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जड़ उवाच

कृताहारं महात्मानमधिपं पवनाशिनाम् उपासाञ्चक्रिरे पुत्रौ भूपालतनयस्तथा

जड़ ( सुमति ) वोले- जब राजकुमार, नागराज और उनके दोनोंपुत्र भोजन कर चुके तो नागपुत्र और राजकुमार नागराज की सेवा करने लगे

कथाभिरनुरूपाभिः स महात्मा भुजङ्गमः नीतिं सज्जनयामास पुत्रसख्युरुवाच च

महात्मा नाग- राज ने राजकुमार के स्वरूप के अनुसार कथायेंकहकर प्रीति उत्पन्न की और अपने पुत्रों के मित्र राजकुमार से कहां

विभद्र सुखं ब्रूहि गेहमभ्यागतस्य यत् कर्त्तव्यमुत्सृजाशङ्कां पितरीव सुतो मयि

यह तुम्हारा घर है, तुम हमारे अतिथि हो जो तुम्हारा कल्याण हो,  कुछ तुम्हारी इच्छा हो निःशङ्क होकर कहो, मैं  श्रवश्य एक पुत्र के पिता की भांति करूँगा

जितं वा सुवर्ण वा वस्त्रं वाहनमासनम् द्वाभिमतमत्यर्थं दुर्लभं तट्टणुष्व माम्

चाँदी, सोना, वस्त्र, वाहन, शासन अथवा जो कोई दुर्लभ वस्तु तुम्हें इच्छित हो वह मुमंसे  माँगो

कुवलयाश्व उवाच

तव प्रसादाद्भगवन् सुवर्णादि गृहे मम पितुरस्ति ममाद्यापि न किंचित् कार्य्यमीदृशम् ||५||

कुचलयाश्व चोले- हे भगवन् ! आपकी कृपा से सोना इत्यादि मेरे घर पर भी मौजूद है मेरे पिता मौजूद है ।ऐसा कोई कार्य मुझे श्रापसे नहीं है

ताते वर्षसहस्राणि शासतीमां वसुन्धराम् थैव त्वयि पातालं न मे याचनोन्मुखं मनः ||

मेरे पिता एक हज़ार वर्ष से इस पृथ्वी का राज्य करते हैं और इसी प्रकार आप पाताल में इस कारण मेरे मन में कोई अभिलाषा नहीं है

स्वर्ग्याच सुपुण्याच येषां पितरि जीवति कोटिसमं वित्तं तारुण्याद्वित्तकोटिपु ।। ७।।

जिनके पिता जीवित हैं वे बड़े पुण्यवान हैं, करोड़ों तरह के धन युवावस्था रूपी धनके श्रागे तृणवत् हैं

मैत्राणि तुल्यशिष्टानि तद्देहमनामयम् अनिता धियते वित्तं यौवनं किन्नु नास्ति मे ८।।

मेरे मित्र भी शिष्ट हैं तथा मेरा देह भी आरोग्य है, क्या मैं अपनी युवावस्था के वल से धन प्राप्त नहीं कर सकता हूँ

श्रसत्यर्थे नृणां याचनाप्रवणं जायते मनः सत्यशेषे कथं पाचूणां मम जिहा करिष्यति ।।

धन के न होने पर भी लोग भिक्षा माँगने का मम नहीं रखते हैं फिर मैं शेष धन होने पर किस तरह याचना करूँ

'यैर्न चिन्त्यं धनं किञ्चिन्मम गेहेऽस्ति नास्ति वा पितृवाहुतरुच्छायां संश्रिताः सुखिनो हि ते १०

जो मनुष्य ये बात न विचार कर कि उनके घरमें धन है या नहीं अपने पिता की भुजा की छाया में रहते हैं वे ही सुखी हैं १०

ये तु वाल्यांत् प्रभृत्येव विना पित्रा कुटुम्बिनः

ते सुखास्वादविभ्रंसान्मन्ये धात्रैव वञ्चिताः ११॥

जो लोग वाल्यावस्था सेही पितृहीन हो जाते हैं उनको इस सुख का आ स्वादन नहीं होता है, और उनको मैं प्रभागा समझता हूँ ॥१६॥

तद्वयं त्वत्प्रसादेन धनरत्नादिसंचयान् पितृमुक्तान् प्रयच्छामः कामतो नित्यमर्थिनाम्।।१२।।

हम लोग आपकी कृपा से अपने पिता के सञ्चित धन, रत्न, मोती आदिकों में से नित्य ज़रूरतमन्द याचकों को देते हैं १२

तत् सर्व्वमिह सम्प्राप्तं यदवियुगलं तत्र मच्चूड़ामणिना स्पृष्ट ं यच्चाङ्गस्पर्शमाप्तवान् १३।।

मेरे मुकुट की मणि के श्रापके चरणों से लगने से तथा मेरे में आपकी चरणधूति के स्पर्श होने से मुझे सब कुछ प्राप्त होगा ||१३||

जड़ उवाच

इत्येवं प्रसृतं वाक्यमुक्तः पन्नगसत्तमः प्राह राजसुतं प्रीत्या पुत्रयोरुपकारिणम् ॥१४।।

जड़ ( सुमति ) वोले- यह मधुर वार्ता सुनकर नागराज अपने पुत्रोंके. उपकारी राजकुमारसे प्रेम पूर्वक बोले || १४ || नाग उवाच

यदि रत्नसुवर्णादि मतोऽवाप्तुं न ते मनः यदन्यन्मनसः प्रीत्यै तद्ब्रूहि त्वं ददाम्यहम् १५॥

नागराज बोले- अगर तुम्हारा मन मुझसे रत्न सुवर्ण यादि माँगने का नहीं है तो जो कुछ अन्य वस्तु की इच्छा हो वह मुझसे कहो मैं वही दूँगा १५ कुवलयाश्व उवाच

भगवंस्त्वत्प्रसादेन प्रार्थितस्य गृहे मम सर्व्वमस्ति विशेषेण सम्प्राप्तं तव दर्शनात् १६

कुवलयाश्व वोले- हे भगवन् ! श्रापकी कृपा से मेरे घर पर संव कुछ है तथा आपके दर्शन से और विशेष रूप से सब कुछ मिल गया १६

कृतकृत्योऽस्मि चैतेन सफलं जीवितञ्च मे यदङ्गसंश्लेषमितस्तव देवस्य मानुषः १७॥

मैं कृतकृत्य हूँ, और मेरा जीवन सफल है क्योंकि मैंने मनुष्य होकर श्राप जैसे देवता का संसर्ग प्राप्त किया १७

ममोत्तमाङ्ग स्वसादरजसा यदिहास्पदम् कृतं तेनैव न प्राप्तं किं मया पन्नगेश्वर || १८ ||

हे नागराज ! मेरे अङ्ग में जो आपके चरणों की धूलि लगी उससे मुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ || १८ ||

यदि त्ववश्यं दातव्या वरो मम यथेप्सितः तत्पुण्यकर्म्मसंस्कारो हृदयान्मा व्यपैतु मे १६।।

यदि आप मेरी इच्छा के अनुकूल वर देना ही चाहते हैं तो मेरे हृदय से पुण्य संस्कार कभी नष्ट न हो

सुवर्णमणिरत्नादि वाहनं गृहमासनम् स्त्रियोऽननं पुत्राश्च चारुमाल्यानुलेपनम् ||२०||

सुवर्ण, मणि, रत्न, वाहन, गृह, श्रासन, स्त्रियाँ, अन्न, पान, पुत्र तथा सुन्दर मालायें और चन्दन ॥ २०

एते च विविधाः कामा गीतवाद्यादिकंच यत् सर्व्वमेतन्मम मतं फलं पुण्यवनस्पतेः ॥२१॥

इन सबको तथा विविध प्रकार के गीत-वाद्यादि को मैं पुण्यरूपी वृक्ष के फल समझता हूँ २१

तस्मान्नरेण तन्मलसेके यत्नः कृतात्मना कर्त्तव्यः पुण्यसक्तानां न किंचिद्भुवि दुर्लभम्॥२२।।

इसलिये मनुष्य को चाहिये कि पुण्यरूपी वृक्ष को सावधानी से रक्खे पुण्यवानों के लिये संसार में कोई कार्य दुर्लभ नहीं हैं २२

अश्वतर उवाच

एवं भविष्यति प्राज्ञ तव धर्माश्रिता मतिः सत्यञ्चैतत् फलं सर्व्वधर्म्मस्येाक्तं यथा वया २३॥

नागराज अश्वतर बोले- हे प्राज्ञ ! यही होगा, तुम्हारी बुद्धि धर्म में श्राश्रित होगी यह भी सत्य है कि जो कुछ तुमने कहा है वह धर्म का फल है ||२३||

तथाप्यवश्यं मद्गेहसांगतेन त्वयाधुना ग्राह्यं यन्मानुषे लोके दुष्प्राप्तं भवतो मतम् ||२४||

फिर भी चूंकि तुम मेरे घर पर आये हो इसलिये जो कुछ तुम्हें मनुष्यलोक में दुष्प्राप्य हो वह मुझसे माँगो ||२४|| जड़ उवाच

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स तदा नृपनन्दनः चक्रे पन्नगेश्वरपुत्रयोः ||२५||

जड़ ( सुमति ) वोले- उसके इन वचनों को सुनकर वह राजकुमार नागपुत्रों के मुख की श्रोर देखने लगा २५

'ततस्तौ प्रणिपत्योभौ राजपुत्त्रस्य यन्मतम् तत् पितुः सकलं वीरौ कथयामासतुः स्फुटम् ||२६||

फिर उन दोनो नागपुत्रो ने प्रणाम करके जो कुछ राजकुमार के मन मे था वह सब स्पष्टतया पिता के सन्मुख निवेदन कर दिया।।

पुत्रावूचतुः

ततोऽस्य पत्नी दयिता श्रुत्वेमं विनिपातितम् श्रत्यजद्दयितान् प्राणान् विप्रलब्धा दुरात्मना ॥२७॥

नागपुत्र वोले- इसकी प्रिय पत्नी ने किसी दुष्टात्मा दानव के विश्वास दिलाने पर कि राजकुमार की मृत्यु हो गई है अपने प्रिय प्राणों को त्याग दिया २७

केनापि कृतवैरेण दानवेन कुबुद्धिना गन्धर्व्वराजस्य सुता नाम्ना ख्याता मदालसा २८||

किसी दुर्बुद्धि दानच ने जो वैर रखता था ऐसा किया, तथा इसकी पत्नी गन्धर्व कन्या मदालसा थी ॥२८॥

कृतज्ञोऽयं ततस्तात प्रतिज्ञां कृतवानिमाम् नान्या भार्य्या भवित्रीति वर्जयित्वा मदालसाम् २६"।।

मदालसा के प्रति कृतज्ञ होकर इस राजकुमार ने प्रतिज्ञाकी कि मदालसाको छोड़कर दूसरी स्त्री ग्रहण न करूँगा ||२६||

द्रष्टुं तां चारुसर्वाङ्गीमयं वीर ऋतध्वजः तात वाञ्छति यद्येतत् क्रियते तत् कृतं भवेत् ३०॥

हे तात यह वीर ॠतध्वज उस सुन्दरी को देखना चाहता है, अतः ऐसा उपाय कीजिये जिससे यह कार्य सिद्ध हो ३० अश्वतर उवाच

भूतैर्वियोगिनो योगस्तादृशैरेव तादृशः

कथमेतद्विना स्वयं मायां वा शम्बरोदिताम् ॥३१

अश्वतर नागराज बोले-- वैसे ही वियोगियों को मिला देना कठिन है । यह स्वप्न अथवा राक्षसी माया के बिना किस प्रकार सम्भव है ? ३१ जड़ उवाच

मणिपत्य भुजंगेशं पुत्रः शत्रुजितस्ततः प्रत्युवाच महात्मानं प्रेमलज्जासमन्वितः ॥३२॥

जड़ ( सुमति) वोले- शत्रुजित के पुत्र ऋतध्वज ने महात्मा नाग- राज को प्रणाम कर प्रेम और लज्जा से युक्त हो कहा ||३२||

: मायामयीमप्यधुना मम तात मदालसाम् यदि दर्शय ते मन्ये परं कृतमनुग्रहम् ॥३३॥

हे तात ! यदि आप मायामयी मदाल- सा का भी दर्शन करादें तो मेरे ऊपर श्रापका चड़ा बड़ा अनुग्रह होगा ३३ अश्वतर उवाच

तस्मात् पश्येह वत्स त्वं मायाञ्चेद्रद्रष्टुमिच्छसि अनुग्राह्यो भवान् गेहं बालोऽप्यभ्यागतो गुरुः॥ ३४

नागराज श्रश्वतर बोले- हे वत्स ! अगर तुम माया को ही देखना चाहते हो तो ऐसा ही करूंगा, क्योंकि अभ्यागत बालक को गुरु ही मानना चाहिये ३४ जड़ उवाच

श्रनयामास नागेन्द्रो गृहगुप्तां मदालसाम्  तेषां सम्मोहनार्थाय जजल्प च ततः स्फुटम् ||३५||

जड़ ( सुमति ) बोले- फिर नागराज घर में छिपी हुई मदालसा को लिये कह दिया कि यह मायामयी है ३५

दर्शयामास च तदा राजपुत्राय तां शुभाम् सेयं न वेति ते भार्य्या राजपुत्र मदालसा ||३६||

श्रर ले आये और राजकुमार को मोह में डालने के उस शुभे को राजपुत्र को दिखला दिया और पूछा कि हे राजकुमार ! यह तुम्हारी स्त्री मदालसा या नहीं ३६

श्रश्वतर उवाच

स दृष्ट्वा तां तदा तन्वीं तत्क्षणाद्विगतत्रपः प्रियेति तामभिमुखं ययौ वाचमुदीरयन्

निवारयामास च तं नागः सोऽश्वतरस्त्वरन् ||३७|||

उस सुन्दरी को देखते ही वह राजकुमार लज्जा छोड़कर "प्रिये, प्रिये” यह कहते हुए उसकी ओर चले। इसपर अश्वतर नागराज ने उनको शीघ्रता पूर्वक रोका ३७

मायेयं पुत्र मा स्माक्षीः प्रागेव कथितम् तव

अन्तर्द्धानमुपैत्याशु- माया संस्पर्शनादिभिः ||३८||

नागराज अश्वतर चोले- हे पुत्र ! मैंने पहले ही तुमसे कह दिया थाकि यह मायामयी है इसे न छुत्रो यह स्पर्श करते ही अन्तर्ध्यान हो जानेगी ३८

ततः पपात मेदिन्यां स तु मूर्च्छापरिप्लुतः हा प्रियेति वदन सोऽथ चिन्तयामास भाविनीम् ३६||

इसपर वह 'राजकुमार ' हा प्रिये' ऐसा कहकर छितदो पृथ्वीन पर गिर पड़ा और वह सुन्दरी भी सोचने लगी |

हो स्नेहोऽस्य नृपतेर्ममोपर्य्यचलं मनः येनायं पातनोऽरीणां विना शस्त्रेण पातितः ॥४०॥

श्रहा ! इन राजकुमार का स्नेह मेरे ऊपर चल है जिन्होंने अनेकों शत्रुओं को गिराया है वे श्राज विना शस्त्र के लगे ही गिर पड़े ||४०||

मायेति दर्शिता तेन मिथ्या मायेति यत् स्फुटम् वाय्वम्युतेजसां भूमेराकाशस्य च चेष्टया ४१॥

पृथ्वी, जल, तेज, बाद, आकाश से उत्पन्न हुई मुझको इन्होंने माया की मदालसा समझ लिया है ४९ जड़ उत्राच ततः कुवलयाश्वं तं समाश्वास्य भुजङ्गमः कथयामास तत् सर्व्वं मृतसञ्जीवनादिकम् ||४२ ||

जड़ ( सुमति) बोले- इसके अनन्तर नागराज ने कुत्रलयाभ्वको धैर्य देकर मदालसा के सञ्जीवनादि की पूरी कथा कह सुनाई || ४||

ततः प्रहृष्टः प्रतिलभ्य कान्तां प्रणम्य नागं निजगाम सोऽथ | सुशोभमानः स्वपुरं तमश्व- मारुह्य सञ्चिन्तितमभ्यपेतम् ४३ |

फिर राजकुमार अपनी स्त्री को प्राप्त कर बड़े प्रसन्न हुए | वे नागराज को प्रणाम कर अपने घोड़े पर चढ़कर मदालसा के साथ अपने शोभायमान नगर को चले ॥४३॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में मदालसा - प्राप्ति नाम चौबीसवां अध्याय समाप्त