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मार्कण्डेयउवाच

 सतेनपितृवाक्येणभृशमुद्विग्नमानसः। कन्याभिलाषीविप्रर्षिःपरिबभ्राममेदिनीम्॥१

मार्कण्डेयजी बोले

पितरों के वचनों से उद्विग्न चित्त होकर वह विप्रर्षि कन्या की इच्छा करते हुए पृथ्वी पर घूमनेलगे ॥ १ ॥

कन्यामलभमानोऽसौपितृवाक्याग्निदीपितः। चिन्तामवापमहतीमतीबोद्विग्नमानसः॥२

कोई स्त्री न मिलने पर वह पितरों के वाक्यों की अग्नि से दग्ध होकर श्रत्यन्तं चिन्ता

को प्राप्त हुए और उनका चित्त उद्विग्न होगया ॥ २॥

किंकरोमिक्वगच्छामिकथंमेदारसंग्रहः। क्षिप्रंभवेत्मत्पितृणांसचाभ्युदयकारकः॥३

वहकहनेलगेकिमैंक्याकरू, कहाँजाऊँ मुझकोस्त्रीकिसप्रकारमिलेजिससेकिपितरोंकाउद्धारहो||३||

इतिचिन्तयतस्तस्यमतिर्जातामहात्मनः। तपसाराधयाम्येनंब्रह्माणंकमलोद्भवम्॥४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए उन महात्मा को यह मति उपजी कि कमल-योनि ब्रह्माजी की तपस्यां द्वारा श्राराधना कीजाय॥ ४ ॥

ततोवर्षशतंदिव्यंतपस्तेपेसवेधसः। | आराधनायसतदापरंनियममास्थितः || ५ ||

फिर नियम पूर्वक उन्होंने सौ दिव्य वर्षों तक तप करके ब्रह्मा की आराधना की ॥ ५ ॥

ततःस्वंदर्शयामासब्रह्मालोकपितामहः। उवाचतंप्रसन्नोऽस्मीत्युच्यतामभिवाञ्छितम् || ६

जगत्पिता ब्रह्माजी ने उसको अपना दर्शन दिया और कहा, "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारी इच्छाक्या है यह मुझे बताओ " ॥ ६ ॥

ततोऽसौमणिपत्याहब्रह्माणंजगतोगतिम्। पितृणांवचनात्तेनयत्कर्तुमभिवाञ्छितम्। ब्रह्माचाहरुचिविप्रंश्रुत्वातस्याभिवाञ्छितम्॥७॥

फिर रुचि ने जगत की गति ब्रह्माजी को प्रणाम कर पितरों के वचनों के अनुसार उनको जो कुछ श्रभीष्ट था वह कह सुनाया और ब्रह्माजी उनकी इच्छा कोसुनकर वोले ॥ ७ ॥

ब्रह्मोवाच

प्रजापतिस्त्वंभवितास्रष्टव्याभवताप्रजा: सृष्ट्वाप्रजाःसुतान्विप्रसमुत्पाद्यक्रियास्तथा || ८ कृत्वाहृताधिकारस्त्वंततःसिद्धिमवाप्स्यसि। सत्वंतथोक्तंपितृभिःकुरुदारपरिग्रहम् || ६

ब्रह्माजी बोले--

हे विप्र ! तुम प्रजापति होगे और प्रजा उत्पन्न करोगे । प्रजानों को उत्पन्न करके तुम विहित

क्रियात्रों को करके सिद्धि को प्राप्त करोगे अतः तुम पितरों के कथनानुसार स्त्री ग्रहण करो ॥ ६ ॥

कामश्चममभिध्यायक्रियतांपितृपूजनम् | तएवतुष्टाःपितरःप्रदास्यन्तितवेप्सितान्। पत्नींसुतांचसन्तुष्टाःकिंनदद्युःपितामहाः॥१०

स्त्री की इच्छा करके तुम पितरों का पूजन करो । वही पितर संतुष्ट होकर तुम्हारे इच्छित पत्नीऔर पुत्रों को प्रदान करेंगे ॥ १० ॥ .

मार्कण्डेयउवाच

इत्यृषेर्वचनश्रुत्वाब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। नद्याविविक्तेपुलिनेचकारपितृतर्पणम्॥११॥

मार्कण्डेयजी बोले--

हे मुनि कौटुकिजी ! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी के वचन सुनकर रुचि ने नदी के किनारे पितरों का

तर्पण किया ॥ ११ ॥

तुष्टावचपितृन्विप्रस्तवैरेभिस्तथादृतः। एकाग्रःप्रयतोभूत्वाभक्तिनम्रात्मकन्धरः॥१२॥

फिर एकाग्र चित्त ढोकर और भक्ति से प्रणाम करते हुए रुचि ने आदर पूर्वक स्तोत्रों से पितरों को सन्तुष्ट किया ॥ १२ ॥ रुचिरुवाच

नमस्येऽहंपितृन्श्राद्धेयेवसन्त्यधिदेवताः। देवैरपिहितर्प्यन्तेयेचश्राद्धस्वधोत्तरैः॥१३

रुचि वोले --

मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जो श्राद्धमें 'देवता होकर निवास करते हैं और जिनका कि

श्राद्धों में देवता भी स्वधा कहकर तर्पण करते हैं ॥१३

नमस्येऽहंपितॄनस्वर्गेयेतर्प्यन्तेमहर्षिभिः। श्राद्धैर्मनोमयैर्भक्त्याभुक्तिमुक्तिमभीप्सुभिः || १४

उन पितरों को नमस्कार करता हूँ जिनका कि स्वर्ग में भुक्तिऔर मुक्ति की इच्छा करनेवाले महर्षि लोग भक्ति पूर्वक श्राद्धों से तर्पण करते हैं ॥ १४ ॥

नमस्येऽहंपितॄन्स्वर्गेसिद्धाःसन्तर्पयन्तियान्। श्राद्धेषुदिव्यैःसकलैरुपहारैरनुत्तमैः॥१५॥

मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जिनको कि स्वर्ग में सिद्ध लोग श्राद्धों में दिव्य और उत्तम

उपहारों से तृप्त करते हैं ॥ १५ ॥

नमस्येऽहंपितृन्भक्त्यायेऽर्च्यन्तेगुह्यकैरपि। ।तन्मयत्वेनवाञ्छद्धिद्विमात्यन्तिकींपराम्॥१६

 मैं उन पितरों को नमस्कार करता हूँ जिनको ऋद्धि की इच्छा करते हुए परम एकाग्र चित्त होकर गुह्यक भी भक्तिपूर्वक पूजते हैं ॥ १६ ॥

नमस्येऽहंपितॄनमत्यैरर्च्यन्तेभुत्रियेसदा। श्रद्धयाऽभीष्ट - लोकमाप्तिप्रदायिनः॥१७॥

मैंउनपितरोंकोप्रणाम करताहूँजिनकीकिपृथ्वीपरमनुष्यलोगसदैव भीष्ट लोकोंकी प्राप्तिकी इच्छा सेश्रद्धा पूर्वकश्राद्धों में अर्चना करते हैं ॥ १७ ॥

नमस्येऽहंपितॄन्विषैरच्र्च्यन्तेभुवियेसदा। वाञ्छिताभीष्टलाभायप्राजापत्यमदायिनः॥१८॥

 मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जो कि ब्रह्मलोक को प्राप्त कराते हैं और जिनको कि पृथ्वीपर श्रभीष्ट साधनके लिये ब्राह्मण लोग पूजते हैं ||१८||

नमस्येऽहंपितॄन्येवैतर्प्यन्तेऽरण्यवासिभिः। वन्यैःश्राद्धर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकिल्बिषैः॥१६॥

मैं उन पितरोंको प्रणाम करता हूँ जिनको कि वनवासी, निष्पाप फूलों से पूजते हैं ॥१९॥

श्राद्धर्यताहारैस्तपोनिर्धूतकिल्विषैः "नमस्येऽहंपितृन्विमैर्नैष्ठिकत्रतचारिभिः। येसंयतात्मभिर्नित्यंसन्तर्प्यन्तेसमाधिभिः ||२०||

 मैं उन पितरोंको नमस्कार तपस्वी और यताहारी लोग श्राद्ध करके वन के करता हूँ जिनको कि निष्ठा व्रत वाले ब्राह्मण और जितेन्द्रिय लोग समाधियों से सदा तृप्त करते हैं ।२०

नमस्येऽहंपितृन्श्राद्धै: राजन्यास्तर्पयन्तियान्। कव्यैरशेषैर्विधिवल्लोकत्रयफलमदान्॥२१॥

मैं उन त्रिलोकीका फल देनेवाले पितरों को प्रणाम करता हूँ जिनको क्षत्रिय लोग अशेष कव्य पदार्थों से विधि पूर्वक श्राद्ध करके तृप्त करते हैं ॥ २१ ॥

नमस्येऽहंपितॄन्वैश्यैरच्र्यन्तेभुवियेसदा। स्वकर्माभिरतैर्नित्यंपुष्प- धूपान्नचारिभिः॥२२॥

मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जिनको अपने कामों में लगे हुए वैश्य लोग पृथ्वी पर सदा पुष्पधूप, अन्न, जल आदि से तृप्त करते हैं ॥ २२ ॥

नमस्येऽहंपितृन्श्राद्धर्येशूद्रैरपिभक्तितः। सन्तर्प्यन्तेजगत्यत्रनाम्नाख्याताःसुकालिनः२३

मैं उन पितरों को नमस्कार करता हूँ जो इस संसार में सुकाली नाम से प्रसिद्ध हैं और जिनको कि शूद्र लोग भक्तिपूर्वक श्राद्धों में तृप्त करते हैं ॥ २३ ॥ नमस्येऽहंपितृन्श्राद्ध: पातालेयेमहासुरैः। सन्तर्पन्तेस्वधाहारास्त्यक्तदम्भ - मदैःसदा ||२४|||

मैं उन पितरों को नमस्कार करता हूँ जिनको कि पाताल में महान राक्षस लोग दम्भ और मद छोड़ कर स्वधा कहकर श्राद्धों से तृप्त करते हैं ॥ २४ ॥

नमस्येऽहंपितॄन्श्राद्धंरच्र्यन्तेयेरसातले। भोगैरशेपैर्विधिवन्नागैःकामानभीष्युभिः ||२५||

मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जिनको कि रसातल में अनेक कामनाओं की इच्छाओं से नाग

लोग विधि पूर्वक अनेक भोगों से पूजते हैं ॥ २५ ॥

नमस्येऽहंपितृन्श्राद्धःसपैःसन्तर्पितान्सदा। तत्रैवविधिवन्मन्त्र - भोगसम्पत्समन्वितैः॥२६॥

मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जिनको कि वहाँ रसातल में ही सर्प सदा मन्त्र, भोग और

सम्पत्तियों से विधिवत् तृप्त किया करते हैं ||२६||

पितृन्नमस्येनिवसन्तिसाक्षादयेदेवलोके। चतथान्तरीक्षे।महीतलेयेचसुरादिपूज्यास्ते।

मे प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम् ॥२७॥

श्राकाशऔरपृथ्वीतलपररहतेहैंऔरजोकि देवताश्रादिकोंसेपूजितहैं।वेपितरमेरेअर्पण कियेहुएजलकोग्रहणकरें॥२७॥

पितृन्नमस्येपरमात्मभूतायेवैविमाने निवसन्तिमूर्त्ताः।यजन्तियानस्तमलैर्मनोभि योगीश्वराःक्लेशविमुक्तिहेतून् ||२८||

 मैं परमात्मा स्वरूप उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जो विमानों पर चढ़कर अन्तरिक्ष में निवास करते हैं और जिनको कष्ट से मुक्ति पाने के अभिप्राय से योगीश्वर'विगल चित्त से पूजते हैं ॥ २८ ॥

पितृन्नमस्येदिवियेचमूर्त्ताःस्वधाभुजः। काम्यफलाभिसन्धौ।प्रदानशक्ताःसकलेप्सितानां विमुक्तिदायेऽनभिसंहितेषु ||२६||

मैं उन पितरों कोनमस्कार करता हूँ जो कि स्वर्ग में रहते हैं और स्वधाभोजी हैं तथा जो कामना वालों की इच्छापूरी करते और निष्काम लोगों को मुक्ति प्रदान करते हैं ॥ २६ ॥

तृप्यन्तुं तेऽस्मिन् पितरः समस्ता इच्छावतां

ये प्रदिशन्ति कामान् । सुरत्वमिन्द्रत्वमतोऽधिकं । वासुवान्पशून्स्वानिवलंगृहाणि॥३०॥

इससे वे सव पितर तृप्त हों जो  कि इच्छा करने वालों की सब इच्छायें पूर्ण करते हैंऔरदेवत्व, इन्द्रत्वतथाइससेभीअधिक. ब्रह्मत्वतथापुत्र, पशुबलऔरगृहआदिप्रदान करतेहैं॥३०॥

सोमस्य ये रश्मिषु येऽर्कविम्वे शुक्ले विमाने चसदावसन्ति।तृप्यन्तुतेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयै -

र्गन्धादिना पुष्टिमितो व्रजन्तु ॥ ३१ ॥

 वे पितर जो चन्द्रमा की किरणों औरसूर्यकीज्योतिमेंतथाश्वेत, विमानोंमेंसदैवनिवास करते हैं

 इन श्रन्न, जल, गन्ध श्रादिसे तृप्तहोकर पुष्ट हों ॥३१॥

येषांहुतेऽनौहविषाचतृप्तिर्येभुञ्जते विप्रशरीरसंस्था: ।येपिण्डदानेनमुदंप्रयान्ति तृप्यन्तुतेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयैः॥३२॥

 जो पितर अग्नि में हविष्य प्रदान करने से तृप्त होतेहैं तथा जो ब्राह्मणके शरीर में स्थित होकर भोजन करते हैं और जो पिण्डदान से प्रसन्न होते हैं  वे पितृ लोग इन अन्न औरजलों से सन्तुष्ट हों ॥ ३२ ॥

येखड्गिमांसेनसुरैरभीष्टैःकृष्णैस्तिलैर्दिव्य- मनोहरैश्च।कालेनशाकेनमहर्षिवय्यैः सम्मीणितास्तेमुदमत्रयान्तु | ३३ ||

जो पितर गैंडेके मांस से अथवा देवताओं के दिये हुए काले तिलों से अथवा दिव्य मुहूर्त में महर्षियों के दिये हुए शाक से प्रसन्न होते हैं वे यहाँ मुझपर प्रसन्न हों ॥ ३३ ॥

कव्यान्यशेषाणिचयान्यभीष्टान्यतीव तेषाममरार्चितानाम्।तेषान्तुसान्निध्यमिहास्तु पुष्पगन्धान्नभोज्येषुमयाकृतेषु ||३४||

जो पितर लोग देवताओं से पूजित होकर शेष कव्यों को अभीष्ट मानते हैं वे मेरे सान्निध्य से

पुष्प, गन्ध तथा अन्न आदि को ग्रहण करें ॥ ३४ ॥

दिनेदिनेयेप्रतिगृह्णतेचींमासान्तपूज्या | भ्रुवियेऽष्टकासु।येवत्सरान्तेऽभ्युदयेचपूज्याः प्रयान्तुतेमेपितरोऽत्रतृप्तिम् ||३५||

जो पितर लोग नित्य प्रति अर्घ्य ग्रहण करते हैं तथा पृथ्वी पर जिनकी अभ्युदय काल में प्रका,

मासान्त और वर्ष के अन्त की पूजा होती है, वेपितर यहाँ तृप्ति को प्राप्त हों ||३५||

पूज्याद्विजानांकुमुदेन्दुभासोयेक्षत्रियाणाञ्च नार्कवर्णाः।तथाविशांयेकनकावदाता | नीलीनिभाःशूद्रजनस्ययेच ||३६||

 जो पितर लोग चन्द्रमा के समान प्रकाशित होकर ब्राह्मणों से, बाल सूर्य की तरह ज्योतिष्मान् होकर क्षत्रियों से, सुवर्ण के समान कान्तियुक्त होकर वैश्यों से औरश्यामवर्ण होकर शूद्रों से पूजित हैं ॥ ३६ ॥

तेऽस्मिन्समस्ताममपुष्पगन्धधूपान्नतोयादि निवेदनेन।तथाग्निहोमेनचयान्तुतृप्तिसदा पितृभ्यःप्रणतोऽस्मितेभ्यः ||३७||

वे सब मेरे से तथा अग्नि में होम करने से तृप्त हों, मैं उन पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न, जल आदि के निवेदनपितरों को सदा प्रणाम करता हूँ ॥ ३७ ॥

येदेवपूर्व्वाण्यतितृप्तिहेतोरनन्तिकव्यानि शुभाहुतानि।तृप्ताश्चयेभूतिसृजोभवन्ति | तृप्यन्तुतेऽस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्यः॥३८॥

  मैं उन पितरों को प्रणाम करता हूँ जो अग्नि में हवन किये हुए कव्य को खाते हैं और जो तृप्त होकर ऐश्वर्य प्रदान करते हैं ॥ ३८ ॥

रक्षांसिभूतान्यसुरांस्तथोग्रान्निर्नाशयन्त स्त्वशिवंप्रजानाम्।श्राद्याःसुराणाममरेशपूज्या- | किस्तृप्यन्तुतेऽस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्यः ||३६|| को प्रणाम करता हूँ जो राक्षसों, भूतों और प्रचण्ड दैत्यों का नाश करके प्रजा का कल्याण करते हैं। जो पितरदेवताओं के पूर्ववर्ती और उनसे पूज्य हैं वे तृप्त हों ||३६||

निष्वात्तावर्हिषदआज्यपाःसोमपास्तथा। व्रजन्तुतृप्तिंश्राद्धऽस्मिन्पितरस्तर्पितामया॥४०॥

ज्या और सोमपा हैं वे इस श्राद्ध में मुझसेतर्पित होकर तृप्ति को प्राप्त हों ||४०||

श्रग्निष्वात्ताःपितृगणाःमाचींरक्षन्तुमेदिशम्। तथावर्हिषदःपान्तुयाम्यांयेपितरःस्मृताः॥४१

 वे पिनर जोकि अग्निष्वात्ता, वहिर्षद पितर जो बहिर्षद कहलाते हैं मेरी दक्षिण दिशा में

रक्षा करें ॥ ४१ ॥

प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपिसोमपाः। रक्षो-भूत-पिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोषतः||४२||

श्राज्यपा पितर पश्चिम दिशा में, तथा सोमपा उत्तर दिशा में राक्षस, भूत, पिशाचतथा असुरों से मेरी रक्षा करें ॥ ४२ ॥

सर्व्वतथाधिपस्तेषां यमो रक्षां करोतु मे ।

विश्वो विश्वभुगाराध्यो धम्र्मो धन्यः शुभाननः । भूर्तिदोभूतिभूतिःपितृणांयेगणानव ||४३|||

उन सब पितरों के स्वामी यमराज मेरी रक्षा करें । विश्व, विश्वभुक्, श्राराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति पितरों के ये नौ गण ४३

कल्याण : कल्यताकर्त्ताकल्यःकल्यंतराश्रयः।

कल्पताहेतुरवधःषड़िमेतेगणाःस्मृताः ||४४ ||

कल्याण, कल्यताकर्त्ता, कल्य, कल्यतराश्रय, कल्याणहेतु और श्रवध, ये छहों गए ॥ ४४ ॥

वरोवरेण्योवरदःपुष्टिदस्तुष्टिदस्तथा। विश्वपातातथाधातासप्तैवैतेतथागणाः || ४५||

बरवरेण्य, वरद, पुष्टि, तुष्टि, विश्वपाता तथा धाता ये पितरों के सात गए ॥ ४५ ॥

महान्महात्मामहितोमहिमावान्महाबलः। गणाःपंचतथैवैतेपितॄणांपापनाशनाः || ४६ ||

महान्, महात्मा महित, महिमावान् और महावल ये पापनाशक पितरों के पाँच गए ॥ ४६ ॥

सुखदोधनदायोधर्म्मदोऽन्यथभूतिदः। पितॄणांकथ्यतेचैतत्तथागणचतुष्टयम् ||४७॥ |

सुखद, धनद, और भूतिद ये पितरों के चार गण ॥ ४७ ॥

एकत्रिंशत्पितृगणायैर्व्याप्तमखिलंजगत्। तेमेनुतृप्तास्तुप्यन्तुयच्छन्तुचसदाहितम्॥४८॥

इसप्रकारइकत्तीसपितृगणोंसेसम्पूर्णजगतव्याप्त है।येसबपितरगणतृप्तहोकरकेसदामेरीरक्षाकरें॥४८|| इतिश्री मार्कण्डेय०मेंरुचि - उपाख्यानमेंरुचिकृतपितृ-पुरुषस्तोत्रकथननाम६६वाँश्र०स०।