मार्कण्डेय महा पुराण
131
मार्कण्डेयउवाच
सतुतस्याःसुतंदृष्ट्वागृहीतवरकार्मुकम्। धनुःशस्त्रञ्चतस्योत्रंज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥१
मार्कण्डेयजी वोले-
अवीक्षित ने अपने पुत्र महाराज मरुत्त क धनुष हाथ में लिये हुए तथा उग्र ज्वालासे समस्त दिशाओं को व्याप्त होते हुए देखा ॥ १ ॥
उद्भिरन्तंमहावहिंदीपिताखिलभूतलम्। पातालान्तर्गतंप्राप्तमसांघोरभीपणम्॥२
महाराजमरुत्त के अस्त्र से निकली हुई अग्नि से समस्त पृथ्वीतल दीप्त होगया, वह अग्नि पाताल के भीतर तक फैल गई तथा वह असह्य, घोर और भीषणथी ॥ २ ॥
तंदृष्ट्वामहीपालंभृकुटीकुटिलाननम्। माक्रुधस्त्वंमरुत्तास्त्रमुपसंहियतामिति॥३
उन्होंने राजा को क्रोध से टेढ़ी भ्रकुटी' किये देखा । फिर वीक्षितजी ने राजा से कहा, मरुन्त ! क्रोध न करो, अपना अस्त्र खींचलो ॥३
माहासंकृत्त्वरालुप्त-वर्णक्रममुदारधीः। सनिशम्यगुरोर्वाक्यंदृष्ट्वातश्चपुनःपुनः॥४
पिता के वचन सुनकर तथा उनको देखकर जल्दी से मरुन्त ने अवीक्षित से कुछ कहा परन्तु वहउनकी समझ में न आया || ४ ||
गृहीतकार्मुकःपित्रोःप्रणिपत्यसगौरवम्। प्रत्युवाचापरार्द्धामेसुभृशंपन्नगाःपितः॥५
हाथ में धनुष लिये । हुए ही उन्होंने गौरव सहित पिताको प्रणाम किया। और उत्तर दिया कि हे पिता ! इन नागों ने मेराबड़ा अपराध किया है ||५||
शासतीमांमयिमहींपरिभूयबलंमम। संप्ताश्रममुपागम्यदष्टामुनिकुमारकाः॥६
पृथ्वी पर मेरे शासन में, मेरे बल की उपेक्षा करके इन्होंने यहाँ आकरसातं मुनिकुमारों को काट खाया है ॥६
ऋषीणामाश्रमस्थानाममीषामवनीपते मयिशासतिदुष्टंचदूषितानिहवींषिच॥७॥
मेरेशासनकरतेहुएइनदुष्टोंने ऋषियोंकेहविष्योंकोदूषितकियाहै॥७॥
जलाशयास्तथाप्येतैःसर्व्वएवहिदूषिताः। तदेतत्कारणंकिञ्चिन्नवक्तव्यंत्वयापितः। ननिवारयितव्योऽहंब्रह्मन्नान्प्रतिपन्नगान्॥८
सव जलाशयों को भी दूषित करदिया है । हे पिता ! इस कारण आपको कुछ न कहना चाहिये । इंन ब्रह्मघाती नागों के वध करने से आप मुझकोन रोकिये ॥ ८॥ त्रवीचिदुवाच
यद्यभिर्निहताविमायास्यन्तिनरकंमृताः। सतत् क्रियतां वाक्यं विरमात्रप्रयोगतः ॥ ६ ॥
त्रवीक्षितबोले- इनकावधकरनेलेतोमरेहुएमुनिकुमार नरककोजायगेइसलियेमेराकहनामानकरअपने त्रकोशान्तकरो॥६॥ भरतउनाव
श्रहमेवगमिष्यामिनरकंयदिपापिनाम्। ननिग्रहेयताम्येषांमांनिवारयमापितः॥१०॥
मत्त बोले-
इन पापियों का वध करने से अगर मुझे भी नरक में जाना पड़े तो मैं जाऊँगा, मैं इनके पकड़ने
का यत्न न करूँगा. हे पिता ! आपसुके न रोकियो।१०॥ त्रवीदिदुवाच
मामेवेशरणंप्राप्ताःपन्नगाममगौरवात्। उपसंहियतामखमलंकोपेनतेनृप॥११॥
श्रीक्षित वोले-
ये नाग मेरी शरण में त्राकर प्राप्त हुए हैं । हे राजन् ! मेरे सन्मानार्थ ही तुम श्रत्र को शान्तकरो और क्रोध न करो ॥११॥ मत्तउवाच
नाहमेषांक्षमिष्यामिदुष्टानामपराधिनाम्। स्वधर्म्ममुल्लङ्घ्यकथंकरिष्यामिवचस्तव॥१२॥
मस्त बोले-
मैं इन दुष्ट अपराधियों को क्षमा न करूँगा, पने धर्म का उल्लंघन कर मैं आपके वचनों कापालन किस तरह करूँ ? ॥१२॥
दण्ड्येनिपातयन्दण्डंभूपःशिष्टांथपालयन्। पुण्यलोकानवाप्नोतिनरकांचाप्युपेक्षकः ||१३||
जो राजा दंडनीयों को दण्ड देता और सज्जनों का पालन करता वह पुण्य लोकों को पाता है तथा इसके विपरीत जो इन सिद्धान्तों की उपेक्षा करता है वह नरक को जाता है ॥ १३ ॥ मार्कण्डेयउवाच
एवंसबहुशःपित्रावार्य्यमाणोयदातुतः। नोपसंहरतेसोऽवंततोऽसौपुनरब्रवीत् ||१४||
मार्कण्डेयजी बोले-
इस प्रकार पिता के बहुत कुछ समझाने पर भी जब पुत्र ने अस्त्र को वापिस न लिया तब
अवीक्षित ने मस्त से कहा ||१४|| अवीचिदुवाच
हिंससेपन्नगान्भीतान्ममैतान्शरणंगतान्। 'वार्य्यमाणोऽपितस्मात्तेकरिष्यामिप्रतिक्रियाम्१५॥
त्रवीक्षित वोले--
जो तुम मेरे मना करने पर भी भयभीत हुए रहे हो इसलिये मैं इसका प्रतिकार करूँगा- ॥१५॥
मयाप्यत्राण्यवाप्तानिनत्वमेकोविद्भुवि। ममाग्रतःसुदुर्वृत्तपौरुषञ्चकियत्तव॥१६॥
और मेरी शरण में त्राये हुए इन नांगों का बंध करें मैंने अस्त्र-विद्या पढ़ी हैं, तुही अकेला पृथ्वी पर अस्त्रों का जानने वाला नहीं है । हे दुष्ट ! मेरे श्राने तेरा पौरुप क्या है ?॥१६॥
मार्कण्डेय उवाच
प्रतः कार्मुकमारोप्य कोपताम्रविलोचनः ।
प्रिवीदिस्त्रं जग्राह कालस्य मुनिपुङ्गव ॥१७॥
मार्कण्डेयजीबोले:- हेसुनिश्रेष्ठकौटुकिजी ! फिरक्रोधसेताम्रवर्ण नेत्रहोरहेहैंजिनके, ऐसेवीक्षितनेधनुषको संधानकरकालास्त्रकोउठाया॥१७॥
तो ज्वालापरीवारमरिसङ्घन्नमुत्तमम् ।
कालानन्तु महावीर्य्यं योजयामास कार्मुकं ||१८||
महाज्वालासंयुक्तउससम्वर्तअस्त्रकासंहारकरने केहेतुउन्होंनेउत्तमऔरसुदृढ़कालास्त्रको धनुषपरचढ़ाया॥१८॥
नमसोम जगती संवर्त्तास्त्रमतापिता । सान्धिशैलाऽखिलाविमकालस्यास्त्रेसमुद्यते॥१६॥
हे विप्र ! समुद्र और संवत्रमतापिता । पर्वतों सहित वह पृथ्वी जो कि सम्म अस्त्र सेतप्त हो रही थी कालास्त्र के उपस्थित होते हीकम्पायमान होगई ॥ १६ ॥
कालास्त्रमुद्यतंपित्रामरुत्तःसोऽपिवीक्ष्यतत्। प्राहोच्चैरस्त्रमेतन्मेदुष्टशास्तिसमुद्यतम्॥२०॥
अपने पितांको कालास्त्र लिये हुए देखकर मरुत्त ने उच्च स्वर से कहा, 'यह अस्त्र मैंने दुष्टों के शासन के लिये चलाया है'॥ २० ॥
नत्वद्वधायकालास्त्रंमयिमुञ्चतिकिंभवान्। सद्धर्मचारिणिसुतेसदैवाज्ञाकरेतव॥२१॥ |
यह श्रापके वध के लिये नहीं चलाया है, फिर थाप धर्म में प्रवृत्त और आज्ञाकारी अपने
पुत्र पर कालान क्यों चलाते हैं । ॥ २१ ॥
मयाकार्य्यंमहाभागप्रजानांपरिपालनम्। त्वयैवंक्रियतेकस्मान्मद्वधायास्त्रमुद्यतम् ||२२
हे महा- भाग ! मुझको तो प्रजाओं का पालन करना है । श्राप इस प्रकार मेरा वध करने के लिये श्रस्त्र किस लिये उठाते हैं ? ||२२|| श्रवीक्षितउवाच
शरणागतसन्त्राणंकर्त्तुंव्यवसितावयम्। तस्यव्याघातकर्त्तात्वंनसेजीवनविमोक्ष्यसे॥२३
श्रवीक्षित वोले-
हम शरण में श्राये हुओंकी रक्षा करना चाहते' इसलिये हम तुमको भी जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥२३॥
मांवात्वाखवीर्येणजहिदुष्टानिहोरगान्। त्वांवाहत्वाऽहमस्त्रेणरक्षिष्यामिमहोरगान्॥२४
हैं और चूंकि तुम उन्हीं का वध करना चाहते हो या तो तुम अपने अस्त्र बल से मुझे मार कर इन दुष्ट नागों को मारो अथवा मैं तुमको मार कर इन नागों की रक्षा करूँ ॥२४॥
धिक्तस्यजीवितंपुंसःशरणार्थिनमागतम्। योनार्त्तमनुगृह्णातिवैरिपक्षमपिध्रुवम् ||२५||
उस मनुष्य का जीवन धिक्कार है जो शरण में आये हुए पर दया न करें, फिर चाहे वह शरणार्थी वैरी ही क्यों न हो ||२५||
क्षत्रियोऽहमिमेभीताःशरणंमामुपागताः। अपकर्त्तात्वमेवैषांकथंबध्योनमेभवान् ||२६||
मैं क्षत्रिय हूँ, ये भयभीत हुए नाग मेरी शरण में श्राये हैं, तुम इनके विरोधीहो, अब बताओ तुम्हारा वध क्यों न किया जाय ? ॥ २६ ॥ मरुत्त उवाच
मित्रंवावान्धवोवापिपितावायदिवागुरुः।
प्रजापालनविघ्नाययोहन्तव्यःसभूभृता ||२७|||
मरुत्त बोले-
प्रजा - पालन में विघ्नकारी यदि मित्र, चान्धव,पिता या गुरु भी हो तो वह राजा द्वारा वध किये
जाने योग्य है ॥२७॥
सोऽहंतेमहरिष्यामिनक्रोद्धव्यंत्वयापितः। स्वधर्मःपरिपाल्योमेनमेक्रोधस्तवोपरि॥२८॥
अतः मैं आपके ऊपर प्रहार करूंगा । हे पिता ! आप फिर क्रोध न करें, मैं तो अपने धर्म का पालन करता हूँ, आपके ऊपर. मेरा क्रोध नहीं है ॥ २८ ॥ मार्कण्डेयउवाच
ततस्तौनिश्चितौदृष्ट्वापरस्परवधंप्रति।
समुत्पत्यान्तरे तस्थुर्मुनयो भार्गवादयः ॥२६
फिरउनदोनोंकोएकदूसरेकेबधकरनेपर उतारूदेखकरभार्गवश्रादिमुनिवहाँआकर उपस्थितदुप॥२६॥
ऊचुचैनं न मोक्तव्यं त्वयास्त्रं पितरं प्रति ।
त्वया च नायं हन्तव्यः पुत्रः प्रख्यातचेष्टितः ॥ ३०
उन्होंनेपुत्रसेकहाकिउस कापितापरअस्त्रचलानाउचितनहींतथाइसी प्रकारपितासेभी अपनेधर्मात्मापुत्र कोचकरने कानिषेधकिया ||३०|| मरुत्तउवाच
मयादुष्टानिहन्तव्याःसन्तोरक्ष्यामहीक्षिता। इमेचदुष्टाभुजगाःकोऽपराधोऽत्रमेद्विजाः॥३१
मरुत्त चोले
हे ब्राह्मणो ! राजा होने के कारण मेरा कर्तव्य:है कि मैं दुष्टोंको मारूँ और सज्जनों की रक्षा करू
ये नाग लोग दुष्ट हैं, मेरा इसमें क्या अपराध है॥३१॥ श्रवीतिदुवाच
शरणागतसन्त्राणंमयाकार्य्यमयञ्चमे। अपराध्यः सुतो विप्रा यो हन्ति शरणागतान् ||३२||
अवीक्षितबोले- हेब्राह्मणो ! मुझेशरणमेंआयेहुएकीरक्षा करनाचाहिये।येमेरा.. पुत्रमेरेशरणागतों वधकरताहै, इसलियेयेमेराअपराधीहै॥३२॥
ऋषयऊचुः
इमेवदन्तिभुजगास्त्रासलोलविलोचनाः। सञ्जीवयामस्तान्विप्रान्येदष्टादुष्टपन्नगैः॥३३॥
ऋषिगण वोले-
भय से चंचल होरहे हैं नेत्र जिनके, ऐसे ये नाग लोग कहते हैं कि दुष्ट सर्पों द्वारा काटे हुए
मुनिकुमारों को ये जीवित करदेंगे ॥३३॥
तदलंविग्रहेणोभौराजवय्यैौप्रसीदताम्। उभावपिविनिर्मूढ़प्रतिज्ञौधर्म्मकोविदौ ||३४||
इसलिये आप दोनों राजवर्य प्रसन्न हों और युद्ध को चन्द करें । यद्यपि आप दोनों धर्म ज्ञाता हैं परन्तु व्यर्थबातों की प्रतिज्ञा पर श्रारूढ़ हैं ॥ ३४ ॥ मार्कण्डेयउवाच
सातुवीरासमभ्येत्यपुत्रमेतदभाषत। मद्वाक्यादेषतेपुत्रोहन्तुंनागान्कृतोद्यमः ||३५||
मार्कण्डेयजी बोले-
महारानी वीरा भी अपने पुत्र अवीक्षित के पास आकर बोली, "मेरी श्राज्ञा से ही तुम्हारे पुत्र
ने सर्पों को मारने का उद्यम किया है” ॥ ३५ ॥
निष्पन्नंयदाविप्रास्तेजीवन्तितथामृताः। संजीवन्तश्चमुच्यन्तेयद्युष्मच्छरणंगताः ||३६||
इसलिये ऐसा उपाय करो जिससे ये मृत तपस्वी जीवित होजाँय । उनके जीवित होनेपर ही तुम्हारे शरणार्थी छूटेंगे ||३६|| भामिन्युवाच
इश्रहमभ्यर्थितापू र्व्वमेभिःपातालसंश्रयैः। तन्निमित्तमयंभर्त्तामयात्रविनियोजितः ||३७||
भामिनी बोली :-
एक बार पहिले इन पातालवासी नागों ने मेरी. पूजा की थी, उसी विचार से अपनी प्रतिज्ञानुसार
इनकी रक्षा करने को मैंने अपने स्वामी को प्रेरित किया है ॥ ३७ ॥
तदेतदार्य्यनितमुभयोरपिशोभनम्। हममभर्त्तुश्चपुत्रस्यत्वत्पौत्रास्यात्मजस्यच ||३८||
इसलिये इन दोनों के जो कि मेरे स्वामी और पुत्र हैं और आपके पुत्र तथा नाती हैं
युद्ध का वन्द होजाना ही अच्छा है ||३८|| मार्कण्डेयउवाच
ततःसञ्जीवयामासुस्तान्विप्रांस्तेभुजङ्गमाः। ईदिव्यैरोषधिजातैश्चविषसंहरणेनच॥३६॥
मार्कण्डेयजी बोले-
फिर उन सर्पों ने मरे हुए मुनिकुमारों को विष के शमन करने से व दिव्य औषधियों से पुनर्जीवित कर दिया || ३ ६||
पित्रोर्ननामचरणौसततोजगतीपतिः। मरुत्तञ्चसतंप्रीत्यापरिष्वज्येदमब्रवीत्॥४०॥
तब महाराज मरुत्त ने पिता के चरणों में शिर नवाया और श्रवीक्षितजी उनको छाती से लगाकर यह बोले ||४०||
मानहाभवशत्रूणांचिरंपालयमेदिनीम्। पुत्र-पौत्रैश्चमोदस्वमाचतेसन्तुविद्विषः ||४१
तुम शत्रुओं कासान खण्डन करने वाले होओ, पृथ्वी का पालन करो तथा बहुत से पुत्र, पौत्रों के साथ श्रानन्द मनाश्रो और तुम्हारे कोई शत्रु न हों ॥ ४१ ॥
ततोद्विजैरनुज्ञातोवीरयाचनरेश्वरौ। ज्ञसमारूढ़ौरथंसाचभामिनीस्वपुरंगता ||४२||
फिर ब्राह्मणों और वीरासे आज्ञा लेकर श्रवीक्षित, मरुत्त और भामिनी रथ पर बैठकर अपने नगर को गये ||४२||
मात्रीराऽपि कृत्वा सुमहत् तपो धर्मभृतां वरा ।
भर्त्तःसलोकतांप्राप्तामहाभागापतिव्रता ||४३||
इसके बाद महाभागा, पतिव्रता वीरा कठिन तप करके अपने स्वामी के लोक को गई ॥ ४३ ॥
मरुत्तोऽपिचकारोर्व्याधर्म्मतःपरिपालनम्। विनिज्जितारिषड्वर्गोभोगांवबुभुजेनृपः || ४४ ||
महाराज मरुत ने भी छहों प्रकार के शत्रुओं को जीतकर पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया औरअनेक भोगों को भोगा ॥ ४४ ॥
तस्यपत्नीमहाभागाविदर्भतनयातथा। प्रभावतीसुवीरस्यसौवीरीचाभवत्सुता ||४५||
विदर्भ की कन्या सौभाग्यवती प्रभावती तथा सुवीर की कन्या सौवीरी ये दोनों उनकी रानियाँ हुईं ॥ ४५॥
केतुवीर्य्यस्यमागधस्यात्मजाऽभवत्।
च सिन्धुवीर्य्यस्य मद्रराजस्य केकयी ||४६ ||
मगधदेशकेराजाकेतुवीर्यकीकन्यासुकेशी, मद्रदेश केराजासिन्धुवीर्यकीकन्याकेकयी॥४६॥ केकयस्यचसौरिन्ध्रीसिन्धुभन्तुर्वेपुप्पाती। चेदिराजसुताचाभूद्भार्य्यातस्यसुशोभना ||१७||
तथा राजा केकय की पुत्री सैरिन्ध्री और सिन्धुपति कन्या वपुष्मती तथा चेदिराजकी कन्याये सब भी उनकी भार्या हुई ||४७||
तासांपुत्रास्तस्यचासनभूभृतोऽष्टादशद्विज। तेषांप्रधानोज्येष्ठश्वनरिष्यन्तःसुतोऽभवत्॥४८॥
उसके उन स्त्रियों से अठारह पुत्र हुए, उनमें से प्रधान और बड़े नरिष्यन्त हुए || ४८ ||
एवंवीय्योंमरुत्तोऽभून्महाराजोमहाबलः। तस्यामतिहतंचक्रमासीदद्वीपेषुसप्तसु ||४६॥
हे महावली महाराज मरुत्त का पराक्रम इस प्रकार का हुन कि सातों द्वीपों में उनका अखण्ड राज्य था |॥४६॥
यस्यतुल्योऽपरोराजानभूतोनभविष्यति। सत्त्वविक्रमयुक्तस्यराजपैरमितौजसः॥५०॥
उनके समान कोई दूसरा राजा न हुआ और न ऋषि और बड़े तेजस्वी थे ॥ ५० ॥
तस्यैतचरितंश्रुत्वामरुत्तस्यमहात्मनः। जन्मचाग्यंद्विजश्रेष्ठमुच्यतेसर्व्वकिल्वियैः॥५१॥
हे द्विज श्रेष्ठ होगा । वे पराक्रम और सत्व से युक्त, राजानों में कौटुकिजी ! महात्मा मरुत्त का यह चरित्र और जन्म कथा सुनने से सब पाप नष्ट होजाते हैं ॥५१॥
इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणमेंमरुत्तचरित्र (३) नाम१३१वाँग्र०स०।
Summary of chapter 131 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
Having accomplished peerless sacrifices and established universal peace, King Marutta divides his vast wealth among the Brāhmaṇas and bestows the kingdom upon his son Narishyanta before retiring into the forest for meditation.