22

पुत्रावूचतु: ततः काले बहुतिथे गते राजा पुनः सुतम् माह गच्छाशु विप्राणां त्राणाय चर मेदिनीम्

नागपुत्र वोले- बहुत काल व्यतीत होने पर राजा ने फिर अपने पुत्र से कहा कि शीघ्र जाकर ब्राह्मणों की रक्षा के निमित्त पृथ्वी पर भ्रमण करो अश्वमेनं समारुह्यं मातः प्रातदिने दिने अवाधा द्विजमुख्यानामन्वेष्टव्या सदैव हि

नित्य प्रति इस घोड़े पर बैठकर ब्राह्मणों को तलाश कर के देखो कि उनको कोई बाधा तो नहीं है दुष्टताः सन्ति शतशो दानवाः पापयोनयः तेभ्यो न स्याद्वयथा बाधा मुनीनां त्वं तथा कुरु ॥३॥

पापयोनि सैकड़ों दैत्य हैं उनसे मुनियों को कोई बाधा न हो ऐसा उपाय करो ॥३ . स. यथोक्तस्ततः पित्रा तथा चक्रे नृपात्मजः परिक्रम्य महीं सर्व्वं ववन्दे चरणौ पितुः || ४ || उस राजकुमार ने वैसा ही किया जैसा कि उसके पिता ने आदेश किया था वह सब पृथ्वी की परिक्रमा करके पिता के चरणों में नमस्कार करताथा

अहन्यहन्यनुप्राप्ते पूर्वाह्न नृपनन्दनः ततश्च शेषं दिवस तया रेमे सुमध्यमा || ५ ||

नित्य प्रति वह राजकुमार पूर्वाह्न में भ्रमण करता तथा शेष दिन मदालसा के साथ व्यतीत करता था एकदा तु चरन् सोऽथ ददर्श यमुनातटे पातालकेतोरनुजं तालकेतुं कृताश्रमम् || ६ ||

एक वार उसने घूमते हुए यमुना तट पर पाताल- केतु के भाई तालकेतु को देखा जिसने कि वहाँ पर आश्रम बना लिया था मायावी दानवः सोऽथ मुनिरूपं समास्थितः स माह राजपुत्रं तं पूर्ववैरमनुस्मरन् ७।।

वह मायावी दानव मुनि का रूप धारण किये हुए था अपने पुराने वैर को स्मरण करके वह राजकुमार से बोला राजपुत्र ब्रवीमि त्वां तत् कुरुष्व यदीच्छसि न च ते प्रार्थनाभङ्गः कार्य्यः सत्यप्रतिश्रव ॥८॥

हे राजकुमार ! यदि तुम्हारी इच्छाहो तो जो मैं कहता हूँ वह करो ! मैं सत्य कहता हूँ तुम्हारी प्रार्थना व्यर्थ न जायेगी यक्ष्ये यज्ञेन धम्मयि कर्त्तव्याश्च तथेष्टयः चितयस्तत्र कर्त्तव्या नास्ति मे दक्षिणा यतः ||

धर्म की सिद्धि के लिये जो यज्ञ होता है उसको मैं करना चाहता हूँ परन्तु उसकी दक्षिणा मेरे पास नहीं है ६ अतः प्रयच्छ मे वीर हिरण्यार्थं स्वभूपणम् यदेतत् कण्ठलग्नं ते रक्ष चेमं ममाश्रमम् ||१०||

हे वीर ! इसलिये दक्षिणा के निमित्त अपने गले का आभूषण मुझको दो और मेरे श्राश्रम की रक्षा करो १० यावदन्तर्जले देवं वरुणं यादसां पतिम् वैदिकैर्वारुणैर्मन्त्रैः प्रजानां पुष्टिहेतुकैः ॥११॥

जब कि मैं जल के अन्दर जलों के स्वामी वरुण देवता को वैदिक वारुण मन्त्रों से प्रजा के हितार्थं ॥११॥ अभिष्टय त्वरायुक्तः समभ्येमीति वादिनम् तं प्रणम्य ततः प्रादात् स तस्मै कण्ठभूषणम् १२

शीघ्रता से पूजूँ | इस प्रकार मुनि रूपी राक्षस के कहने पर राजकुमार ने अपने कण्ठ का आभूषण उसको देकर प्रणाम किया ||१२|| प्राह चैनं भवान् यातु निर्व्यलीकेन चेतसा स्थास्यामि तावदत्रैव तवाश्रमसमीपतः || १३||

और वोला कि श्राप निर्विघ्न चित्त से जाइये, जब तक मैं यहाँ ही आपके श्राश्रम के समीप ठहरूँगा ॥ १३ तवादेशान्महाभाग यावदागमनं तव न ते कश्चिदावाधां करिष्यति मयि स्थिते विश्रब्धश्वात्वरन् ब्रह्मन् कुरुष्व त्वं मनोगतम् १४ हे महाभाग ! श्रापकी श्राज्ञानुसार मेरे यहाँ ठहरने से आपके लौटने तक कोई बाधा न होगी हे ब्रह्मन् ! इस बात पर विश्वास करके जो श्रापके मन में है वह शीघ्र कीजिये १४ पुत्रावूचतुः एवमुक्तस्ततस्तेन स ममज्ज नदीजले ररक्ष सोऽपि तस्यैव मायाविहितमाश्रमम् ॥१५॥

पुत्र वोले- उसके ऐसा कहने पर वह मुनि नदी के जल में घुस गया और वह राजकुमार उस मायायुक्त श्राश्रम की रक्षा करने लगा ||१५|| गत्वा जलाशयात् तस्मात् तालकेतुश्च तत्परम् मदालसायाः प्रत्यक्षमन्येषाञ्चैतदुक्तवान् ॥१६॥

फिर वह ताल- केतु जल से निकल कर मदालसा व अन्य घर के लोगों के पास पहुँचकर इस प्रकार कहने लगा | तालकेतुरुवाच वीरः कुवलयाश्वोऽसौ ममाश्रमसमीपतः केनापि दुष्टदैत्येन कुर्व्वन् रक्षां तपस्विनाम् ||१७||

तालकेंतु बोला- मेरे श्राश्रम के पास तपस्वियों की रक्षा करते हुए वीर कुवलयाश्व का किसी दुष्ट दैत्य से ॥१७॥ युध्यमानो यथाशक्ति निघ्नन् ब्रह्मद्विषो युधि माया माश्रित्य पापेन भिन्नः शूलेन वक्षसि १८॥

यशाशक्ति घोर युद्ध हुआ परन्तु उस मायावी राक्षस ने पाप से एक शूल राजकुमार की छाती में मारा १८ म्रियमाणेन तेनेदं दत्तं मे कण्ठभूषणम् योग स वने शूद्रतापसः १६ मरते समय उस राजकुमार ने अपने कंण्ठ का यह आभूषण मुझे दिया तथा शब्दों और तपस्वियों से उस वन में उसने अग्नि-संस्कार, पाया १६ कृताह पाशब्दो वै त्रस्तः साश्रुविलोचनः नीतः सोऽश्वश्च तेनैव दानवेन दुरात्मना ||२०||

उसने बड़े दुःख से तथा अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह बातें कहीं तथा बाई भी कहा कि उस घोड़े को भी वही दैत्यं ले गया एतन्मया नृशंसेन दृष्टं दुष्कृतकारिणा यदत्रानन्तरं कृत्यं क्रियतां तदकालिकम् २१॥

यह सब जघन्य कृत्य मुझ निर्दयी ने अपनी आँखों से देखा है अव उसके बाद की जो क्रिया है वह आप कीजिये २१ हृदयाश्वासनञ्चैतद्गृह्यतां कण्ठभूषणम् नास्माकं हि सुवर्णेन कृत्यमस्ति तपस्विनाम् ||२२||

श्रव हृदय में धैर्य धारण कीजिये तथा इस कण्ठहार को लीजिये हम तपस्वियों का सुवर्ण से कोई काम नहीं है २२ पुत्रावूचतुः इत्युक्त्वोत्सृज्य तद्भूमौ स जगाम यथागतम् निपपात जनः सोऽथ शोकार्त्तो सूर्च्चयातुरः ॥२३॥

नाग-पुत्र बोले- यह कहकर और उस श्राभूषण को पृथ्वी पर रखकर वह चला गया और जो लोग वहाँ बैठे हुए थे वह शोक से श्रार्त हो मूर्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ तत्क्षणात् चेतनां प्राप्य सव्र्वास्ता नृपयोषितः राजपत्न्याश्च राजा स विलेपुर तिदुःखिताः २४

फिर क्षण में ही होश में आकर सव रनि वास की स्त्रियाँ, राजपत्नी श्रीर राजा दुःखी होकर विलाप करने लगे २४ मदालसा तु तद्दृष्ट्वा तदीयं कण्ठभूषणम् तत्यानाशु प्रियान् प्राणान् श्रुत्वा च निहतं पतिम् २५

मदालसा ने भी उस गले के श्राभूषण को देखकर और अपने पति के मरण को सुनकर तत्काल अपने प्राणों को छोड़ दिया २५ ततस्तथा महाक्रन्दः पौराणां भवनेष्वभूत् यथैव तस्य नृपतेः स्वगेहे समवर्त्तत ||२६||

इसके अनन्तर नगर-निवासियों के घर में भी महान् सदन हुआ और जिस प्रकार राजा के महल में शोक था उसी प्रकार सर्वत्र शोक छा गया २६ राजा च तां मृतां दृष्ट्वा विना भर्चा मदालसाम् प्रत्युवाच जनं सर्व्वं विमृष्य सुस्थमानसः ||२७||

पति-वियोग में मदालसा का मरण देखकर स्वस्थ मन होकर राजा प्रजाजनों से बोले २७ न रोदितव्यं पश्यामि भवतामात्मनस्तथा सर्व्वपामेव संचिन्त्य सम्बन्धानामनित्यताम् ||२८||

आप लोग न रोवें, मैं देखता हूँ कि मेरा, आपका तथा इसी प्रकार संसार के संव सम्वन्ध अनिश्चित और निःसार हैं ||२८|| किं नु शोचामि तनयं किं नु शोचाम्यहं स्नुषाम् विमृष्य कृतकृत्यत्वान्मन्येऽशोच्यावुभावपि २६

मैं किस का शोक करूँ, पुत्र का अथवा पुत्र बधू का ? मैं तो दोनों को प्रशोचनीय समझकर अपने को कृतार्थ मानता हूँ || २ || मच्छुश्रूषुर्मद्वचनाद्वद्विजरक्षणतत्परः

प्राप्तो मे यः सुतो मृत्युं कथं शोच्यः स धीमताम् ३०|| मेरी सेवा करते हुए और मेरी श्राज्ञा से ब्राह्मणों की रक्षा में तत्पर होकर मेरे पुत्र ने मृत्यु पाई, इसलिये क्या वह शोक करने योग्य है ? जो देह कि निश्चय नाशवान है

अवश्यं याति यदहं तद्विजानां कृते यदि

मम पुत्रेण सन्त्यक्तं नन्वभ्युदयकारि तत् ॥३१॥

हो। इसके विपरीत तो पति के साथही मृदीको वह यदि ब्राह्मणों के निमित्त मेरे पुत्र ने छोड़ी तो निश्चय ही कल्याणकारी हुआ ३१ इयश्च सत्कुलोत्पन्ना भर्त्तर्येवमनुव्रता कथं नु शोच्या नारीणां भर्त्तुरन्यन्न दैवतम् ॥३२॥

और यह उत्तम कुल में उत्पन्न, स्वामी में रत, जो पति को ही अनन्य देवता समझती थी ऐसीक्या सोच करने योग्य है ? ॥३२॥ अस्माकं बान्धवानाञ्च तथान्येषां दयावताम् शोच्या होणा भवेदेवं यदि भर्त्ता वियोगिनी ||३३|||

यह यदि से वियोगिनी होकर जीवित रहती तो हम से बान्धवों से, तथा अन्य दयालुत्रों से शोचनीय जाती ||३३|| या तु भर्त्तर्वधं श्रुत्वा तत्क्षणादेव भाविनी भर्त्तारमनुयातेयं न शोच्यातो विपश्चिताम् ||३४||

इस भाविनी का बुद्धिमानों को शोक करना चाहिये कारण रहा पति का मरण सुनं कर उसी पर अपने स्वामीक पीछे चली गई । स्त्री का हिल्स करना चाहिये जो वियोगिनी होग ताः शोच्या या वियोगिन्यो न शोच्या या मृताः सह भर्त्तुर्वियोगस्त्वनया नानुभूतः कृतज्ञया ३५॥

होगई हो उसका सोच नहीं करना चाहिये इस को धन्य है, कारण इसने पतिके वियोग का अनु भव ही नहीं किया ३५ दातारं सर्व्वसौख्यानामिह चामुत्र चोभयाः लोकयोः का हि भर्त्तारं नारी मन्येत मानुषम् ||३६||

स्वामी इस लोक, तथा परलोक में सब सुख का देने वाला है वह स्त्री क्या जो पति को साधारण मनुष्य समझे ३६ नासौ शोच्यो न चैवेयं नाहं तज्जननी न च त्यजता ब्राह्मणार्थाय प्रारणान् सर्व्वे स्मतारिताः ३७||

अपने पुत्र का मुझको तथा उसकी माता को शोक नहीं करना चाहिये | इसने तो ब्राह्मणों की रक्षा में प्राण त्याग कर हम सबको तार दिया है ३७ विप्राणां मम धर्म्मस्य गतः स हि महामतिः आनृण्यमर्द्धभुक्तस्य त्यागाद्देहस्य मे सुतः ||३८||

उस महामति मेरे पुत्र ने मेरे धर्म तथा ब्राह्मणों की रक्षा के निमित्त उस देह को त्यागा है जिसे कि काल हर समय श्राधा मुख में रखता है ३८ मातुः सतीत्वं मद्वंश वैमल्यं शौर्य्यमात्मनः संग्रामे सन्त्यजन् प्राणान् नात्यजद्विद्वजरक्षणे ३६

मेरे वंश में माता का सतीत्व भी निर्मल है कि जिसके शूरवीर पुत्र ने संग्राम में प्राणों को छोड़ दिया परन्तु ब्राह्मणोंकी रक्षा करना न छोड़ा ॥३॥ पुत्रावूचतुः ततः कुवलयाश्वस्य माता भर्त्तुरनन्तरम् श्रुत्वा पुत्रवधं तादृक् प्राह दृष्ट्वा तु तं पतिम् ॥४०॥

नागपुत्र बोले- फिर पति के बाद कुवलयाश्व की माता पुत्र का मरण सुनकर अपने पति की ओर देख कर बोली ४० मातोवाच न मे मात्रा न मे स्वस्त्रा प्राप्ता प्रीतिनृपेदृशी श्रुत्वा मुनिपरित्राणे हतं पुत्रं यथा मया ४१।.

माता बोली- हे राजन् ! न तो मेरी माता और न मेरी सांसही ने इतना यश पाया जितना कि मैंने मुनियों की  रक्षा करते करते हुए अपने पुत्र के मरण को सुनकर पाया ४१ शोचतां बान्धवानां ये निश्वसन्तो ऽतिदुःखिताः म्रियन्ते व्याधिना क्लिष्टास्तेषां माता वृथाप्रजा ४२ ||

शोक तो उन पुत्रों के लिये करना चाहिये जो रोग से दुखित होकर भरते हैं, ऐसे पुत्रों की माता का सन्तान उत्पन्न करना वृथा ही ||४२|| संग्रामे युध्यमाना येऽभीता गोद्विजरक्षणे क्षुण्णा शस्त्रैर्विपद्यन्ते त एव भुवि मानवाः ४३

संग्राम में युद्ध करता हुआ जो निडर हो कर गो ब्राह्मण की रक्षा के निमित्त तीक्ष्ण शस्त्र से बध को प्राप्तहो वह मनुष्य ||४३|| अर्थिनां मित्रवर्गस्य विद्विषाञ्च पराङ्मुखम् यो न याति पिता तेन पुत्री माता च वीरसूः ४४

और जो ज़रूरत वाले अपने मित्रों तथा वैरियों को भी विमुख, न करे, ऐसे वीर पुत्र से पिता पुत्रवान् तथा माता पुत्रवती होती है ४४ गर्भशः स्त्रियो मन्ये साफल्यं भजते तदा यदारिविजयी वा स्यात् संग्रामे वा हतः सुतः || ४५|| प्रसव में जो स्त्रियाँ पीड़ा उठाती हैं वह तब ही सफल होती हैं जबकि युद्ध में उनके पुत्र शत्रु को जीतें अथवा रणस्थल मैं ही मृत्यु को प्राप्त हों ४५

पुत्रावूचतुः ततः स राजा संस्कारं पुत्रपत्नीमलम्भयत् निर्गम्य च वहिः स्नातो ददौ पुत्राय चोदकम् ४६

नागपुत्र बोले-

फिर राजा शत्रुजितने अपनी पुत्रबधू मदालसा का मृत- संस्कार किया तथा नगर से बाहर जाकर स्नान करके अपने पुत्र को तिलाञ्जलि दी ४६ तालकेतुश्च निर्गम्य तथैव यमुनाजलात् राजपुत्रमुवाचेदं प्रणयान्मधुरं वचः ॥४७||

तालकेतु ने भी उसी यमुना जल से निकल कर राजकुमार से विनय पूर्वक मीठी वाणी से कहा ॥ ४७

गच्छ भूपालपुत्र त्वं कृतार्थोऽहं कृतस्त्वया कार्य्यं चिराभिलषितं त्वय्यत्र विचले स्थिते ||४८ |||

हे राजकुमार ! तुम जाओ, तुमसे मैं कृत- कृत्य हुआ, और तुम्हारे यहाँ अचल होकर रहने. से मेरी पुरानी मनोवांछा पूर्ण हुई ४८

वारुणं यज्ञकार्यञ्च जलेशस्य महात्मनः मन्मायासाधितं सर्व्वं यन्ममासीदभीप्सितम् ||४६ महात्मा वरुण का वारुण-यज्ञ जिसको कि करने की मेरी अभिलाषा थी, तुम्हारी कृपा से वह मैंने पूर्ण किया ४६

मणिपत्य स तं प्रायाद्राजपुत्त्रः पुरं पितुः

समारुह्य तमेवाश्वं सुपर्णानिलविक्रमम् ||५० ||  वह राजकुमार उसको प्रणाम करके तथा अपने घोड़े पर चढ़कर जो कि वेग में गरुड़ और वायु के समान था अपने पिताके नगर की ओर चला ५० इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में मदालसा - वियोग नाम बाईसवां अध्याय समाप्त |