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कौटुकिरुवाच

भगवंस्त्वण्डसम्भूतिर्यथावत् कथिता मम ब्रह्माण्डे ब्रह्मणो जन्म तथा चोक्तं महात्मनः॥

कौटुकिजी बोले- हे भगवन् ! श्रापने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और ब्रह्माजी के जन्म का मुझसे यथावत् वर्णन किया ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तो भृगुकुलोद्भव यदा न सृष्टिभूतानामस्ति किं नु न चास्ति वा काले वै प्रलयस्यान्ते सर्व्वस्मिन्नुपसंहृते

हे भृगुकुल से उत्पन्न मार्कण्डेयजी ! श्रव श्रापसे यह सुनने की इच्छा करता हूँ कि प्रलयकाल के अन्त में जब कि सबका उपसंहार हो जाता है जीवों की सृष्टि रहती है या नहीं

मार्कण्डेय उवाच

यदा तु प्रकृतौ याति लयं विश्वमिदं जगत् तदोच्यते प्राकृतोऽयं विद्वद्भिः प्रतिसञ्चरः

मार्कण्डेयजी बोले- जब यह सृष्टि प्रकृति में लीन हो जाती हैं तो इस प्राकृत को विद्वान लोग प्रतिसञ्चर कहते हैं

वात्मन्यवस्थितेऽव्यक्ते विकारे प्रतिसंहते रुतिः पुरुषश्चैव साधर्म्येणावतिष्ठतः || ४।।

जब श्रव्यक्त पुरुष विकार को छोड़ कर अपने में स्थित हो जाता है तब प्रकृति और पुरुष अपने धर्मानुसार स्थित हो जाते हैं ४॥

तदा तमश्च सत्त्वञ्च समत्वेन गुणौ स्थितौ

अनुद्रिक्तावनूनौ च तत्मोतौ च परस्परम्

फिर तमोगुण और सतोगुण मिलकर एक होजाते हैं तथा एक दूसरे से न कम रहते हैं और न अलग रहते हैं ||५||

तिलेषु धा यथा तैलं घृतं पयसि वा स्थितम् तथा तमसि सत्त्वे च रजोऽप्यनुसृतं स्थितम् ||

जिस प्रकार तिलों में तेल और दूध में घी रहता है उसी प्रकार सतोगुण और तमोगुण में रजोगुण मिला हुआ रहता है ||६||

उत्पत्तिब्रह्मणो यावदायुपो द्विपरार्द्धिकम् तावद्दिनं परेशस्य तत्समा संयमे निशा

ब्रह्मा की उत्पत्ति से तक उनकी श्रायु होती है उसको द्विपरार्द्ध कहते हैं वह परब्रह्म का एक दिन होता है और उतनी ही बढ़ी उनकी रात्रि होती है

हर्मुखे प्रयुद्धस्तु जगदादिरनादिमान् सर्व्वहेतुरचिन्त्यात्मा परः कोऽप्यपरक्रियः \

वह जगत के यादि और अनादिमान्, सबके कारण, अचिंत्या- त्मा और परक्रिया हैं वह ब्रह्म प्रातःकाल में जाग कर ||८||

प्रकृतिं पुरपञ्चैव प्राविश्याशु जगत्पतिः क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः || ६ ||

वे जगत के स्वामी जल्द प्रकृति श्रौर पुरुष में प्रवेश कर जाते हैं तथा परम योग से उनको क्षोभित करते हैं || ||

यथा मदो नवस्त्रीणां यथा वा माधवानिलः अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान् ॥१०॥

जिस प्रकार वसन्त ऋतु का पवन और मद नई स्त्रियों को क्षोभित करता है उसी तरह वह योगयुक्त ब्रह्म प्रकृति और पुरुपको क्षोभित करता है १०

प्रधाने क्षोभ्यमाणे तु स देवो ब्रह्मसंज्ञितः समुत्पन्नोऽण्डकोपस्थो यथा ते कथितं मया ११॥

प्रधान पुरुष के क्षोभित होने पर वह देव जिनको ब्रह्म कहते हैं अण्डकोश में स्थित हो उत्पन्न होते हैं जिस प्रकार कि मैंने ! पहिले तुमसे कहा था ॥११॥

स एव क्षोभकः पूर्व्वं स क्षोभ्यः प्रकृतेः पतिः

स सङ्कोच विकाशाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः १२ | |

वही प्रकृति के स्वामी पुरुष जो पहिले क्षोभयुक्त श्रव क्षोभरहित होकर सङ्कोच और विकाशसे प्रधानत्त्रमें स्थित रहते हैं।

उत्पन्नः स जगद्योनिरगुणोऽपि रजोगुणम् भुञ्जन् प्रवर्त्तते सर्गे ब्रह्मत्वं समुपाश्रितः १३

वे ही गुण और अज होते हुए जगत् को उत्पन्न करते हैं और रजोगुण का भोग करते हुए और उत्पन्न करने में प्रवृत्त होने के कारण ब्रह्मा कहलाते हैं १३

ब्रह्मत्वे स प्रजाः सृष्ट्वा ततः सत्त्वातिरेकवान् विष्णुत्वमेत्य धर्मेण कुरुते परिपालनम् ॥१४॥

वे ब्रह्मा होकर प्रजा की सृष्टि करते हैं सृष्टि का पालन करते हैं ||१४||

ततस्तमोगुणोद्रिक्तो रुद्रत्वे चाखिलं जगत् उपसंहृत्य वै शेते त्रैकाल्ये त्रिगुणोऽगुणः ॥१५॥

तथा फिर तमोगुण और सतोगुण युक्त विष्णु होकर वे धर्म पूर्वक से युक्त रुद्र रूप होकर सम्पूर्ण सृष्टि का संहार तीनों गुण कहे १५

यथा मागव्यापकः क्षेत्री पालको लावकस्तथा तथा स संज्ञामायाति ब्रह्मविष्णवीशकारिणीम् १६॥

जिस प्रकार किसान पहिले करके शयन करते हैं, इस प्रकार तीनों काल में बोता है, फिर रक्षा करता है तथा फिर काटता है चाहिये ॥१६॥

ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् रुद्रत्वे संहरत्यपि विष्णुत्वे चाप्युदासीनस्तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः १७

ब्रह्मा होकर लोकों की सृष्टि करते हैं उसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेशरूप पुरुषको जानना और रुद्र होकर उनका संहार करते हैं तथा विष्णु होकर उनका पालन करते हैं, यही तीन

प्रकार की अवस्था स्वयम्भू की है ॥१७॥

रजो ब्रह्मा तमो रुद्रो विष्णुः सत्त्वं जगत्पतिः

एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुरणाः १८।।

रजोगुण ब्रह्मा, तमो- गुण रुद्र और सतोगुण विष्णु हैं। इन्हीं तीनों गुणों के ये तीन देवता हैं ॥१८॥

अन्योन्यमिथुना होते श्रन्योन्याश्रयिणस्तथा क्षरणं वियोगो न ह्येषां न त्यजन्ति परस्परम् १६

ये तीनों गुण एक दूसरे से मिले रहते तथा एक दूसरे के आश्रित हैं, इनका एक क्षणभी वियोग नहींहोता और न ये एक दूसरे को छोड़ते हैं ॥१६॥

एव ब्रह्मा जगत्पूर्वी देवदेवश्चतुर्मुखः रजोगुणं समाश्रित्य स्रष्टृत्वे स व्यवस्थितः ॥२०॥

इस प्रकार जगत् के श्रादिकर्ता सृष्टि की रचना करते हैं २०

हिरण्यगर्भो देवादिरनादिरुपचारत: भूपद्मकर्णिकासंस्थो ब्रह्माग्रे समजायत ॥२१॥

वै ही हिरण्यगर्भ देवदेव, चतुर्मुख ब्रह्मा हैं जो रजोगुण में प्राप्त होकर देव उपचार से सबके यादि और अनादि हैं और उन्हीं की नाभि से पहिले कमलकोश में ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं ||२१||

तस्य वर्षशतं त्वेकं परमायुर्महात्मनः ब्राह्मय रौव हि मानेन तस्य संख्यां निवेोध मे ||२२||

उन महात्मा की परम श्रायु सौ वर्ष की है उस वर्ष का प्रमाण ब्रह्म मान करके कहता हूँ सुनिये ||२२||

निमेषैर्दशभिः काष्ठा तथा पंचभिरुच्यते कलास्त्रिंशच वै काष्ठा मुहूर्त्त त्रिशतिः कलाः ||२३||

दस या पाँच निमेषकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाकी एक कला और तीस कला का एक मुहूर्त होता है ||२३||

अहोरात्रं मुहूर्त्तानां नृणां त्रिंशत् तु वै स्मृतम् अहोरात्रैश्च निशद्भिः पक्षौ द्वौ मास उच्यते २४

तीस मुहूर्त का एक दिन रात मनुष्यों का होता है और तीस दिन का एक महीना होता है २४

षड्भिरयनं वर्ष द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे तद्देवानामहोरात्रं दिनं तत्रोत्तरायणम् ||२५||

छः महीने का एक रात अर्थात् पन्द्रह दिनका एक पक्ष और दो पक्ष अयन और दो अयन का एक वर्ष होता है जो दक्षिणायण और उत्तरायण दो अयन हैं वे ही देवताओं के क्रमशः एक रात और दिन हैं २५

दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं शृणुष्व मे

देवताओं अव देवताओं के बारह हज़ार वर्ष के चतुर्युग के सतयुग त्रेतादि विभागोंको सुनिये ||२६||

चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां कृतमुच्यते शतानि सन्ध्या चत्वारि सन्ध्यांशश्च तथाविधः २७॥

वर्ष के प्रमाण से चार हजार वर्षों का सतयुग होता है इसमें चारसौ वर्ष संध्या और इतना ही संध्यांश होता है || २||

त्रेता त्रीणि सहस्राणि दिव्याव्दानां शतत्रयम् तत्सन्ध्या तत्समां चैव सन्ध्याशश्च तथाविधः॥ २८

तीन हज़ार दिव्य वर्षोंका त्रेता होता है तथा इसकी तीनसौ वर्ष संध्या और इतना ही सन्ध्यांश है २८

द्वापरं द्व े सहस्र े तु वर्षाणां द्वे शते तथा तस्य सन्ध्या समाख्याता द्वे शताब्दे तदंशकः २६

इस द्वापर दो हज़ार दिव्य वर्षों का होता है और व्यतीत होता है २६

कलिः सहस्र दिव्यानामन्दानां द्विजसत्तम सन्ध्या सन्ध्यांशकश्चैव शतकौ समुदाहृतौ ||३०||

हे कौटुकिजी ! कलियुग में दोसौ वर्ष सन्ध्या और दोसौ वर्ष सन्ध्यांश का प्रमाण एकहज़ार दिव्यवर्ष है तथा इसमें भी सौ वर्ष सन्ध्या और सौ वर्ष सन्ध्यांश होता है |

एपा द्वादशसाहस्री युगाख्या कविभिः कृता एतत् सहस्रगुणितमहर्ब्राह्मयमुदाहृतम् ||३१||

इन्हीं युगों को कवियों ने बारह वर्षीय कहा है, यह  चारह हज़ार वर्षों का चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन होता है ||३१||

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवः स्युश्चतुर्द्दश भवन्ति भागशस्तेपां सहस्र' तद्विभज्यते ||३२||

हे ब्रह्मन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं उनका विभाग भी हज़ार से किया जाता है ||३२||

देवाः सप्तर्षयः सेन्द्रा मनुस्तत्सुनवो नृपाः मनुना सह सृज्यन्ते संहियन्ते च पूर्व्ववत् ॥३३॥

इन्द्र सहित सब देवता, सप्तर्पि, मनु और उनके पुत्र राजा लोग मनुके साथ उत्पन्न होते हैं तथा उसी प्रकार नाश को प्राप्त होजाते हैं ॥३३॥

चतुर्युगाणां संख्याता साधिका होकसप्ततिः मन्वन्तरं तस्य संख्यां मानुषान्दैर्निबोध मे ३४

इकहत्तर चतुर्युग का एक मन्वन्तर होता है, मनुष्यों के वर्षसे उसका प्रमाण मुझसे सुनो ॥३४॥

त्रिंशत्कोव्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। | सप्तपष्टिस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया ||३५

विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयं साधिकं विना एतन्मन्वन्तरं प्रोक्तं दिव्यैर्वर्षै निबोध मे ३६

हे द्विज- सत्तम ! तीनकरोड़ सड़सठ लाख बीस हज़ार वर्ष का एक मन्वन्तर मनुष्योंके वर्ष के हिसावसे होता है, व देवताओं के वर्ष के हिसाब से सुनो ॥३५,- ३६

अष्टौ वर्ष सहस्राणि दिव्यया संख्यया युतम् द्विपञ्चाशत् तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ३७॥

श्राठ और बावन अर्थात् साठ हज़ार देव- ताओं के वर्षों का एक मन्वन्तर होता है ||३७||

चतुर्दशगुणो होप कालो ब्राह्मचमहः स्मृतम् तस्यान्तै मलयः प्रोक्तो ब्रह्मन् नैमित्तिको बुधैः॥ ३८

इस को चौदह से गुणा करने पर जो समय श्राता है उसको ब्रह्मा का एक दिन कहते हैं हे कौटुकिं । इस दिन श्रन्तको परिडत लोग नैमित्तिक प्रलय कहते हैं ||३८||

भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च विनाशिनः तथा विनाशमायाति महर्लोकश्च तिष्ठति ३६

इस दिन के अन्त में भूलोक, भुव- र्लोक और स्वर्गलोक नष्ट होजाते हैं तथा इसी तरह महर्लोक भी नाश को प्राप्त होता है ३६

तद्वासिनोऽपि तापेन जनलोकं प्रयान्ति वै एकार्णवे च त्रैलोक्ये ब्रह्मा स्वपिति वै निशि ४०

इसके निवासी ताप के कारण जनलोक को भाग जाते हैं और तीनों लोकों में प्रलय होने पर ब्रह्मा रात को सो जाते हैं ४०

तत्प्रमाणैव सा रात्रिस्तदन्ते सृज्यते पुनः एवन्तु ब्रह्मणो वर्षमेकं वर्षशतन्तु तत् ४१

जितना दिन है उसी प्रमाण की ब्रह्मा की रात्रि है रात्रि के अन्त होने पर ब्रह्माजी पुनः सृष्टि की रचना करते हैं इस प्रकार दिन रात्रि के ३६० दिन का ब्रह्मा का एक वर्ष होता है श्रौर ऐसे सौ वर्षों की आयु ब्रह्मा की है ४१

शतं हि तस्य वर्षाणां परमित्यभिधीयते पञ्चाशद्भिस्तथा वर्षैः पराद्धय मिति कीर्त्यते ४२

ब्रह्मा के इन सौ वर्षों को परम कहते हैं और इनके आधे पचास वर्षों को परार्द्ध कहते हैं ४२

एवमस्य परार्ध्यन्तु व्यतीतं द्विजसत्तम यस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः|||४३||

हेविप्रवर ! इस पहिले परार्द्ध के अन्त होने पर इसको पद्म नाम महाकल्प कहते हैं ॥४३॥

द्वितीयस्य परार्ध्यस्य वर्त्तमानस्य वै द्विज वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकल्पितः ॥४४॥

द्वितीयपरार्द्ध को जो वर्तमान है वाराह कल्प कहते हैं,  इसकी कल्पना पहिले ही करली गई है || ४४ || इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में ब्रह्मायु प्रमाण नाम ४६वाँ अध्याय समाप्तः