मार्कण्डेय महा पुराण
83
ऋषिरुवाच
निहन्यमानंतत्सैन्यमवलोक्यमहासुरः। सेनानीश्चिक्षुरःकोपाद्वययौयोद्धुमथाम्बिकाम्॥१॥
ऋषि बोले--
उस सेना को मरते हुए देखकर महान् असुर सेनापति चिनुर क्रोधान्वित होकर अम्बिका सेयुद्ध करने को गया ||१||
सदेवींशरवर्षेणववर्षसमरेऽसुरः। यथामेरुगिरेःशृङ्गंतोयवर्षेणतोयदः॥२
जिस प्रकार मेरु पर्वत पर मेघ जल की वर्षा करते हैं उसी तरह युद्ध में उस असुर ने देवी पर बाणों की वर्षा की ॥ २ ॥
तस्यच्छित्त्वाततोदेवीलीलयैवशरोत्करान्। जघानतुरगान्वाणैर्यन्तारंचैववाजिनाम्॥३॥
उसकेतीक्ष्ण बाणों को देवी ने खेल की तरह काट डाला और उसके घोड़ों को उनके सारथियों सहित मारडाला ॥ ३ ॥
चिच्छेदचधनुःसद्योध्वजंचातिसमुच्छ्रितम्। विव्याधचैवगात्रेषुच्छिन्नधन्वानमाशुगैः॥४
और शीघ्र उसके धनुष और ऊँची ध्वजा को भी काटडाला तथा उस राक्षसके शरीर को अपने बाणों से छेद डाला ||४||
सच्छिन्नधन्वाविरथोहताश्वोहतसारथिः। अभ्यधावततांदेवींखड्गचर्म्मधरोऽसुरः॥५॥
जब उस राक्षसके धनुष, रथ, अश्व और सारथि नष्ट होगये तथ वह तलवार लेकर देवी के ऊपर दौड़ा ||५ ||
सिंहमाहत्यखड्गेनतीक्ष्णधारेणमूर्द्धनि। आजघानभुजेसव्येदेवीमप्यतिवेगवान्॥६
उसने तलवार की तीक्ष्ण धार से सिंह को शिर में घायल किया और अत्यन्त वेग से देवी की भुजा में तलबार मारी ॥ ६ ॥
तस्याःखड्गोभुजंप्राप्यपफालनृपनन्दन। ततोजग्राहशूलंसकोपादरुणलोचनः॥७
हे सुरथ ! वह तलवार उस देवी की भुजा से लगकर टुकड़े २ होगई, तब क्रोध से
आँखें लाल करके उस राक्षस ने शूल को ग्रहणकिया ॥ ७ ॥
चिक्षेपचततस्तत्तुभद्रकाल्यांमहासुरः। जाज्वल्यमानंतेजोभीरविविम्वमित्राम्बरात्॥८
उस महासुर ने आकाश से सूर्य के समान चमकता हुआ वह शूल भद्रकाली के ऊपरफेंका ॥ ८ ॥
दृष्ट्वातदापतच्छूलंदेवीशूलममुञ्चत। तच्छूलंशतधातेननीतंसचमहासुरः॥६
उस शलको श्राता हुआ देखकर देवी ने अपना शलछोड़ा जिसने कि राक्षसके शूल और
राक्षस चिक्षुर के सौ-सौ टुकड़े कर दिये ॥ ६ ॥ -
हतेतस्मिन्महावीर्येमहिषस्यचमूपतौ।
गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्द्दनः॥१०॥
महिषासुर के सेनापति महा बलवान् चिक्षुर केमरने पर देवताओं का वैरी चामर हाथी पर चढ़कर श्राया || १०|| श्राजगाम
सोऽपिशक्तिमुमोचाथदेव्यास्तामम्विकाद्रुतम्। ढुङ्काराभिहतांभूमौपावयामासनिष्पभाम्॥११॥
उसने भी देवी अम्बिकापर बड़ी तेजी से एक शक्ति चलाई जो कि देवी की हुँकार मात्र से पृथ्वी पर निस्तेज होकर गिर पड़ी ॥११॥
भग्नांशक्ति : निपतितांदृष्ट्वाक्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं वाणैस्तदपि सोऽच्छिनत् ॥ १२॥
शक्तिकोटूटकरपृथ्वीपरगिरतेहुएदेखकर चामरनेशूलकोछोड़ाजिसेकिदेवीनेबाणसे • काटडाला॥१२॥
ततःसिंहःसमुत्पत्यगजकुम्भान्तरेस्थितः। बाहुयुद्धेनयुयुधेतेनोचैस्त्रिदशारिणा॥१३॥
फिर सिंह कूद कर हाथी केमस्तक पर चढ़ गया और वहाँ उस देवताओं केबैरी से बाहु युद्ध करने लगा ॥ १३ ॥
युध्यमानौततस्तौतुतस्मान्नागान्महींगतौ। युयुधातेऽतिसंरब्धौप्रहारैरैतिदारुणैः॥१४॥
वे दोनों युद्ध करते हुए उस हाथी से उतर कर पृथ्वी पर आये और एक दूसरे पर प्रहार करते हुए दारुणयुद्ध करने लगे || १४ ||
ततोवेगात्खमुत्पत्यनिपत्यचमृगारिणा। करमहारेणशिरश्चामरस्यपृथक्कृतम्॥१५॥
फिर उस सिंह ने कूद कर तमाचे के प्रहार से चामर का शिर धड़ से अलगकर दिया ॥ १५ ॥
उदग्रश्चरणेदेव्याशिलावृक्षादिभिर्हतः। दन्तमुष्टितलैश्चैवकरालश्चनिपातितः॥१६॥
देवी ने समर में उदग्र को शिला और वृक्षादिसे मारडाला और कराल नाम राक्षस का दाँत, मुष्टि और हाथों से वध कर दिया ॥१६॥
देवीक्रुद्धागदापातैश्चूर्णयामासचोद्धतम्। वाष्कलंभिन्दिपालेनवाणैस्ताम्रतथान्धकम् || १७||
देवी ने क्रुद्ध होकर गदा से उद्धत को चूर्ण कर डाला तथा उसने भिंदिपाल से वाष्कल और बाणों से ताम्र और अन्धक का वध कर दिया ॥ १७ ॥
उग्रास्यमुग्रवीर्य्यञ्चतथैवचमहाहनुम्। त्रिनेत्राचत्रिशूलेनजघानपरमेश्वरी॥१८॥
त्रिनेत्रा परमेश्वरी ने शूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य । श्ररमहाहनु नाम राक्षसों का वध कर दिया ॥ १८ ॥
चिड़ालस्यासिनाकायात्पातयामासवैशिरः। दुर्द्धरंदुर्मुखंचोभौशरैर्निन्येयमक्षयम्॥१६॥
विडाल का शिर तलवार से काट कर पृथ्वी पर डाल दिया तथा दुर्द्धर और दुर्मुखनाम दो राक्षसों
को बाणों से मार कर यमपुर भेज दिया ॥ १६॥
एवंसंक्षीयमाणेतुस्वसैन्येमहिषासुरः। माहिषेणस्वरूपेणत्रासयामासतान्गणान्॥२०॥
अपनी सेना के इस प्रकार क्षीण होने पर महिषा- सुर महिष रूप से देवों के गणों को त्रास देनेलगा२० ॥
कांश्चित्तुण्डमहारेणखुरक्षेपैस्तथापरान्। लांगूलताड़ितांश्चान्यान्शृङ्गाभ्याश्चविदारितान्२१
महिषासुर ने कुछ को तुण्ड के प्रहार से, कुछ को खुरों की मार से और कुछ को पूंछ से:
मारा । कुछ गणों को उसने अपने सींगों से रडाला ॥ २१ ॥
वेगेनकांश्चिदपरान्नादेनभ्रमरणेनच। निश्वासपवनेनान्यान्पातयामासभूतले ||२२||
उसने कुछ गणों को वेगसे, कुछ को अपने श्वास की हवा से पृथ्वी पर गिरा दिया ||२२
निपात्यप्रमथानीकमभ्यधावतसोऽसुरः। सिंहंहन्तुंमहादेव्याःकोपंचक्रेततोऽम्बिका॥२३॥
नाद, कुछ को घूमने की चपेट से तथा कुछ को गणों को मार कर वह असुर देवी के सिंह को
मारने के लिये दौड़ा और तब अम्बिका ने बहुतक्रोध किया || २३ ||
सोऽपिकोपान्महावीर्य्यःखुरक्षुण्णमहीतलः। शृङ्गाभ्यांपर्व्वतानुच्चांश्चिक्षेपचननादच॥२४
और वह महाबलवान् महिषा- सुर भी क्रोध करके पृथ्वी को खुरों से खोदनेलगा तथा वह सींगों से पर्वतों को उखाड़ कर गर्जा ॥२४
वेगभ्रमणविक्षुणामहीतस्यव्यशीर्यत। लाङ्गुलेनाहतश्चाव्धि: प्लावयामाससर्व्वतः ||२५||
उसके चलने फिरने के वेग से पृथ्वी फटगई और उसकी पूँछ के वेग से समुद्र हिलकर सबकोप्लावित करने लगा ॥ २५ ॥
धुतशृङ्गविभिन्नाश्चखण्डखण्डंययुर्घनाः। श्वासानिलास्ताःशतशोनिपेतुर्नभसोऽचलाः॥२६॥
उसके सींगके हिलाने।की हवाओं से पर्वत टुकड़े २ होकर पृथ्वी पर से बादलोंके टुकड़े-टुकड़े होगये और उसके श्वासगिर पड़े ||२६||
इतिक्रोधसमाध्मातमापतन्तंमहासुरम्। दृष्ट्वासाचण्डिकाकोपंतद्वधायतदाऽकरोत् ||२७||
इस प्रकार क्रोध युक्त उस महिषा- सुर को आते हुए देखकर चण्डिकाने उसका हननकरने को क्रोध किया ||२७|| साक्षिप्त्वातस्यवैपाशंतंबबन्धमहासुरम्। तत्याजमाहिषंरूपंसोऽपिबद्धोमहामृधे॥२८
देवी ने पाश फेंक करशाली राक्षस ने अपने उस महिष रूप को छोड़ उस महान राक्षस को बाँध लिया परन्तु उस बल-दिया ॥ २८ ॥
ततःसिंहोऽभवत्सद्योयावत्तस्यास्त्रिकाशिर।
छिनत्ति तावत् पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत २६ ॥
औरवहशीघ्रसिंहबनगयाऔरजब तक कि अम्बिका उसका शिर काटने को गई वह हाथ में तलवार लिये हुए एक पुरुष के रूप मेंदिखाई दिया ||२६||
ततएवाशुपुरुषंदेवीचिच्छेदशायकैः। तंखड्गचर्म्मणासार्द्धंततःसोऽभून्महागजः॥३०॥
फिर इस पुरुष रूप महिषासुर को देवी ने वाणों से छेदन किया तो वह पुरुष के द्वेष को छोड़कर एक विशाल हाथी बन गया ||३०||
करेणचमहासिंहंतंचकर्षजगर्जच। कर्षतस्तुकरंदेवीखड्गेननिरकृन्तत | ३१||
फिर उसने अपनी सूंड़ से देवी के वाहन सिंह को खंच लिया और गरजने लगा। इसपर देवी ने उसकी तलवार से सूंड़ काट ली ||३१||
ततोमहासुरोभूयोमाहिषंवपुरास्थितः। तथैवक्षोभयामासत्रैलोक्यंसचराचरम् ||३२||
फिर वह महाअसुर पुनः महिष रूप से प्रकट हुआ जिससे चर और अचरयुक्त तीनों लोक क्षुभित होगये ॥ ३२ ॥
ततःक्रुद्धाजगन्माताचण्डिकापानमुत्तमम्। पपौपुनःपुनश्चैवजहासारुलोचना | ३३
तब क्रोधित हुई जगत की माता चण्डिका ने चार बार मदिरा पानकिया जिससे कि उनके नेत्र लालहोगये और वे हँसने लगीं ||३३||
ननईचासुरःसोऽपिबलवीर्य्यमदोद्धतः। विपाणाभ्याञ्चचिक्षेपचण्डिकांप्रतिभूधरान् |३४||
उधर वह असुर भी अपने वल से उन्मत्त होकर गरजने लगा और अपने सींगों से पहाड़ों को उखाड़ उखाड़ कर देवीके ऊपर फेंकने लगा || ३४ ॥
साचतान्प्रहितांस्तेनचूर्णयन्तीशरोत्करैः। उवाचतंमदोदभूत - मुखरागाकुलाक्षरम् ||३५||
देवी भी बाणों से उन पहाड़ों को चूर्ण करती हुई महिषासुर से बोली । मदिरा पान के कारण देवी का मुख मण्डल लालहो रहा था ॥ ३५ ॥
देव्युवाच
गर्जगर्जक्षणंमूढ़मधुयावत्पिवाम्यहम्। मयात्वयिहतेऽत्रैवगजिष्यन्त्याशुदेवताः॥३६
देवी बोली-
मूर्ख ! तू क्षण भर और गरज ले जब तक कि मैं मदिरा पान करूँ। मैं तुझको यहीँ मारूँगीऔर इसके बाद देवता लोग गजैंगे ||३६|| ऋषिरुवाच
एवमुक्त्वासमुत्पत्यसारूढ़ातंमहासुरम् | पादेनाक्रम्यकण्ठेचशूलेनैनमताडयत्॥३७॥
ऋषि बोले-
यह कहकर देवी कूद कर महिषासुर पर चढ़ गई और पाँव से दबाकर उसके करठ में एक शुलमारा ॥ ३७ ॥
ततःसोऽपिपदाक्रान्तस्तयानिजमुखात्ततः। ऋद्धनिष्क्रान्तएवातिदेव्यावीर्येणसंदृतः॥३८
तब वह देवी के चरणों से दवा हुआ होने के कारण पूरा न निकल सका और देवीं बल के प्रभाव से श्राधा ही निकला ॥ ३८ ॥
श्रद्धनिष्क्रान्तएवासौयुध्यमानोमहासुरः। तयामहासिनादेव्याशिरश्छित्त्वानिपातितः॥३६॥
निकला हुआ ही वह महा असुर युद्ध करने लगा तब देवी ने एक बड़ी तलवार से उसका
काट लिया जिससे कि वह पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३६ ॥
ततोहाहाकृतंसर्व्वंदैत्यसैन्यंननाशतत्। महर्षञ्चपरंजग्मुःसकलादेवतागणाः॥४०
फिर हाहाकार करती हुई दैत्यों की नाश को प्राप्त होगई और देवताओं को परम हैहुआ ॥ ४० ॥
तुष्टुवुस्तांसुरादेवींसहदिव्यैर्महर्षिभिः। जगुर्गन्धर्व्वपतयोननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४१॥
देवता और ऋषिगण देवी श्राराधना करने लगे तथा गन्धर्वपतिं गानेश्रप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४१ ॥ इतिश्री मार्कण्डेय०मेंसावर्णिकमन्वन्तरमेंदेवीमाहात्म्यमेंमहिषासुरबधनाम८३वाँप्र०स०।
Summary of chapter 82 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
When the titan Mahishāsura defeated the devas and usurped Indra's celestial throne, the devas gathered around Svayambhū Brahmā, Bhagavān Vishṇu, and Bhagavān Śiva in deep anguish. From the concentrated wrath and divine light emanating from all the devas, a magnificent female form manifested as the Supreme Goddess Mahālakshmī. Adorned with celestial weapons gifted by all devas—Śiva's trident, Vishṇu's discus, Varukṇa's noose, and Indra's thunderbolt—the Divine Mother unleashed a terrifying roar that shook the mountains and completely annihilated Mahishāsura's vast demonic armies led by Cikshura and Chāmara.