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मार्कण्डेय उवाच

ततस्तंतुष्टवुर्देवास्तथादेवर्पयोरविम्। वाग्भिरीड्यमशेषस्यत्रैलोक्यस्यसमागताः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

इसके अनन्तर सव देवता और देवर्षिगण त्रैलोक्यसे वंदनीय सूर्य भगवान्की स्तुति करने लगे।१ देवाऊचुः

नमस्तेऋस्वरूपायसामरूपायतेनमः। यजुःस्वरूपरूपायसाम्नांधामवतेनमः॥२

देवता वोले-

हे भगवन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेदके स्वरूप आपको नमस्कार है. ॥ २ ॥

ज्ञानैकधामभूतायनिर्धूततमसेनमः। शुद्धज्योतिःस्वरूपायविशुद्धायामलात्मने || ३

ज्ञान के धाम,अन्धकारनाशक, शुद्ध ज्योति और निर्मलात्मा यदि आपके स्वरूपों को प्रणाम है ॥ ३ ॥

वरिष्ठायवरेण्यायपरस्मैपरमात्मने। नमोऽखिलजगद्वयापिस्वरूपायात्ममूर्त्तये॥४॥

वरिष्ट,वरेण्य, पर, परमात्मा, समस्त जगत् व्यापी और श्रात्ममूर्ति श्रादि श्रापके स्वरूपों को नमस्कार है ||४

सर्व्वकारणभूतायनिष्ठायैज्ञानचेतसाम्। नमःसूर्य्यस्वरूपायप्रकाशात्मस्वरूपिणे॥५॥

आप सव पदार्थों के कारण और ज्ञानियों के चित्त में स्थित हैं । प्रकाश श्रात्मा स्वरूप सूर्य ! आपकोनमस्कार है |५|| भास्करायनमस्तुभ्यंतथादिनकृतेनमः।

शर्व्वरीहेतवेचैवसन्ध्याज्योत्स्नाकृतेनमः॥६॥

भास्कर और दिवाकर रूप आप को नमस्कार है तथा रात्रि के कारणभूत और सन्ध्या ज्योत्स्ना के करने वाले श्रापको नमस्कारहै || ६ ||

स्वंसर्व्वमेतद्भगवान्जगदुदुभ्रमतात्वया। भ्रमत्याविद्धमखिलंब्रह्माएडंसचराचरम् || ७॥

  हे भगवन् ! यह सम्पूर्ण जगत् आप ही और आपके ही भ्रमण करने से श्राप के साथसव चराचर ब्रह्माएंड घूमता है ॥ ७ ॥

त्वदंशुभिरिदंस्पृष्टंसर्व्वंसज्जायतेशुचि। क्रियतेत्वत्करैःस्पर्शाज्जलादीनांपवित्रता॥८

आपकी किरणों के स्पर्श से ही सब वस्तुयें पवित्र होती हैं. आपकी किरणों के स्पर्श से ही जलादिकभी पवित्र होते हैं ॥ ८ ॥

होमदानादिकोधम्मनोपकारायजायते। तावद्यावन्नसंयोगिजगदेतत्त्वदंशुभिः॥६

जब तक आपकी किरणों से जगत् का संयोग नहीं होता तबतक होम, दानादिक धर्म सफलनहीं होते ॥६॥

ऋचस्तेसकलाहोतायजूंष्येतानिचान्यतः।। सकलानिचसामानिनिपतन्तित्वदङ्गतः॥१०॥

सव ऋचायें तथा यजुर्वेद के मन्त्र और साममन्त्र श्रापके से निकलते हैं ॥ १० ॥

ऋङ्मयस्त्वंजगन्नाथत्वमेवचयजुर्म्मयः। यतःसाममयश्चैवततोनाथत्रयीमयः॥११

जगत् के स्वामी ! श्राप जिस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदमय हैं उसी प्रकार आपत्रयीमय हैं ॥ ११ ॥

त्वमेवब्रह्मणोरूपंपरञ्चापरमेवच। मूर्त्तामूर्त्तस्तथासूक्ष्मःस्थूलरूपस्तथास्थितः॥१२॥

आप ब्रह्म के स्वरूप और परतथा अपर हैं।  तथा आप मूर्त्त, श्रमूर्त्त सूक्ष्म औरस्थूल रूप से स्थित हैं ॥ १२ ॥

निमेष- काष्ठादिमयःकालरूपःक्षयात्मकः। प्रसीदस्वेच्छयारूपंस्वतेजःशमनंकुरु॥१३॥

निमेप और काष्ठाआदि काल स्वरूप क्षयात्मक आप ही हैं, आप प्रसन्न हों और अपनी इच्छा  से ही अपने तेज को शमन करें ॥ १३ ॥ मार्कण्डेयउवाच

एवंसंस्तूयमानस्तुदेवैर्देवर्षिभिस्तथा। सुमोचस्वंतदातेजस्तेजसांराशिरव्ययः || १४ |

मार्कण्डेयजी बोले—

देवताओं और देवर्षियों के इस प्रकार स्तुति करने पर तेजराशि व्यय सूर्य भगवान् ने अपनेतेजको कम कर दिया ||१४||

यत्तस्यऋङ्मयंतेजोभवितातेनमेदिनी। व्यजुर्भयेापिदिवंस्वर्गःसाममयंरवेः॥१५

भगवान् सूर्यके ऋग्मयतेज से पृथ्वी, यजुर्मय तेजसे श्राकाश, और साम-  मय तेज से स्वर्ग की उत्पत्ति हुई ||१५|| शातितास्तेजसोभागायेत्वष्ट्रादशपंचच। त्वष्द्दैवतेनसर्व्वस्यकृतंशूलंमहात्मना॥१६॥

शान्त हुएतेज के पन्द्रह भाग में से एक भाग का विश्वकर्मा ने महादेव का त्रिशूल निर्मित किया ॥ १६ ॥

चक्रंविष्णोवसूनांश्चशङ्करस्यसुदारुणा। उपावकस्यतथाशक्तिःशिविकाधनदस्यच ||१७||

सूर्य केनिकले हुए तेज से विश्वकर्मा ने विष्णु का चक्र,सूत्रों के वाण, अग्नि की शक्ति और कुबेर कीपालकी बनाई ॥१७॥

श्रन्येषांचसुरारीणामस्त्राण्युग्राणियानिवै। पयक्ष - विद्याधराणाञ्चतानिचक्रेसविश्वकृत्॥१८॥

तथा अन्य देवताओं, यक्षोंऔर विद्याधरों के लिये भी बहुत से उग्र अस्त्र विश्वकर्मा ने सूर्य के निकले हुए तेज से बनाये ॥१८

जततश्चषोड़शंभागंबिभर्तिभगवान्विभुः। ज्तत्तेजःपंचदशधाशातितंविश्वकर्म्मणा ||१९

और उस तेज के सोलहवें भाग को भगवान सूर्य  ने स्वयं धारण किया तथा अवशिष्ट पन्द्रह भाग तेज को विश्वकर्मा ने शान्त करके देवताओं के अस्त्र ना डाले ॥ १६ ॥

भ्ततोऽश्वरूपधृग्भानुरुत्तरानगमत्कुरून्। ददृशेतत्रसंज्ञाञ्चबढ़वारूपधारिणीम् ||२०||

फिर घोड़े का रूप धारणकर सूर्य उत्तर दिशा में कुरुदेशको गये और वहाँ जाकर उन्होंने घोड़ी के रूपमें संज्ञा को देखा ॥ २० ॥

साचदृष्ट्वातमायान्तंपरपुंसोविशङ्कया। जगामसम्मुखंतस्यपृष्टरक्षणतत्परा॥२१॥

संज्ञा ने जब उनको आते हुए देखा तो पर पुरुषकी शङ्का करके वह उनके सन्मुख गई जिससेकि पीछे की तरफ की रक्षा हो जावे ॥ २१ ॥

नासिकायोगंतयोस्तत्रसमेतयोः।

नासत्यदत्रौ तनयावश्ववक्त्त्रविनिर्गतौ ॥२२॥

तबउन दोनों की नाक से नाक का योग होगया और उस घोड़ी रूपी संज्ञाके मुख से नासत्य और दस्रनाम वाले दो पुत्र उत्पन्न हुए || २२ ॥

हरेतसोऽन्तेचरेवन्तःखड्गीचर्मीतनुत्रधृक्। . समुद्भूतोवाणतूणसमन्वितः॥२३॥

सूर्यके पृथ्वी पर गिरे हुए वीर्य से रेवन्त नाम एक पुरुष प्रकट हुत्रा जो घोड़े पर चढ़ा हुआ था तथा ढाल, तल- वार, धनुष वारा और अन्य अस्त्र धारण किये हुएथा ॥ २३ ॥

ततःस्वरूपमतुलंदर्शयामासभानुमान्। तस्यैषाचसमालोक्यस्वरूपंमुदमाददे ||२४||

इसके अनन्तर सूर्य ने अपना अतुल स्वरूप दिखाया जिसको देखकर कि संज्ञाको अत्यंतप्रसन्नता हुई ॥ २४ ॥

स्वरूपधारिणीञ्चेमामानिनायनिजाश्रयम्। संज्ञांभाय्यीप्रीतिमतींभास्करोवारितस्करः ||२५||

फिर संज्ञा ने अपने पूर्वस्वरूपको पुनः धारण कर लिया और सूर्यभी उस प्रीति- मती भार्या को फिर अपने श्राश्रममें लेगये॥ २५॥

ततःपूर्व्वसुतोयोऽस्याःसोऽभूद्वैवस्वतोमनुः। द्वितीयश्चयमःशापाद्धर्म्मदृष्टिरभूत्सुतः॥२६॥

इसके बाद संज्ञा के प्रथम पुत्र वैवस्वत मनु हुए और दूसरे पुत्र शाप के कारण धर्मदृष्टि यम हुए ॥२६॥

क्रिमयोमांसमादायपादतोऽस्यमहीतले। पतिष्यन्तीतिशापान्तंतस्यचक्रेपितास्वयम्॥२७॥

तीसरी कन्या यमुना नाम महानदी हुई और यम को पाँव के पृथ्वी पर गिरने का शाप सूर्य ने स्वयं शान्त कर दिया || २७||

धदृष्टियतासमोमित्रेतथाऽहिते। ततोनियोगंतंयाम्येचकारतिमिरापहः॥२८॥

और यमराज को जो धर्ममैं दृष्टि रखते थे और मित्र तथा शत्रुको समभाव से देखते थे, सूर्य ने प्रजाओं के धर्माधर्म का निर्णयकरने के हेतु नियुक्त किया ॥२८॥

यमुनाचनदीजज्ञेकलिन्दान्तरवाहिनी। अश्विनौदेवभिजौकृतौपित्रामहात्मना॥२६॥

यमुना नाम कन्यानदी होकर कलिन्द देश में बहने लगी और महात्मा सूर्य ने अपने दोनों पुत्रोंको जो घोड़ीरूप संज्ञा से उत्पन्न हुए थे श्रश्विनीकुमारों के नाम से देवताओंका वैद्य बनाया ||२६||

गुह्यकाधिपतित्वेचरेवन्तोऽपिनियोजितः। छायासंज्ञासुतानाञ्चनियोगःश्रूयतांमम॥३०॥

सूर्यने रेवन्तको गुह्यकोंका अधिपति बनाया।  अब छाया के पुत्रों की जोनियुक्ति हुई उसको सुनो ॥ ३० ॥

पूर्व्वजस्यमनोस्तुल्यश्छायासंज्ञासुतोऽग्रजः। ततःसावर्णिकींसंज्ञामवापतनयोरवेः॥३१

छायारज्ञा के बड़ेपुत्र का जो मनु के तुल्य था  सूर्य ने सावर्णिक नामरक्खा ॥ ३१ ॥

भविष्यतिमनुःसोऽपिबलिरिन्द्रोयदातदा। 'शनैश्वरोग्रहाणांचमध्येपित्रानियोजितः ||३२|||

 वह सावर्णिक जिस समय बलि इन्द्र होंगे उस समय मनुं होंगे। दूसरे पुत्र शनैश्चर कोसूर्य ने ग्रहों के मध्य में नियुक्त किया ॥ ३२ ॥

तयोस्तृतीयायाकन्यातपतीनामसाकुरुम्। नृपात्संवरणात्पुत्रमवापमनुजेश्वरम् ||३३||

औरतीसरी जो कन्या थी उसका नाम तपती रक्खा । तपतीके कुरुदेश के राजा सम्बरणसे मनुजेश्वर नामएक पुत्र हुआ ||३३||

तस्यवैवस्वतस्याहंमनोःसप्तममन्तरम्। कथयामिसुतान्भूपानृषीन्देवान्सुराधिपम् ||३४||

हे कौटुकि ! अव उस सातवेंमन्वन्तर में जो देवता,  ऋषि और उस मनुके पुत्रराजा लोग हुए उनको कहता हूँ ॥३४॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंवैवस्वतमन्वन्तरमेंवैवस्वतोपत्तिनाम७८वांअध्यायसमाप्त।