के रस सेऔर सरोवरों से मेरा चित्त लुभायमान होरहा है३२ ॥

एवंगतेतुपश्येयंयदिकचित्तपोनिधिम्। सममोपदिशेन्मार्गगमनायगृहंप्रति ||३३||

इस अवस्था में यदि कोई तपोनिधि मुझेघर जाने के लिये मार्ग का दिग्दर्शन करे तोउत्तम हो ॥ ३३ ॥

मार्कण्डेयउवाच

सएवंचिन्तयन्विप्रोबभ्रामचहिमाचले | भ्रष्टपादौषधिवलोवैक्लवंपरमंगतः॥३४॥

मार्कण्डेयजी बोले-

पाँव की औपाधिके धुलजाने से परम विकलताको प्राप्त वह ब्राह्मण यह सोचता हुआ हिमालय

पर घूमता रहा ॥ ३४ ॥

तंददर्शभ्रमन्तञ्चमुनिश्रेष्टंवरूथिनी। वराप्सरामहाभागामौलेयारूपशालिनी ||३५||

इतने ही में उस घूमते हुएमुनिश्रेष्ठ को सुन्दरी अप्सरा वरूथिनी नामकमहाभागा ने देखा ||३५||

तस्मिन्दृष्टेतंतःसाभद्विजवर्थेवरूथिनी।

मदनाकृष्टहृदया सानुरागा हि तत्क्षणात् || ३६ ||

वरूथिनीउसब्राह्मणकोदेखकर  कामदेव से श्राकृष्ट हो तत्क्षण श्रासक्त होगई ||३६||

चिन्तयामासकोन्वेपरमणीयतमाकृतिः। सफलंमेभवेज्जन्मयदिमांनावमन्यते ||३७|||

 वह मनमें सोचने लगी कि इतना सुन्दर यह कौन है  यदि यह मुझे मान ले तो मेरा जीवनसफल हो जावे ॥ ३७ ॥

अहोऽस्यरूपमाधुर्य्यमहोऽस्यललितागतिः। होगम्भीरतादृष्टेःकुतोऽस्यसदृशोभुवि ||३८||

श्रहा ! इसका रूप-माधुर्य और इसकी सलौनी चाल, इसकी गंभीर चितवन कारण इसके समान संसार में कौन रूपवान है !३८ ॥

दृष्टादेवास्तथादैत्या: सिद्धगन्धर्व्वपन्नगाः। कथमेकोऽपिनास्त्यस्यतुल्यरूपोमहात्मनः॥३६

मैंने बहुत से देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व और नागों को देखा है परन्तु इस महात्मा के

समान कोई रूपवान् नहीं है ॥ ३६ ॥

यथाहमस्मिन्मय्येषसानुरागस्तथायदि। भवेदत्रमयाकार्य्यस्तत्कृतःपुण्यसंचयः ||४०||

  यदि जिस प्रकार मेरी प्रीति इसमें होगईहै उसी प्रकार इसकी प्रीति मुझमें होजाय तो मेरा कार्य सिद्ध होजाय ॥ ४०

यद्येषमयिसुस्निग्धांदृष्टिमद्यनिपातयेत्। कृतपुण्यानमत्तोऽन्यात्रैलोक्येवनिताततः॥४१॥

यदि यह मेरी ओर प्रेममयी दृष्टि से देख ले तो तीनों लोक में मेरे समान पुण्यवती स्त्री दूसरीनहीं है ॥ ४१ ॥

मार्कण्डेयउवाच

एवंसञ्चिन्तयन्तीसादिव्ययोषित्स्मरातुरा।

आत्मानंदर्शयामासकमनीयतराकृतिम्॥४२

मार्कण्डेयजी बोले-

इस प्रकार विचार करती हुई उस कामातुर अप्सरानेअपनेआपकोअतिसुन्दररूपमेंदिखाया ॥ ४२ ॥

तान्तुदृष्ट्वाद्विजसुतश्चारुरूपांवरूथिनीम्। सोपचारंसमागम्यवाक्यमेतदुवाचह॥४३

वह ब्राह्मण भी उस रूपवती वरू थिनी को देखकर उससे उपचार पूर्वक यह वचन बोला ||४३||

कात्वंकमलगर्भाकस्यकिंवानुतिष्ठसि। ब्राह्मणोऽहमिहायातोनगरादरुणास्पदात् ||४४||

 हे कमल-गर्भ के समान कान्तिवाली ! तुम कौन हो श्रीर कहाँ रहती हो ? मैं तो

वरुणा:स्पद्नगरसेश्रायाहुआब्राह्मणहूँ॥४४॥

पादलेपsत्रमेध्वस्तोविलीनोहिमवारिणा। यस्यानुभावादत्राहमागतोमदिरेक्षणे॥४५॥ |

मेरापादलेप वर्फ के जल से घुलकर विलीन होगया हैजिस कारण से कि हे मदिरा के से नेत्र वाली ! मैंयहाँश्रापहुँचा॥४५॥

वरूथिन्युवाच

मौलेयाहंमहाभागानाम्नाख्यातावरूथिनी। विचरामिसदैवात्ररमणीयेमहाचले ||४६ ||

वरूथिनी वोली---

अप्सरा ने कहा कि मैं वरुथिनी नामक अनमोल ओर अति भाग्यवान अप्सरा हूँ और सदा इस रमणीक पर्वत पर विचरती रहती है।

साहंत्वदर्शनाद्विपकामवक्तव्यतांगता। प्रशाधियन्मयाकार्य्यंत्वदधीनास्मिसाम्प्रतम्४७||

 हे विप्र ! तुम्हारे दर्शन से मैं कामासक हो रही हूँ । जो मुझको आशा हो सो करूँ, इस समय मैं

तुम्हारे श्राधीन हूँ ॥४७॥

ब्राह्मणउवाच

येनोपायेनगच्छेषंनिजगेहंशुचिस्मिते। तन्ममाचक्ष्वकल्याणिहानिनेऽखिलकर्म्मणाम्४८

ब्राह्मण बोला-

हे सुन्दरी ! जिस उपाय से मैं अपने घर पहुँच सकूं उसको मुझसे कहो, क्योंकि विना घर पहुंचे

मेरी समस्त क्रियाओं की हानि हो रही है ॥ ४८ ॥

नित्यनैमित्तिकानान्तुमहाहानिर्द्विजन्मनः। भवत्यतस्त्वंहेभद्रेमामुद्धरहिमालयात् ||४६

नित्य और नैमित्तिक क्रियाओं का उल्लंघन होना ब्राह्मण के लिये बड़ी हानि है इसलिये हे भद्रे ! तू मुझे हिमालय से उद्धारकर || ४६||

प्रशस्यतेनप्रवासोब्राह्मणानांकदाचन। अपरार्द्धनमेभीदेशदर्शनकौतुकम् ||५०॥

हे भीरु ! ब्राह्मणंको प्रवास में रहना उचित नहीं और न उसको कुतूहलवशं देशों को देखते हुए घू॥ ५० ॥

सतोगृहेद्विजाउयस्यनिष्पत्तिःसर्व्वकर्म्मणाम्।

नित्यनैमित्तिकानाञ्च हानिरेवं प्रवासिनः ॥ ५१

उत्तम. ब्राह्मणकीसबक्रियाओंकीसिद्धि घरपरहीहोतीहैतथाप्रदेशमेंरहनेसेइसी प्रकार नित्य और नैमित्तिक क्रियायें छूट जाती हैं॥ ५९ ॥

सा त्वं किं बहुनोक्तेन तथा कुरु यशस्विनि । यथानास्तंगतेसूर्येपश्यामिनिजमालयम् ||५२ |

  हे यशस्विनी ! अधिक कहने से क्या लाभ हैं ऐसा करो जिससे सूर्यास्त के पहिले मैं अपनेघरपहुँचजाऊँ॥५२॥

वरूथिन्युवाच

मैवंब्रूहिमहाभागमाभूत्सदिवसोमम। मांपरित्यज्ययत्रत्वंनिजगेहमुपैष्यसि ||५३ ||

वरूथिनी बोली--

हे महाभाग ! ऐसा मत कहो, वह दिन कभी न हो जब कि तुम मुझे छोड़ कर अपने घरजाओ ||५३|| अहोरम्यतरःस्वर्गोनयतोद्विजनन्दन। तोवयंपरित्यज्यतिष्ठामोऽत्रसुरालयम् ||५४ ||

हे ब्राह्मण ! इससे अधिक रमणीकस्वर्ग भी नहीं है, इसी लिये हम स्वर्ग को छोड़करयहाँ रहती हैं ||५४||

सत्वंसहमयाकान्तकान्तेऽत्रतुहिनाचले। रममाणोनमत्त्र्त्यानांबान्धवानांस्मरिष्यसि || ५५

हे कान्त ! तुम एकान्त में इस पर्वत पर मेरे साथ रमण करो। रमण करते हुए तुम मनुष्यलोक के अपने भाई बन्धुओं को भूल जाओगे||५५||

स्वजोवस्त्राण्यलङ्कारान्भक्ष्यभोज्यानुलेपनम् ! दास्याम्यत्रतथाहंतेस्मरेणवशगाहृता॥५६॥

 मेरे हृदय को कामदेव ने वश में करलिया है मैं तुमको माला, वस्त्र, अलंकार, भोजन, चन्दनआदि सब कुछ दूंगी ||५६||

वीणावेणुस्वनंगीतंकिन्नराणांमनोरमम् अङ्गाहादकरोवायुरुष्णान्नमुदकंशुचि॥५७॥

 यहाँ किन्नरोंके मनोहर गीत और वीणा तथा वेणु के शब्द सुनाई देते हैं तथा वायु बड़ी सुखकर है। यहां का अन्न ताज़ातथा जल पवित्र है ॥ ५७ ॥

मनोऽभिलषिताशय्यासुगन्धमनुलेपनम् इहासतोमहाभागगृहेकिंतेनिजेऽधिकम् ||५८||

यहां पर मन वांछित शय्या तथा सुगन्धियुक्त चन्दन हैं। हे महाभाग  इससे अधिक तुम्हारे घर में क्या है ? ॥ ५८ ॥

इहासतोनैवजराकदाचित्तेभविष्यति। त्रिदशानामियंभूमिर्यैवनोपचयप्रदा॥५६

यहाँरहते हुए तुम्हें बुढ़ापा कभी न होगा ।  यह भूमिदेवताओं की बनाई हुई है, कारण यहाँ सदाचौबन रहता है ||५६||

इत्युक्त्वासानुरागासासहसाकमलेक्षणा | श्रालिलिङ्गप्रसीदेतिवदन्तीकलमुन्मनाः॥६०

 यह कहकर अनुराग संहित हो वह कमलनयनी 'मुझपर प्रसन्न हो' यह कहती हुई ब्राह्मण से लिपटने को उद्यत हुई ॥६०॥

ब्राह्मणउवाच

मामांस्माक्षीव्रजान्यत्रदुष्टेयःसदृशस्तव। मयान्यथायाचितात्वमन्यथैवाप्युपैषिमाम्॥६१

ब्राह्मण बोला---

हे दुष्टे ! मुझको स्पर्श न कर और अन्यत्र जा जहां कि तेरे ही समान तुझको मिल जाय । मैंने

वृथा ही तुझसे पूछा, तू मुझसे वृथा ही मिलनाचाहती है ॥ ६१ ॥

सायंप्रातर्हृतंहव्यंलोकान्यच्छतिशाश्वतान्। त्रैलोक्यमेतदखिलंमूढ़ेहव्येप्रतिष्ठितम्। लघुपायंसमाचक्ष्वयेनयामिस्वमालयम् ||६२||

मनुष्य सायं और प्रातः दोनों दफा हवन करके स्वर्ग को जाते हैं । हे मूढ़े ! यह तीनों लोक होममें ही स्थित हैं । ऐसा सरल उपाय मुझे यता जिससे मैं शीघ्र अपने घर जाऊँ ॥ ६२ ॥ वरूथिन्युवाच

किंतेनाहंमियाविप्ररमणीयोनकिंगिरिः। गन्धर्व्वान्किन्नरादींश्चत्यक्त्वाभीष्टोहिकस्तव६३॥

वरूथिनी बोली--

हे ब्राह्मण ! क्या मैं तुम्हारी प्रिया नहीं हूँ और क्या यह पर्वत रमणीक नहीं है ? गन्धवों और

किन्नरों को छोड़कर तुमको क्या अभीष्ट है ? ॥६३॥

निजमालयमप्यस्माद्भवान्यास्यत्यसंशयम्। स्वल्पकालंमयासार्द्धंमुच्क्ष्वभोगान्सुदुर्लभान्६४

आप निस्सन्देह अपने घर को जायेंगे परन्तु थोड़े ही समय के लिये मेरे साथ दुर्लभ भोगोंको भोगों ॥६४

ब्राह्मणउवाच

अभीष्टागार्हपत्याद्याःसततंमेोनयः।

स्यं समानिशरणं देवी विस्तरणी मिया ||६५||

ब्राह्मणबोला-

गार्हपत्यआदितीनोंशाश्वतश्रग्नियांहीमुझ कोअभीष्टहैं, अग्निकी शरणही सुरुको रमणीक हैऔर देवीवाणी मेरीप्रियाहै॥६५॥ वरूथिन्युवाच

अष्टावात्मगुणायेहितेपामादौदयाद्विज। तांकरोषिकथंनत्वंमयिसद्धर्म्मपालक || ६६

वरूथिनी बोली–

हे द्विज ! श्रात्मा के आठ गुण हैं उनमें दया .मुख्य है । है धर्मपालक ! इसलिये तुम मुझपर दयाक्यों नहीं करते? ॥६६॥

त्वद्विमुक्तानजीवामितथाप्रीतिमतीत्वयि। नैतद्वदाम्यहंमिथ्याप्रसीदकुलनन्दन॥६७॥

 हे कुलनन्दन ! तुम मुझपर्‍ प्रसन्न हो जाओ, मेरी तुम में प्रीति है । तुम्हारे छोड़ने पर मैं जीवित न रहूँगी, यह मैं मिथ्यानहीं कहती हूँ ॥ ६७ ॥ ब्राह्मणउवाच

यदिप्रीतिमतीसत्यंनोपचाराद्ब्रवीपिमाम्।

तदुपायंसमाचक्ष्वयेनयामिस्वमालयम् ||६८ |||

ब्राह्मण बोला-

यदि तेरी प्रीति सच्ची है और केवल उप- चार मात्र नहीं है तो ऐसा उपाय बतला जिससे

मैं अपने घर पहुँच जाऊँ ॥ ६८ ॥

वरूथिन्युवाच

निजमालयमप्यस्माद्भवानयास्यत्यसंशयम्। स्वल्पकालंमयासार्द्धंभुङ्क्ष्वभोगान्सुदुर्लभान६६

वरूथिनी बोली-

श्राप निस्सन्देह अपने घर को पहुँच जायेंगे, परन्तु थोड़े ही समय के लिये मेरे साथ अलभ्यभोगों को भोगिये ॥ ६६ ॥

ब्राह्मणउवाच नभोगार्थायविमारणांशस्यतेहिवरूथिन। इहक्लेशायविमारणांचेष्टाप्रेत्याफलप्रदा॥७०॥

ब्राह्मण बोला-

हे वरूथिनि ! शास्त्रों में ब्राह्मणों के लिये भोग नहीं लिखा है । ब्राह्मणों का जीवन इस संसार में

श्रवश्य दुखदाईहै परन्तु परलोकमें वह फलप्रद है |७० वरूथिन्युवाच

सन्त्राणंम्रियमाणायाममकृत्वापरत्रते। पुण्यस्यैवफलंभाविभोगाचान्यत्रजन्मनि॥७१॥

वरूथिनी बोली-

हे ब्राह्मण ! मेरे साथ भोग करके मुझ मृत-  प्राय की रक्षा करो, इस से तुम्हें सब पुण्य का फल होगा ॥ ७१ ॥ एवञ्चद्वयमप्यत्रतवोपचयकारणम्। प्रत्याख्यानादहंमृत्युंत्वञ्चपापमवाप्स्यसि॥७२॥

यहाँ पर तुम्हें दो लाभ हैं, परन्तु इसके विपरीत करने से मेरी मृत्यु होगी और तुमको पाप लगेगा ॥ ७२ ॥ ब्राह्मणउवाच

परस्त्रियंनाभिलपेदित्यूचुर्गुरवोमम। तेनत्वांनाभिवाञ्छामिकामंविलपशुध्यवा।।७३।।

ब्राह्मण बोला-

मेरे गुरुने कहा था कि अन्य स्त्री की अभिलाषा न करना इस कारण मैं तेरी इच्छा पूर्ण नहीं

सकता तू विलाप कर अथवा न कर ||७३|| मार्कण्डेयउवाच

इत्युक्त्वासमहाभागःस्पृष्ट्वापःमयतःशुचिः। माहेदंप्रणिपत्यानिगार्हपत्यमुना ||७४

मार्कण्डेयजी बोले-

यह कहकर वह भाग्यवान् ब्राह्मण जल को स्पर्श कर पवित्र हो गार्हपत्य भगवान् श्रग्नि केप्रति यह बोला ॥ ७४ ॥ भगवन्गार्हपत्याग्नेयोनिस्त्वंसर्व्वकर्म्मणाम्। स्वतआहवनीयोऽग्निदक्षिणाग्मिथनान्यतः॥७५॥

  हे भगवन् ! गृहकी देवता अनि ! आप सब कर्मों के कारण हैं। आप में हवन करने से सब अशियाँ तृप्त हो जाती हैं ॥७५॥

युष्मदाप्यायनादेवादृष्टिशस्यादिहेतवः। भवन्तिशस्यादखिलंजगद्वयतिनान्यतः॥७६॥

श्राप के तृप्त होने से ही सब देवता वर्षा करते हैं जिस से पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न होता है और अन्न से ही सम्पूर्ण जगत् के प्राणियों का जीवन है ॥ ७६ ॥

एवंत्वत्तोभवत्येतद्वयेनसत्येनवैजगत्। तथाहमद्यस्वंगेहंपश्येयंसतिभास्करे॥७७॥

अगर आप ऐसे हैं तो इसी सत्य से मैं सूर्यास्त से पहिले घर पहुंच जाऊ ॥ ७७ ॥ थाचैवैदिकंकर्म्मस्वकालेनोज्झितंमया। नसत्येनपश्येयंगृहस्थोऽद्यदिवाकरम् | ७८

यदि मैंने उनकेसमय पर वैदिक कर्मों को न छोड़ा हो तो उसी सत्य से मैं आज घर पहुँच कर सूर्य को देखूं ॥७८॥ पथाचनपरद्रव्येपरदारेचमेमतिः। कदाचित्साभिलाषाभूत्तथैतत्सिद्धिमेतुमे॥७६

यदि मेरी अभिलापा दूसरे के धन और स्त्री में कभी नहीं हुई हो तो उस सत्य से मेरा प्रणसिद्ध हो ॥ ७६ ॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंस्वारोचिपमन्वंतरमेंब्राह्मणवाक्यनाम६९वाँअध्यायसमाप्त।