16

पितोवाच कथितं मे त्वया वत्स संसारस्य व्यवस्थितम् स्वरूपमतिहेयस्य घटीयन्त्रवदव्ययम्

पिता बोले- हे वत्स ! तुमने मुझसे संसारकी व्यवस्थाकही तथा इसका प्रति घृणित घटीयन्त्र का सा खरूप भी बताया

तदेवमेतदखिलं मयावगतमीदृशम् किं मया वद कर्त्तव्यमेवमस्मिन् व्यवस्थिते || २

वह सब मैंने खूब समझ लिया है इस दशामें मुझे क्या कर्तव्य है सो कहो पुत्र उवाच यदि मद्वचनं तात श्रद्दधास्यविशङ्कितः तत् परित्यज्य गार्हस्थ्यं वानप्रस्थपरो भव || ३

पुत्रं वोला- हे तात! यदि आपको मेरे वचन में श्रद्धा है तो गृहस्थधर्म को छोड़कर वाणप्रस्थ में प्रवेश कीजिये तमनुष्ठाय विधिवद्भविहायामिपरिग्रहम्

आत्मन्यात्मानमाधाय निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः और उसका विधिवत् अनुष्ठान  कीजिये और अग्नि का संयम छोड़कर अपने में ही श्रात्मा का ध्यान कीजिये तथा निर्द्वन्द्व रहकर एकान्त वास कीजिये || ४ || कान्तराशी वश्यात्मा भव भिक्षुरतन्द्रितः योगपरो भूत्वा बाह्यस्पर्शविवर्जितः

एकान्त वास करते हुए अपनी आत्मा को वश में कीजिये और जितेन्द्रिय होकर भिक्षुक बनिये तथा बाह्य संसर्ग से अलग रहकर योगी हो जाइये तिः प्राप्स्यसि तं योगं दुःखसंयोगभेपजम् [क्तिहेतुमनौपम्यमनाख्येयमसङ्गिनम् त्संयोगान्न ते योगो भूयो भूतैर्भविष्यति

इसके बाद आपको आवागमन की औषधि स्वरूप योगकी प्राप्ति होगी वह योग मुक्ति का हेतु अनुपम, अवर्णनीय तथा असङ्ग है तथा जिसके प्रतापसे फिर संसार में आने का संयोग नहीं होता है पितोवाच वत्स योगं ममाचक्ष्व मुक्तिहेतुमतः परम् पेन भूतैः पुनर्भूतो नेदृग्दुःखमवाप्नुयाम्

पिता बोले-- हे वत्स ! मुक्ति के हेतु स्वरूप योग का मुझसे वर्णन कीजिये जिससे मुझे फिर इस दुःख का अनुभव न हो ||७|| पत्रासक्तिपरस्यात्मा मम संसारबन्धनैः नैति योगमयोगोऽपि तं योगमधुना वद

जिसकी शक्ति से मैं सांसारिक- वन्धनों में न फैल और मेरी श्रात्मा श्रासक्ति सें. परे हो जाय संसारादित्यतापात्ति-विप्लुष्यदेह मानसम् ब्रह्मज्ञानाम्युशीतेन सिंच मां वाक्यवारिणा

संसाररूपी सूर्य से मेरा मन और शरीर तप्त हो रहा है, ब्रह्मज्ञान शुक्त शीतल जल रूपी अपने वचनों से इसको शीतल करो अविद्याकृष्णसर्पेण दष्टं तद्विषपीडितम् स्ववाक्यामृतपानेन मां जीवय पुनर्मृतम् ॥१०॥

श्रविद्यारूपी काले सांप ने मुझे उसा है और उसके विप से मैं पीड़ित हूँ, मुझ मरे हुए को अपने वचनरूपी अमृत से पुनः जीवित करो १० पुत्र-दार-गृह-क्षेत्र - ममत्वनिगड़ार्दितम् मां मोचयेष्टसद्भाव - विज्ञानोद्घाटनैस्त्वरन् ११

पुत्र, स्त्री, घर, खेत की ममता रूपी जंजीरों में जकड़ा हुआ हूँ तुम सद्भावयुक्त विज्ञान उत्पन्न कर मुझको छुड़ायो ११ पुत्र उवाच शृणु तात यथा योगो दत्तात्रेयेण धीमता अलर्काय पुरा प्रोक्तः सम्यक् पृष्टेन विस्तरात् १२

पुत्र बोला--हे पिता ! जो लोग प्राचीन काल में अलर्क के पूछने पर बुद्धिशाली दत्तात्रेयजी ने सम्यक् प्रकार से विस्तार पूर्वक वर्णन किया है वह सुनिये ||१२|| पितोवाच दत्तात्रेयः सुतः कस्य कथं वा योगमुक्तवान् कञ्चालक महाभागो यो योगं परिपृष्टवान् ||१३||

पिता बोले- दत्तात्रेय किसके पुत्र थे, उन्होंने कौनसा योग वर्णन किया और महाभाग अलर्क जिन्होंने योग पूछा वे कौन थे ? १३ पुत्र उवाच कौशिको ब्राह्मणः कश्चित् प्रतिष्ठानेऽभवत् पुरे सोऽन्यजन्मकृतैः पापैः कुष्ठरोगातुरोऽभवत् १४॥

पुत्र बोला- प्राचीन काल में कोई कौशिक नाम ब्राह्मण था जो पूर्व जन्म में किये पापों के कारण कोढ़ी होगया ||१४|| तं तथा व्याधितं भार्य्या पतिं देवमिवार्च्चयत् पादाभ्यङ्गाङ्गसंवाह-स्नानाच्छादनभोजनैः १५॥

उसकी स्त्री उस रोगी पति को ही देवताके समान पूजती थी और उसके चरण धोकर स्नान कराती, वस्त्रपहिनाती और भोजन कराती थी || १५ || श्लेष्म मूत्र- पुरीषाटक - प्रवाहक्षालनेन च रहश्चैवोपचारेण प्रियसम्भाषणेन च १६

वह स्त्री अपने पति की खखार, मूत्र, विष्ठा और रुधिर धोकर साफ़ करती तथा उसका उपचार करती हुई मीठी वाणी से संभाषण करती थी॥१६॥ सतया पूज्यमानोऽपि सदातीव विनीतया [ अतीवतीको पत्वान्निभर्त्सयति निष्ठुरः वह निष्ठुर उस विनय-शीला से प्रति नम्रतापूर्वक पूजित होकर भी अत्यन्त क्रोध से उसको भला बुरा कहता रहता था १७

तथापि प्रणता भार्य्या तममन्यत दैवतम् तं तथाप्यतिवीभत्सं सर्व्वश्रेष्ठ ममन्यत १८

इसपर भी उसकी स्त्री उसको देवता के समान समझती और उस श्रति वीभत्स को ही सर्वश्रेष्ठ मानती ॥१८॥ अचंक्रमणशीलोऽपि स कदाचिदद्विजोत्तमः माह भाय्यी नयस्वेति त्वं मां तस्या निवेशनम् १६

मरण शील होने पर भी वह ब्राह्मण एक वार अपनी स्त्री से बोला कि मुझे उसके घर पहुंचादो ॥१६॥ या सा वेश्या मया दृष्ट्वा राजमार्गे गृहोपिता तां मां प्रापय धर्म्मज्ञे सैव मे हृदि वर्त्तते ||२०||

जिस वेश्या को श्राज मैंने राजा के दरवार में जाते हुए देखा है, हे धर्म को जानने वाली ! उस वेश्या के पास मुझे पहुँचा दे, वह मेरे हृदय में बस गई है | दृष्टा सूर्योदये वाला रात्रिश्चेयमुपागता दर्शनानन्तरं सा मे हृदयान्नापसर्पति २१

उस स्त्री को मैंने प्रातःकाल देखा था और श्रव रात्रि होगई है उसको देखे इतनी देर होने परभी वह मेरे हृदय से नहीं निकलती है ॥२१॥ यदि सा चारुसर्वाङ्गी पीनश्रोणिपयोधरा नोपग्रहति तन्वङ्गी तन्मां द्रक्ष्यसि वै मृतम् ||२२||

यदि वह सर्वाङ्ग सुन्दरी, जिसकी सुन्दर जाँघें तथा कड़े स्तन हैं, मुझे न मिलेगी तो मेरी मृत्यु हो जावेगी||२२|| वामः कामो मनुष्याणां बहुभिः प्रार्थ्यते च सा ममाशक्तिश्च गमने संकुलं प्रतिभाति मे || २३

कामदेव का मार्ग मनुष्योंके लिये बड़ा कठिन । उस मनुष्य ने स्त्री से बहुत प्रार्थना की और कहा कि मुझ में चलने की शक्ति नहीं है इससे मैं व्याकुल हूँ || २३ ||

तत् तदा वचनं श्रुत्वा तु : कामातुरस्य सा तत्पत्नी सत्कुलोत्पन्ना महाभागा पतिव्रता ||२४||

कामातुर अपने स्वामी के वचन सुनकर उस भाग्यवती, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न होने वाली, पतिव्रता स्त्री ने ||२४||

गाढं परिकरं बद्ध्वा शुल्कमादाय चाधिकम्  स्कन्धे भर्त्तारमादाय जगाम मृदुगामिनी ||२५||

अपनी कमर कसकर कन्धे पर कपड़ा रक्खा और उसपर अपने स्वामी  को बिठाकर वह धीरे-धीरे चलने लगी २५ निशि मेघास्तृते व्योम्नि चलद्विद्युत्मदर्शिते

राजमार्गे प्रियं भत्तु श्चिकीर्षन्ती द्विजाङ्गना ॥२६॥

अंधेरी रात्रि थी, श्राकाश में विजली चमक रही थी, और ब्राह्मणी राज्यमार्ग से अपने प्रिय खामी को लिये जारही थी ||२६||

पथि शूले तथा प्रोतमचौरं चौरशङ्कया माण्डव्यमतिदुःखार्त्तमन्धकारेऽथ स द्विजः ॥२७॥

रास्ते में एक शली थी जिसपर चोरी की आशङ्का में माण्डव्य मुनि को चढ़ा दिया गया था और जहाँ कि वे मुनि अपने दुःख से श्रार्त हो रहे थे वह ब्राह्मण २७ पत्नीस्कन्धे समारूढश्चालयामास कौशिकः पादावमर्पणात् क्रुद्धो माण्डव्यस्तमुवाच ह ||२८||

कौशिक अपनी स्त्री के कन्धे पर चढ़ा हुआ चला जाता था कि उसके पाँव लगने से माण्डव्य मुनि क्रोधित हो ये बोले २८ येनाहमेवमत्यर्थं दुःखितश्चालितः पदा

दशां कष्टामनुप्राप्तः स पापात्मा नराधमः ||२६||

जिसने अपने पाँव से इस शूली को हिला कर मुझे दुःखित कर इस दशा में पहुँचाया है वह पापी नराधम ||२६|| सूर्योदयेऽवशः प्राणैर्विमोक्ष्यति न संशयः भास्करालोकनादेव स विनाशमवाप्स्यति ||३०|||

सूर्यो-दय होने पर अवश्य प्राण त्यागेगा, इसमें संशय नहीं वह सूर्य को देखते ही नष्ट हो जायगा ॥३०॥ तस्य भार्य्या ततः श्रुत्वा तं शापमतिदारुणम्

मोवाच व्यथिता सूय्र्यो नैवोदयमुपैष्यति ३१

उसकी स्त्री ने उस अति कठिन शाप को सुनकर  दुःख से कहा कि सूर्य उदय को प्राप्त न हो ॥३१॥ ततः सूर्योदयाभावादभवत् सन्तता निशा बहून्यंहः प्रमाणानि ततो देवा भयं ययुः ||३२||

 इसके बाद सूर्य के न निकलनेके कारण चारों ओर बहुत दिन तक रात्रि ही रही इससे देवतागण भयभीत हुए ३२

निःस्वाध्यायवषट्कार-स्वधास्वाहाविवज्जितम्

कथं नु खल्विदं सर्व्वं न गच्छेत् संक्षयं जगत् ॥३३॥

स्वाध्याय, षट्कर्म, स्वधा, स्वाहा आदि सब छूट गये तथा यह सोचनेलगे कि ये जगत् इस तरह से कैसे चलेगा ||३३||

अहोरात्रव्यवस्थाया विना मासतु संक्षयः तत्संक्षयान त्वयने ज्ञायेते दक्षिणोत्तरे ||३४||

यदि दिन, रात्रि की व्यवस्था न रहेगी तो मास -ऋतु किस प्रकार होंगे और बिना इस के उत्तरायण और दक्षिणायण का ज्ञान किस प्रकार से होगा ? ||३४|| विना चायनविज्ञानात् कालः संवत्सरः कुतः संवत्सरं विना नान्यत् कालज्ञानं प्रवर्त्तते ३५||

अनके बिना जाने वर्ष और संवत्- `सर किस प्रकार मालूम होगा और सन्वत्सर के विना कालवान किस तरह प्रचलित होगा ३५ पतिव्रताया वचसा नोनच्छति दिवाकरः सूर्योदयं विना नैव स्नानदानादिकाः क्रियाः॥३६॥

यदि पतित्रता के वचन से सूर्य नहीं निकलेगा तो सर्वोच्य के बिना स्नान, दान यादिक क्रियायें किस. प्रकार होगी ॥३॥ नाविहरणञ्चैव त्वभावश्च लक्ष्यते नवाप्यायनमस्माकं विना होमेन जायते ||३७||

विना श्रन्नि के यश का प्रभाव दिखाई देता है तथा विना चंज्ञ, होमादि के हम लोगों की वृति किस प्रकार होगी ? ३७ वयमाप्यायिता मर्त्ययज्ञभागैर्यथोचितः दृष्टया ताननुगृह्णीमो मर्त्यान् शस्यादिसिद्धये ३८

हम लोग ययोचित यह भाग मनुष्यों से पाकर वृष्टि करते हैं जिससे कि मनुष्यों के लिये अनादि उत्पन्न होता है ३८ निष्पादितास्वोषधीषु मर्त्या यज्ञेर्यजन्ति नः तेषां वयं प्रयच्छामः कामान् यज्ञादिपूजिताः ||३६||

यह करने वाले मनुष्यों के लिये औषधियां उत्पन्न होती हैं हम भी यज्ञादि से पूजित होकर मनुष्योंकी मनोकामना पूर्ण करते हैं ||३|| यो हि वर्षा वयं मर्त्याचोद्ध मत्रर्षिणः तवर्षेण हि वयं हरिवर्षेण मानवाः ॥४०॥

हम नीचे की ओर बरसाते हैं और मनुष्य ऊपर की ओर। हम जल की वर्षा करते हैं और मनुष्य हविष्यान की   ये नास्माकं प्रयच्छन्ति नित्यनैमित्तिकीः क्रियाः क्रतुभागं दुरात्मानः स्वयञ्चाश्नन्ति लोलुपाः ४१॥

जो दुष्टात्मा नित्य- नैमित्तिक दिया करके हमको यज्ञभाग नहीं देते और वे लोभी स्वयं ही उसको खा लेते हैं, उन १९ विनाशाय वयं तेषां तोयसूर्याग्निमारुतान् क्षितिश्च सन्दूषयामः पापातामपकारिणाम् ||४२||

पापियों को हम संसार में सूर्य, अग्नि, वायु आदि के द्वारा नाश कर देते हैं ॥४॥ दुष्टतोयादिभोगेन तेषां दुष्कृतकर्मणाम् उपसर्गाः प्रवर्त्तन्ते मरणाय सुदारुणाः ॥४३॥

कुत्सित जल आदि के पीने से उन पापियों की दशा संसार जो लोग हमको प्रसन्न करके फिर शेष श्रम को में मृत्यु से भी अधिक वारस हो जाती है ४३ ये त्वस्मान् प्रीणयित्वा तु भुञ्जते शेषमात्मना तेषां पुण्यान् वयं लोकान् विदयाम महात्मनाम् ४४ ||

स्वयं खाते हैं उन महात्मा पुत्रवानों को हम उन कु लोक देते हैं ॥४४॥ तन्नास्ति सर्व्वमेवैतद्विषां व्युष्टिसंस्थितिम् कयं तु दिनसर्गः स्यादन्योऽन्यमवदन् सुराः ॥४५॥

यदि सूर्योदय न हुआ तो यह सब कुछ न होगा, स्वर्ग में स्थिति और दिन की सत्क्रियायें किस प्रकार होंगी। ये आपस में देवता लोग कह रहे थे ४५ तेषामेव नमेतानां यज्ञव्युच्छित्तिशङ्किनाम् देवानां वचनं श्रुत्वा प्राह देव प्रजापतिः ॥४६॥

यज्ञादि के विषय में शङ्कित उन देवताओं की बातें सुनकर प्रजापति ब्रह्माजी बोले

तेजः एवं तेजसैव तपसा च तपस्तया प्रशाम्यतेऽमरास्तस्माच्छृणुध्वं चचनं मम ||४७||

तेज से परे तेज है तथा तपस्या से परे तपस्या है इसलिये आप लोग धैर्य रखें और जो नै कहता हूँ वह सुनें ४७ पतिव्रताया माहाल्यानोइच्छति दिवाकर | तस्य चानुदयाद्धानिमर्त्यानां भवतां तथा ॥४८॥

पतिव्रताके तेजले सूर्योदय नहीं होता है और सूर्यके न निकलने से हमारी और मानकों की हानि हैं इसलिये - ऋत्रि मुनि की पतिव्रतात्री अनुसूया जो तपस्विनी करो और उनको प्रसन्न करो ४ तस्मात् पतिव्रतामत्रेरनुत्यां तपस्विनीम् प्रसादयत वै पत्नी भानोदयकाम्यया ॥४६॥

पुत्र ( सुमति ) ने कहा- तव देवताओं ने जाकर अनुसूया को प्रसन्न किया। अनुसूया ने कहा कि आपकी क्या इच्छा है सो कहिये। देवताओं ने याचना की कि पहिले की तरह दिन निकलना चाहिये ५० अनसूयोवाच

पतिव्रताया माहात्म्यं न हीयेत कथन्त्विति सम्मान्य तस्मात् तां साध्वीमहः स्रक्ष्याम्यहंसुराः ५१ यथा पुनरहोरात्र संस्थानमुपजायते यथा च तस्याः स्वपतिर्न साध्वया नाशमेष्यति ५२||

अनुसूया बोली - हे देवताओ! पतिव्रता का माहात्म्य किसी प्रकार मिथ्या नहीं हो सकता, इसलिये उस सती को सम्मानित करके उससे क्षमा-दान कराऊँ गी ॥ जिससे पुनः दिन और रात्रि पूर्ववत् हो और उस साध्वीका पति भी नाश को न प्राप्त हो ||२२|| पुत्र उवाच एवमुक्त्वा सुरांस्तस्या गत्वा सा मन्दिरं शुभा उवाच कुशलं पृष्टा धर्म्म भतुस्तथात्मनः सुमति बोला- उनके यह कहने पर देवता लोग अनुसूया को साथ लेकर उसके स्थान पर गये और उससे उस की तथा स्वामी की कुशल पूछी ५३ अनुसुयोवाच कच्चिन्नन्दसि कल्याणि स्वतु मुखदर्शनात्

कच्चिच्चाखिलदेवेभ्यो मन्यसेऽभ्यधिकं पतिम् ॥५४ ।।

अनुसूया वोली--

हे कल्याणी ! तुम अपने स्वामी के मुख का दर्शन करके आनन्द करती हो तथा अन्य सब देवताओं से पति को अधिक मानती हो ५४ भर्तृशुश्रूपणादेव मया प्राप्तं महत् फलम्

सर्व्वकामफलावाप्तया प्रत्यूहाः परिवर्त्तिताः मैने भी स्वामी की सेवा से महान सुख प्राप्त किया है. मेरी सव कामनायें सिद्ध हुई और कभी दुःख नहीं हुआ ५५

पञ्चर्णानि मनुष्येण साध्वि देयानि सर्व्वदा

तथात्मवधर्मेण कर्त्तव्यो धनसंचयः ५६ |

हे सती ! मनुष्यको सदैव पाँच ऋण देने के लिये तत्पर रहना चाहिये इसलिये  अपने वर्ण के अनुसार धर्म रूपी धन का सञ्चय करना चाहिये ५६ प्राप्तश्चार्थस्ततः पात्रे विनियोज्यो विधानतः

सत्यार्जव तपो दानैर्दयायुक्तो भवेत् सदा || ५७ || धन प्राप्त करके विधि विधान सहित सत्पात्र को दान करना चाहिये और सदैव सत्य, विनय, तप, दान और दया मुक्त रहनाचाहिये धन प्राप्त करके विधि विधान सहित सत्पात्र को दान करना चाहिये ५७

क्रियाथ शास्खनिर्दिष्टा रागद्वेपविवज्जिताः कर्त्तव्या अन्वहं श्रद्धा - पुरस्कारेण शक्तितः ५८ | |

 सब कियायें राग और द्वेष से रहित हो कर शास्त्र की विधि के अनुसार करनी चाहिये,

तथा श्रद्धा और पुरस्कार सहित शक्तिपूर्वक सर्व की सेवा करनी चाहिये ५८ स्वजातिविहितानेव लोकानाप्नोति मानवः फ्रेशेन महता साध्वि प्राजापत्यादिकान् क्रमात् ५६॥

हे साध्वी ! अत्यंत केश से लोग स्वजाति कर्म और प्राजापत्यादि व्रत करते हुए लोकों को प्राप्त करते हैं ५६ स्त्रियस्त्वेवं समस्तस्य नरैर्दु:खाज्जितस्य वै पुण्यस्यार्द्धापहारिण्यः पतिशुश्रूपयैव हि ६०॥

मनुष्यों  द्वारा बड़े दुःख से संचित किये हुए उस समस्त में स्त्रियां पति की सेवा करनेके कारण आधा घुराय भाग पाती हैं ६०॥ नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न श्राद्धं नाप्युपोषितम् भत्तृ शुश्रूपयैवैतान् लोकानिष्टान् ब्रजन्ति हि ६१

स्त्रियोंके लिये पृथक यश, ज्ञान श्राद्ध और उपवास कुछ भी नहीं है ! वे तो पति : सेवा करती हुई निष्ठ लोकों को जाती हैं ६१ तस्मात् साध्वि महाभागे पतिशुश्रूषणं प्रति त्वया मतिः सदा कार्य्या यतो भर्त्ता परा गतिः ६२॥|

इसलिये हे सौभाग्यवती साध्वी ! पति की सदा अपनी वृद्धि रक्खो, क्योंकि स्त्रीके लिये ही परम गति है ६२ यद्देवेभ्यो यच्च पित्रागतेभ्यः कुर्य्याद्धर्त्ताभ्यर्च्चनं सत्क्रियातः तस्याप्यद्ध केवलानन्यचित्ता नारी भुङ्क्ते भर्त्तृशुश्रूपयैव ॥६३॥

जो कुछ देवताओं और अतिथियों की सेवा करके पति पुण्य है उसका श्राधा स्त्री केवल पतिका अनन्य चेतना और सेवा करने से पाती है ॥६३॥ पुत्र उवाच तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा मतिपूज्य तथादरात् प्रत्युवाचात्रिपत्नीं तामनुसूयामिदं वचः ६४ पुरुष बोला- उसका यह वचन सुनकर और श्रादर सिपूजा करके वह पतिव्रता ब्राह्मणी अत्रि ऋषि की स्त्री अनुसुया के प्रति यह वचन बोली ६४ धन्यास्मच नुगृहीतास्मि देवैश्वाप्यवलोकिता यन्मे प्रकृतिकल्याणि श्रद्धां वद्ध यसे पुनः ॥६५

कल्याणि ! मैं धन्य हूँ जो आपसे अनुगृहीत की गई तथा मैंने देवताओं का दर्शन पाया इससे मेरी श्रद्धा में वृद्धि हुई है ॥६५॥| जानाम्येतन्न नारीणां काचित् पतिंसमा गतिः तत्प्रीतिश्चोपकाराय इह लोके परत्र च ६६

मैं जानती हूँ कि इस लोक और परलोक में स्त्रियों की गति पति में प्रेम और उसकी सेवा ही है ॥६६॥ पतिप्रसादादिह च प्रेत्य चैव यशस्विनि नारी सुखमवाप्नोति नार्य्या भर्त्ता हि देवता || ६७ ||

हे यशस्विनी ! पति की कृपा से ही और उसको देवता समझने से ही स्त्री इस लोक और परलोक में सुख पाती है, ६७ सा त्वं ब्रूहि महाभागे प्राप्ताया मम मन्दिरम् आर्य्याया यन्मया कार्य्यं तथाय्र्येणापि वा शुभे || ६८ | हे सौभाग्यवती ! जिस कारण तुम मेरेस्थान पर आई हो सो कहो हे श्रायें ! जो कुछ मुझे कर्तव्य है वह तुम मुझसे कहो ६८ अनुसूयोवाच एते देवाः सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिताः त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्म्म-दिननक्तं निरूपणा: ६६

इन्द्र के सहित ये देवतागण अति दुखित हो कर मेरे पास आये और कहने लगे कि तुम्हारे वचन के कारण ही सूर्योदय नहीं होता है कि जिससे आन्हिक सव कर्म नष्ट हो रहे हैं ६६ याचन्तेऽहनिशा संस्थां यथावदविखण्डिताम् अहं तदर्थमायाता शृणु चैतद्वचो मम ॥७०॥

ये देवता लोग इस बात की याचना करते हैं कि दिन और रात्रि क्रम पूर्वक होते रहें और मैं भी यही अभिलापा लेकर आई हूँ। मेरे इस वचन को सुनिये ॥७०॥ दिनाभावात् समस्तानामभावो यागकर्म्मणाम् तदभावात् सुराः पुष्टिं नापयान्ति तपस्विनि ७१

दिन न निकलने से समस्त यज्ञ कर्मों का प्रभाव हैं जिस अभाव के कारण कि देवताओं की पुष्टि नहीं होती है ॥७१॥ श्रचैव समुच्छेदादुच्छेदः सर्व्वकर्म्मणाम् तदुच्छेदादनादृष्ट्या जगदुच्छेद मेष्यति ७२

दिन के नाश होने से सव शुभ कर्मों का नाश होगया है शुभ कर्मों के नष्ट होने से अनावृष्टि होगई है जिससे कि संसार नाश की ओर उन्मुख है ७२ तत् त्वमिच्छसि चेदेतत् जगदुद्ध मापदः पसीद साध्वि लोकानां पूर्व्ववद्वर्त्ततां रविः ७३

हे साध्वी ! इस जगत् का श्रापत्ति से उद्धार कर इसकी रक्षा करो, आपके प्रसन्न होनेसे सूर्य पूर्ववत् उदय होंगे ||७३ || ब्राह्मणबुवाच माण्डव्येन महाभागे शप्तो भर्त्ता ममेश्वरः पूर्योदये विनाशं त्वं प्राप्स्यसीत्यतिमन्युना ||७४

ब्राह्मणी बोली-- हे सौभाग्यवती ! माण्डव्य ऋषि ने मेरे पति- देव को शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तू नाश को प्राप्त होगा ||७४ || अनुसूयोवाच अनुसूया बोली-- यदि वा रोचते भद्रे ततस्त्वद्वचनादहम् करोमि पूर्व्ववदेहं भर्त्तारच नवं तव ७५॥

हे भद्रे ! यदि तुम्हारी ऐसी ही अभिलाषा है तो तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारे स्वामी की पूर्ववत देह कर दूँगी ॥७५॥ या हि सर्व्वथा स्त्रीणां माहात्म्यं वरवर्णिनि पतिव्रतानामाराध्यमिति सम्मानयामि ते ७६

हे सुन्दर वर्णवाली ! मैं सर्वथातो तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हारे स्वामी की पूर्ववत् स्त्रियों के माहात्म्य को जानती हूँ। मैं तुमको पति- बताओं द्वारा आराधित होने योग्य मानती हूँ || ७६ पुत्र उवाच थेत्युक्ते तया. सूर्य्यमाजुहाव तपस्विनी प्रनुसूयार्घ्यमुद्यम्य दशरात्रे तदा निशि ||७७ सुमति बोला-- अनुसूयाके इस प्रकार कहनेपर उस तपस्विनी ने हवन करके अर्घ्य देकर सूर्य को प्रणाम किया  जब तक दस रात्रि के बराबर समय व्यतीत हो चुका था ७७

विवस्वान भगवान् फुलपद्मारुणाकृतिः ।।

इसके अनन्तर लाल कमल केसमान कान्ति वाले सूर्य भगवान् शैलराज उदया- चल पर रविमण्डल से प्रगट हुए ७८ भार्कण्डेयपुराण समनन्तरमेवास्या भर्त्ता प्राणैर्व्ययुज्यत पपात च महीपृष्ठे पतन्तं जगृहे च सा ॥७६॥

सूर्य के प्रगट होते ही उस ब्राह्मण का पति प्राण- रहित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और उस गिरते हुए को स्त्री ने गोदमें उठा लिया ७६ अनुसूयोवाच न विषादस्त्वया भद्रे कर्त्तव्यः पश्य मे बलम् पतिशुश्रूषयावाप्तं तपसः किं चिरेण ते ॥८०॥

अनसूया चोली- हे भद्रे ! तुमशोक न करो और मेरे उस बलको देखो जो मैंने चिरकाल तक पति की सेवा और तपस्या करके प्राप्त किया है ८० यथा भर्त्तृ' समं नान्यमपश्यं पुरुषं कचित् रूपतः शीलतो बुद्ध्या वाङ्माधुर्य्यादिभूपणैः॥ ८१

जो मैंने रूप, शील, वुद्धि अथवा श्रङ्ग माधुर्य श्रादि भूषणों से कभी किसी दूसरे पुरुष को पति रूप से न देखा हो तो ८१ तेन सत्येन विमोऽयं व्याधिमुक्तः पुनर्युवा प्रामोतु जीवितं भार्थ्यासहाय: शरदां शतम् ॥८२॥

उस सत्य से यह विप्र व्याधि-रहित होकर जीवित होजावे और युवा होकर सैकड़ों वर्ष तक अपनी स्त्री की सहायता करें ८२ यथा भर्तृ समं नान्यमहं पश्यामि दैवतम् तेन सत्येन विप्रोऽयं पुनर्जीवत्वनामयः ॥८३॥

यदि मैं अपने पति के समान किसी अन्य देवता को न मानती होॐ तो उस सत्य से यह ब्राह्मण पुनर्जी- वित होकर आरोग्यता को प्राप्त हो ८३ कर्म्मणा मनसा वाचा भर्त्तुराराधनं प्रति यथा ममोद्यमो नित्यं तथायं जीवतां द्विजः ८४

यदि मेरा उद्यम नित्य मनसा, वाचा, कर्मणा पति के श्राराधनके निमित्त है तो यह ब्राह्मण जीवित होजाय पुत्र उवाच ततो विमः समुत्तस्थौ व्याधिमुक्तः पुनर्युवा स्वभाभिर्भासयन् वेश्म वृन्दारक इवांजरः ८५॥

सुमति बोला- अनुसूया के इस प्रकार कहने पर वह ब्राह्मणव्याधिमुक्त होकर जीवित होगया और युवा होकर अपनी आभा से घर को प्रकाशित करने लगा तथा देवता की भांति अजर होगया ८५ ' ततोऽपतत् पुष्पवृष्टिदैववाद्यादिनिस्वनः लेभिरे च मुदं देवा अनुसूयामथाब्रुवन् ||८६||

इसके बाद देवता लोग पुष्पवृष्टि करके वाद्य आदि का शब्द करने लगे और प्रसन्न हो अनुसूयासे कहने लगे देवा ऊचुः वरं वृणीष्व कल्याणि देवकार्यं महत् कृतम् त्वया यस्मात् ततो देवा वरदास्ते तपस्विनि ॥८७॥

देवता वोले- हे कल्याणि ! चूँकि तुमने देवताओं का महान् कार्य किया है इसलिये देवता तुम्हें वर देना चाहते हैं हे तपस्विनि ! अपनी इच्छानुसार वर माँगो अनुसूयोवाच यदि देवाः प्रसन्ना मे पितामहपुरोगमाः वरदा वरयोग्या च यद्यहं भवतां मता ॥८८॥

अनुसूया बोली- यदि पितामह और देवता लोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं अथवा मुझे वर के योग्य समझते हैं तो ८८ तद्यान्तु मम पुत्रत्वं ब्रह्म-विष्णु-महेश्वराः योगञ्च प्राप्नुयां भर्त्तु सहिता केशमुक्तये ||८||

ब्रह्मा, विष्णु और शिव मेरे पुत्र कहलायें और मैं अपने पति के सहित योग को प्राप्त हो क्लेश से मुक्त हो जाऊँ ८६ एवमस्त्विति तां देवा ब्रह्म - विष्णु - शिवादयः मोक्त्वा जग्मुर्यथान्यायमनुमान्य तपस्विनीम्॥ ६०॥ अनुसूया के यह वचन सुनकर ब्रह्मा, विष्णु औरशिव आदिक देवता लोग "एवमस्तु" कहकर और न्याय पूर्वक उस तपस्विनी का सन्मान कर के अपने-अपने स्थानों को चले ॥६०॥

इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में पिता-पुत्र संवादके अंतर पतिव्रता वर प्राप्ति नाम सोलहवाँ अध्याय समाप्त।