मार्कण्डेय महा पुराण
85
ऋषिरुवाच
पुराशुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यांशचीपतेः। त्रैलोक्यंयज्ञभागाथहृतामदबलाश्रयात्॥१
ऋषि बोले-
पूर्व काल में शुम्भ निशुम्भ नाम दोनों राक्षसों ने इन्द्र का त्रैलोक्य तथा देवताओं का यज्ञ भाग
चपने मदके वलसे हरण कर लिया ॥ १॥
तावेवसूर्य्यतांतद्वदधिकारंतथैन्दवम्। कॉवेरमथयाम्यश्वचक्रातेवरुणस्यच॥२॥
उन दोनों ' ने सूर्य पर और उसी प्रकार चन्द्रमा, कुबेर, यम' और वरुण पर अपना अधिकार जमा लिया || २ ||
तावेवपवनर्द्धिश्चचक्रतुर्वह्निकर्म्यच। रातोदेवाविनिर्धूताःभ्रराज्याःपराजिताः॥३
येदोनोंपवनऔरअग्निकोभीअपनेवशमेंकर केउनकाकार्यस्वयंकरनेलगेऔरदेवतालोग परास्तहोकरराज्यसेच्युतहोगयेऔरभयंसेकांपने लगे ॥ ३ ॥
ताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यांसर्व्वेनिराकृताः। महासुराभ्यांतांदेवींसंस्मरन्त्यपराजिताम्॥४॥
उन दोनों महाअसुरोंने सब देव तात्रों को उनके अधिकारों से च्युत कर दियाऔर स्वर्ग से निकाल दिया इसपर देवताओं ने अपराजिता देवी का स्मरण किया ॥ ४ ॥
त्वयास्माकंवरोदत्तोयथापत्सुस्मृताखिलाः। भवतांनाशयिष्यामितत्क्षणात्परमापदः॥५ इतिकृत्वामतिंदेवाहिमवन्तंनगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ॥। ६
एसी विचार करके देवता लोग पर्वतराज हिमालय पर गये और वहाँ जाकर भगवती विष्णुमाया की स्तुति करने लगे।
देवाऊचुः
नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनमः। नमःप्रकृत्यैभद्रायैनियताःप्रणताःस्मताम्॥७॥
देवता बोले-
हम लोग देवी, महादेवी, शिवा, प्रकृति, भद्रा को नम्रता पूर्वक निरन्तर प्रणाम करते हैं ॥ ७ ॥
रौद्रायैनमोनित्यायैगौय्येंधान्यैनमोनमः। ज्योत्स्नायैचेन्दुरूपिण्यैसुखायैसततंनमः॥८
रुद्राणी को नमस्कार हैं तथा आप जो नित्या,गौरी, धात्री, ज्योत्स्ना, इन्द्ररूपा और परमानन्दरूपा हैं उनको नमस्कार है ॥ ८ ॥
कल्याण्यैमरणतांहृद्धयैसिद्ध्यैकुम्र्म्मोनमोनमः नैऋत्यैभूभृतांलक्ष्म्यैसर्व्वाण्यैतेनमोनमः॥६॥
दुःखीजनों काकल्याण करने वाली, वृद्धि और सिद्धि करनेवाली- पर्वतों की श्री और सर्वाणी ! आपको नमस्कार है।
दुर्गायैदुर्गपारायैसारायैसर्व्वकारिण्यै। व्यास्यैतथैवकृष्णायैधूम्रायैसततंनमः॥१०॥
संसार रूपी दुर्ग से पार करनेवाली दुर्गा,सब जगत का कार्य करने वाली, प्रकृति और
पुरुष में मेदज्ञान रूपिणी, धूम्राकाली को हमारानिरन्तर प्रणाम है ॥ १० ॥
प्रतिसौम्यातिरौद्रायैनतास्तस्यैनमोनमः। मोजगत्प्रतिष्ठायैदेव्यैकृत्यैनमोनमः॥११॥
हे देवि ! श्राप श्रति सौम्य और अति रौद्र हैं, श्रापको हमारा प्रणाम हैं जगत के कारण और क्रिया शक्तिरूप ! श्रापकोनमस्कार है ॥११॥
देवीसर्व्वभूतेषुविष्णुमायेतिशब्दिता। मस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः || १२
जो देवी सब प्राणियों में विष्णु, की माया के नाम से प्रसिद्ध है उसको हमारा बारबार प्रणाम है ॥ १२ ॥
देवीसर्व्वभूतेषुचेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः || १३
जो देवी सव प्राणियों में | चेतना रूप से स्थित है उसको हम चार २ प्रणाम: करते हैं ॥ १३ ॥
देवीसर्व्वभूतेषुबुद्धिरूपेणसंस्थिता। मस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||१४||
जो देवी सब जीवों में बुद्धि रूप सेविद्यमानहैउसकोहमलोगअनेकप्रणामकरते हैं ॥ १४ ॥
देवीसर्व्वभूतेषुनिद्रारूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१५॥
जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित है उसको हम बार बार नमस्कारकरते हैं ||१५||
देवीसर्व्वभूतेषुक्षुधारूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१६
जो देवी सब प्राणियों में भूखके रूप में स्थित है उसको हमारा अनेक प्रणाम है ॥१६॥
सदेवीसर्व्वभूतेषुछायारूपेणसंस्थिता। मस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१७॥
जो देवी सब प्राणियों में छायारूप से स्थित उसको हम बार बार नमस्कार करते हैं ॥ १७ ॥
देवींसर्व्वभूतेषुशक्तिरूपेणसंस्थिता। मस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१८
जो देवी सब जीवों में शक्ति रूप से विराजतीं उसको हम बार बार प्रणाम करते हैं ॥ १८ ॥ ॥
देवीसर्व्वभूतेषुतृष्णारूपेणसंस्थिता। मस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥१६॥
जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से रहती है उस को हम नमस्कार करते हैं ॥ १६ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुक्षान्तिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२०॥
जो देवी सब जीवों में क्षमा रूप से स्थित है उसको हमारानमस्कार है ॥ २० ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुजातिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२१
जो देवी सब जीवों में जांति रूप से स्थित है उसको हमारा प्रणाम है ॥ २१ ॥
रादेवीसर्व्वभूतेषुलज्जारूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२२||
जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित है उसको हमारा नमस्कार है ॥ २२ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुशान्तिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२३||
जो देवी सबजीवों में शान्ति रूपसे विराजती है उसको हमारा बार बार प्रणाम है ॥ २३ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुश्रद्धारूपेणसंस्थिता। नमस्तयैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२४||
जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित है उसको हमारा बार बारप्रणाम है ॥ २४ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुकान्तिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२५॥
जो देवी सब प्राणियों में कान्ति रूप से विराजती है उसको नमस्कार है, नमस्कारहै, नमस्कार है ॥ २५ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुलक्ष्मीरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२६||
जो देवी सब जीवों मेंलक्ष्मी रूप से स्थित है उसको हमारा नमस्कार है,नमस्कार है, नमस्कार है ॥ २६ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुदृत्तिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२७॥
जो देवी सब जीवों में वृत्ति रूप से स्थित है उसको हम चारवार प्रणाम करते हैं ॥ २७ ॥
गादेवीसर्व्वभूतेषुस्मृतिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२८||
जो देवी सब जीवों में स्मृति रूप से स्थित है उनको हमारा अनेक नमस्कार है ॥ २८ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुदयारूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||२६||
जो देवी सब प्राणियों में दया रूप से विराजती है उसको हम अनेक प्रणामकरते हैं ॥ २६ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुतुष्टिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||३०||
जो देवी सब जीवों में संतोष रूप से स्थित है उसको हम वार २ प्रणाम करते हैं ॥३०॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुमातृरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||३१||
जो देवी सब प्राणियों में माता होकर रहती है मैं इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवी है और सब जीवों
उसको हम बार बार प्रणाम करते हैं ॥ ३१ ॥
यादेवीसर्व्वभूतेषुभ्रान्तिरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||३२||
जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्ति रूप से स्थित है उस को हमारा नमस्कार है ॥ ३२ ॥
इन्द्रियाणामधिष्ठात्रीभूतानाञ्चाखिलेषुया। भूतेषुसततंतस्यैव्याप्तिदेव्यैनमोनमः ||३३|||
जो सब प्राणियों की अधिष्ठात्री देवी है और सब जीवो में में व्याप्त है उसको हम प्रणाम करते हैं ॥ ३३ ॥
चितिरूपेणयाकृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिताजगत्। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ||३४||
जो चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है उस देवी को हम बार बार नमस्कार करते हैं ॥ ३४ ॥
स्तुतासुरैःपूर्व्वमभीष्टसंश्रयात्तथासुरेन्द्रेणदिनेषु सेविता |
करोतुसानःशुभहेतुरीश्वरीशुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ||३५||
हे शुभ करने वाली ईश्वरी देवी ! पहिले देवताओं ने आपकी स्तुति की थी और महिषासुर के वध रूपी अभीष्ट के सिद्ध होजाने पर इन्द्र ने आपकीसेवा कीथी। हमारीविपत्तियों कानाश करकेआपहमाराकल्याणकरें॥३५॥
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च। सुरैर्नमस्यते।याचस्मृताततक्षणमेवहन्ति |
नःसर्व्वापदोभक्तिविनम्रमूर्त्तिभिः ||३६||
हे देवि ! इस समय उद्धत दैत्यों से पीड़ित होकर हम देवतालोग आपको नमस्कार करते हैं ।
भक्ति से नम्र होकर हम जब कभी आपका स्मरण करते हैं तभीआप हमारी विपत्तियों का नाश करती हैं ||३६||
ऋषिरुवाच
एवंस्तत्रादियुक्तानांदेवानांतत्रपार्व्वती। स्नातुमभ्याययौतोयेजाह्नव्यानृपनन्दन ||३७||
ऋषि बोले-
हे राजन् ! देवताओंके इस प्रकार स्तुति करने पर देवी पार्वती गङ्गा स्नान करने के हेतु आई
और देवताओं के सन्मुख प्रगट हुई ॥ ३७ ॥
साऽब्रवीत्तान्सुरान्सुश्रूर्भवद्भिःस्तुयतेऽत्रका। शरीरकोषतश्चास्याःसमुद्भूताऽब्रवीच्छिवा॥३८॥
वह उन देवताओं से बोलीं कि तुम किसकी स्तुति करते हो, और उनके शरीर कोश से शिवा निकलकर उनसे बोली ||३८||
स्तोत्रंममैतत्क्रियतेशुम्भदैत्यनिराकृतैः। देवैःसमेतैःसमरेनिशुम्भेनपराजितैः॥३६॥
समर में शुम्भ और निशुंभदैत्यों से परास्त होकर आप सब देवता मेरी स्तुति कर रहे हैं ॥ ३६ ॥
शरीरकोषादयत्तस्याःपार्व्वत्यानिःसृताम्बिका कौपिकीतिसमस्तेषुततोलोकेषुगीयते॥४०
क्योंकि वह विका पार्वतीजी के शरीर कोश से उत्पन्न हुई इसलिये उनको सब लोकों में कौशिकी कहते हैं ॥४०॥
तस्यांविनिर्गतायान्तुकृष्णाऽभूत्सापिपार्श्वती कालिकेतिसमाख्याताहिमाचलकृताश्रया॥४१॥
उनकेनिकल जाने पर पार्वतीजी कृष्णवर्ण होगई और इसी कारण वे कालिका कहलाई और हिमालयपर्वत पर रहने लगीं ॥। ४१॥
ततोऽम्बिकांपरंरूपंविभ्राणांसुमनोहरम्। ददर्शचण्डोसुण्डभृत्यौशुम्भनिशुम्भयोः॥४२
फिर अम्बिका के परमरूप को दैववशात् शुम्भ निशुम्भ के सेवक चण्डसुराड ने देखा ॥ ४२॥
ताभ्यांशुम्भायचाख्याताअतीवसुमनोहरा। काप्यास्तेस्त्रीमहाराजभासयन्तीहिमाचलम् ||४३||
वे दोनों शुम्भ के पास जाकर बोले कि "हे महाराज ! एक अत्यन्त सुन्दरी स्त्री है जो कि हिमालय पर्वत को प्रकाशमान कर रहीहै ॥ ४३ ॥
नैवतादृक्कचिद्रूपंदृष्टंकेनचिदुत्तमम्। ज्ञायतांकाप्यसौदेवीगृह्यताञ्चासुरेश्वर॥४४॥
हे असुरेश्वर ! ऐसा उत्तम रूप किसी का कहीं भी नहीं देखा गया है, मालूम होता है
वह कोई देवी है, आप उसको ग्रहण करें ॥ ४४ ॥
स्त्रीरत्नमतिचाङ्गीद्योतयन्तीदिशस्त्विषा। सातुतिष्ठतिदैत्येन्द्रतांभवान्द्रष्टुमर्हति || ४५||
हे दैत्येन्द्र ! वह स्त्री अत्यन्त सुन्दरी और स्त्रियों मैं रत्न है, वह वहाँ पर समस्त दिशाओं को
प्रकाशित कर रही है, आप उसको अवश्य देखिये ||४५||
यानिरत्नानिमरायोगजाश्वादीनिवैप्रभो। त्रैलोक्येतुसमस्तानिसाम्प्रतंभान्तितेगृहे॥४६॥
हे प्रभो ! त्रिलोकी में जो श्रेष्ठ रत्न, मणि, गज अश्व आदि हैं वे इस समय आपके घर पर मौजूद हैं ॥ ४६ ॥
- ऐरावतःसमानीतोगजरत्नंपुरन्दराद | पारिजाततरुश्चायंतथैवोच्चैःश्रवाहयः॥४७॥
इन्द्र से आप हाथियों में रत्न और इसी प्रकार कल्पवृक्ष श्रीर लाये उच्चैःश्रवा घोड़ा भी मिले ||४७॥
विमानंहंससंयुक्तमेतत्तिष्टतितेऽङ्गणे। रत्नभूतमिहानीतंयदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥४८॥
ब्रह्मा का हंस युक्तविमान भी आपके आङ्गरा में मौजूद हैं । वह भीएक रत्न है और बड़ा अद्भुत है ॥ ४८ ॥
निधिरेषमहापद्मःसमानीतोधनेश्वरात्। किंजल्कनींददौचाञ्चिर्मालामम्लानपङ्कजाम्॥४६
कुबेर से आप महापद्म नाम निधि को लाये तथा समुद्र ने आपको अमलकंज की किंजल्किनी नाम मालाप्रदान की ॥४६॥
छत्रतेवारुणंगेहेकाञ्चनावितिष्ठति। तथायंस्यन्दनवरोयःपुरासीत्प्रजापतेः ||५०
बरुण का वह छत्र भी जो सुवर्ण वर्साता है आपके घर पर मौजूद है और उसी तरह यह उत्तम रथ भी है जो कि पहिले प्रजापति केपास था ॥ ५० ॥
मृत्योरुत्क्रान्तिदानामशक्तिरीशत्वयाहृता। पाशःसलिलराजस्यभ्रातुस्तवपरिग्रहे॥५१॥
मृत्यु देने वाली जो शक्ति है उस को भी आप हरण करके ले श्राये हैं तथा वरुणका पाश आपके भाई के हाथ में रहता है. ॥ ५१ ॥
निशुम्भस्याधिजाताथ समस्ता रत्नजातयः । वह्निरपिददौतुभ्यमनिशौचेचवाससी ||५२ ||
समुद्र से उत्पन्न हुए जितने रत्न हैं वे सब आपके भाई निशुम्भ के पास है और शनि ने भी आपको एक अत्यन्त पवित्र वस्त्र भेंट किया है ||५२||
एवंदैत्येन्द्ररत्नानिसमस्तान्याहृतानिते। खीरत्नमेपाकल्याणीत्वयाकस्मान्नगृह्यते॥५३
हे दैत्येन्द्र !ये सव रत्न श्रापने लिये है, व इस स्त्री रत्न कल्याणी को श्राप क्यों नहीं ग्रहण करते ? ॥ ५३ ॥
ऋषिरुवाच
निशम्येतिवचःशुम्भःसतढ़ाचण्ड-गुण्डयोः। प्रेपयामाससुग्रीवंदूतंदेव्यामहासुरम् ||५४ ||
ऋषि बोले-
चण्ड मुण्ड के इन वचनों को सुनकर शुम्भ ने देवीकेपाससुग्रीवनामदूतराक्षसकोभेजा॥५४॥
इतिचेतिचवक्तव्यासागत्वावचनान्मम। यथाचाभ्येतिसम्प्रीत्यातथाकार्य्यंत्वयालघु५५॥
और उससे कह दिया कि देवी के पास जाकर मेरा बचन उसे सुना देना तथा जिस तरह वह
प्रीति पूर्वक नावे उसे ले जाना ॥ ५५ ॥
सतत्रगत्वायत्रास्तेशैलोदेशेऽतिशोभने। सादेवीतोततःमाहश्लक्ष्णंमधुरयागिरा ||५६||
वह पर्वत के उस सुन्दर प्रदेश में गया जहाँ वह देवी रहती थी और वहाँ जाकर कोमल शब्दों में उससे कहा ॥५६॥ दृतउवाच
देवि दैत्येश्वरः शुम्भत्रैलोक्ये परमेश्वरः ।
दूतोऽहं प्रेपितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ||५७||
दूतबोला- हेदेवि ! तीनोंलोकोंकेस्वामी'दैत्येश्वरशुम्भ- भेजाहुआमैंउसकादूतथापकेपासयहाँश्राया॥५७॥
अव्याहताज्ञःसर्व्वासुयःसदादेवयोनिषु। निज्जिताखिलदैत्यारिःसयदाहशृणुष्वतत् || ५८
सब देवता लोग उसकी श्राज्ञा मानते हैं;उसने सब देवताओं को जीत लिया है। उसने जोकहा है वह सुनो ॥ ४८ ॥
ममत्रैलोक्यमखिलंममदेवावशानुगाः। यज्ञभागानहंसर्व्वानुपाश्नामिपृथक्पृथक्॥५६
यह त्रैलोक्य मेरा है, सब देवता मेरे वरावर्ती हैं और सब यक्षों का भाग मैंपृथक् पृथक् ग्रहण करता हूँ ॥ ५६ ॥
त्रैलोक्येवररत्नानिममवश्यान्यशेषतः। तथैवगजरत्नानिहत्वादेवेन्द्रवाहनम्॥६०॥
तीनों लोकों मैं जो-जो सुन्दर रत्न हैं वे सब मेरे वशमें हैं और इसी प्रकार मैंने इन्द्रसे उसका वाहन पेरावाहाथीहरण कर लिया है ॥६०॥
श्रीसुंदमयनोद्भूतमश्वरत्नंममामरैः। उच्चैःश्रवससंज्ञंतत्प्रणिपत्यसमर्पितम् ||६१ ||
समुद्र-मथनके समय जो श्रभ्वरन उच्चैःश्रवा निकला या उसको देवतात्रों ने मुझे करबद्ध होकर समर्पित किया है ॥ ६१॥
यानिचान्यानिदेवपुगन्धर्व्वेपूरगेषुच। रत्नभूतानिभूतानितानिमय्येवशोभने॥६२॥
थौर जो-जो रज देवताओं, गन्धवों और नागगणों के पास थे वे सब मेरे पास विद्यमान हैं ॥ ६२ ॥
स्त्रीरत्नभूतांत्वांदेविलोकेमन्यामहेवयम्। सात्वमस्मानुपागच्छयतोरत्नभुजोवयम्॥६३॥
हे देवि ! हम श्रापको संसार में स्त्रीरत समझते हैं इसलिये आप हमारे पास आइये, क्योंकि रत्नभोका हम ही है ॥६३॥ मांवाममानुजंचापिनिशुम्भमुरुविक्रमम्। भजत्वंचञ्चलापाङ्गिरत्नभूतासिवैयतः ||६४ ||
है चञ्चलाङ्गी ! मेरे अथवा मेरे छोटे भाई पराक्रमी निशुम्भ के पास तुम रहो, क्योंकि तुम रक्ष रूप हो ॥ ६४ ॥
परमैश्वर्यमतुलंप्राप्स्यसेमत्परिग्रहात्। एतद्वयुद्धचासमालोच्यमत्परिग्रहतांव्रज || ६५
मेरे साथ विवाहकरने से तुमको अतुल ऐश्वर्य प्राप्त होगा | यह विचार कर तुम मेरी स्त्री होकर रहो ॥६५॥ ऋषिरुवाच
इत्युक्तासातदादेवीगम्भीरान्तःस्मिताजगौ। दुर्गाभगवतीभद्राययेदंधार्य्यतेजगत्॥६६॥
ऋषि बोले-
जब दूत ने ऐसा कहा तव देवी मुस्करा गई और फिर दुर्गा देवी जो इस सम्पूर्ण जगत को
धारण करती हैं गम्भीर वाणी से बोलीं ॥६६॥
देव्युवाच
सत्यमुक्तंत्वयानात्रमिथ्याकिञ्चित्त्वयोदितम्।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ६७॥
देवीबोली- हेदूत ! तुमनेसचक्रहा, इसमेंकुछभीमिथ्या'नहीं है शुम्भ और निशुम्भ तीनों लोकों के अधिपति हैं ॥ ६७ ॥
किन्त्वत्रयत्प्रतिज्ञातंमिथ्यातत्क्रियतेकथम्। श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञायाकृतापुरा॥६८
किन्तु जो प्रतिज्ञा में कर चुकी हूँ. वह कैसे मिथ्या हो सकती है ? मैंने अल्प बुद्धि केकारण जो पहिले प्रतिज्ञा की थी उसको सुनो ॥६८
योमांजयतिसंग्रामेयोमेदर्पंव्यपोहति। योमेप्रतिबलीलोकेसमेभर्त्ताभविष्यति || ६६
जो संग्राम में मुझे जीत कर मेरा दर्प चूर्ण करेगा अथवा जो मेरे समान वली होगा वही मेरा स्वामीहोगा ॥ ६६ ॥
तदागच्छतुशुम्भोऽत्रनिशुम्भोवामहासुरः। मांजित्वाकिंचिरेणात्रपाणिगृह्णातुमेलघु॥७०
इसलिये शुम्भ और निशुम्भ यहाँ श्रा और मुझे जीतकर शीघ्र मेरा पाणिग्रहण करें ॥७० दूतउवाच
अवलिप्तासिमैत्वंदेविब्रूहिसमाग्रतः।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भ निशुम्भयोः॥ ७१
दूत बोला-
हे देवि ! मेरे आगे अभिमानकी बातें न करो, इस त्रिलोकी में शुम्भ निशुम्भ के श्रागे कौनसामनुष्य ठहर सकता है ॥ ७१ ॥
श्रन्येषामपिदैत्यानांसर्व्वेदेवानवैयुधि। तिष्ठन्तिसम्मुखेदेविकिंपुनःस्त्रीत्वमेकिका॥७२॥
सब देवता तो समर में उनके अन्य दैत्यों के आगे भी न ठहर सके जिन शुम्भादिकों के सन्मुख में इन्द्रादिक सव जिसमें तुम तो स्त्री हो और वह भी अकेली ॥७२॥
इन्द्राद्याःसकलादेवास्तस्थुर्येषांनसंयुगे। शुम्भादीनांकथंतेषांस्त्रीप्रयास्यसिसम्मुखम्॥७३
देवता भी न ठहर सके, उनके सन्मुख स्त्री होकर तुम किस प्रकार प्रयास करती हो ॥ ७३ ॥
सात्वंगच्छमयैवोक्तापार्श्वशुम्भ-निशुम्भयोः। केशाकर्षणनिर्द्धत -गौरवासागमिष्यसि ||७४ | | |
श्रतः तुममेरे कहने से शुम्भ निशुम्भ के पास चलो अन्यथा तुम्हारा गौरव क्षीण करके बाल पकड़ कर तुम्हेंलेजाया जायगा ||७४|| देव्युवाच
एवमेतदुबलीशुम्भनिशुम्भश्चातिवीर्य्यवान्। किंकरोमिप्रतिज्ञामेयदनालोचितापुरा ||७५||
देवी बोली.
शुम्भ और निशुम्भ ऐसे ही वली और पराक्रमी हैं । परन्तु मैं क्या करूँ, मैं पहिले प्रतिज्ञाकर चुकी हूँ ||७५||
सत्वंगच्छमयोक्तंतेयदेतत्सर्व्वमादृतः। तदाचक्ष्वासुरेन्द्रायसचयुक्तंकरोतुयत्॥७६॥
इसलिये तुम जाओ और जैसामैंने कहा है वह अविकल उनको कह सुनाओ । इस पर वे असुरों के अधिपति जो उचितसमझेंगे करेंगे ॥ ७६ ॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंसावर्णिकमन्वंतरमेंदेवीमाहात्म्यमें दूतसंवाद नाम ८५वां [
Summary of chapter 84 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Indra and all the devas bow in deep humility before the victorious Goddess, offering the sublime Śakrādi Stuti. They extol Her as the supreme embodiment of Śraddhā, Svāhā, Svadhā, and Mahāvidyā, who resides as fortune in the homes of the virtuous and as intelligence in the hearts of the wise. Pleased by their selfless devotion, the Mother of the Universe grants them the boon that whenever they remember Her in times of distress, She will instantly descend to destroy their afflictions.