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मार्कण्डेयउवाच

तस्यतस्यांसुनन्दायांपुत्राद्वादशजज्ञिरे। प्रांशुःप्रवीरःशूरचसुचक्रोविक्रमःक्रमः॥१

मार्कण्डेयजी बोले-

फिर वत्समी से सुनन्दा के बारह पुत्र उत्पन्न हुए जो कि क्रमशः प्रांशु, प्रवीर, शूर, सुचक्र, विक्रमक्रम ॥ १ ॥

बलोबलाकश्चण्डश्चप्रचण्डश्चसुविक्रमः। स्वरूपश्चमहाभागाःसर्व्वेसंग्रामजित्तमाः॥२

चल, चलाक, प्रचण्ड, सुविक्रम, और स्वरूप थे । ये सब भाग्यवान् तथा संग्राम जीतनेवाले थे ॥ २ ॥

तेषांज्येष्ठोमहावीर्यःप्रांशुरासीन्नराधिपः। इतरेभृत्यवत्तस्यबभूवुर्वशवर्त्तिनः॥३

उनमें सबसे ज्येष्ठ महापराक्रमी राजा प्रांशु थे । उनके अन्य ग्यारह भाई सेवक की तरह

उनके वशवर्ती थे ॥ ३ ॥

तस्ययज्ञेद्विजत्यक्तैरनेकैर्द्रव्यराशिभिः। न्यूनवर्णविसृष्टैश्चसत्यनामावसुन्धरा॥४

उनके यज्ञ में ब्राह्मण तथा सेवकों द्वारा छोड़ी हुई धन राशि से पृथ्वी पूर्ण होकर अपने वसुन्धरा नाम को सार्थक करनेलगी ॥ ४ ॥

सम्यक्पालयतस्तस्यप्रजाःपुत्रानिवौरसान | योऽभूद्धनचयःकोषेतेननिष्पादितास्तुये || ५

  वे प्रजा को पुत्रवत् पालन करते थे और कोष में जो धन इकट्ठा होता था ||५||

क्रतवःशतसाहस्त्रास्तेषांसंख्यानविद्यते। अयुताद्यनकोटीभिर्नचपद्मादिभिर्मुने॥६

उससे वे सैकड़ों, हज़ारों, करोड़ों अनगिनती यज्ञ करतेथे ॥ ६ ॥

प्रजातिस्तस्यपुत्रोऽभूद्वयस्ययज्ञेशतक्रतुः। श्रवाप्यतृप्तिमतुलांयज्ञभागैःसुरैःसह || ७

इनके सबसे बड़े पुत्र प्रजाति हुए हुए जिनके यज्ञ में इन्द्र ने देवताओं सहित अतुल तृप्ति प्राप्तकर ॥ ७ ॥

दानवानांसुवीर्याणांजघाननवतीर्नव। बलश्चबलिनांश्रेष्ठोजम्भञ्चासुरसत्तमम्। अन्यांश्चसुमहावीर्य्यानाजघानामरद्विषः॥८

जम्भ आदि महापराक्रमी दानवों तथा उनकी वलवान् सेनाओं सहित निन्यानवे पराक्रमी

राक्षसों को मारा तथा अन्य भी अनेकों देवशत्रु बलवान् राक्षसों को मारा ॥ ८ ॥

प्रजातेस्तनयाःपंचखनित्रप्रमुखामुने। तेषांखनित्रोराजाभूत्प्रख्यातोनिजविक्रमैः॥६॥

  हे कौटुकि जी ! प्रजाति के खनित्र आदि पाँच पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें सब से बड़े खनित्र राजा हुए ॥ ६॥

सशान्तःसत्यवाक्शूरःसर्व्वप्राणिहितेरतः। स्वधर्माभिरतोनित्यंवृद्धसेवीबहुश्रुतः॥१०

 वे खनित्र शान्त, सत्यवक्ता, वीर, सबकी भलाई चाहनेवाले, सदैव अपने धर्म पर चलने वाले, बड़ों की सेवा करने वाले तथा विद्वान थे ॥१०॥

वाग्मीविनयसम्पन्नःकृतास्त्रोऽप्यविकत्थनः। सर्व्वलोकप्रियो नित्यमुवाचैतदहर्निशम् ॥११॥ वेवक्ता, विनयसम्पन्न, शस्त्रअस्त्रोंमेंविशारद, अपनीबड़ाई कभीनकरने वालेतथासब संसारकेप्रियथे औरदिनरात यहकहाकरते॥११॥

नन्दन्तुसर्व्वभूतानिसन्तुविजनेष्वपि। स्वस्त्यस्तुसर्व्वभूतेषुनिरातङ्कानिसन्तुच॥१२

सब प्राणियोंको आनन्द हो और वे ग़ैरों में भी प्रीति रक्खें । सब जीवों का कल्याण हो श्रीर वे श्रातङ्क रहितहो जावें ॥ १२ ॥

माव्याधिरस्तुभूतानामाधयोनभवन्तुच। मैत्रीमोपभूतानिपुष्यन्तुसकलेजने ||१३||

प्राणियों को कोई आधि, व्याधि न हों और मनुष्यों में परस्पर मैत्री हो तथा सव

लोग फलै फूलं ॥ १३ ॥

शिवमस्तुद्विजातीनांमीतिरस्तुपरस्परम् समृद्धिःसर्व्ववर्णानांसिद्धिरस्तुचकर्म्मणाम् ||१४||

ब्राह्मणों का कल्याण हो और उनमें श्रापस में प्रीति हो तथा सव वर्णों को ऐश्वर्य श्रीर उनके कर्मों में सिद्धि हो ॥ १४ ॥

हेलोकाःसर्व्वभूतेषुशिवावोऽस्तुसदामतिः। यथात्मनितथापुत्रंहितमिच्छयसर्व्वदा॥१५॥

  हे लोगो ! यापकी बुद्धि सब प्राणियों में कल्याणवती हो। जिस तरह अपना हित लोग चाहें उसी तरह श्रपने पुत्रों का भी चाहें ॥ १५ ॥

तथासमस्तभूतेषुवर्त्तभ्यंहितयुद्धयः। एतद्वोहितमत्यन्तंकोवाकस्यापराव्यते ||१६||

सब प्राणियों में परस्पर हित करने वाली बुद्धि की वृद्धि हो । जब एक का दूसरे में हित होगा तो अपराध कौनकरेगा ? ॥१६॥

यत्करोत्यहितंकिञ्चित्कस्यचिन्मूढमानसः। तंसमभ्येतितन्नूनंकर्तृगामिफलंयतः॥१७॥

यदि कोई किसी का मूढ़तावश थोड़ा भी अहित करता है तो उसका फल उसको श्रत्यन्त दुःखदाई होता है ||१७||

इतिमत्यासमस्तेषुभोलोकाःकृतयुद्धयः। सन्तुमालौकिकंपापंलोकानप्राप्स्यथवैयुधाः१८

   ये बात मान कर लोग आपस में एक दूसरे के हितैषी हों, इस तरह लौकिक पाप न होगा और लोग उत्तम लोकों कोप्राप्त करेंगे ॥ १८ ॥

योमेsयनियतेतस्यशिवमस्तुसदाभुवि। यथमांद्वेष्टिलोकेऽस्मिन्सोऽपिभद्राणिपश्यतु१६

इस पृथ्वी पर जो मुझसे प्रीति रखता है उसका तथा जो मेरे विरुद्ध है उसका भी कल्याण हो ॥ १६ ॥

एवंस्वरूपःपुत्रोऽभूतखनित्रस्तस्यभूपतेः। समस्तगुणसम्पन्नःश्रीमानन्दलेक्षणम्॥२०॥

राजा प्रजाति के इसप्रकार सर्व गुण सम्पन्न और कमल के समान नेत्र वाले पुत्र ग्यनित्र हुए ||२०||

तेनतेम्रातरःप्रीत्यापृथग्राज्येषुयोजिताः। स्वयश्चपृथिवीमेतांयुभुजेसागराम्बराम् ||२१||

उन्होंने अपने भाइयों पृथक पृथक राज्य देकर अलग कर दिया और स्वयं इस समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी पर राज्य करनेलगे ||२१||

माच्यांतेनकृतःशौरिंदक्षिणायामुदावसुः। दिशिपतीच्यांसुनयउत्तरस्यांमहारथः ||२२||

उन्होंने पूर्व दिशा का राज्य शौरिको,' दक्षिण का उदावसु को, पश्चिम का सुनय और

उत्तर का महारथ को दिया ॥२२॥

नेपांतस्यचभूपस्यपृथग्गोत्राःपुरोहिताः। भुचुर्मुनयचैवमन्त्रिवंशक्रमागताः

उनमें से हरेक राजा के पृथक पृथक् गोत्र, पुरोहित, पुत्र और मन्त्री गण हुए ॥ २३ ॥

शॉरेरत्रिकुलोद्भूतःसुहोत्रोनामवैद्विजः। उदावसोःकुशावर्तीगौतमान्वयजोऽभवत् ||२४||

शौरि के पुरोहित अिकुल में उत्पन्न सुहोत्र नाम ब्राह्मण हुए और वंश में उत्पन्न कुशावर्त उदावसु के पुरोहित हुए।२४॥

काश्यपःममतिर्नाममुनयस्यपुरोहितः। महारथस्यचाशिष्ठःपुरोधाऽभून्महीभृतः ||२५||

कश्यप कुल में उत्पन्न प्रमति सुनय और वशिष्ट कुलोत्पन्न वाशिष्ठ जी राजा महारथ

के पुरोहित हुए ||२५||

युस्तेस्वराज्यानिचत्वारोऽपिनराधिपाः। खनित्रश्चाधिपस्तेषामशेपवमुधाधिपः ||२६||

 वे चारों राजा अपने राज्य का उपभोग करते परन्तु खनित्र उन सव अधिपति और समस्त पृथ्वी के स्वामी थे ॥२६

तेषुभ्रातृष्वशेषेषुखनित्रःसमहीपतिः। प्रजासुचसमस्तासुपुत्रेष्विवसदाहितः॥२७

उन चारों भाइयों पर तथा समस्त प्रजा पर महाराज खनित्र पुत्रवत् स्नेह करते थे ॥२७॥

एकदामन्त्रिणाशौरिःसप्रोक्तोविश्ववेदिना। विविक्तेपृथिवीपालकिंचिद्वक्तव्यमस्तिनः ||२८||

एव बार शौरि से उनके मन्त्री विश्ववेदि ने कहा, राजन् ! मुझे आपसे कुछ कहना है||२८||

यस्येयंपृथिवीकृत्स्नायस्यभूपावशानुगाः। सराजातस्यपुत्रश्चतत्पौत्रायान्वयस्ततः॥२६॥

यह समस्त पृथ्वी है उसी के वशवर्ती सव राजां हैं तथा वह स्वयं और उसके पुत्र, पौत्र श्रादि

उसके राजा रहेंगे ॥ २६ ॥

इतरेभ्रातरस्तस्यप्राक्स्वल्पविषयाधिपाः। तत्पुत्रश्चाल्पकस्तस्मात्तत्पौत्राश्चाल्यकालकाः३०॥

उसके भाई तो पहिले ही से छोटे छोटे प्रदेशों के राजा हैं । उन भाइयों के पुत्रों के पास उनसे भी कम तथा पौत्रों के पास पुत्रों से भी कम राज्य रह जायगा ॥ ३० ॥

कालेनहासमासाद्यपुरुषात्पुरुषान्तरम्। कृष्योपजीविनोभूपभवन्तीतितदन्वयाः॥३१॥

यहाँतकं कि पुत्र, पौत्रों के बाद जो सन्तति होगी वह समय पाकर घटते घटते खेती पर जीवन निर्वाह करने वाली रह जायगी ||३१||

नोद्धारंकुरुतेभ्राताभ्रातृस्नेहवलार्पण: स्नेहकःपृथिवीपालपरयोर्भ्रातृपुत्रयोः ||३२||

आई कभी भाई पर प्रेम करके उसका उद्धार नहीं चाहता है।  हे राजन!फिर भाई का भाई के पुत्रों पर तो प्रेम कहाँ सेश्राया ||३२||

तत्पुत्रयोःपरतरामतिर्भवतिपार्थिव। तत्पुत्रःकेनकार्येणप्रीतियुक्तोभविष्यति ||३३|||

   हे राजन् ! जब भाई के पुत्रों में प्रीति नहीं होती है तब उसके पुत्र के पुत्रों आदि में कहाँसे होगी ||३३||

अथवायेनतेनैवसन्तोषंकुरुतेनृपः। क्रियतेतत्किमर्थन्तुभूपैर्मन्त्रिपरिग्रहः ||३४||

 हे राजन् ! यदि आप यह कहें कि आपको इतने पर ही सन्तोष है तो फिर राजात्रों द्वारा मन्त्रियों का रक्खा जाना तथा उनसे सलाह लेना व्यर्थ है ||३४||

भुज्यतेसकलंराज्यंमयातेमन्त्रिरणासता। तत्किंसुधाधारयसेसन्तोषंकुरुतेयदि ||३५||

मेरी आपको यहीं मन्त्रणा है कि श्राप समस्त राज्य का उपभोग करें और यदि श्राप सन्तोष करेंगे तो आपको सुख प्राप्त न होगा॥ ३५ ॥

कार्य्यनिष्पादकंराज्यंकरणंकर्त्तुरिष्यते। राज्यलब्धुश्चतेकार्य्यंत्वंकर्त्ताकरणंवयम् ||३६||

राज्य सव सिद्धि का देने वाला है परन्तु उसके लिये उपाय करना चाहिये । आपको राज्य

प्राप्त करना चाहिये, उसमें आप कर्ता होंगे और  हम साधक ||३६||

नोऽस्माभिःकरणैराज्यंपितृपैतामहंकुरु। फलप्रदाभविष्यामःपरलोकेनतेवयम् ||३७||

इसलिये हमको साधन बनाकर आप अपने वाप दादा का राज्य प्राप्त कीजिये.  हमइस लोक में ही आपके काम आगे परलोक मेंनहीं ॥ ३७ ॥ राजोवाच

येष्ठोराजामहीपालवयंतस्यानुजायतः। तःसभुङ्क्तेपृथिवींवयञ्चापवसुन्धराम् ||३८||

राजा बोले-

बड़ा भाई ही समस्त पृथ्वी का मालिक होताहै, हम तो छोटे भाई हैं । अतः वह हो पृथ्वी पर

राज्य करते हैं और हम छोटे छोटे राज्यों के स्वामी हैं ॥ ३८ ॥

यन्तुभ्रातरःपंचपृथ्वीचैकामहामते। तोऽस्याःपृथगैश्वर्य्यंकथंकृत्स्नंभविष्यति॥३६॥

'हे महामति ! हम तो पाँच भाई हैं परन्तु पृथ्वी एक ही है अतः एक एक के पास समस्त पृथ्वी का राज्य किस प्रकार होगा ॥३॥ विश्ववेद्यवाच

वमेतद्भवांस्तत्रयद्यकावसुधांनृप। तंत्वमेवाभिपग्रस्त्रज्येष्ठःशास्तुमहींभवान् ||४०||

विश्ववेदि मन्त्री वोले:-

हे राजन् ! जिस प्रकार आप कहते हैं पृथ्वी और बड़े भाई को रहने दें ॥ ४० ॥

र्वाधिपत्यःसर्वेभ्योभवत्वमखिलेश्वरः। तन्तेचयथाऽहंतेतेषामाहितमन्त्रिणः॥४१॥

आप ही सबकेएक ही है। उसका स्वामित्व श्राप ही ग्रहण कर अधिपति और स्वामी हूजिये, तथा जिस प्रकार  मैं यत्न करता हूँ उसी प्रकार आपके भाइयों केमन्त्री भी उनकी राज्य प्राप्तिके लिये यत्न करते हैं ॥४१

राजोवाच

ष्ठोराजाययापीत्वाभजतेऽस्मान्सुतानिव।

कथं तस्य करिष्यामि ममत्वं जगतीगतम् ॥४२॥

राजाबोले:- हमारेज्येष्ठभ्राताहमपरपुत्रवत्स्नेहकरते. है, हम उनके राज्य पर किस प्रकार दृष्टि डाल||४२

विश्ववेद्यवाच

राज्यस्थितःपूजयेथाज्येष्ठोभूपार्हणैर्नयैः। कनिष्ठज्येष्ठताकेयंराज्यंप्रार्थयतांनृणाम् ||४३||

विश्ववेदि बोले:-

राज्य में स्थित होकर श्राप पड़े भाई की तरह वस्त्र और श्राभूषणों द्वारा पूजित होंगे । राज्य

की इच्छा करने वालों को बड़े छोटे की बातन देखनी चाहिये ॥४३॥ मार्कण्डेयउवाच

तथेति च प्रतिज्ञाते भूभुजा तेन सत्तम ।

विश्ववेदी ततो मन्त्री तद्धातृननयद्वशम् ||४४ ||

मार्कण्डेयजीबोले-

हेक्रोष्टुकिजी ! राजाशौरिकेप्रतिज्ञाकर परमन्त्रीविश्ववेदिनेउनकेभाइयोंकोअपने वशमेंकरलिया ||४४ ||

तेषां पुरोहितांश्चैव आत्मना शान्तिकादिप् ।

नियोजयामास ततः खनित्रस्याभिचारके ||४५॥

इसकेपश्चात्उनकेपुरो- हितोंकोखनित्रपरशान्तिकआदिप्रयोगोंद्वारा श्रभिचारिक कर्मकरनेकेलिये तत्परकिया ||४५||

बिभेद तस्य निभृतान् सामदानादिभिस्तथा ।

चक्रे च परमोद्योगं निजदण्डमबाधने ॥ ४६ ॥

साम, दाम, दण्ड, भेदश्रादिद्वाराउनपुरोहितों कोअपनेवशमेंकियातथाअपनेदण्डकाभय दिखाकरउद्योगमेंतत्परकराया॥४६॥

आभिचारिकमत्युग्रमहन्यहनि कुर्व्वताम् ।

पुरोधसां चतुर्णाञ्च जज्ञे कृत्या चतुष्टयम् ॥ ४७॥

नित्यप्रतिचारोंपुरोहितोंनेमहाराजखनित्रकेनाश होनेकेनिमित्तअभिचारिककर्मकियाजिससे चारकृत्याउत्पन्नहुए॥४७॥

विकरालं महावक्त्त्रमतिभीषणदर्शनम् ।

समुद्यतमहाशूलं प्रभूतमतिदारुणम् ॥४८॥

वेविकरालथेतथा देखनेमेंभयानकमुखवालेथे।महाशूलधारण करवेमहाराजकेनाशकरनेकोउद्यतहुए |॥४८

ततस्तदागतंतत्रखनित्रोयत्रपार्थिवः। निरस्तञ्चाप्यदुष्टस्यतस्यपुण्यचयेनतत्॥४६ | |

और वे वहाँ पहुँचे जहाँ महाराज खनित्र थे परन्तु उनकेपुण्यसमूहकेकारणउनकीएकनचली॥४६

कृत्याचतुष्टयंतेषुनिपपातदुरात्मसु। पुरोहितेषुभूपानांतथावैविश्ववेदिनि॥५०

फिर वे कृत्या चारों भाइयों के दुष्टात्मा पुरोहितोंऔरमन्त्रीविश्ववेदिपरगिरे॥५०॥

ततोनिहन्त्यानिर्दग्धाःकृत्ययातेपुरोहिताः।

विश्ववेदी तदा मन्त्री स शौरेर्दुष्टमन्त्रदः ॥ ५१

उन कृत्याचकेगिरनेसेवेपुरोहितऔरशौरिकादुष्टमन्त्री विश्ववेदिजलकरभरमहोगये॥५१॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंखनित्रचरित्र (१) नाम१९७०स०।