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मार्कण्डेय उवाच

पञ्चमोऽपिमनुर्ब्रह्मन्रैवतोनामविश्रुतः। तस्योत्पत्तिविस्तरशःभृणुष्वकथयामिते॥१॥

मार्कण्डेयजी बोले-

हे कौटुकिजी ! पाँचवां मनु रैवत नाम सेविख्यात हुआ, उसकी उत्पत्ति मैं विस्तार पूर्वककहता हूं, सुनिये ॥ १ ॥

ऋषिरासीन्महाभागऋतवागितिविश्रुतः। पुत्रस्यपुत्रोऽभूद्रेवत्यन्तेमहात्मनः॥२

ऋतवाक नाम एक ऋषि थे जिनके पहिले कोई पुत्र न था परन्तु फिर उनके एक पुत्र रेवती नक्षत्र के अन्त में हुझा ॥ २ ॥

संतस्यविधिवचक्रेजातकर्मादिकाःक्रियाः। तथोपनयनादधसचाशीलोऽभवन्मुने॥३॥

मुनि ! फिर उन्होंने उस लड़के की जातकर्म आदि क्रियायें और उपनयन संस्कार कराये परन्तु वहशीलवान् न हुआ ||३||

यतःप्रभृतिजातोऽसौततःप्रभृतिसोऽपिः। दीर्घरोगपरामर्पमवापमुनिपुङ्गवः ॥४॥

जिस समय से उस पुत्र की उत्पत्ति हुई उसी समय से वे ऋषि दीर्घ रोगऔर दुःख से घिर गये ||४|| मातातस्यपरामार्त्तिंकुष्ठरोगादिपीड़िता।

जगामसपिताचास्यचिन्तयामासदुःखितः || ५ ||

 उस पुत्रकी माता कुष्ट रोग से पीड़ित होकर बहुत दुःखी होगई और  ऋषि भी इससे दुःखी होकर सोचने लगे ॥ ५ ॥

किमेतदितिसोऽप्यस्यपुत्रोऽप्यत्यन्तदुर्मतिः। जग्राहभार्यामन्यस्यमुनिपुत्रस्यसम्मुखीम्॥६॥

यह क्या है ? यह पुत्र तो अत्यन्त दुर्बुद्धि है कि इसने दूसरे मुनि पुत्र की भार्या सम्मुखी को ग्रहणकरलिया ॥६॥

ततोविपणमनसाऋतवागिदमुक्तवान्। पुत्रतामनुष्याणांश्रेयसेनकुपुत्रता || ७

 तव खिन्न चित्त होकर ऋतवाक् बोले कि मनुष्यों के लिये कुपुत्र होने से विना पुत्र के !रहना उत्तम है ||७||

कुपुत्रोहृदयायासंसर्व्वदाकुरुतेपितुः। मातुश्चस्वर्गसंस्थांचस्वपितृन्पातयत्यवः || ८

 एक कुपुत्र माता-पिताके को सदैव संताप देता है और पितरों को भी स्वर्ग से नीचे गिरा देता है ॥८॥

सुहृदांनोपकारायपितृणाञ्चनतृप्तये। पित्रोर्दुःखायधिग्जन्मतस्यदुष्कृतकर्म्मणः॥६॥

 दुष्ट पुत्र से न तो मित्रों का उपकार होता है श्रौर न पितरों की ही तृप्ति होती है। माता पिता के तो वह दुःख का कारण ही है, अतः ऐसे कुपुत्र को धिक्कार है ॥ ६ ॥

धन्यास्तेतनयायेषांसर्व्वलोकाभिसम्मताः। परोपकारिणःशान्ताःसाधुकर्म्मण्यनुव्रताः॥१०

वे हीपुत्र धन्य हैं जिनकी सब लोग प्रशंसा करें तथा जो परोपकारी, शान्त चित्त और साधु कर्मों मेंप्रवृत्त हों ॥ १० ॥

नितंतदामन्दंपरलोकपराङ्मुखम्। नरकायनसद्गत्यैकुपुत्रालम्विजन्मनः॥११॥

कुपुत्र परलोक से विमुख होताइस कारण उस मन्द के माता-पिता की सद्गति नहीं होती शौर  नरक में जाते हैं ॥ ११॥

करोतिसुहृदांदैन्यमहितानांतथामुदम्। कालेचजरांपित्रोःकुपुत्रःकुरुतेध्रुवम्॥१२॥

वह पुत्रमित्रों को दुःख और शत्रुओं को आनन्द देता है तथा माता पिता को समय आने से पहिले ही बूढ़ावना देता है ||१२||

मार्कण्डेयउवाच

एवंसोऽत्यन्तदुष्टस्यपुत्रस्यचरितैर्मुनिः। दह्यमानमनोवृत्तिवृत्तंगर्गमपृच्छतगर्गमपृच्छत ॥१३॥

मार्कण्डेयजी बोले-

इस प्रकार उस दुष्ट पुत्र के चरित्र से दुखित चित्त होकर मुनि ऋतवाकूने इसका वृत्तान्त गर्गमुनि से पूछा ॥ १३ ॥ .

 ऋतवागुवाच

सुव्रतेनपुरावेदागृहीताविधिवन्मया। समाप्यवेदान्विधिवत्कृतोदारपरिग्रहः॥१४॥

ऋतवाकू बोले-

पूर्व काल में व्रती होकर मैंने विधिवत् वेदों का अध्ययनकिया और अध्ययन समाप्तकर विधिवत् श्रपना विवाह किया ||१४||

सदारेणक्रियाःकार्य्याःश्रताःस्मार्त्तावपक्रियाः। मेन्यूनाःकृताःकाचिद्वयावदद्यमहामुने ||१५||

    हे महामुनि ! स्त्री सहित मैंने श्रीत, स्मार्त और पट् क्रियाओं को किया। मैंने किसी भी क्रिया को आज तक अपूर्ण न छोड़ा ||१५||

गर्भाधानविधानेननकाममनुरुन्धता। पुत्रार्थंजनितञ्चायंपुन्नाम्नोविभ्यतासुने || १६

 हे मुनि पुन्नाम नरक के डर से पुत्र प्राप्ति के लिये विधि पूर्वक गर्भाधान किया

तथा कामके वश होकर कभी मैथुन न किया ॥ १६ ॥

सोऽयंकिमात्मदोषेणममदोषेणवामुने। श्रस्मद्धदुःखावहोजातोदौःशील्याद्भवन्धुशोकदः॥१७॥

हे मुनि ! अपने दोप से अथवा मेरे दोंप से किस प्रकार यह पुत्र उत्पन्न होगया है जिसके कि दुष्टस्वभाव से हम तथा सब बन्धुवान्धव दुखी हैं ॥१७ ! गर्गउवाच

रेवत्यन्तेमुनिश्रेष्ठजातोऽयंतनयस्तव।

तेन दुःखाय ते दुष्टे काले यस्मादजायत || १८ ||

गर्गबोले- हेमुनिवर ! यहपुत्ररेतवीनक्षत्रकेअन्तउत्पन्न हुआ है। चूँकि यह दुष्ट काल में उत्पन्न हुआहै अतः यह दुःख दे रहा है ॥ १८ ॥

नतेऽपचारोनैवास्यमानुनयंकुलस्यते। तस्यदौःशील्यहेतुस्तुरेवत्यन्तमुपागतम् ||१६||

इसमें तुम्हारा,इसका, माता का अथवा कुल का दोष नहीं है । इसके दुःशील का हेतु वही रेवती नक्षत्र है ॥१६ ॥ ऋतवागुवाच

यस्मान्ममैकपुत्रस्यरेवत्यन्तसमुद्भवम्। दौःशील्यमेतत्सातस्मात्पततामाशुरेवती || २०

ऋतवाकू बोले-

जो कि मेरा एक पुत्रभी रेवती नक्षत्र के श्रन्त में उत्पन्न होने से दुःशील को प्राप्त होगया तो इस

रेवती नक्षत्र का पतन होजाय ||२०||

मार्कण्डेयउवाच

तेनैवंव्याहृतेशापेरेवत्यृक्षंपपातह। पश्यतःसर्व्वलोकस्यविस्मयाविष्टचेतसः ||२१||

मार्कण्डेयजी बोले-

उनके शाप देते ही रेवती नक्षत्र सब लोगों के विस्मय पूर्वक देखते-देखते स्वर्ग से नीचे गिर पड़ा||२१||

रेवत्यृक्षश्चपतितंकुमुदाद्रौसमन्ततः।। भासयामाससहसावन-कन्दर - निर्भरम्॥२२॥

वह रेवती नक्षत्र कुमुदाद्रि पर्वत पर गिरा और उसके गिरते ही सहसा सब वन, कन्दराश्रर झरने प्रकाशित होगये ||२२||

कुमुदाद्रिश्चतत्पातातख्यातोरैवतकोऽभवत्। अतीवरम्यःसर्व्वस्यांपृथिव्यांपृथिवीधरः॥२३

इसके बाद सेकुमुद पर्वत रैवतक नाम से विख्यात हुआ और तबही से वह पर्वत पृथ्वीपर सव पर्वतों से अधिकरमणीक होगया ||२३||

तस्यर्क्षस्यतुयाकान्तिर्जातापङ्कजिनीसरः। ततोजज्ञेतदाकन्यारूपेणातीवशोभना ||२४|

से वहाँ पर पङ्कजिनी नाम एक सरोवर प्रगट हुआ जिससे कि एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई ||२४||

रेवतीकान्तिसम्भूतांतांदृष्ट्वाममुचोमुनिः। तस्यानामचकारेत्थंरेवतीनामभागुरे ||२५||

 और उस नक्षत्र की कान्ति प्रमुचि मुनि ने रेवती नक्षत्र की कान्ति से उत्पन्न उस कन्या को देखकर उसका नाम रेवतीरक्खा || २५ ||

पोषयामासचैवैतांस्वाश्रमाभ्याससम्भवाम्। प्रयुचःसमहाभागस्तस्मिन्नेवमहाचले ||२६||

 और उसी पर्वत पर स्थित अपने आश्रम में उसको लाकर प्रमुचि मुनिं ने उसकीपालन पोषण किया ॥ २६ ॥

तान्तुयौवनिनींदृष्ट्वाकन्यकांरूपशालिनीम्। ससुनिश्चिन्तयामासकोsस्याभर्त्ताभवेदिति॥२७॥

जब वह सुन्दरी कन्यायुवती हुई तो वे मुनि सोचने लगे  कि इसकास्वामी कौन होगा ||२७ ॥

एवंचिन्तयतस्तस्यययौकालोमहान्मुने। नचाससादसदृशंवरंतस्यांमहामुनिः ||२८||

 हे कौटुकि मुनि ! उनको इस प्रकार सोचते हुए बहुत काल बीत गया परंतु महामुनि ने उस कन्या के योग्य वर न पाया ॥२८॥

ततस्तस्यावरंप्रष्टुमग्निंसप्रमुचोमुनिः। विवेशवह्निशालांवैप्रष्टारंप्राहहव्यभुक् ||२६||

इसके अनन्तर प्रमुचि मुनि उसका वर कौन होगा वहाँ अग्नि से पूछा तो अग्नि ने कहा ॥ २६ ॥

इसयह अग्नि से पूछने के लिये अग्निशाला में गये और कन्या का स्वामी महावलवान् पराक्रमी, प्रियवचन बोलने वाला धर्मात्मा राजा दुर्गम होगा ||३०||

मार्कण्डेयउवाच

श्रनन्तरश्च मृगयामसङ्गनागतोमुने। तस्याश्रमपदंधीमान्दुर्गमःसनराधिपः ||३१||

मार्कण्डेयजी बोले--

हे कौटुकि मुनि ! इसके बाद मृगया करते हुए उनके श्राश्रम पर राजा दुर्गम प्रसङ्गवश श्राये ॥ ३१ ॥

प्रियव्रतान्वयभवोमहाबलपराक्रमः। पुत्रोविक्रमशीलस्यकालिन्दीजठरोद्भवः॥३२॥

यह बलवान् और पराक्रमी राजा दुर्गम प्रियव्रत के वंश में कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न राजा विक्रमशीलका पुत्र था || ३२||

सप्रविश्याश्रमपदंतांतन्वींजगतीपतिः। 'पश्यमानस्तमृषिंप्रियेत्यामन्यपृष्टवान् ||३३|||

वह राजा उस आश्रम में प्रवेशकर ऋषि को न देखकर  उस सुन्दरी से 'है प्रिया'यह कहकर पूछने लगा ॥३३॥ राजोवाच

क गतोभगवानस्मादाश्रमान्मुनिपुङ्गवः। तंप्रणेतुमिच्छामितत्त्वंब्रूहिशोभने॥३४॥

राजाबोले- हेशोभने ! इसआश्रमसेमुनिश्रेष्ठकहाँगये यहतुमबताओमैंउनकोप्रणामकरनेआयाहूँ।३४ मार्कण्डेय उवाच

अग्निशालांगतोविप्रस्तच्छ्रुत्वातस्यभाषितम्। प्रियेत्यामन्त्रणञ्चैवनिश्चक्रामत्वरान्वितः ||३५||

मार्कण्डेयजी बोले-

अग्निशाला को गये हुए वे मुनि उसकी बात चीत और 'प्रिये' के सम्बोधन को सुनकर शीघ्रवहाँ से निकले || ३५ ||

सददर्शमहात्मानंराजानंदुर्गमंमुनिः। नरेन्द्रचिह्नसहितंप्रश्रयाव44444444नतंपुरः ||३६||

 फिर मुनि ने राज्य चिह्नों से युक्त और 44विनय से झुके हुए महात्मा राजा दुर्गमकोदेखा ||३६||44

तस्मिन्दृष्टेततःशिष्यमुवाचसतुगौतमम्। उसको देखकर मुनिने अपने  शिष्यगौतम से कहा, "हे गौतम! महाराजके लिये शीघ्रअर्घ्य लाओ " ॥ ३७ ॥

एकस्तावदयंभूपश्चिरकालादुपागतः।

जामाता च विशेषेण योग्योऽर्घस्य मतो मम ||३८||

एकतोयहराजावहुतदिन वादश्रायेहैंऔरदूसरेयहमेरेजामाताहैं छाता विशेष अर्ध्यके योग्यहैं यह मेरामतहै॥३८॥  मार्कण्डेयउवाच

ततःसचिन्तयामासराजाजामातृकारणम्। विवेदचनतन्मौनीजगृहेऽर्धञ्चतंनृपः॥३६॥

मार्कण्डेयजी बोले--

इसपर राजा सोचने लगे कि मैं इनका जामाताकिस प्रकार हुआ ? परन्तु वे कुछ न वोले और

श्रर्घ्य ग्रहण कर लिया ॥ ३६ ॥

तमासनगतंविप्रोगृहीतार्घमहामुनिः। स्वागतंप्राहराजेन्द्रमपितेकुशलंगृहे॥४०॥

जय राजा आसन आसन पर बैठ गये और उन्होंने अर्ध्य ग्रहण कर लिया महामुनि ने पूछा, "राजन् ! श्रापका स्वागत है। कहिये घर पर तो कुशल है ? ॥ ४० ॥

कोपेवलेऽथमित्रेषुभृत्यामात्येनरेश्वर। तथात्मनिमहाबाहोयत्रसर्व्वंप्रतिष्ठितम्॥४१॥

हे राजन् अपने कोष, सेना, मित्रों, सेवकों, मन्त्रियों तथा अपनी भी कुशल कहिये ॥ ४१ ॥

पत्नीचतेकुशलिनीयतएवानुतिष्ठति। पृच्छाम्यस्यास्ततोनाहंकुशलिन्योऽपरास्तव ||४२

आपकी स्त्री जोयहाँ है वह कुशल है, अव श्रापकी अन्य स्त्रियों की कुशलता पूछता हूँ ॥ ४२॥

राजोवाच

त्वत्प्रसादादकुशलंनकचिन्ममसुव्रत। जातकौतूहलचास्मिममभार्य्यात्रकामुने।४३॥

राजा बोले--

हे सुव्रत ! आपकी कृपा से मेरे यहाँ कहीं भी. कुशल नहीं है । हे मुनि ! मुझको आश्चर्य है किमेरी यहाँ कौनसी पत्नी है ||४३|| ऋषिरुवाच

रेवतीसुमहाभागात्रैलोक्यस्यापिसुन्दरी। तवभार्यावरारोहातांत्वंराजन्नवेत्सिकिम्४४

ऋषि बोले-

त्रिलोकी में सुन्दरी रेवती नाम अपनी सौ भाग्यवती स्त्रीको हे राजन् ! तुम किस प्रकार नहीजानते हो ? ॥ ४४ ॥ राजोवाच

सुभद्रांशान्ततनयांकावेरीतनयांविभो। सुराष्ट्रजांसुजाताञ्चकदम्बाञ्चवरूथजाम् ||४५||

राजा बोले-

हे भगवन् ! सुभद्रा, शान्ततनया, कावेरीतनया, सुराष्ट्र्जा, सुजाता, कदम्बा और वरूथजा ॥ ४५

विपाठांनन्दिनीञ्चैववेद्मिभाय्यांगृहेद्विज। तिष्ठन्तिमेनभगवन्रेवतींवेद्मिकान्वियम् ||४६

तथा विपाठा और नन्दिनी ये ही भार्या मेरे घर पर हैं जिनको मैं जानता हूँ। हे भगवन् ! मेरे यहाँ पर रेवतीनाम कोई स्त्री नहीं है जिसको कि मैं जान !!४६

ऋषिरुवाच

प्रियेतिसाम्प्रतंयेयंत्वयोक्तावरवर्णिनी।

के विस्मृतं ते भूपाल श्लाध्येयं गृहिणी तव || ४७||

ऋषिबोले- हेराजन् ! जिससुन्दरवर्णवालीस्त्रीसे अभीतुमनेप्रियेकहकरसम्बोधनकियाथाक्या उसकोतुमभूलगये. वहीतुम्हारीपुण्यवतीस्त्रीहै॥४७ राजोवाच

त्यमुक्तंमयाकिन्तुभावोदुष्टोनसेसुने। रात्रकोपंभवान्कर्तुमर्हत्यस्मासुयाचितः ||४८|||

राजा बोले-

हे मुनि ! यह सत्य है कि मैंने उसको प्रिया कहकर सम्बोधन किया परन्तु मेरा भाव दुष्ट नथा ।

मैं आपसे याचना करता हूँ कि आप मुझपर क्रोध न करें ॥ ४८ ॥ ऋपित्वाच

त्त्वंब्रवीषिभूपालनभावस्तवदूषितः। व्याजहारभवानेतद्वह्निनानृपचोदितः॥४६॥

ऋषि बोले-

हे राजन् ! आपके भाव में कोई दोष न था, आपने जो कुछ कहा था वह अग्नि की प्रेरणा सेसत्य कहा था ॥४६॥

यापृष्टोहुतवहःकोऽस्याभर्तेतिपार्थिव। वितातेनचाप्युक्तोभवानेवाद्यवैवरः ||५०||

 हे महाराज ! मैंने पहिले ही अग्नि से पूछा था कि इस कन्या का स्वामी कौन होगा जिसपर उन्होंने आपके ही लिये कहा था, अतः व आपही इस कन्या के स्वामी हैं ॥ ५० ॥

द्विगृतांमयादत्तातुभ्यंकन्यानराधिप प्रेयेत्यामन्त्रिताचेयंविचारंकुरुषेकथम्॥५१॥

हे राजन् ! अब मैं इस कन्याको आपके लिये देता करके अव श्राप क्या विचार करते हैं ? ॥ ५१ ॥ मार्कण्डेयउवाच

तोऽसावभवन्मौनीतेनोक्तःपृथिवीपतिः। ऋषिस्तथोद्यतःकर्त्तुंतस्यावैवाहिकंविधिम् ||५२||

मार्कण्डेयजी बोले-

मुति के ऐसा कहनेपर राजा चुप हो गये और सुनि उनके विवाह के निमित्त तैयारी करने लगे ॥५२ मुद्यतंसापितरंविवाहायमहामुने। उवाचकन्यायत्किंचित्प्रश्रयावनतानना || ५३॥

जब कन्या ने अपने पिता महासुनि को विवाह की तैयारी करते देखा तो वह अत्यन्त विनय पूर्वकउनसे बोली ॥ ५३ ॥

यदिमेप्रीतिमांस्तातप्रसादंकर्तुमर्हसि। रेवत्यृक्षेविवाहसेतत्करोतुप्रसादितः ||५४

 हे तात ! यदि आपकी प्रीति मुभमें है तो मेरे ऊपर कृपा करें और प्रसन्न कर मेरे विवाह को रेवती नक्षत्र में करें ॥ ५४ ॥ ऋषिरुवाच

रेवत्यृक्षंनवैभद्रेचन्द्रयोगिव्यवस्थितम्। अन्यानिसन्तिऋक्षाणिसुभ्रुवैवाहिकानिते॥५५॥

ऋषि बोले-

हे पुत्री ! रेवती नक्षत्र व चन्द्रमण्डल में स्थित नहीं है ।  हे सुन्दरी ! तुम्हारे विवाहके लिये और भी नक्षत्र हैं ५५ कन्योवाच

वाततेनविनाकालोविफलःप्रतिभातिमे। विवाहोविफलेकालेमद्विधायाःकथंभवेत् ||५६||

कन्या वोली-

हे तात ! रेवती नक्षत्र के बिना मुझको समय विफल मालुम होता है,  मुझ जैसी कन्या को विवाह विफल काल में किस प्रकार होगा ॥ ५६ ॥ ऋषिरुवाच

ऋतवागितिविख्यातस्तपस्वीरेवतींप्रति। चकारकोक्रुद्धेनतेनविनिपातितम् ||५७|||

ऋषि बोले-

ऋतवाक् नाम एक प्रसिद्ध तपस्वी ने  रेवती :नक्षत्र के प्रति क्रोध करके जसका पतन करा दिया५७॥

मयाचास्मैप्रतिज्ञाताभाय्र्येतिमदिरेक्षणा। नचेच्छसिविवाहंत्वंसङ्कटंनःसमागतम्॥५८॥

मैं तेरा विवाह राजा दुर्गम के साथ करने. की प्रतिज्ञा कर चुकाहूँ, यदि तू अव विवाह करने की इच्छा न करेगी  तो मुझ पर बड़ा सङ्कटआ जायगा ॥ ५८ ॥ कन्योवाच

ऋतवासमुनिस्तातकिमेवंतप्तवांस्तपः।

न त्वया मम तातेन ब्रह्मबन्धोः सुतास्मि किम् || ५६ ||

कन्या बोली-

हे तात ! क्या ऋतवाक मुनि ने ही तपस्या की थी जो कि मेरे पिता आपने नहीं की है ? क्यामैं आप जैसे ब्राह्मण की पुत्री नहीं हूँ ? ॥ ५६ ॥ ऋषिरुवाच

ब्रह्मबन्धोःसुतानत्वंवालेनैवतपस्विनः ! सुतात्वंममयोदेवान्कर्त्तमन्यान्समुत्सहे॥६०॥

ऋषि बोले—

हे वाले ! तू किसी ब्राह्मण अथवा तपस्वी की ही वेटी नहीं है, तू मेरी पुत्री है  जो कि मैं चाहूँतो देवताओं को भी बदल हूँ ॥६०॥

कन्योवाच

तपस्वीयदिमेतातस्तत्किमृक्षमिदंदिवि। समारोप्यविवाहोमेतदृक्षेक्रियतेनतु || ६१

कन्या वोली-

यदि मेरे पिता उद्भट तपस्वी हैं तो वे क्यों न इस नक्षत्र को पुनः स्वर्ग में स्थापित करके मेराविवाह रेवती नक्षत्र में कर देते हैं ? ॥ ६१ ॥ ऋषिरुवाच

एवंभवतुभद्रंतेभद्रेप्रीतिमतीभव। आरोपयामीन्दुमार्गेरेवत्यृक्षंकृतेतव॥६२॥

ऋषि बोले---

हे भद्रे ! तेरा कल्याण हो, यदि तेरी ऐसी ही इच्छा है तो मैं तेरे लिये रेवती नक्षत्र को चन्द्रमार्ग में स्थित करूँगा ॥ ६२ ॥ मार्कण्डेयउवाच

ततस्तपःप्रभावेणरेवत्यृक्षंमहामुनिः। यथापूर्व्वंतथाचक्रेसोमयोगिद्विजोत्तम॥६३॥

मार्कण्डेयजी बोले-

हे द्विजश्रेष्ठ ! तव उन महामुनि ने अपने तप के प्रभाव से रेवती नक्षत्र को पहिले की तरहचन्द्रमा के साथ जोड़ दिया ॥ ६३ ॥

विवाहञ्चैवदुहितुर्विधिवन्मन्त्रयोगिनम् । निष्पाद्यप्रीतिमान्भूयोजामातारमथाब्रवीत् || ६४॥

 फिर उस कन्या का विधिपूर्वक मन्त्रों सहित विवाह कर दिया और इसके बाद वे प्रसन्न होकर अपने जमाईसे कहने लगे ॥ ६४ ॥

श्रद्वाहिकंतेभूपालकथ्यतांकिंददाम्यहम्। दुर्लभ्यमपिदास्यामिममाप्रतिहतंतपः॥६५॥

  हे राजन् ! विवाह की दक्षिणा में मैं आपको क्या हूँ, कहिये ।  मैं अत्यन्त दुर्लभवस्तु को भी आपके लिये दे सकता हूँ, क्योंकिमेरा तप अनियन्त्रित है ||६५|| राजोवाच

मनोःस्वायम्भुवस्याहमुत्पन्नःसन्ततौमुने। मन्वन्तराधिर्षंपुत्रंत्वत्प्रसादाद्वदृणोम्यहम् ||६६

राजा वोले-

हे मुनिजी ! मेरा जन्म स्वायम्भुव मनु के वंशमें हुआ है ।  मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि मेरापुत्र मन्वन्तर का अधीश्वर मनु हो ॥६६॥ ऋषिरुवाच

भविष्यत्येषतेकामोमनुस्त्वत्तनयोमहीम्। सकलांभोक्ष्यतेभूषधर्म्मविच्चभविष्यति॥६७॥

ऋषि बोले-

हे राजन! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी और तुम्हारा पुत्र मनु होकर सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्यकरेगा तथा वह धर्मात्मा होगा ॥ ६७ ॥ मार्कण्डेयउवाच

'तामादायततोभूपःस्त्रमेवनगरंययौ। तस्मादजायतसुतोरेवत्यांरैवतोमनुः ||६८ !

मार्कण्डेयजी बोले-

तव उस स्त्री को लेकर राजा अपने नगर को गये और वहाँ उस रेवती से एक पुत्र उत्पन्न कियाजो कि रेवत मनु कहलाया ॥ ६८ ॥

समेतःसकलैधम्मर्मानवैरपर/जितः विज्ञानाखिलशास्त्रार्थोवेदविद्यार्थशास्त्रवित्॥६९॥

वह सब धर्मोंसे युक्त और सव मनुष्यों से अजेय हुत्रा ।  वहसब शास्त्रों और वेदविद्या के प्रथों को जाननेवाला हुआ ॥६९॥

तस्यमन्वन्तरेदेवान्मुनिदेवेन्द्रपार्थिवान्।

कथ्यमानान्मयाब्रह्मन्निबोधसुसमाहितः॥७०॥

  हे ब्रह्मन् ! उस मन्वन्तर में जो उनको देवता मुनि, देवेन्द्र और राजा आदि हुएमैं कहता हूँ तुम ध्यान से सुनो ॥ ७० ॥

सुमेधसस्तत्रदेवास्तथाभूपतयोद्विज।

वैकुण्ठाश्चामिताभा चतुर्दश चतुर्दश ॥ ७१ ॥

हेद्विज ! उससमयदेवतासुमेधनामसेप्रसिद्धहुए औरवैकुण्ठतथाअमिताभनामसेक्रमशः'चौदह२राजा हुए ॥ ७१ ॥

तेषांदेवगणानान्तुचतुर्णामपिचेश्वरः। नाम्नाविभुरभूदिन्द्रःशतयज्ञोपलक्षकः॥७२ ||

उन देवताओं के स्वामी विभुनामइन्द्रहुए  जिन्होंनेकिसौयज्ञकरलियेथे ||७२॥

हिरण्यरोमावेदश्रीरूद्वाहुस्तथापरः।

वेदबाहुःसुधामाचपर्जन्यश्चमहामुनिः॥७३॥

हे महामुनि ! हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्ववाह औरपर्जन्य॥७३॥

वशिष्ठश्चमहाभागोवेदवेदान्तपारगः।

एते सप्तर्षयश्वासन रैवतस्यान्तरे मनोः ॥७४ ||

और वेदवेदाङ्ग के जाननेवाले महाभाग वाशिष्ठ  यही सव रैवत मन्वन्तर मेंसप्तर्षि हुए ॥७४॥

बलबन्धुमहावीर्य्यःसुयष्टव्यस्तथापरः। सत्यकाद्यास्तथैवासन्रैवतस्यमनोःसुताः॥७५॥

बलबन्धु, महावीर्य्य, सुयष्टव्य और सत्यक इत्यादि रैवत मनु के पुत्र हुए ॥ ७५ ॥

रैवतान्तास्तुमनवःकथितायेमयातव। स्वायम्भुवाश्रयाहोतेस्वारोचिषमृतेतनुम्॥७६॥

हे कौटुकिजी ! रैवत मनु तक जितने मनुत्रों का हाल हमने आपसे कहा हैं वह सब स्वायम्भुव

वंश के आश्रित है परन्तु स्वारोचिप वंश इससेपृथक् है ॥ ७६ ॥

इतिश्री मार्कण्डेयपुराणमेंरैवतमन्वंतरनाम७५वाँअध्यायसमाप्त |