मार्कण्डेय महा पुराण
19
स्पृषेर्वचनं श्रुत्वा कार्त्तवीर्यो नरेश्वरः । दत्तात्रेयाश्रमं गत्वा तं भक्त्या समपूजयत् ॥ १ ॥
सुमति बोले- गर्गजी के यह वचन सुनकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन भगवान् दत्तात्रेय के श्राश्रम को गये और वहाँ जाकर उनकी भक्ति पूर्वक पूजा की ॥१॥ पादसंवाहनाद्यं न मध्वाचाहरणेन च । स्वक्चन्दनादिगन्धाम्बु- फलाद्यानयनेन च ॥ २
मार्ग की थकान इत्यादिको चरण सम्वाहन इत्यादि करके हरण करने लगे और उनके लिये माला, चन्दन, जल, फल आदि लाने लगे ॥ २ ॥ तथान्नसाघनैस्तस्य उच्छिष्टापोहनेन च । परितुष्टो मुनिर्भूपं तमुवाच तथैव सः ॥ ३।।
तथा अन्न आदि साधनों से सत्कार कर उनका मंठा प्रसाद खाने लगे । इससे सन्तुष्ट होकर मुनि ने उस राजा से कहा ॥३॥
ययैवोक्ताः पुरा देवा मद्यभोगादिकुत्सनम् । 'स्त्री चेयं मम पार्श्वस्येत्येतद्भोगाच्च कुत्सितम् ॥ ४ ॥
फिर जिस प्रकार प्राचीन काल में उन्हों ने देवताओं से कहा था कि मैं मद्यपान आदि से कुत्सित हूँ. उसी प्रकार कहा कि ये स्त्री जो मेरे पास है इसके भोग से मैं कुत्सित हो रहा हूँ ॥४॥ सदैवाहं न मामेवमुपरोदधुं त्वमर्हसि । अशक्तमुपकाराय शक्तमाराधयस्व भोः ॥ ५॥स मैं सदा इसी भोग में रहता हूँ इसलिये तुम मेरी सेवा करने के योग्य नहीं हो, मैं तुम्हारा उपकार करने में असमर्थ हूँ, तुम शक्ति-सम्पन्न की आराधना करो ॥ ॥ जड़ उवाच तेनैवमुक्तो मुनिना स्मृत्वा गर्गवचश्च तत् । प्रत्युवाच प्रणम्यैनं कार्त्तवीर्यार्जुनस्तदा ॥ ६ ॥
सुमति बोले- कार्तवीर्य अर्जुन ने गर्ग ऋषि के वचनों का स्मरण करके दत्तात्रेयजी को प्रणाम किया और यह वचन बोले ॥ ६ ॥ अर्जुन उवाच किं मां मोहयसे देव स्वां मायां समुपाश्रितः । अधस्त्वं तथैवेयं देवी सर्व्वभवारणिः ॥ ७।
अर्जन बोले- देव ! आप मुझ त्राये हुए को अपनी माया से क्यों मोहित करते हैं ? आप तथा ये सर्वजगत् को उत्पन्न करने वाली देवी निप्पाप हैं ॥७ ॥ इत्युक्तः प्रीतिमान् देवस्ततस्तं प्रत्युवाच ह । कार्त्तवीर्य्यं महाभागं वशीकृतमहीतलम् ॥ ८।
अर्जुन बोले- “हे महाभाग कार्तवीर्य ! तुमने मुझको पृथ्वी के ऐसा कहने पर दत्तात्रेय प्रसन्न होकर उससे तल पर वशीभूत कर लिया है" ॥ ८ ॥ वरं वृणीष्व गुह्यं मे यत् त्वया समुदीरितम् । तेन तुष्टिः परा जाता त्वय्यद्य मम पार्थिव ॥ ६।।
हे राजन् ! चूंकि तुमने मेरे गुप्त तत्व का वर्णन कर दिया इस लिये मैं तुमसे परम प्रसन्नहूँ, तुम वर मांगो ॥ ६॥ ये च मां पूजयिष्यन्ति गन्यमाल्यादिभिर्नराः । प्रांसमग्रोपहारैश्च मिष्टान्नैश्चान्यसंयुतैः ॥१०॥
सुझको मांस, मद्य, मिष्टान्न आदि उपहारों को देते जो मनुष्य मुझको सुगन्धित मालाओं से पूजकर ॥ १० ॥ समेतं गीतैश्च ब्राह्मणानां तथार्चनैः । वाद्य मनोरमैवणा-वेणु-शंखादिभिस्तथा ॥ ११॥ और लक्ष्मी सहित ब्राह्मणों को पूजकर जो मनोरम वीणा, वेणु, शंख, वाद्य, गीत आदि से मेरा सत्कार करते हैं ॥ ११ ॥ तेषामहं परां तुष्टिं पुत्रदारधनादिकम् ।
प्रदास्याम्यवघातञ्च हनिष्याम्यवमन्यताम् १२||| उनको मैं पुत्र, स्त्री, धन आदि से परम संतोष प्रदान करता हूँ और उनके वैरियों का नाश करता हूँ ॥ १२ ॥ स त्वं वरय भद्रं ते वरं यन्मनसेप्सितम् । प्रसादसुमुखस्तेऽहं गुह्यनाममकीर्त्तनात् ॥ १३ ॥
क्योंकि तुमने मेरे गुह्य तत्व का प्रकीर्तन किया है इसलिये मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। जो तुम्हारे मन में हो वह वर अपने कल्याण के निमित्त माँगो ॥ १३ ॥ कार्त्तवीर्य्य उवाच यदि देव प्रसन्नस्त्वं तत् प्रयच्छर्द्धिमुत्तमाम् । - यया प्रजाः पालयेऽहं न चाधर्म्ममवाप्नुयाम् ॥ १४ ॥
कार्तवीर्य वोले हे देव ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझ को वह ऋद्धि प्रदान कीजिये जिससे मैं प्रजा का पालन करूँ और अधर्म में प्राप्त न होऊँ ॥ १४ ॥ परानुसरणे ज्ञानमप्रतिद्वन्द्वतां रखे । सहस्रमाप्तुमिच्छामि बाहूनां लघुतागुणम् || १५ ||
दूसरोंकी रक्षा करनेमें तथा समरमें मेरी समानता कोई न कर सके । मेरी वलवती एकसहस्र भुजायें हों ||१५|| असङ्गा गतयः सन्तु शैलाकाशाम्बु-भूमिषु । पातालेषु च सर्वेषु वधश्चाप्यधिकान्नरात् ॥ १६ ॥
यदि मैं अकेला पर्वत, श्राकाश, समुद्र, किसी भी शत्रु से कम न होऊँ ॥ १६ ॥ तथोन्मार्गमवृत्तस्य चास्तु सन्मार्गदेशकः । सन्तु मेऽतिथयः श्लाघ्या वित्तदाने तथाक्षये ॥ १७ ॥
कुमार्ग पर भूमि, पाताल आदि कहीं भी चला जाऊँ तो वहाँ चलने वालों का मैं उत्तम पथ-प्रदर्शक होऊ और मुझमें अतिथियों को पालन करने तथा दान देने की क्षमता हो ॥ १७ ॥ अनष्टद्रव्यता राष्ट्रे ममानुस्मरणेन च । त्वयि भक्तिर्ममैवास्तु नित्यमव्यभिचारिणी ॥१८
मेरे राष्ट्र में कभी धन का नाश न हो और आप में मेरी शुद्ध भक्ति हो ॥१८॥ दत्तात्रेय उवाच यत्र ते कीर्त्तिताः सर्व्वे तान् वरान् समवाप्स्यसि । मत्प्रसादाच्च भविता चक्रवर्त्ती त्वमीश्वरः ॥ १६ ॥
दत्तात्रेयजी बोले- जो कुछ तुमने वरदान माँगे हैं वे तुमको सब प्राप्त होंगे, मेरी कृपासे तुम चक्रवर्ती राजा होगे ||
जड़ उवाच
प्रणिपत्य ततस्तस्मै दत्तात्रेयाय सोऽर्जुनः । श्रानाय्य प्रकृतीः सम्यगभिषेकमगृह्णत ||२०|| सुमति वाले- वह राजा अर्जुन उस समय दत्तात्रेय को प्रणाम कर अपने घर आये और वहाँ श्राकर सा- धारण स्वभावसे राज्याभिषेक ग्रहण कर लिया ॥२०॥
श्रागताचापि गन्धर्व्वास्तथा चाप्सरसां वराः । ऋषयोऽथ वशिष्ठाद्या मेर्व्वाद्याः पर्व्वतास्तथा ॥ २१ ॥ उस समय पर गन्धर्व तथा अप्सरायें वशिष्ठ श्रादिक ऋषि तथा मेरु आदिक पर्वत ॥ २१ ॥
गङ्गाद्याश्च तथा नद्यः समुद्रा जलसंवृताः । प्लक्षाद्याच तथा वृक्षा देवा वै वासवादयः ||२२||
गङ्गा श्रादिक नदियां, जलपूर्ण सागर, प्लक्ष आदि वृक्ष, तथा वसु आदि देवता लोग ॥ २२ ॥
वासुकिप्रमुखा नागा अभिषेकार्थमागताः । तार्यायाः पक्षिणश्चैव पौरजानपदास्तथा ॥२३॥
तथा वासुकि प्रमुख नाग, ताक्षों आदि पक्षीगण और नगरनि- वासी लोग अर्जुन के अभिषेकार्थं श्राये ॥ २३ ॥
सम्भाराः सम्भृताः सर्व्वे दत्तात्रेयप्रसादतः । अथ सञ्जल्पना लग्नाः देवैर्ब्रह्मादिभिः सह ॥ २४ दत्तात्रेयंजी की कृपा से सब का यथोचित सत्कार हुआ और शुभ लग्न में देव ब्राह्मणों के साथ ॥२४॥
नारायणेनाभिषिक्तो दत्तात्रेयस्वरूपिणा । समुद्रैश्च नदीभिश्च ऋषिभिः सोऽभिषेचितः । धर्मस्य विनाशार्थं धर्म्मसंरक्षणाय च ||२५||
दत्तात्रेय स्वरूप श्रीनारायण ने समुद्रों, नदियों और ऋषियों की सहायता से अर्जुन का अभिषेक किया जो कि अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के हेतु था ॥ २५ ॥
घोषयामास तदा स्थितो राज्ये स हैहयः । दत्तात्रेयात् परामृद्धिमवाप्यातिबलान्वितः ||२६|| तव हैहयराज अर्जुन ने अपने राज्य में स्थित हो यह घोषणा की कि हमने श्री दत्तात्रय की कृपा से अतुल ऋद्धि तथा बल प्राप्त किया है ॥२६ ॥
अद्यप्रभृति यः शस्त्रं मामृते न्यो ग्रहीष्यति । हन्तव्यः स मया दस्युः परहिंसारतोऽपि वा ॥२७॥
अतिरिक्त जो कोई शस्त्र ग्रहण करेगा वह चोर, और जो कोई किसीकी हिंसा करेगा वह मेरे द्वारा बधको प्राप्त होगा ||२७|| इत्याज्ञसे न तद्राष्ट्रे कश्विदायुधधृङ्नरः । तमृते पुरुषव्याघ्र बभूवोरु. राक्रमम् ||२८||
इस आदेशके होने पर उस के राज्य में किसी मनुष्यने शस्त्र धारण न किया और समस्त पृथ्वी में कार्तवीर्यार्जुन ही पराक्रम- शील पुरुपसिंह हुए ||२ स एव ग्रामपालोऽभूत् पशुपालः स एव च । क्षेत्रपालः स एवासीद्विजातीनाञ्च रक्षिता ||२६||
वह ही ग्राम, पशु, खेत और द्विजातियोंके रक्षकहुए ||२६||
तपस्विनां पालयिता सार्थपालस्तु सोऽभवत् । दस्यु - व्यालाग्नि- शस्त्रादि-भयेष्वन्धौ निमज्जताम् ॥ ३०
उन्होंने तपस्वियों तथा प्रजाके धनके रक्षक होकर चोर, सर्प, अग्नि, शस्त्र आदि के भयसे सबको मुक्त करदिया ॥ ३० ॥ अन्यासु चैव मग्नानामापत्सु परवीरहा । स एव संस्मृतः सद्यः समुद्धर्त्ताभवन्नृणाम् ॥३१ ॥
जो लोग आपत्ति में पड़ते उनकी याद करते ही उनका उद्धार करदिया करते थे ||३१|| अनष्टद्रव्यता चासीत् तस्मिन् शासति पार्थिवे । तेनेष्टं बहुभिर्यज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ ३२ ॥ उस राजा के राज्य में दरिद्रता नहीं थी । उसने बहुत से यज्ञों के समाप्त होने पर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दिलवाई ||३२||
तेनैव च तपस्तप्तं संग्रामेष्वभिचेष्टितम् । तस्यर्द्धिमतिमानञ्च दृष्ट्वा प्राहाङ्गिरा मुनिः ||३३||
उसने तपस्यायें कीं और युद्धोंमें करतब दिखलायेउस बुद्धिमान् की समृद्धि देखकर श्रङ्गिरा ऋषि ने कहा ||३३|| न नूनं कार्त्तवीर्य्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः । यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा संग्रामे चातिचेष्टितैः ॥ ३४ ॥
कोई राजा लोग कार्तवीर्य की गति को नहीं पहुँचेंगे कि जिनके समान यज्ञ, दान, तप, में कोई नहींहै ||३४|| दत्तात्रेयादिने यस्मिन् स प्रापद्धिं नरेश्वरः । तस्मिंस्तस्मिन् दिने यागं दत्तात्रेयस्य सोऽकरोत् ३५||
जिस तिथिको उस राजाने दत्ता- त्रेयंजी से समृद्धि पाई थी उस तिथि को वह सदा दत्तात्रेयजी का यज्ञ किया करता था ॥ ३५ ॥ तत्रैव च प्रजाः सर्व्वास्तस्मिन्नहनि भूपतेः । तस्यर्द्धि परमां दृष्ट्वा यागं चक्रुः समाधिना ||३६||
उसी दिन अपने राजाकी समृद्धि देखकर सब प्रजा जन भी यज्ञ आदि करते थे ॥ ३६ ॥ इत्येतत् तस्य माहात्म्यं दत्तात्रेयस्य धीमतः । विष्णोश्चराचरगुरोरनन्तस्य महात्मनः ||३७|| इस प्रकार महात्मा दत्तात्रेय का जोकि धीमान् स्वयं विष्णु, चराचर के गुरु और अनन्त हैं. माहात्म्य है ॥ ३७ ॥
प्रादुर्भावाः पुराणेषु कथ्यन्ते शाङ्गधन्विनः । अनन्तस्याप्रमेयस्य शंख-चक्र-गदाभृतः ॥३८॥
वे शाङ्ग - पाणि, अनन्त, अप्रमेय तथा शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं तथा उनका आविर्भाव इस प्रकार पुराणों से होता है ॥ ३८ ॥ एतस्य परमं रूपं यश्चिन्तयति मानवः । स सुखी स च संसारात् समुत्तीर्णोऽचिराद्भवेत् ॥ ३६ ॥
इस परम स्वरूप का जो मनुष्य ध्यान करता है वह सुखी होकर शीघ्र ही संसार से पार होजाता है ||३६|| सदैव वैष्णवानाञ्च भक्तचाहं सुलभोऽस्मि भोः । इत्येवं यस्य वै वाचस्तं कथं नाश्रयेज्जनः ॥४०॥
जिन्होंने रूपं ऐसा कहा है कि मैं वैष्णवों को भक्ति द्वारा श्रुति सुलभहूँ तो फिर लोग क्यों न उनका श्राश्रय लें ||४०||
अधर्मस्य विनाशाय धर्माचारार्थमेव च । . अनादिनिधनो देवः करोति स्थिति - पालनम् ॥ ४१ ॥
वे धर्म का नाश करके धर्म की स्थापनां करनेवाले हैं तथा सृष्टि की स्थिति, पालन और संहार करते हैं और अनादि हैं ॥४१॥ तथैव जन्म चाख्यातमलर्क कथयामि ते । तथा च योगः कथितो दत्तात्रेयेण तस्य वै । पितृभक्तस्य राजर्षेरलर्कस्य महात्मनः ||४२ ||
इसी प्रकार पितृभक्त, राजर्षि, महात्मा अलर्क के जन्मकी कथा - कहता हूँ कि जिनसे दत्तात्रेय ने योग का वर्णन किया है ॥ ४२ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में दत्तात्रेयीय प्रकरण नाम उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त
Summary of chapter 19 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The narrative relates how King Kārtavīryārjuna worshipped Avadhūta Dattātreya with single-minded devotion and received four magnificent boons. Dattātreya granted him one thousand mighty arms in battle, absolute moral rule over his kingdom, the ability to perceive adharma among his subjects instantly, and death only at the hands of a superior warrior. Through these boons, Kārtavīryārjuna established an golden era of righteous governance on Earth.