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जड़ उवाच एवमुलाप्यमानस्तु स तु मात्रा दिने दिने ववृधे वयसा वालो बुद्ध्या चालर्कसंज्ञितः

जड़ ( सुमति ) वोले --- इस प्रकार भाता नित्य प्रति उस वालक को बहलाती और शिक्षा देती वह अलर्क नाम वाला बालक बाल्यावस्था से बड़ा होना शुरू हुआ

स कौमारकमासाद्य ऋतध्वजसुतस्ततः कृतोपनयनः प्राज्ञः प्रणिपत्याह मातरम् २।।

ऋतध्वज के उस पुत्र ने जब कुमारावस्था प्राप्त की तंव उसका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ और वह अपनी माता को प्रणाम कर बोला

अलर्क उवाच

मया यदत्र कर्त्तव्यमैहिकामुष्मिकाय वै सुखाय वद तत् सर्व्वं प्रश्रयावनतस्य मे अलर्क बोला-

मुझे जो कुछ इस संसार में अथवा परलोकमें सुख के हेतु कर्तव्य है उस सबको मुझसे कहो मदालसोवाच

वत्स राज्येऽभिषिक्तेन प्रजारञ्जनमादितः कर्त्तव्यमविरोधेन स्वधर्म्मस्य महीभृता ४।।

मदालसा वोली- हे वत्स ! राज्याभिषेक होनेपर राजाका कर्तव्य है कि धर्मपूर्वक निर्विरोध प्रजाका पालन करे ॥४॥ व्यसनानि परित्यज्य सप्त मूलहराणि वै आत्मा रिपुभ्यः संरक्ष्यो वहिर्मन्त्रविनिर्गमात् ।। ५।।

सात धातुओं के मूल को हरण करनेवाले व्यसनों को छोड़कर अपने आपको शत्रुओं से बचाना चाहिये तथा मन्त्रियों के सहयोग से कार्य करना चाहिये श्रष्टधा नाशमामोति सुचक्रात् स्यन्दनाद्वयथा तथा राजाप्यसन्दिग्धं वहिर्मन्त्रविनिर्गमात् ६।।

जिस प्रकार सुन्दर पहिये का रंथ उत्तम होता है उसी प्रकार मन्त्रियों की सलाह से राजा भी निस्सन्देह सुरक्षित रहता है ॥६॥ दुष्टादुष्टांश्च जानीयादमात्यानरिदोषतः चरैश्वरास्तथा शत्रोरन्वेष्टव्याः प्रयत्नतः

मंत्रियों मै दुष्ट और सज्जनों की पहिचान रखनी चाहिये, तथा शत्रुओं के मित्रों की भी यत्नपूर्वक निगाह रखनी चाहिये

विश्वासो न तु कर्त्तव्यो राज्ञा मित्राशबन्धुषु कार्य्ययोगादमित्रेऽपि विश्वसीत नराधिपः ८।।

राजा को चाहिये कि अपने मित्रों, भाई-बन्धुनों में भी विश्वास न करे और यदि मौक़ा हो तो शत्रुका भी विश्वास करले

स्थानवृद्धिक्षयज्ञेन षाड्गुण्यगुणिनात्मना भवितव्यं नरेन्द्रण न कामवशवर्त्तिनः ६।

राजाको चाहिये कि छः गुणोंके अनुसार रहे तथा स्थान और हानि, लाभ का ज्ञान रक्खे और कभी काम के वशीभूत न हो प्रागात्मा मन्त्रिणश्चैव ततो भृत्या महीभृता ज्ञेयाश्चानन्तरं पौरा विरुध्येत ततोऽरिभिः १०।।

राजा पहिले अपने आप को, फिर मन्त्रियों को फिर सेवकों को तथा उसके बाद प्रजा को वशमें करे और फिर शत्रुओं से विरोध करे ॥१०॥ यस्त्वेतानविजित्यैव वैरिणो विजिगीषते परोऽजितात्मा जितामात्यः शत्रुवर्गेण बाध्यते ११

जो रणको न जीतकर बैरियों को जीतने की इच्छा करता है वह व्यक्ति, जिसने अपने आपको नहीं जीता है तथा जो मन्त्रियों से जीता हुआ है वह शत्रुओं द्वारा बघ को प्राप्त होगा॥११॥

तस्मात् कामादयः पूर्व्वजेयाः पुत्र महीभुजा तज्जये हि जयोऽवश्यं राजा नश्यति तैजितः॥ १२

 हे पुत्र ! इसलिये राजाको चाहिये कि पहिले कामादिक को जीते उनको जीतने से निश्चय जय प्राप्त होगी और उनको न जीतने से नाश को प्राप्त होता है १२

कामः क्रोधश्च लोभश्च मदो मानस्तथैव च हर्षश्च शत्रवो ह्य ेते विनाशाय महीभृताम् १३

काम, क्रोध, लोभ, मद, मान तथा हर्ष ये सब राजाओं का नाश करनेके लिये शत्रुवत् १३॥

कामप्रसक्तमात्मानं स्मृत्वा पाण्डुं निपातितम् निवर्त्तयेत् तथा क्रोधादनुहार्द हतात्मजम्

यह स्मरण करके कि काम से राजा पांडु का पतन हुआ और क्रोध से अनुहाद का पुत्र मारा गया काम और क्रोध को छोड़ देना चाहिये ॥ १४

हतमैलं तथा लोभान्मदाद्व ेगं द्विजैर्हतम् मानादनायुपापुत्रं बलिं हर्षात् पुरञ्जयम् ||१५||

लोभ से राजा पुरूरवा मरा, मद के कारण राजा वेणु ब्राह्मणों से शापित होकर मरा मान से अनायुप का पुत्र वलि और हर्ष से पुरञ्जय मारे गये ||१५||

एभिर्जितैर्जितं सर्व्वं मरुत्तेन महात्मना स्मृत्वा विवर्जयेदेतान् दोषान् स्वीयान् महीपतिः काक - कोकिल-भृङ्गाणां मृग-व्याल - शिखण्डिनाम्। हंस- कुक्कुट - लोहानां शिक्षेत चरितं नृपः १७॥

 इन सबको जीतकर महात्मा मरुत ने सव पर विजय प्राप्त की यह सब सोचकर राजा को चाहिये कि अपने को इन सब दोषों से बचावे ॥ और राजा को चाहिये कि काक, कोकिल, भौंरा, हिरन, सर्प, मोर, हंस, कुक्कुट और लोह श्रादि. के चरित्र से शिक्षा ग्रहण करे १७

कीटकस्य क्रियां कुर्य्याद विपक्षे मनुजेश्वरः चेष्टां पिपीलिकानाञ्च काले भूपः प्रदर्शयेत् १८

राजा वि-पक्षियों से कीट की तरह काम निकाले तथा राजा को चाहिये कि अपनी चेष्टा चींटी की तरह रक्खे ॥ १८

ज्ञेयाग्निविस्फुलिङ्गानां वीजचेष्टा च शाल्मलेः चन्द्रसूर्य्यस्वरूपेण नीत्यर्थे पृथिवीक्षिता १६

अग्नि के कण और शाल्मलि वृक्ष के बीज की तरह अपनी चेष्टा रक्खे और नीति के लिये चन्द्र- सूर्य की तरह पृथ्वी पर देखता रहे ॥१६॥

बन्धकी पद्मशरभ-शूलिकागुर्विणीस्तनात् प्रज्ञा नृपेण चादेया तथा गोपालयोषितः ||२०||

बन्धकी स्त्री. कमल, पतङ्गा, शूलिका, गुर्विणी, तथा इसी प्रकार ग्वाले की स्त्री के स्तनों से राजा को बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये २०

शक्रार्क -यम- सोमानां तद्वायोर्महीपतिः रूपाणि पञ्च कुर्वीत महीपालनकर्म्मणि ॥२१॥

इन्द्र, सूर्य, यम, चन्द्रमा और वायु इन पाँच रूपों को राजा प्रजा- पालन के समय धारण करे ||२||

यथेन्द्रश्चतुरो मासान् तोयोत्सर्गेण भूगतम् श्राप्याययेत् तथा लोकं परिहारैर्महीपतिः ||२२||

जिस प्रकार इन्द्र चार महीने जल बरसा कर पृथ्वी का पालन करते हैं उसी तरह राजा को चाहिये कि प्रजा को अन्न वस्त्र से तृप्त करें २२

मासानष्टौ यथा सूर्य्यस्तोयं हरति रश्मिभिः सूक्ष्मेणैवाभ्युपायेन तथा शुल्कादिकं नृपः ||२३||

जिस प्रकार सूर्य आठ महीने अपनी किरणों से जल का शोषण करता है उसी प्रकार राजा सूक्ष्म उपायों से प्रजा से कर वसूल करे २३

यथा यमः प्रियद्वेष्ये प्राप्तकाले नियच्छति तथा प्रियाप्रिये राजा दुष्टादुष्टे समो भवेत् ||२४||

जिस प्रकार समय थाने पर यमराज अच्छे बुरे को देखते हैं उसी प्रकार राजा को चाहिये कि सज्जन के प्रति प्रिय और दुष्ट के प्रति प्रिय हो || २४

पूर्णेन्दुमालोक्य यथा प्रीतिमान् जायते नरः एवं यत्र प्रजाः सर्व्वा निवृ त्तास्तच्छशितम् ||२५||

जिस प्रकार पूर्ण चन्द्रमा को देखकर मनुष्य प्रसन्न होते हैं उसी प्रकार राजा को चन्द्रमा के समान वही कार्य करना उचित है जिससे प्रजा को सुख हो || २५ ||

मारुतः सर्व्वभूतेषु निगृदुश्वरते यथा एवं नृपश्चरेच्चारैः पौरामात्यादिवन्धुषु २६

जिस तरह वायु सब प्राणियों में गुप्त रूप से बहती है उसी तरह राजाको चाहिये कि गुप्तचरों द्वारा नगरनिवासियों तथा भाई बन्धुओं की खबर रक्खे ||२६||

न लोभाट्टा न कामाद्वा नार्थाद्वा यस्य मानसम् यथान्यैः कृष्यते वत्स स राजा स्वर्गसृच्छति ||२७||

जिसका मन लोभ, काम, और अर्थ से नहीं ले जाया जाता है वह राजा जिस प्रकार एक ग्रन्धा बच्चे द्वारा ले जाया जाता है, स्वर्ग को चला जाता है २७

उत्पथग्राहिणो मृद्वान् स्वधर्म्माञ्चलतो नरान् यः करोति निजे धर्मे स राजा स्वर्गमृच्छति ॥२८॥

जो मूढ़ मनुष्य अपने धर्म को छोड़ कर कुमार्ग पर चलते हैं उनको जो राजा अपने धर्म में लगाता हैं वह भी वर्ग को जाता है २८

वर्णधर्मा न सीदन्ति यस्य राज्ये तथाश्रमाः वत्सं तस्य सुखं प्रेत्य परत्रेह च शाश्वतम् ||२६||

हे वत्स ! जिस के राज्य में वर्णाश्रम धर्म का हास नहीं होता हैं. राजा का कर्तव्य वही है जिससे धर्म की सिद्धि वह इस संसार व परलोक में सुख पाता है २६

एतद्राज्ञः परं कृत्यं तथैतत् सिद्धिकारकम् स्वधर्म्मस्थापनं नृणां चाल्यते यत् कुबुद्धिभिः||३०||

हो जो दुर्बुद्धियों द्वारा किया गया हो उसको निवारण करके अपने धर्म को स्थापन करे ३० पालनेनैव भूतानां कृतकृत्यो महीपतिः सम्यक् पालयिता भागं धर्म्यस्याप्नोति यत्नतः ३१।।

प्रजा का पालन करने से ही राजा कृतकृत्य होता है प्रजा के भली प्रकार पालन से जो पुराय होता है उसका भाग राजा को प्राप्त होता है ३१

एवं यो वर्त्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे

स सुखी विहरत्येष शक्रस्यैति सलोकताम् ३२||

इस प्रकार चारों वर्णों की रक्षा करता हुआ राजाइस लोक व इन्द्रलोक में सुख पूर्वक विहार करता है ३२ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में पुत्रानुशासन ( २ ) नाम सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त।