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मार्कण्डेयउवाच

ततःपरन्तुभौत्यस्यसमुत्पत्तिनिशामय। देवानृषींस्तथापुत्रांस्तथैववसुधाधिपान्॥१

मार्कण्डेयजी बोले ---

इसके बाद भौत्य मनु की उत्पत्ति तथा उनके मन्वंतर में जो देवता, ऋषि और उनकेपुत्र राजा लोग हुए उनको सुनो ॥ १ ॥

बभूवाङ्गिरसःशिष्योभूतिर्नाम्नातिकोपनः। चण्डशापप्रदोऽल्पेऽर्थेमुनिरागस्यसौम्यवाक्॥२

श्रङ्गिरा मुनिके शिष्य भूति बड़े क्रोधी थे । वे तनिक बात पर शाप देनेलिये उद्यत होजाते तथा बड़े कटुवादी थे ॥ २ ॥

तस्याश्रमेमातरिश्वानचवात्रतिनिष्ठुरम्। नातितापंरविचक्रेपर्जन्योनातिकर्द्दमम् || ३

उनके भय से उनके आश्रम पर पवन कोई उत्पात नहीं करता था, सूर्य अधिक ताप नहीं करते तथा मेघ इतना जल न बरसाते जिससे कीचड़ हों ॥३

नातिशीतंचशीतांशुःपरिपूर्णोऽपिरश्मिभिः। चकारभीत्यावैतस्यकोपनस्यातितेजसः॥४

उनक्रोधीमुनिकेभयसेचंद्रमापूर्णहोकरभी अधिकशीतनकरताथा॥४॥

ऋतवश्च क्रमं त्यक्त्वा वृक्षेष्वाश्रमजन्मसु । पुष्पफलंचक्रुराज्ञयासार्व्वकालिकम्॥५॥

ऋतु भी उनकीआशा से अपने क्रमको छोड़कर आश्रम के  आसपास के वृक्षों में सब कालके फूल और फल दिया करते थे

मुहुरापत्रछन्देनतस्याश्रमसमीपगाः। कमण्डलुगताचैवभूतेभतामहात्मनः॥६॥

जल भी महात्मा भूति के भय से उसके श्राश्रम के पास तथा कमण्डलु मेंभरा रहता था || ६ ||

नातिक्लेशसहोविप्रसोऽभवत्कोपनोभृशम्। अपुत्रमहाभागःसतपस्यकरोन्मनः॥७॥

  हे विप्र क्रोष्टुकिजी ! वह क्लेश को सहन न करता तथा उसको अत्यन्त क्रोध बना रहता था । पुत्र न होने के कारण उस महा- भाग ने तपस्या करने का विचार किया ॥ ७ ॥

पुत्रकामोयताहारःशीतवातानलाहतः। तपस्यामिविचिन्त्येतितपस्येवमनोदधे॥८॥

की इच्छासे जाढ़ा, गर्मी, वायु सहकर और मिता- हारी रहकर तपस्या करूँगा ऐसा विचार किया ।८॥

तस्येन्दुर्नातिशीतायनातितापायभास्करः। अभवन्मातरिश्वाचवनातिमहामुने॥६॥

है कौटुकि मुनि ! उसके तपस्या करते हुए न ने अति उष्णता, तथा वायु ने भी कोई उत्पात न

चंद्रमा ने अत्यन्त शीतलता उत्पन्नकी और न सूर्यश्रतिकिया ॥ ६ ॥

श्रीड्यमानोद्वन्द्वैश्चसभूतिर्मुनिसत्तमः। श्रनवाप्याभिलापंतंतपसःसंन्यवर्त्तत ||१०||

क्लेशों को सहकर तपस्या करने पर, भी भूति मुनि की श्रभिलावा पूर्ण न हुई तब उन्होंने तपस्या करना छोड़ दिया ॥ १० ॥

तस्यभ्रातासुवर्चाभूयतेनाभिमन्त्रितः। यियासुःशान्तिनामानंशिष्यमाहमहामतिम्॥११॥

तब उनकेभाई सुवर्चा के यहां यज्ञ हुआ और निमन्त्रित होने पर उन्होंने वहाँ जाने की इच्छा से अपने शान्तिनामक शिष्य से कहा ॥ ११ ॥

प्रशान्तमक्षप्रतिमंविनीतंगुरुकर्म्मणि। सदोहयुक्तंशुभाचारमुदारंमुनिसत्तमम्॥१२ ॥

वह शान्ति सतोगुणी,विनीत, गुरुकर्म में तत्पर, शुभ कर्म में रत और उदार था ॥ १२ ॥

भूतिस्वाच

अहंयज्ञंगमिष्यामिभ्रातुःशान्तंसुवर्चसः।

तेनाहूतस्त्वया चेह यत् कर्त्तव्यं शृणुष्व तत् ॥ १३ ॥

भूतिबोले- हेशान्ति ! अपनेभाईसुवर्चाकेनिमंत्रणके कारणमैंउसकेयशमेंजाऊँगा, अबजोतुमकोकरना है वह सुनो ||१३||

प्रतिजागरणंवहस्त्वयाकाममाश्रमे। तथातथाप्रयत्नेनयथाग्निर्नशमंव्रजेत् ||१४|||

मेरे आश्रम पर अग्नि कोजागृत रखना तुम्हारा कार्य होगा, तुम प्रत्येक प्रयत्न ऐसा करना जिससे अग्नि शांत न होनेपावे || १४| मार्कण्डेयउवाच

इत्याज्ञाप्यतथेत्युक्तोगुरुःशिष्येणशान्तिना। जगामयज्ञंतंभ्रातुराहूतःसयवीयसा ||१५||

मार्कण्डेयजी बोले-

इस श्राशा को सुनकर शिष्य शान्ति ने कहा कि ऐसा ही होगा। और तब भूति मुनि भाई के

निमंत्रण पर उसके यज्ञ को चले गये || १५||

सचशान्तिर्वनादयावत्समित्पुष्पफलादिकम्। उपानयतिभृत्यर्थंगुरोस्तस्यमहात्मनः॥१६॥

शांतिभी बन से समिधा और फल, फूल लाकर गुरुदेव की श्राज्ञानुसार कार्य करने लगे ॥ १६ ॥

अन्यचकुरुतेकर्म्मगुरुभक्तिवशानुगः। प्रशान्तस्तावदनलोयोऽसौभूतिपरिग्रहः || १७ ||

गुरु की भक्ति के बावत होकर उन्होंने दूसरा कर्म भी किया परन्तु भूति से परिग्रह की हुई अग्नि किसी प्रकार से शान्त होगई ॥ १७ ॥

तंदृष्ट्वासोऽनलंशान्तंशान्तिरत्यन्तदुःखितः। भीतश्चभूतेर्बहुधाचिन्तामापमहामतिः ||१८||

उस अग्निको बुझ हुआ देखकर शान्ति को बड़ा दुःख हुआ और वह भूति के डर से अत्यन्त चिन्तित हुए ॥ १८ ॥

किंकरोमिकथंवात्रभवितागमनंगुरोः। मयाद्यप्रतिपत्तव्यंकिंकृतेंसुकृतंभवेत् ||१६||

   वे कहने लगे मैं क्या करूँ, गुरु के आगमन पर क्या उत्तर दूँगा, श्रव मैं क्या करूँ जिससे किसुकृत हो ? ॥ १६ ॥

प्रशान्ताग्निमिमंधिष्टययदिपश्यतिमेगुरुः। ततोमांविषमेव्यसनेसन्नियोक्ष्यति॥२०॥

जय गुरु इस अग्नि को बुझा हुआ देखेंगे तो वे मुझपर क्रोध करेंगे जिससे मुझेबड़ा दुःख होगा ॥ २० ॥

यद्यन्यममिमन्त्राहमग्निस्थानेकरोमितत्। सर्व्वंप्रत्यक्षभस्मसोऽवश्यंमांकरिष्यति॥२१

यदि इस अग्नि के स्थानमें दूसरी मिलाकर रक्खूं तो सर्वदर्शी मेरे गुरु श्रवश्य ही मुझको भस्म कर डालेंगे ||२१||

सोऽहंपापोगुरोस्तस्यनिमित्तंकोप - शापयेाः। 'तथात्मानंनशोचामियथापापंकृतंगुरोः॥२२॥

मैं बड़ा पापी हूँ जो कि गुरु के क्रोध और शापका निमित्त हुआ । मैंने उस बात को न सोचा जिससे यहपाप हुआ ॥ २२ ॥

दृष्ट्वाप्रशान्तमनलंनूनंशप्स्यतिमांगुरुः। अथवापावकःक्रुद्धस्तथावीयोंहिसद्विजः॥२३॥

इस अग्नि को बुझा हुआ देखकर गुरु मुझको शाप देंगे और मैं उनके वल से इस प्रकार भस्न हो जाऊंगा जिस प्रकार क्रुद्ध होकर अग्नि प्रत्येक वस्तु को भस्म कर देती हैं ॥२३

यस्यप्रभावादिवभ्यन्तोदेवास्तिष्ठन्तिशासने। कृतागसंसमांयुक्त्याकयानाधर्षयिष्यति॥२४

जिसके प्रभाव से देवता लोग भी डर कर शासन में रहते हैं ऐसे गुरुका मुझे शाप न लगे वह उपायकौनसा है ॥२४॥

मार्कण्डेय उवाच

बहुधैवंविचिन्त्यासौभीतस्तस्यसदागुरोः। योमतिमतांश्रेष्ठःशरणंजातवेदसम् ||२५||

नार्कण्डेयजी बोले--

गुरु के डरसे बहुत चिन्तित होकर वुद्धिमानोंश्रेष्ठ शान्ति सुनि ने अग्नि की शरण ली ॥ २५ ॥

पचकारतदास्तोत्रंसप्ताचैिर्यतमानसः। चैकचित्तोमेदिन्यांन्यस्तजानुःकृताञ्जलिः॥२६

 वे एकाग्र चित्त होकर, घुटने पृथ्वी पर टेक कर और हाथ जोड़कर श्रग्नि की स्तोत्रों से स्तुतिकरने लगे ॥ २६ ॥ शान्तिरुवाच

प्रोंनमःसर्व्वभूतानांसाधनायमहात्मने। एकद्विपश्चधिष्टयायराजसूयेपढ़ात्मने ||२७||

शान्ति बोले-

सब जीवों के साधक, महात्मा एकद्विपंच- स्थानी, राजसूय यज्ञ में पड़ात्मा अग्नि को प्रणाम  है ||२७|

म: समस्तदेवानांवृत्तिदायशुक्ररूपाय |

जगतामशेषाणांस्थितिप्रदः ||२८||

मैं उस अग्नि को प्रणाम करता हूं जो सव सुवर्चसे । देवताओं को वृत्तिदायक है और कान्तियुक्त, शुक्ररूप, अशेष जगतों की स्थिति का कारण है ॥२८॥

वंमुखंसर्व्वदेवानांत्वयात्तुंभगवान्हविः। रिणयत्यखिलान्देवान्त्वत्मारणाःसर्व्वदेवताः२६॥

अग्नि ! तुम सब देवताओं के सुख हो । तुम्हारे द्वारा हविष्य भक्षण करके भगवान् सब देवताओं को तृप्त करते हैं अतः तुम सब देवताओं के प्राणहो ||२६||

तंहविस्त्वय्यमलमेवत्वमुपगच्छति तश्चजलरूपेणपरिणाममुपैतियत्॥३०॥

आपके भीतर हवन किया हुआ हविमलत्व को प्राप्त होकर परिणाम में जलरूप

होजाता है ॥३०॥

नाखिलौषधीजन्मभवत्यनिलसारथे। शेषवीभिरशेपाभिःसुखंजीवन्तिजन्तवः॥३१

हे अनिलसारथे ! उस जल से समस्त श्रपधियां तथा खाद्यपदार्थ उत्पन्न होते हैं जिनसे कि सब जीव सुखपूर्वक जीवित हैं ॥ ३१ ॥

तन्वतेनरायज्ञान्त्वत्सृष्टास्त्रोषधीषुच। ज्ञैर्देवास्तथादैत्यास्तद्वद्रक्षांसिपावक ||३२||

 हे पावक ! आपकी उत्पन्न औषधियों से मनुष्य यज्ञ करते हैं और उन यज्ञों से देवता, दैत्य औरराक्षस ॥ ३२ ॥

राप्याय्यन्तेचतेयज्ञास्त्वदाधाराहुताशन। तःसर्व्वस्ययोनिस्त्वंवहसर्व्वमयस्तथा॥३३॥

तृप्त होते हैं । हे हुताशन ! श्रापही यज्ञों के आधार हैं । अतः आपही सव के कारणतथा सर्वमय हैं ॥ ३३ ॥

बतादानवायक्षादैत्यागन्धर्व्वराक्षसाः। पाःपशवोवृक्षामृग-पक्षि- सरीसृपाः ||३४||

देवता, दानव, यक्ष, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, मनुष्य, पशु, वृक्ष, मृग, पक्षी तथासर्प आदि ॥ ३४ ॥

प्याय्यन्तेत्वयासर्व्वेसंवर्ध्यन्तेचपावक। एवोद्भवंयान्तित्वय्यन्तेचतथालयम्॥३५॥

सव व्यापके ही द्वारा तृप्त होते हैं । हे नि ! आपही इनका संवर्द्धन करते हैं तथा आपही से इनका उत्कर्ष और आपही में इनका लय है ॥ ३५ ॥

पःसृजसिदेवत्वंत्वमत्सिपुनरेवताः। व्यमानास्त्वयाताथप्राणिनांपुष्टिकारणम् ||३६||

हे देव ! आपही जलों को उत्पन्नकरते तथा श्रपही उनको पी जाते हैं । आपके द्वारा पचाया हुआ जल ही प्राणियों की पुष्टि करताहै ||३६||

तेजोरूपेणकान्त्यासिद्धेष्ववस्थितः।

विषरूपेण नागेषु वायुरूपः पतत्रिषु ||३७||

देवताओंमेंतेजरूपसे, सिद्धोंमेंकान्तिवायु रूप से,  नागों में विष रूप से तथा पक्षियों मेंरूप से ॥ ३७ ॥

मनुजेंषुभवान्क्रोधोमेाहःपक्षि- मृगादिषु। श्रवष्टम्भोऽसितरुपुकाठिन्यंत्वंमहींप्रति।३८ ||

मनुष्यों में क्रोध रूप होवर, पशु- होकर और पृथ्वी में कठोरता रूप होकर ॥ ३८ ॥

जलेद्रवत्वंभगवान्जलरूपीतथानिले। व्यापित्वेनतथैवानेनभस्यात्माव्यवस्थितः ||३६||

पक्षियों में मोह रूप होकर, वृक्षों में अवष्टम्भ रूप जलमें द्रवरारूप और वायुमें वेगरूप तथा श्राकाश मैं व्यापकता रूप होकर हे भगवान् श्रग्नि ! थापस्थित हैं ||३६||

त्वमसर्व्वभूतानामन्तश्चरसिपालयन्। त्वामेकमाहुःकवयस्त्वामाहुत्रिविधंपुनः॥४०॥

 हे अग्नि श्राप लव जीवोंका पालन करते हुए उनके अंतस्तल में विचरतेहैं ! श्राप एक

हैं, परन्तु कवियों ने श्रापको तीन प्रकार का कहा ||४०||

त्वामष्टधाकल्पयित्वायज्ञमाद्यमकल्पयन्। त्वयासृष्टिमिदंविश्वंवदन्तिपरय: ॥४१

परम ऋषि आपको यज्ञ के आदि में आठ प्रकार का कल्पित करते हैं और यह कहते हैं किसंसार आपसे ही उत्पन्न है ॥ ४१ ॥

त्वामृतेहिजगत्सर्व्वंसद्योनश्येद्धताशन। तुभ्यंकृत्वाद्विजःपूजांस्वकर्म्मविहितांगतिम्॥४२॥

 हे हुताशन ! आपके मरनेपर सब जगत् नष्ट होजायगा । श्रापकी पूजा करके ब्राह्मण अपने विहित कर्म को ॥ ४२ ॥

प्रयातिहव्यकव्याद्यःस्वधास्वाहाभ्युदीरणात्। परिणामात्मवीर्याहिप्राणिनाममरार्चित।४३

स्वधा और स्वाहा आदि का उच्चारण करके हव्य कव्य आदि से प्राप्त होते हैं । हे देवताओंसे पूजित अग्निदेव ! सब प्राणियों का श्रात्मा और पराक्रमश्रापद्दी से है ॥ ४३ ॥

दहन्तिसर्व्वभूतानिततोनिष्क्रम्यहेतयः। जातवेदस्तवैवेयंविश्वसृष्टिमहाद्युते॥४४॥

 हे जातवेद ! हे महाद्य ति ! श्रापद्दी की ज्वालायें सब भूतों को जलाती हैं तथा

इस विश्व की सृष्टि आपही से है ॥ ४४ ॥

तवैववैदिकंकर्म्मसर्व्वभूतात्मकंजगत्। नमस्तेऽनलपिङ्गाक्षनमस्तेऽस्तुहुताशन॥४५॥

श्रापही वैदिककर्म और सब जीवों से युक्त जगत् रूप हैं । हे अनल ! हे पिंगाक्ष ! हे हुताशन ! आपको मैंवार वार प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥

पावकाद्यनमस्तेऽस्तुनमस्तेहव्यवाहन। त्वमेवभुक्तपीतानांपाचनाद्विश्वपावकः ||४६ ||

  हे आदि पावक ! हे हव्यवाहन ! आपको नमस्कार है। आपही खायेऔर पिये हुए को पचाते हैं श्रतः श्रापही विश्वपाचक हैं || ४६ ॥

शस्यानांपाककर्त्तात्वंपोष्टात्वंजगतस्तथा। त्वमेवमेघस्त्वंवायुस्त्वंवीजंशस्यहेतुकम्॥४७॥

श्रापही अक्षोंका पाक करते और जगत का पालन करते हैं । श्रापही मेघ, वायु, औरतों के बीजरूपहैं ||४७||

पोपायसर्व्वभूतानांभूतभव्यभवोह्यसि। त्वंज्योतिःसर्व्वभूतेषुत्वमादित्योविभावसुः॥४८॥

सब जीवों के पालन और कल्याण के लिये आपका जन्म हुआ है। आप ही सव जीवों में ज्योति और आपही सूर्य हैं ॥४८॥

स्वहस्त्वंतथारात्रिरुभेसन्ध्येतथाभवान्। हिरण्यरेतास्त्वंवह्नेहिरण्योद्भवकारणम्।४६॥

आपही दिनरात्रि तथा दोनों संध्याएँ हैं । हे अग्नि ! श्रापही हिरण्यरेता और सुवर्ण का कारण हैं ॥४६॥

हिरण्यगर्भश्चभवान्हिरण्यसदृशप्रभः। त्वंमुहूर्त्तक्षणत्वंत्वंत्रुटिस्त्वंतथालवः॥५०

यापही हिरण्यगर्भ हैं और आपकी कान्ति सुवर्ण के समान है। मुहर्त्त, क्षण, त्रुटि तथा लव श्रापहीहैं ॥ ५० ॥

कला - काष्ठा- निमेषादि-रूपेणासिजगत्प्रभो। त्वमेतदखिलंकालःपरिणामात्मकोभवान्॥५१

  हे जगत् के प्रभु! आपही कला, काष्ठा, निमेष आदि रूप से समस्त कालके स्वरूपहैं औरश्रापही परिणामरूप हैं ॥ ५१ ॥

याजिहाभवतःकालीकालनिष्ठाकरीप्रभो। भयान्नःपाहिपापेभ्यऐहिकाचमहाभयात् ||२२||

 हे प्रभु! आप की काली जिह्वा कालनिष्ठा करने वाली है ! उसी के द्वारा श्राप सांसारिक भय तथा पाप से हमारीरक्षा कीजिये ||१२||

करालीनामयाजिवामहाप्रलयकारणम्। तयानःपाहिपापेभ्यऐहिकाच्चमहाभयात्॥५३

श्रापकी कराली नाम की जिह्वामहाप्रलय करने वाली है, उससे आप हमारे पापों और सांसारिक भय से हमारी रक्षा करें ॥ ५३ ॥

मनोजवाचयाजिह्वालघिमागुणलक्षणा। तया नः पाहि पापेभ्य ऐहिकाच्च महाभयात् ॥ ५४||

लघिमा गुण लक्षण वाली जोआपकीमनोजाजिल्हा हैउसकेद्वाराश्रापःहमारेपापोंऔरसांसारिक,भय से हमारी रक्षा करें ॥ ५४ ॥

करोतिकामंभूतेभ्योयातेजिद्दासुलोहिता। तयानःपाहिपापेभ्यऐहिकाचमहाभयात्॥५५॥

आपकी सुलोहिंता नाम जिहा जीवों की कामना पूर्ण करती है उसीसे आप हमारे पापों और सांसारिक भय सेहमारी रक्षा करें || ५५ ||

सधूम्रवर्णायाजिह्वाप्राणिनांरोगदाहिका। तया नः पाहि पापेभ्य ऐहिकाच्च महाभयात् ||५६

प्राणियों के रोग नाशकरने .वाली सधूम्रवर्ण नाम जिला के द्वारा आप हमारे पापों और सांसारिक भय से हमारी रक्षा करें ॥५६

. स्फुलिङ्गिनीचयाजिह्वायतःसकलपुद्गलाः। तयानःपाहिपापेभ्यऐहिकाच्चमहाभयात् ||५७||

सब संसार का मन चंचल रखने वाली जो स्फु- लिंगिनी नाम श्रापकी जिहा है उसके द्वारा हमारे

पापों और सांसारिक महाभय से हमारी रक्षा करें॥५७ ॥

यातेविश्वासदाजिह्वाप्राणिनांशर्म्मादायिनी। तयानःपाहिपापेभ्यऐहिकाचमहाभयात् ||५८॥

प्राणियों को कल्याण देनेवाली अपनी विश्वासदा जिह्वा से हमारी पापों और सांसारिकभय से रक्षा करें ||१८||

पिङ्गाक्षलोहितग्रीवकृष्णवर्णहुताशन। त्राहिमांसर्व्वदोषेभ्यःसंसारादुद्धरेहमाम्॥५६

  हे पिंगाक्ष, हे लोहितग्रीव ! कृष्णवर्ण हुताशन ! मेरे सब दोषों को दूर करके इस संसार से मेरा उद्धार करो ॥ ५६ ॥

प्रसीदवहसप्तार्चिःकृशानोहव्यवाहन। अग्नि- पावक-शुक्रादि-नामाष्टभिरुदीरितः॥६०॥

 हे अग्नि ! याप प्रसन्न हों, आप सप्तार्चि, कृशान, हव्यवाहन, अग्नि, पावक, शुक्र आदि घाट नामों से पुकारेजाते हैं ॥ ६०॥

अग्रे सर्व्वभूतानांसमुद्रभूतविभावसो। प्रसीदहव्यवाहाख्यअभिष्टुतमयान्यय॥६१

हे अग्नि ! आप सव जीवोंसे पहले उत्पन्न हुहैं । हे हव्यवाहन, हे अभिष्टुत हे अव्ययआप प्रसन्न हों ॥ ६१ ॥

त्वमक्षयोवह्निरचिन्त्यरूपःसमृद्धिमान्दुष्प्रसहोऽतितीत्रः।

त्वमव्ययंभीममशेषलोकंसमूर्त्तकोहन्त्यथवातिवीर्य्यः॥६२॥

श्राप अक्षय अग्नि, अचिंत्यरूप, समृद्धिशाली, दुष्प्रसह, अतितीव्र, अव्यय और भीम हैं। आप मूर्तिमान् होकर शेष लोकोंको नष्ट करते हैं तथा अति पराक्रमी हैं ॥ ६२ ॥

त्वमुत्तमंसत्त्वमशेषसत्त्वहृत्पुण्डरीकस्त्वमनन्तमीड्यम् |

त्वयाततंविश्वमिदंचराचरंहुताशनैकोबहुधात्वमत्र॥६३॥

श्राप उत्तम जीव है, प्रत्येक जीव के हृदय कमलमें रहते हैं, आप अनन्त स्तुति करने योग्य तथा सव जगत् के व्याप्त हैं । हे हुताशन ! आप एक हैं परंतुअनेक प्रकार से संसार में स्थित हैं ॥ ६३ ॥

त्वमक्षयःसगिरिवनावसुन्धरानभःससोमार्क- महर्दिवाखिलम्।महादधेर्जठरगतश्चवाढ़वो भवान्विभूत्यापरयाकरेस्थितः ||६४ ||

श्राप अक्षय हैं तथा पर्वत, वन, पृथ्वी, श्राकाश, चंद्रमा. सूर्य, दिन, रात्रि ये सब श्रापही हैं। समुद्र में बढ़- वानल श्रापही हैं तथा परम विभूति को आप सदाहाथ में लिये रहती हैं ||६||

हुताशनस्त्वमितिसदाभिपूज्यसेमहाक्रतौ नियमपरमहर्षिभिः।अभिष्टुतःपिवसिच सोममध्वरेवपट्कृतान्यपिचहवींषिभूतये॥६५॥

हुताशन कहकर यज्ञोंमें आपको महान् ऋषि लोग पूजते हैं। यज्ञ में आप की स्तुति करके सोमपान करते तथा वषट् उच्चारण करके हविष्य भक्षण करते हैं ॥ ६५ ॥

त्वंविप्रैःसततमिहेज्यसेफलार्थंवेदाङ्गेष्वथ सकलेषुगीयसेत्वम्।स्वद्धेतोयजनपरायणा।

द्विजेन्द्रावेदाङ्गान्यधिगमयन्तिसर्व्वकाले॥६६॥

ब्राह्मणलोगआपकेनिमित्तयज्ञपरायणहोकर फलार्थी होकर ब्राह्मण सदैव आपका पूजन करते

हैं तथा सूत्र वेदाङ्गों में आपका गान करते हैं  ब्राह्मण लोग आपके निमित्त यज्ञपरायण होकर सदा वेदाङ्गों का अध्ययन करते हैं ६६

त्वंब्रह्मायजनपरस्तथैवविष्णुभूतेशः सुरपतिरर्य्यमाजलेशः।सूर्येन्दुसकलसुरासुराश्च हव्यैःसन्तोष्याभिमतफलान्यथामुवन्ति॥६७॥

यज्ञ परायण होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, अर्यमा, वरुण, सूर्य और चन्द्रमा श्रादि सब देवता व राक्षस आपको हविष्यों से संतुष्ट कर श्रमितफलोंको पाते हैं ॥ ६७॥

अर्चिर्भिःपरममहोपघातदुष्टंसंस्पृष्टंतवशुचि। जायते समस्तम् । स्नानानां परममतीव भस्मना ।

सत् सन्ध्यायां मुनिभिरतीव सेव्यसे तत् ६८

चाहे कितने ही बड़े उपघात से दूषित क्यों न हो गया हो आपकी ज्वालाओं के स्पर्श से सव शुद्ध होजाता है।  संध्या समय के उपरान्त मुनि लोग आपकी भस्म शरीर लगाते हैं ॥६८॥

प्रसीदवहशुचिनामधेयप्रसीदवायो विमलातिदीप्ते।प्रसीदमेपाचकवैद्यताद्य प्रसीदहन्याशनपाहिमांत्वम् ||६६॥

हेअग्नि ! हेशुचि ! हेवायु ! विमलातिदीप्ति ! हेपाचक ! हेवैद्यत ! हेश्राय हव्याशन ! श्रापप्रसन्नहोंऔरमेरीरक्षाकरे ॥६६॥

यत् ते वह शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः । तःपाहिनःस्तुतोदेवपितापुत्रमिवात्मजम्॥७०॥||

हे अग्नि ! श्रापका जो कल्याणमय सप्रकार रक्षा करें जिस प्रकार कि पिता पुत्र की

और सात ज्वालायें हैं वे हे देव ! हमारी २रक्षाकरताहै॥७०॥

इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणकेभौत्यभन्वंतरमेंअग्निस्तोत्रनाम 8वांश्र०स०।