मार्कण्डेय महा पुराण
38
जड़ उवाच
दत्तात्रेयं ततो विप्रं प्रणिपत्य स पार्थिवः । प्रत्युवाच महात्मानं प्रश्रयावनतो वचः ॥ १
जड़ ( सुमति) बोले- उस राजाने ब्राह्मण दत्तात्रेय को प्रणाम किया तथा दीनतापूर्वक उन महात्मा से कहा ॥१॥
सम्यक् प्रपश्यतो ब्रह्मन् मम दुःखं न किञ्चन । प्रसम्यग्दर्शिनो मन्त्राः सर्व्वर्देवासुखार्णवे ॥ २॥
भगवन् ! मुझे भली प्रकार आत्मा का ज्ञान है. इस लिये मुझे कुछ दुःख नहीं है, जो लोग श्रात्मा को भली प्रकार नहीं जानते हैं: वे सदैव दुःख के सागर में डूबे रहते हैं ॥ २ ॥
यस्मिन् यस्मिन् समासक्तां बुद्धिः पुंसः प्रजायते । ततस्ततः समादाय दुःखान्येव प्रयच्छति ॥ ३ ।
मनुष्यों का मन जिस-जिस वस्तु में श्रासक्ति रखता है उसी- उसी वस्तु से उसको दुःख आते हैं ॥ ३ ॥
मार्जारभक्षिते दुःखं यादृशं गृहकुकुटे | न तादृङ्मताशून्ये कलविङ्केऽथ मूषिके ॥ ४ ॥
यदि पालतू मुर्गे को दिल्ली खाजाय तो: इतना दुःख होता है जितना कि मूसे श्रादि के खाने से नहीं होता है ॥ ४ ॥
सोsहं न दुःखी न सुखी यतोऽहं प्रकृतेः परः । योभूताभिभवो भूतैः सुखदुःखात्मको हि सः॥ ५
चूंकि मैं प्रकृति से परे हूं इसलिये मुझको दुःख है न सुख । जो इस भूत के साथ ममता रखता है वही सुखी और दुःखी है ॥ ५ ॥ ॥ दत्तात्रेय उवाच
एवमेतन्नरव्याघ्र यथैतद्वयाहृतं त्वया । ममेति मूलं दुःखस्य न ममेति च निरृतेः ॥ ६
दत्तात्रेय वोले- हे पुरुपसिंह ! यह सब इसी तरह है जिस तरह कि तुमने कहा है । यह मेरा है यही दुःख का मूल है तथा जब ममता नहीं रहती तब निवृत्ति हो जाती है ||६||
मत्प्रश्नादेव ते ज्ञानमुत्पन्नमिदमुत्तमम् । ममेति प्रत्ययो येन क्षिप्तः शाल्मलितूलवत् || ७ ||
मेरे प्रश्न करने से ही तुमको यह उत्तम ज्ञान उत्पन्न हुआ है जिससे ममत्व का प्रभाव इस प्रकार दूर होगया है जैसे सेमर की रुई हवा से उड़ जाती है ||७||
अहमित्यं कुरोत्पन्नी ममेतिस्कन्धवान् महान् । गृहक्षेत्रोवशाख पुत्रदारादिपछवः ॥ ८ ॥
'अहं' अर्थात् मैं इसका अंकुर है और 'मेरा' इसका बड़ा स्कन्द है, घर और खेत इसकी ऊपर की शाखायें हैं तथा स्त्री पुत्रादि इसके पत्ते हैं ॥ ८ ॥ धनधान्यमहापत्रों नैककालमवर्द्धितः । पुण्यापुण्याग्रपुष्पश्च सुखदुःखमहाफलः ॥ ६ ॥
धन-धान्य इसके बड़े-बड़े पत्ते हैं जो चिरकाल से बढ़े हुए हैं । पुण्य और पाप इसके पुष्प और सुख दुःख इसके फल हैं ॥ ॥
* तत्र मुक्तिपथव्यापी मूढसम्पर्कसेचनः । विधित्साभृङ्गमालाढ्यो हृद्यज्ञान महातरुः ॥१०॥
मुक्तिमार्ग को रोकने वाले सूर्खों के सम्पर्करूपी जलसे इसका सिंचन होता है और भौंरों का जो झुण्ड इसपर है वह विधि है ऐसा यह अज्ञानरूपी महावृक्ष है॥ १० ॥
संसाराध्यपरिश्रान्ता ये तच्छायां समाश्रिताः । भ्रान्तिज्ञानसुखाधीनास्तेषामात्यन्तिकं कुतः ॥ ११॥
संसाररूपी मार्ग में थक कर जो लोग इस वृत्तकी छाया का आश्रय लेते हैं वे भ्रमपूर्ण ज्ञान और सुख दुःख के आधीन हो जाते हैं, उनको मोक्ष कहाँ ? ॥११॥
यैस्तु सत्सङ्गपाषाण- शितेन ममतातरुः । छिन्नो विद्याकुठारेण ते गतास्तेन वर्त्मना ||१२||
जो मनुष्य सत्सङ्गरूपी पत्थर पर तेज़ करके विद्यारूपी कुठार से इस ममतारूपी वृक्ष को काट डालते हैं, वे ही उस मार्ग पर जाते हैं जो मोक्षका है ||१२||
प्राप्य ब्रह्मवनं शीतं नीरजस्कमकण्टकम् | प्राशुवन्ति परां माज्ञा निरृति वृत्तिवर्जिताः ॥ १३
वे ज्ञानी लोग काँटे और धूलि से रहित शीतल ब्रह्म-ज्ञान रूपी बनमें पहुँचकर परमनिर्वृत्ति को प्राप्त होते हैं और प्रवृत्ति अर्थात् श्रावागमन - से रहित हो जाते हैं ॥ १३ ॥
भूतेन्द्रियमयं स्थूलं न त्वं राजन् न चाप्यहम् । न तन्मात्रं मया वाच्यं नैवान्तःकरणात्मकौ ॥१४॥
हे राजन् ! भूतेन्द्रियों सहित जो यह स्थूल शरीर है वह न मैं हूँ और न तुम । शरीर के भीतर आत्मा साक्षीरूप है ॥ १४ ॥
कं वा पश्यामि राजेन्द्र प्रधानमयमावयोः । यतः परो हि क्षेत्रज्ञः सङ्घातो हि गुणात्मकः ॥ १५॥ |
हे राजेन्द्र ! हम अपने में और तुम में किसको प्रधान समझें जब कि क्षेत्रज्ञ पुरुष सबसे परे है, इसलिये यह सब गुणात्मक है ॥ १५ ॥
मशकोडुम्बरेपीका -मुजमत्स्याम्भसां यथा । एकत्वेऽपि पृथग्भावस्तथा क्षेत्रात्मनोनृप ॥ १६॥
हे राजन् जिस प्रकार भुनगा गूलर में, सिरकी भूंगी में और मछली जल में रहते हुए एक हैं परन्तु यथार्थ में अलग-अलग हैं, इसी प्रकार शरीर और आत्मा एक में स्थित होते हुए भी अलग-अलग हैं ॥ १६ ॥
अलर्क उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन ममाविर्भूतमुत्तमम् । ज्ञानं प्रधानचिच्छक्ति-विवेककरमीदृशम् । १७ ॥
अॅलर्क बोले- हे भगवन् ! आपकी कृपा से मुझे चैतन शक्ति युक्त उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ ॥ १७ ॥
किन्त्वत्र विपयाक्रान्ते स्थैर्य्यवत्त्वं न चेतसि । न चापि वेद्मि मुच्येयं कथं प्रकृतिवन्धनात् ॥ १८ ॥
किन्तु मेरा मन विषयों में आसक्त है और स्थिर नहीं है, इसलिये इस प्रकृति रूपी मायाके बन्धनसे किस प्रकार मुक्त. होऊँगा यह जानना चाहता हूँ ॥ १८ ॥
कथं न भूयां भूयश्च कथं निर्गुणतामियाम् । कथंच ब्रह्मणैकत्वं व्रजेयं शाश्वतेन वै || १६ ||
किस तरह आवागमन से रहित होकर निर्गुणता को प्राप्त ! होऊंगा और किस प्रकार मैं शाश्वत ब्रह्ममें लीन होऊंगा ? ॥ १६ ॥
तन्मे योगं तथा ब्रह्मन् प्रणतायाभियाचते ।
सम्यग्ब्रूहि महाप्राज्ञ सत्सङ्गो छुप कृन्नृणाम् ||२०||
हे भगवन् ! इसलिये मैं नम्रता पूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि योग मुझे भली प्रकार समझाइये क्योंकि बुद्धिमानों का सत्सङ्ग मनुष्यों का उपकार करने वाला है ॥ २०॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में पिता-पुत्र संवादमें प्रश्न नाम का ३८वाँ अध्याय समाप्त |
Summary of chapter 38 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The father, illuminated by his son's profound realization, seeks further clarification on how an embodied soul can maintain inner detachment while living in the material world. The son illustrates through allegories how the wise remain untouched by worldly dualities of pleasure and pain, honor and dishonor, just as a lotus leaf remains unwetted by water.