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ऋषिरुवाच

निहन्यमानंतत्सैन्यमवलोक्यमहासुरः। सेनानीश्चिक्षुरःकोपाद्वययौयोद्धुमथाम्बिकाम्॥१॥

ऋषि बोले--

उस सेना को मरते हुए देखकर महान् असुर सेनापति चिनुर क्रोधान्वित होकर अम्बिका सेयुद्ध करने को गया ||१||

सदेवींशरवर्षेणववर्षसमरेऽसुरः। यथामेरुगिरेःशृङ्गंतोयवर्षेणतोयदः॥२

जिस प्रकार मेरु पर्वत पर मेघ जल की वर्षा करते हैं उसी तरह युद्ध में उस असुर ने देवी पर बाणों की वर्षा की ॥ २ ॥

तस्यच्छित्त्वाततोदेवीलीलयैवशरोत्करान्। जघानतुरगान्वाणैर्यन्तारंचैववाजिनाम्॥३॥

उसकेतीक्ष्ण बाणों को देवी ने खेल की तरह काट डाला और उसके घोड़ों को उनके सारथियों सहित मारडाला ॥ ३ ॥

चिच्छेदचधनुःसद्योध्वजंचातिसमुच्छ्रितम्। विव्याधचैवगात्रेषुच्छिन्नधन्वानमाशुगैः॥४

और शीघ्र उसके धनुष और ऊँची ध्वजा को भी काटडाला तथा उस राक्षसके शरीर को अपने बाणों से छेद डाला ||४||

सच्छिन्नधन्वाविरथोहताश्वोहतसारथिः। अभ्यधावततांदेवींखड्गचर्म्मधरोऽसुरः॥५॥

जब उस राक्षसके धनुष, रथ, अश्व और सारथि नष्ट होगये तथ वह तलवार लेकर देवी के ऊपर दौड़ा ||५ ||

सिंहमाहत्यखड्गेनतीक्ष्णधारेणमूर्द्धनि। आजघानभुजेसव्येदेवीमप्यतिवेगवान्॥६

उसने तलवार की तीक्ष्ण धार से सिंह को शिर में घायल किया और अत्यन्त वेग से देवी की भुजा में तलबार मारी ॥ ६ ॥

तस्याःखड्गोभुजंप्राप्यपफालनृपनन्दन। ततोजग्राहशूलंसकोपादरुणलोचनः॥७

   हे सुरथ ! वह तलवार उस देवी की भुजा से लगकर टुकड़े २ होगई, तब क्रोध से

आँखें लाल करके उस राक्षस ने शूल को ग्रहणकिया ॥ ७ ॥

चिक्षेपचततस्तत्तुभद्रकाल्यांमहासुरः। जाज्वल्यमानंतेजोभीरविविम्वमित्राम्बरात्॥८

उस महासुर ने आकाश से सूर्य के समान चमकता हुआ वह शूल भद्रकाली के ऊपरफेंका ॥ ८ ॥

दृष्ट्वातदापतच्छूलंदेवीशूलममुञ्चत। तच्छूलंशतधातेननीतंसचमहासुरः॥६

उस शलको श्राता हुआ देखकर देवी ने अपना शलछोड़ा जिसने कि राक्षसके शूल और

राक्षस चिक्षुर के सौ-सौ टुकड़े कर दिये ॥ ६ ॥ -

हतेतस्मिन्महावीर्येमहिषस्यचमूपतौ।

गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्द्दनः॥१०॥

महिषासुर के सेनापति महा बलवान् चिक्षुर केमरने पर देवताओं का वैरी चामर हाथी पर चढ़कर श्राया || १०|| श्राजगाम

सोऽपिशक्तिमुमोचाथदेव्यास्तामम्विकाद्रुतम्। ढुङ्काराभिहतांभूमौपावयामासनिष्पभाम्॥११॥

उसने भी देवी अम्बिकापर बड़ी तेजी से एक शक्ति चलाई जो कि देवी की हुँकार मात्र से पृथ्वी पर निस्तेज होकर गिर पड़ी ॥११॥

भग्नांशक्ति : निपतितांदृष्ट्वाक्रोधसमन्वितः।

चिक्षेप चामरः शूलं वाणैस्तदपि सोऽच्छिनत् ॥ १२॥

 शक्तिकोटूटकरपृथ्वीपरगिरतेहुएदेखकर चामरनेशूलकोछोड़ाजिसेकिदेवीनेबाणसे • काटडाला॥१२॥

ततःसिंहःसमुत्पत्यगजकुम्भान्तरेस्थितः। बाहुयुद्धेनयुयुधेतेनोचैस्त्रिदशारिणा॥१३॥

फिर सिंह कूद कर हाथी केमस्तक पर चढ़ गया और  वहाँ उस देवताओं केबैरी से बाहु युद्ध करने लगा ॥ १३ ॥

युध्यमानौततस्तौतुतस्मान्नागान्महींगतौ। युयुधातेऽतिसंरब्धौप्रहारैरैतिदारुणैः॥१४॥

 वे दोनों युद्ध करते हुए उस हाथी से उतर कर पृथ्वी पर आये और एक दूसरे पर प्रहार करते हुए दारुणयुद्ध करने लगे || १४ ||

ततोवेगात्खमुत्पत्यनिपत्यचमृगारिणा। करमहारेणशिरश्चामरस्यपृथक्कृतम्॥१५॥

फिर उस सिंह ने कूद कर तमाचे के प्रहार से चामर का शिर धड़ से अलगकर दिया ॥ १५ ॥

उदग्रश्चरणेदेव्याशिलावृक्षादिभिर्हतः। दन्तमुष्टितलैश्चैवकरालश्चनिपातितः॥१६॥

देवी ने समर में उदग्र को शिला और वृक्षादिसे मारडाला और कराल नाम राक्षस का दाँत, मुष्टि और हाथों से वध कर दिया ॥१६॥

देवीक्रुद्धागदापातैश्चूर्णयामासचोद्धतम्। वाष्कलंभिन्दिपालेनवाणैस्ताम्रतथान्धकम् || १७||

देवी ने क्रुद्ध होकर गदा से उद्धत को चूर्ण कर डाला तथा उसने भिंदिपाल से वाष्कल और बाणों से ताम्र और अन्धक का वध कर दिया ॥ १७ ॥

उग्रास्यमुग्रवीर्य्यञ्चतथैवचमहाहनुम्। त्रिनेत्राचत्रिशूलेनजघानपरमेश्वरी॥१८॥

त्रिनेत्रा परमेश्वरी ने शूल से उग्रास्य, उग्रवीर्य । श्ररमहाहनु नाम राक्षसों का वध कर दिया ॥ १८ ॥

चिड़ालस्यासिनाकायात्पातयामासवैशिरः। दुर्द्धरंदुर्मुखंचोभौशरैर्निन्येयमक्षयम्॥१६॥

विडाल का शिर तलवार से काट कर पृथ्वी पर डाल दिया तथा दुर्द्धर और दुर्मुखनाम दो राक्षसों

को बाणों से मार कर यमपुर भेज दिया ॥ १६॥

एवंसंक्षीयमाणेतुस्वसैन्येमहिषासुरः। माहिषेणस्वरूपेणत्रासयामासतान्गणान्॥२०॥

अपनी सेना के इस प्रकार क्षीण होने पर महिषा- सुर महिष रूप से देवों के गणों को त्रास देनेलगा२० ॥

कांश्चित्तुण्डमहारेणखुरक्षेपैस्तथापरान्। लांगूलताड़ितांश्चान्यान्शृङ्गाभ्याश्चविदारितान्२१

महिषासुर ने कुछ को तुण्ड के प्रहार से, कुछ को खुरों की मार से और कुछ को पूंछ से:

मारा । कुछ गणों को उसने अपने सींगों से रडाला ॥ २१ ॥

वेगेनकांश्चिदपरान्नादेनभ्रमरणेनच। निश्वासपवनेनान्यान्पातयामासभूतले ||२२||

उसने कुछ गणों को वेगसे, कुछ को अपने श्वास की हवा से पृथ्वी पर गिरा दिया ||२२

निपात्यप्रमथानीकमभ्यधावतसोऽसुरः। सिंहंहन्तुंमहादेव्याःकोपंचक्रेततोऽम्बिका॥२३॥

नाद, कुछ को घूमने की चपेट से तथा कुछ को गणों को मार कर वह असुर देवी के सिंह को

मारने के लिये दौड़ा और तब अम्बिका ने बहुतक्रोध किया || २३ ||

सोऽपिकोपान्महावीर्य्यःखुरक्षुण्णमहीतलः। शृङ्गाभ्यांपर्व्वतानुच्चांश्चिक्षेपचननादच॥२४

और वह महाबलवान् महिषा- सुर भी क्रोध करके पृथ्वी को खुरों से खोदनेलगा तथा वह सींगों से पर्वतों को उखाड़ कर गर्जा ॥२४

वेगभ्रमणविक्षुणामहीतस्यव्यशीर्यत। लाङ्गुलेनाहतश्चाव्धि: प्लावयामाससर्व्वतः ||२५||

उसके चलने फिरने के वेग से पृथ्वी फटगई और उसकी पूँछ के वेग से समुद्र हिलकर सबकोप्लावित करने लगा ॥ २५ ॥

धुतशृङ्गविभिन्नाश्चखण्डखण्डंययुर्घनाः। श्वासानिलास्ताःशतशोनिपेतुर्नभसोऽचलाः॥२६॥

उसके सींगके हिलाने।की हवाओं से पर्वत टुकड़े २ होकर पृथ्वी पर से बादलोंके टुकड़े-टुकड़े होगये और उसके श्वासगिर पड़े ||२६||

इतिक्रोधसमाध्मातमापतन्तंमहासुरम्। दृष्ट्वासाचण्डिकाकोपंतद्वधायतदाऽकरोत् ||२७||

इस प्रकार क्रोध युक्त उस महिषा- सुर को आते हुए देखकर चण्डिकाने उसका हननकरने को क्रोध किया ||२७|| साक्षिप्त्वातस्यवैपाशंतंबबन्धमहासुरम्। तत्याजमाहिषंरूपंसोऽपिबद्धोमहामृधे॥२८

देवी ने पाश फेंक करशाली राक्षस ने अपने उस महिष रूप को छोड़ उस महान राक्षस को बाँध लिया परन्तु उस बल-दिया ॥ २८ ॥

ततःसिंहोऽभवत्सद्योयावत्तस्यास्त्रिकाशिर।

छिनत्ति तावत् पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत २६ ॥

औरवहशीघ्रसिंहबनगयाऔरजब तक कि अम्बिका उसका शिर काटने को गई वह हाथ में तलवार लिये हुए एक पुरुष के रूप मेंदिखाई दिया ||२६||

ततएवाशुपुरुषंदेवीचिच्छेदशायकैः। तंखड्गचर्म्मणासार्द्धंततःसोऽभून्महागजः॥३०॥

 फिर इस पुरुष रूप महिषासुर को देवी ने वाणों से छेदन किया तो वह पुरुष के द्वेष को छोड़कर एक विशाल हाथी बन गया ||३०||

करेणचमहासिंहंतंचकर्षजगर्जच। कर्षतस्तुकरंदेवीखड्गेननिरकृन्तत | ३१||

फिर उसने अपनी सूंड़ से देवी के वाहन सिंह को खंच लिया और गरजने लगा। इसपर देवी ने उसकी तलवार से सूंड़ काट ली ||३१||

ततोमहासुरोभूयोमाहिषंवपुरास्थितः। तथैवक्षोभयामासत्रैलोक्यंसचराचरम् ||३२||

फिर वह महाअसुर पुनः महिष रूप से प्रकट हुआ जिससे चर और अचरयुक्त तीनों लोक क्षुभित होगये ॥ ३२ ॥

ततःक्रुद्धाजगन्माताचण्डिकापानमुत्तमम्। पपौपुनःपुनश्चैवजहासारुलोचना | ३३

तब क्रोधित हुई जगत की माता चण्डिका ने चार बार मदिरा पानकिया जिससे कि उनके नेत्र लालहोगये और वे हँसने लगीं ||३३||

ननईचासुरःसोऽपिबलवीर्य्यमदोद्धतः। विपाणाभ्याञ्चचिक्षेपचण्डिकांप्रतिभूधरान् |३४||

उधर वह असुर भी अपने वल से उन्मत्त होकर गरजने लगा और अपने सींगों से पहाड़ों को उखाड़ उखाड़ कर देवीके ऊपर फेंकने लगा || ३४ ॥

साचतान्प्रहितांस्तेनचूर्णयन्तीशरोत्करैः। उवाचतंमदोदभूत - मुखरागाकुलाक्षरम् ||३५||

देवी भी बाणों से उन पहाड़ों को चूर्ण करती हुई महिषासुर से बोली । मदिरा पान के कारण देवी का मुख मण्डल लालहो रहा था ॥ ३५ ॥

देव्युवाच

गर्जगर्जक्षणंमूढ़मधुयावत्पिवाम्यहम्। मयात्वयिहतेऽत्रैवगजिष्यन्त्याशुदेवताः॥३६

   देवी बोली-

 मूर्ख ! तू क्षण भर और गरज ले जब तक कि मैं मदिरा पान करूँ। मैं तुझको यहीँ मारूँगीऔर इसके बाद देवता लोग गजैंगे ||३६|| ऋषिरुवाच

एवमुक्त्वासमुत्पत्यसारूढ़ातंमहासुरम् | पादेनाक्रम्यकण्ठेचशूलेनैनमताडयत्॥३७॥

ऋषि बोले-

यह कहकर देवी कूद कर महिषासुर पर चढ़ गई और पाँव से दबाकर उसके करठ में एक शुलमारा ॥ ३७ ॥

ततःसोऽपिपदाक्रान्तस्तयानिजमुखात्ततः। ऋद्धनिष्क्रान्तएवातिदेव्यावीर्येणसंदृतः॥३८

तब वह देवी के चरणों से दवा हुआ होने के कारण पूरा न निकल सका और देवीं बल के प्रभाव से श्राधा ही निकला ॥ ३८ ॥

श्रद्धनिष्क्रान्तएवासौयुध्यमानोमहासुरः। तयामहासिनादेव्याशिरश्छित्त्वानिपातितः॥३६॥

निकला हुआ ही वह महा असुर युद्ध करने लगा तब देवी ने एक बड़ी तलवार से उसका

काट लिया जिससे कि वह पृथ्वी पर गिर पड़ा॥ ३६ ॥

ततोहाहाकृतंसर्व्वंदैत्यसैन्यंननाशतत्। महर्षञ्चपरंजग्मुःसकलादेवतागणाः॥४०

फिर हाहाकार करती हुई दैत्यों की नाश को प्राप्त होगई और देवताओं को परम हैहुआ ॥ ४० ॥

तुष्टुवुस्तांसुरादेवींसहदिव्यैर्महर्षिभिः। जगुर्गन्धर्व्वपतयोननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४१॥

देवता और ऋषिगण देवी श्राराधना करने लगे तथा गन्धर्वपतिं गानेश्रप्सरायें नाचने लगीं ॥ ४१ ॥ इतिश्री मार्कण्डेय०मेंसावर्णिकमन्वन्तरमेंदेवीमाहात्म्यमेंमहिषासुरबधनाम८३वाँप्र०स०।