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मदालसोवाच

नित्यं नैमित्तिकञ्चैव नित्यनैमित्तिकं तथा गृहस्थस्य त्रिधा कर्म्म तन्निशामय पुत्रक

मदालसा चोली- हे पुत्र ! गृहस्थ के त्रिविधात्मक कर्म अर्थात् १ ) नित्य ( २ ) नैमित्तिक ( ३ ) नित्यं नैमित्तिक सुनो पञ्चयज्ञाश्रितं नित्यं यदेतत् कथितं तव नैमित्तिकं तथैवान्यत् पुत्रजन्मक्रियादिकम्

पञ्चयज्ञ के आश्रित जो कर्म हैं उन को नित्य कहते हैं और पुत्र जन्म श्रादिके उपलक्ष में हुए उत्सवों को नैमित्तिक कहते हैं २॥

नित्यनैमित्तिकं ज्ञेयं पर्व्वश्राद्धादि पण्डितैः तत्र नैमित्तिकं वक्ष्ये श्राद्धमभ्युदयं तव ३।।

पंडित लोग पर्व और श्राद्ध आदि को नित्यनैमित्तिककहते हैं व अभ्युदय आदिक श्राद्ध जो नैमित्तिक हैं उनको कहती हूँ सुनो ॥३ पुत्रजन्मनि यत् कार्य्यं जातकर्म्मसमं नरैः विवाहादौ च कर्त्तव्यं सर्व्वं सम्यक् क्रमोदितम् ४।।

मनुष्यों को चाहिये कि पुत्र  के जन्म होने पर जातिकर्म के अनुसार कार्य करें और कम से विवाह आदि भी करें ॥४॥

पितरश्चात्र सम्पूज्याः ख्याता नान्दीमुखास्तु ये पिण्डांश्च दधिसंमिश्रान् दद्याद्वयवसमन्वितान् ५।

यहाँ पर पितरों को भी पूजना चाहिये जिनकोनान्दी मुख कहते हैं और उनको दधि और यत्र मिले हुए पिण्ड देने चाहिये

उदङ्मुखः माङ्मुखो वा यजमानः समाहितः श्विदेवाविहीनं तत् केचिदिच्छन्ति मानवाः

यजमान को चाहिये कि वह उत्तर अथवा पूर्व मुख होकर बैठे, कुछ मनुष्य उस समयं वैश्वदेव कर्म नहीं करना चाहते हैं ग्माश्चात्र द्विजाः कार्य्यास्ते च पूज्याः प्रदक्षिणम् रतन्नैमित्तिकं वृद्धौ तथान्यच्चौद्ध देहिकम्

वहाँ पर दो ब्राह्मणों की प्रदक्षिणां कर उनको पूजे इसको नैमित्तिक व अन्य श्रर्ध्वदेहिक कहते हैं ताहनि च कर्त्तव्यमेकोद्दिष्टं शृणुष्व तत् विहीनं तथा कार्य्यं तथैवैकपवित्रकम् ८।।

जिस दिन जिसकी मृत्यु हो उस दिन उसका एकोद्दिष्ट श्राद्ध होना चाहिये वहाँ पर किसी देवता का पूजन नं होना चाहिये तथा एक पवित्र रखना चाहिये

प्रावाहनं न कर्त्तव्यमग्नौकरणवज्जितम् तस्य पिण्डमेकंच दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ

और उसमें अग्निकरण तथा श्रावाहन भी न करना चाहिये और जूंठन के पास प्रेत को एक पिएड., देना चाहिये

तिलोदकंचापसव्यं तन्नामस्मरणान्वितम् प्रक्षय्यममुकस्येति स्थाने विप्रविसर्जने ॥१०

 फिर तिलोदक लेकर यज्ञो पवीत को दाहिनी वगल से चाँई बगल में करके मृतक के नाम का स्मरण करे और कहें कि यह अमुक को प्राप्त हो, इस प्रकार कर्म करने पर ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं १०

अभिरम्यतामिति ब्रूयाद्वब्रूयुस्तेऽभिरताः स्महे प्रतिमासं भवेदेतत् कार्य्यमा वत्सरं नरैः ॥११॥

श्राद्ध करने वाले यजमान को ब्राह्मण के विसर्जन के समय 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहना चाहिये और ब्राह्मण उसका उत्तर दे 'अभिरताः स्महे' मनुष्योंको इस भांति प्रति मास एक वर्षतक करना चाहिये ॥११॥

 अथ संवत्सरे पूर्णे यदा वा क्रियते नरैः सपिण्डीकरणं कार्य्यं तस्यापि विधिरुच्यते || १२

फिर एक वर्ष के बाद सपिंडीकरण करे उसकी विधि इस तरह कही है ||१२||

नचापि दैवरहित सेकाद्वैकपवित्रकम् | नेवानौकरणं तंत्र तच्चावाहनवज्जितम् अपसव्यञ्च तत्रापि भोजयेदयुजो द्विजान् ||१३||

वहाँ पर एक अर्ध्य दे और एक पवित्री रक्खे तथा वहाँपर अग्निकरण अथवा देवताओं का आवाहन न करे वहाँ भी श्रपसव्य रहना चाहिये तथा प्रयुज ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये १३

विशेषस्तत्र चान्योऽस्ति प्रतिमासं क्रियाधिकः तं कथ्यमानमेकाग्रो वदन्त्या मे निशामय || १४ ||

वहाँ पर प्रति मास अधिक क्रिया करता जाय उस क्रिया को मैं श्रव कहती हूँ तुम एकाग्र चित्त होकर सुनो १४ तिलगन्धोदकैर्युक्तं तत्र पात्रचतुष्टयम् कुर्य्यात् पितृणां त्रितयमेकं प्रेतस्य पुत्रक || १५||

तिल, गन्ध और जलसे युक्त चार पात्र वहाँ रक्खे हे पुत्र ! उनमें तीन पात्र पितर के लिये और एक पात्र प्रेत के लिये रक्खे ||१५||

पात्रत्रये प्रेतपात्रमर्घ्यचैव प्रसेचयेत् ये समाना इति जपन पूर्व्ववच्छेषमाचरेत् १६

तीनों पात्रों के बीच में प्रेत पात्र को रक्खे और उसको जलसे अर्घ्य दे और 'ये समाना' इत्यादि मन्त्रों को जपता हुआ पूर्ववत् शेषों में भी करे १६ स्त्रीणामप्येवमेवैतदे कोद्दिष्टमुदाहृतम् सपिण्डीकरणं तासां पुत्राभावे न विद्यते

इसी प्रकार स्त्रियों की भी एकोद्दिष्ट करनी चाहिये यदि पुत्र न हो तो स्त्री का सपिंडीकरण नहीं होता १७

प्रतिसंवत्सरं काय्र्यमेकोद्दिष्टं नरैः स्त्रियाः मृताहनि यथान्यायं नृणां यद्वदिहोदितम् ||१८||

स्त्रियों का एकोद्दिष्ट श्राद्ध प्रति वर्ष करना चाहिये। जिस तिथि को उसकी मृत्यु हो उसकी क्रिया ऊपर कहे अनुसार होनी चाहिये १८

पुत्राभावे सपिण्डास्तु तदभावे सहोदकाः मातुः सपिएडा ये च स्युर्ये च मातुः सहोदकाः॥ १६

पुत्र के अभाव में सपिंड को और उसके भी अभाव में सहोदक को क्रिया करनी चाहिये अथवा उसकी माताका सपिंड उसका सहोदक करे ॥१६॥

कुर्युरेनं विधि सम्यगपुत्रस्य सुतासुतः कुर्युर्मातामहायैव पुत्रिकातनयास्तथा २०।।

जिसके पुत्र न हो उस की बेटी का बेटा इस विधि के अनुसार कार्य करे और मातमह की क्रिया उसकी पुत्री करे श्रथवा उसका पुत्र २०

द्वयामुष्यायणसंज्ञास्तु मातामह - पितामहान् पूजयेयुर्यथान्यायं श्राद्धनैमित्तिकरैपि।।

द्वयामुष्यायण नामक जो नाना या वावा हैं उनको न्यायपूर्वक नैमित्तिक श्राद्धों से से पूजे ॥२१॥

सर्व्वाभावे स्त्रियः कुर्युः स्वभर्तृ णाममन्त्रकम् तदभावे च नृपतिः कारयेत स्वकुटुम्विना २२।।

जिसके कोई न हो उसकी क्रिया उस की स्त्री करे परन्तु उसमें वेदमंत्र न पढ़े और यदि स्त्री भी न हो तो उसकी क्रिया राजा उसके कुटु स्वियों द्वारा करादे || २२||

तज्जातीयैर्नरैः सम्यग्दाहाद्याः सकलाः क्रियाः सर्व्वेपामेव वर्णनाम् बान्धवो  नृपतिर्यतः २३

श्रथवा उसके सजातीय मनुष्यों से दाह श्रादि सव क्रियायें करादे क्योंकि राजा सब वर्गों के मनुष्यों का वन्धु होता है ॥२३॥

एतास्ते कथिता वत्स नित्यनैमित्तिकास्तथा * क्रियां श्राद्धाश्रयामन्यां नित्यनैमित्तिकीं शृणु

मदालसा बोली - " हे वत्स ! इस प्रकार मैंने तुमको नित्य नैमित्तिक क्रियायें बतलाई श्रव और श्राद्ध की नित्य नैमित्तिक क्रियायें सुनो ॥२४॥

दर्शस्तंत्र निमित्तं वै कालश्चन्द्रक्षयात्मकः नित्यतां नियतः कालस्तस्याः संसूचयत्यथ २५॥

दर्श अर्थात् श्रमावस निमित्त है और चन्द्रग्रहण कालको नित्यकहते हैं उस कालकीहुई क्रियायें नित्य कहलाती हैं इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में अलर्कानुशासन में नैमित्तिकादि श्राद्धकल्प नाम ३०वाँ अ० समाप्त !