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मार्कण्डेयउवाच

अथारुरोहस्वरथंमणिपत्यमहामुनिम्। तेनाख्यातंवनंतच्चप्रययावत्पलावतम्॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

इसके बाद राजा महामुनि को प्रणाम कर. अपने रथ पर चढ़ मुनिके बताये हुए उत्पलावर्तकवन की ओर चला ॥ १ ॥

यथाख्यातस्वरूपाञ्चभाय्यीभर्त्राद्विजस्यताम्। भक्षयन्तींददर्शाथश्रीफलानिनरेश्वरः॥२

वहाँ पहुँच कर राजा नेएक स्त्री को जिसका स्वरूप बिल्कुल वैसाही था जैसा कि उस ब्राह्मण ने अपनी स्त्री का बतायाथा देखा || २

पमंच्छचकथंभद्रेत्वमेतद्वनमागता। स्फुटंब्रवीहिवैशालेरपिभार्यासुशर्मणः॥३

राजाने उससे पूछा, "हे भद्रे ! तुम इस वन में कैसे आई ? सत्य कहो, तुम तो विशालनाम ब्राह्मण के पुत्र की स्त्री हो” ॥ ३ ॥

ब्राह्मरा: वाच सुताहमतिरात्रस्यद्विजस्यवनवासिनः। पत्नीविशालपुत्रस्ययस्यनामत्वयोदितम्॥४

ब्राह्मणी बोली-

मैं वनवासी ब्राह्मण श्रतिरात्र की पुत्री हूं  तथाजिसका आपने नाम लिया उस विशाल पुत्र कीस्त्री हूँ ॥ ४ ॥

साहंहृताबलाकेनराक्षसेनदुरात्मना। प्रसुप्ताभवनस्यान्तेभ्रातृ-मातृवियोजिता॥५

मुझको बलाक नाम दुष्ट राक्षस ने रात्रि में सोते हुए घर से चुरा लिया है तथा इसी कारण मेरा भाई ! माता और पति से वियोग होगया है ||५||

भस्मीभवतुतद्रक्षोयेनास्म्येवंवियोजिता। मात्राभ्रातृभिरन्यैश्वतिष्ठाम्यत्रसुदुःखिता॥६

जिस राक्षस ने कि मेरा माता औरभाई-बन्धुत्रों से वियोग करा दिया है वह जलकर

भस्म होजाय, मैं यहाँ अत्यन्त दुःखित होकररहती हूँ ||६||

अस्मिन्वनेऽतिगहनेतेनानीयाहममुज्झिता। नवेद्मिकारणंकिंतन्नोपभुंक्तेनखादति॥७

इस अत्यन्त गहन वन में उसने मुझे लाकर रक्खा है, मुझे इसका कारण नहीं मालुम है

परन्तु न तो वह मुझसे भोग की ही इच्छा रखताहै और न मुझे खाता ही है ॥ ७ ॥

राजोवाच अपि · तज्ज्ञायतेरक्षस्त्वामुत्सृज्यकेवैगतम्। अहंभर्त्रातवैवात्रप्रेषितोद्विजनन्दिनि॥८

 राजा वोले-

हे ब्राह्मणी ! क्या तू जानती है कि वह राक्षस तुझे छोड़कर कहाँ गया । मैं तेरे स्वामी का भेजाहुआ आया हूँ ॥ ८ ॥

ब्राह्मण्युवाच

अस्यैवकाननस्यान्तेसतिष्ठतिनिशाचरः। प्रविश्यपश्यतुभवान्नविभेतिततोयदि॥६

ब्राह्मणी बोली--

इसी वन के दूसरे छोर पर वह राक्षस रहताहै।  यदि आपको भय न हो तो वन में प्रवेश करदेख लीजिये ॥ ६ ॥

मार्कण्डेयउवाच मविवेशततःसोऽथतयावर्त्मनिदर्शिते। ददृशेपरिवारेणसमवेतञ्चराक्षसम्॥१०॥

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर राजा ने ब्राह्मणी के बताये हुए मार्ग से वन में प्रवेश किया और शीघ्र ही परिवार समेतराक्षस को देखा ॥ १० ॥

दृष्टमात्रेततस्तस्मिनत्वरमाण: सराक्षसः। दूरादेवमहींमूर्ध्नास्पृशनपादान्तिकंययौ॥११

शीघ्र वह राक्षस राजाको,देखते ही दूर से ही झुक कर प्रणाम करता हुआ राजा के निकट पहुँचा ॥११॥

राक्षसउवाच

ममात्रागच्छतागेहूं. प्रसादस्तेमहान्कृतः।

प्रशाधिकिंकरोम्येषवसामिविषयेतव ||१२||

राक्षस बोला-

आप जो यहाँ मेरे घर पर आये यह आपकी बड़ी कृपा है, क्योंकि मैं आपके राज्य में रहता

इसलिये आज्ञा दीजिये कि मैं क्या करूँ ॥ १२ ॥

श्रमंप्रतीच्छत्वंस्थीयताञ्चेदमासनम्। वयंभृत्याभवान्स्वामीदृढ़माज्ञापयस्वमाम् || १३|

आप इस को लीजिये तथा इस आसनवैठिये ।  आप स्वामी हैं और हम सेवक हैं, आपआज्ञा करें ॥ १३ ॥

राजोवाच कृतमेवत्वयासर्व्वंसर्व्वमेवातिथिक्रियाम्। किमर्थंब्राह्मणबधूस्त्वयानीतानिशाचर॥१४॥

हे राक्षस ! तुमने यह सब अतिथि सत्कार तो किया परन्तु यह बताओ कि तुम इस ब्राह्मण कीस्त्री को क्यों ले आये हो ? ॥ १४ ॥

नेयंसुरूपासन्त्यन्याभार्यार्थञ्चेतहृतात्वया भक्ष्यार्थंचेत्कथंनात्तात्वयैतत्कथ्यतांमम॥१५॥

राजा बोले--

 यदि तुम इसको अपनी स्त्री बनाने के लिये लाये हो तो यहस्वरूपवान् नहीं वरन् कुरूपा है

और यदि खाने केलिये लाये हो तो तुमने इसको अबतक क्यों नहींखाया, यह मुझसे कहो ॥ १५ ॥

राक्षसउवाच

नवयंमानुषाहाराअन्येतेनृपराक्षसाः। सुकृतस्यफलंयत्तुतदश्नीमोवयंनृप ||१६||

राक्षस बोला-

हे राजन् ! हम लोग मनुष्य भक्षी नहीं हैं, वे राक्षस दूसरे हैं । हम लोग इस बनके उत्तम फलखाते हैं ॥ १६ ॥

स्वभावंचमनुष्याणांयोषितांचविमानिताः। मानिताश्चसमश्रीमोनवयंजन्तुखादकाः॥१७॥

मेरा तथा मेरी स्त्रियों का स्वभाव:मनुष्यों जैसा है।  मैं अपनी स्त्रियों का मान करताहूँ तथा वे मेरा करती हैं, हम मनुष्य भक्षी नहीं हैं॥ १७ ॥

तदस्माभिनृणांक्षान्तिभुक्ताक्रुध्यन्तितेतदा। भुक्तेदुष्टेस्वभावेचगुणवन्तोभवन्तिच॥१८॥

क्योंकि मैं मनुष्यों पर दया करता हूँ इस लिये वे मुझसे क्रुद्ध रहते हैं, यदि मैं भी दुष्ट

स्वभाववाला होता तो वे मुझको गुणवान् समझते॥१८॥

सन्तिनःप्रमदाभपरूपेणाप्सरसांसमाः। राक्षस्यस्तासुतिष्ठत्सुमानुषीषुरतिःकथम्॥१६॥

  हे राजन् ! हमारे यहाँ अनेक स्त्रियाँ अप्सरात्रों के समान रूपवान् हैं, उन सुन्दर राक्षसियों

के होते हुए मेरी कुरूपा मनुष्य- स्त्रियों में प्रीतिकैसे होगी ? ॥ १६ ॥

राजोवाच

यद्येषानोपभोगायनाहारायनिशाचरं। गृहंप्रविश्यविप्रस्यतत्किमेषाहृतात्वया॥२०

राजा बोले-

हे निशाचर ! यदि यह ब्राह्मणी न तो भोग के लिये और न खाने के लिये है तो तुमने ब्राह्मण केघर में घुस कर इसको क्यों हरण किया ? ॥ २० ॥

राक्षसउवाच

मन्त्रवित्सद्विजश्रेष्ठोयज्ञेयज्ञेगतस्यमे। रक्षोघ्नमन्त्रपठनात्करोत्युच्चाटनंनृप॥२१॥

राक्षस बोला-

हे राजन् ! वह ब्राह्मण - मन्त्रज्ञ है और जिस यज्ञ में मैं जाता हूँ वहाँ ही से रक्षोघ्न मन्त्र पढ़करवह मेरा उच्चाटन करदेता है ॥ २१ ॥

वयंयुभुक्षितास्तस्यमन्त्रोच्चाटनकर्म्मणा। कयामःसर्व्वयज्ञेषुसऋत्विग्भवतिद्विज ||२२||

उसके मन्त्रउच्चारण से हम लोग भूखे हैं , हे राजन् ! अब हम कहाँ जाँय क्योंकि वह सभी यज्ञों में ऋत्विकहोता है ॥ २२ ॥

ततोऽस्माभिरिदंतस्यवैकल्यमुपपादितम्। पल्याविनापुमानिज्याकर्म्मयोग्योनजायते॥२३

इसलिये हमने इसके लिये यहउपाय निकाला है ।  स्त्री के विना वह यज्ञकर्म करनेके योग्य न रहेगा ॥ २३ ॥

मार्कण्डेयउवाच वैकल्योच्चारणात्तस्यब्राह्मणस्यमहामंतेः। ततःसराजातिभृशंविषस्मःसमजायत ||२४||

मार्कण्डेयजी बोले-

हे कि ! उस ब्राह्मण की यह विकलता का विचार करके राजाको अत्यन्त दुःख होने लगा ॥२४॥

चैकल्यमेवविप्रस्यवदनमामेवनिन्दति।

न च मां सोऽप्याह मुनिसत्तमः ||२५||

उसब्राह्मणकीविकलताकावर्णनकरकेयह.. राक्षसमेरीनिन्दाकरताहै, मुनिनेभीमुझेअर्ध्य केयोग्यबतायाथा॥२५॥

वैकल्यंतस्यविप्रस्यराक्षसोऽप्याहमेयथा।

पत्नीकतयासोsहंसङ्कटंमहदास्थितः ||२६||

राक्षसने उस ब्राह्मण,की विकलता बतलाकर मानों मेरी ही विकलताबताई है। बिना स्त्री के मैं अत्यधिक सङ्कटापन्नहो गया हूँ ॥ २६ ॥

मार्कण्डेयउवाच

एवंचिन्तयतस्तस्यपुनरप्याहराक्षसः। मरणमनम्नोराजानंबद्धाञ्जलिपुटोमुने ||२७||

मार्कण्डेयजी बोले-

हे मुनि ! इस प्रकार सोच करते हुए उस राक्षस ने राजा से हाथ जोड़ कर प्रणाम करतेहुए कहा ॥ २७ ॥

राक्षसउवाच नरेन्द्राज्ञाप्रदानेनप्रसादःक्रियतांमम। भृत्यस्यप्रणतस्यत्वंयुष्मद्विपयवासिनः ||२८||

राक्षस बोला-

हे राजन् ! मुझ दीन सेवक पर श्राप कृपा करके आज्ञा दीजिये, हम आपके राज्य में रहनेवाले हैं ॥ २८ ॥

राजोवाच स्वभावंवयमश्श्रीमस्त्वयोक्तंयन्निशाचर। तदर्थिनोवयंयेनकाय्र्येणभृगुतन्मम ||२६||

राजा बोले-

हे राक्षस ! जिस प्रकार ब्राह्मण है उसी प्रकार मेरा भी हाल है । इसलिये जो मैं कहूँ वह सुनो।२६ ॥

 अस्यास्त्वयाद्यब्राह्मण्यादौःशील्यमुपभुज्यताम्।

येनत्वयात्तदौःशील्यातद्विनीताभवेदियम्॥३०

आज तुम इस ब्राह्मणी के दुःशील को भक्षण कर जानी जिससे कि यह अपने दुःशीलको छोड़ कर नम्र हो जावे ॥ ३० ॥

नीयतांयस्यभाय्यैयंतस्यवेश्मनिशाचर। अस्मिन्कृतेकृतंसर्व्वगृहमभ्यागतस्यमे ||३१||

 हे निशाचर ! फिर इसको उस ब्राह्मण के घर पहुँचा देना जिस की कि यह स्त्री है, तुम्हारे ऐसा करने पर मेरेयहाँ आने का आशय पूर्ण हो जायगा ॥ ३१ ॥

मार्कण्डेयउवाच ततःसराक्षसस्तस्याःप्रविश्यान्तःस्वमायया। भक्षयामासदौःशील्यंनिजशक्त्यानृपाज्ञया ||३२||

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर वह राक्षस राजा की आज्ञा के अनुसार ' अपनी माया से उस ब्राह्मणी के अन्दर घुस गया

और उसने अपनी शक्ति से उसके दुःशील को खालिया ॥ ३२ ॥

दौःशील्येनातिरौद्रेणपत्नीतस्यद्विजन्मनः। तेनसासम्परित्यक्तातमाहजगतीपतिम् ||३३

जब उस ब्राह्मणी की वह भीषण दुःशीलता निकल गई तब वह राजा के प्रति बोली'॥३३॥

स्वकर्म्मफलपाकेनभर्त्तुस्तस्यमहात्मनः। वियोजिताहंतद्धेतुरयमासीन्निशाचरः ||३४||

अपने कर्म के फलसे ही मेरा अपने महात्मा पति से वियोग होकर इस राक्षस का साथ हुआ॥ ३४ ॥

नास्यदोषोनवातस्यममभर्त्तुर्महात्मनः। ममैवदोषोनान्यस्यसुकृतंद्युपभुज्यते॥३५.

  इस राक्षस का और उस महात्मा मेरे पति, का कोई दोष नहीं है तथा न यह और किसी कादोप है, यह मेरे किये कर्म का भोग है ॥ ३५ ॥

अन्यजन्मनिकस्यापिविप्रयोगःकृतोमया। सोऽयंमयाप्युपगतःकोदोषोऽस्यमहात्मनः॥३६॥

पूर्व जन्म में मैंने किसी का वियोग किया होगा जिसके कारण कि मुझे वियोग सहना पड़ा । इसमहात्मा का कोई दोष नहीं है ||३६||

राक्षसउवाच प्रापयामितवादेशादिमांभृर्तृगृहंप्रभो।

यदन्यत् करणीयं ते तदाज्ञापय पार्थिव ||३७||

राक्षस वोला--

हे प्रभु ! आपकी आज्ञा से मैं इसे पति के घर पहुँचाता हूँ । हे राजन् ! अव जो कुछ औरकरना हो उसे आज्ञा करें ||३७||

राजोवाच

अस्मिन्कृतेकृतंसर्व्वंत्वयामेरजनीचर | आगन्तव्यश्चतेवीरकाकालेस्मृतेनमे ||३८||

राजा बोले- हेनिशाचर! इतना करने पर मैं समभंगाकितुमने सब कुछ करदिया। कार्यहोने परमैंतुम कोयादकरूँ तोतुममेरेपासथाना || ३८||

मार्कण्डेयउवाच

तथेत्युक्त्वातुतद्रक्षस्तामादायद्विजाङ्गनाम्। निन्येभृर्त्तृगृहंशुद्धांदौःशील्यापगमात्तदा॥३६॥

मार्कण्डेयजीबोले- राजाकेयहकहनेपरउसराक्षसनेउस ब्राह्मणीकोजिसकाकिदुःशीलनएहोगयाथां उसे पति केघर पहुँचा दिया॥३६॥ इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंऔौतममन्वन्तरमेंद्विजभार्यानयननाम७०वांअध्यायसमाप्त |