मार्कण्डेय महा पुराण
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मार्कण्डेय उवाच अरिष्टनेमिपुत्रोऽभूद्गरुड़ो नाम पक्षिराट् । गरुड़स्याभवत् पुत्रः सम्पातिरिति विश्रुतः ॥ १ मार्कण्डेय वोले- अरिष्टनेमि के पुत्र गरुड़ हुए जो सव पक्षियों के राजा थे | गरुड़ का पुत्र प्रसिद्ध सम्पाती हुआ ॥ १ ॥
तस्याप्यासीत् सुतः शूरः सुपार्श्वो वायुविक्रमः । सुपार्श्वतनयः कुम्भिः कुम्भिपुत्रः प्रलोलुपः ॥ उसका पुत्र शूरवीर तथा पवन के समान पराक्रम वाला सुपार्श्व नामक हुआ । सुपार्श्व का पुत्र कुन्ति और कुन्ति का पुत्र प्रलोलुप हुआ ॥ २ ॥
स्यापि तनयावास्तां कंकः कन्धर एव च।।
प्रलोलुप के दो पुत्र हुए ( १ ) कङ्क और (२) कन्धरः ॥ ३ ॥ कङ्कः कैलासशिखरे विद्युद्रूपेति विश्रुतम् । ददर्शाम्बुजपत्राक्षं राक्षसं धनदानुगम् ॥ ४,॥
कैलाश पर्वत के शिखर पर विजलीके समान प्रकाशमान् कङ्क रहता था । उसने एक चार कमल के समान नेत्र वाले एक राक्षस को जो कुवेरका अनुचर था देखा ||४|| आपानासक्तममल-खग्दामाम्बरधारिणम् । भायसहायमासीनं शिलापट्ट डेमले शुभे ॥ ५
वह मदिरा आदिके नशे में चूर, स्वच्छ फूलों की माला 'तथा सुन्दर वस्त्र पहिने हुये और एक स्वच्छ एवं पवित्र पत्थर पर अपनी स्त्री का सहारा लिये बैठा था ॥ ५ ॥ तद्दृष्टमात्रं कङ्केन रक्षः क्रोधसमन्वितम् । मोवाच कस्मादायातस्त्वमितो एडजाधम || ६
वह राक्षस उस कङ्क को देखते ही अत्यन्त क्रोधित होगया और उससे वोला, "रे दुष्ट पक्षी, तू यहाँ | किस तरह श्राया " ॥ ६ ॥ स्त्रीसन्निकर्षे तिष्ठन्तं कस्मान्मामुपसर्पसि । नैष धर्म्मः सुबुद्धीनां मिथोनिष्पाद्यवस्तुषु ॥ ७॥
अपनी स्त्री के साथ बैठेहुये मुझको तू क्यों देखता है, बुद्धिमानों का यह धर्म नहीं है । तू निश्चय ही इसी क्षण वध किया जाने के योग्य है ॥ ७ ॥ कङ्क उवाच साधारणोऽयं शैलेन्द्रो यथा तव तथा मम । ।अन्येषांचैव जन्तूनां ममता भवतोऽत्र का ॥ ८
कङ्क वोला-.
यह पर्वत जनसाधारण का है, यह जैसा तेरा वैसा ही मेरा है, अन्य जीवों का भी यह पर्वत है । इसमें तुझको ममता क्यों हुई ॥ ८
मार्कण्डेय उवाच ब्रुवाणमित्थं खड्गेन कङ्कं चिच्छेद राक्षसः । क्षरत्क्षतजवीभत्सं विस्फुरन्तमचेतनम् ॥
मार्कण्डेयजी बोले- इस प्रकार कहते हुये कङ्क को उस राक्षस ने क्षणभर में तलवार से काट डाला । वह अचेत होकर गिर पड़ा और निर्जीव होगया ॥ ६ ॥ कङ्कं विनिहतं श्रुत्वा कन्थरः क्रोधमूर्च्छितः । विद्युद्रूपवधायाशु मनश्चक्रेऽण्डजेश्वरः ॥१०॥
कङ्क के वध को सुनकर पक्षिराज कन्धर क्रोध से मूच्छित होगया और फिर अपने मनको स्थिर कर बिजली के समान दौड़ा ॥ १० ॥ स गत्वा शैलशिखरं कङ्को यत्र हतः स्थितः । तस्य सङ्कालनं चक्रे भ्रातुर्ज्येष्ठस्य खेचरः । कोपामर्प विवृताक्षो नागेन्द्र इव निश्वसन् ॥
वह उस पर्वत के शिखर पर पहुँचा जहाँ कङ्क मरा हुआ पड़ा था, उस पक्षी ने बड़े भाई का क्रियाकर्म किया फिर क्रोध से आँखे विकृत करके सर्प के समान फुसकार मारने लगा ॥ ११ ॥ जगामाथ स यत्रास्ते भ्रातृहा तस्य राक्षसः । पक्षवातेन महता चालयन् भूधरान् वरान् ||१२||
वह वहाँ की चला जहाँ उसके भाई की हत्या करने वाला राक्षस मौजूद था । उसके पंखों की हवा से बड़े पहाड़ हिल गये ॥ १२ ॥ वेगात् पयोदजालानि विक्षिपन् क्षतजेक्षणः क्षरणात् क्षयितशत्रुः स पक्षाभ्यां क्रांतभूधरः ॥१३॥
क्रोध से रक्तवर्ण हो रहे हैं जिसके ऐसा वह पक्षी क्षणभर में के समीप पहुँच गया और उसने अपने पंखों पर्वत को ढक लिया ॥ १३ ॥ पानासक्तमति तत्र तं ददर्श निशाचरम् । ताम्रवक्त्रनयनं हेमपकमाश्रितम् ॥ १४॥
उसने वहाँ राक्षस को शराब के नशे में चूर तथा मुख नेत्रों को तमतमाये हुये सोने के पलकं पर देखो ॥ १४ ॥ स्रग्दामापूरितशिखं हरिचन्दनभूषितम् । केतकीगर्भपत्रा भैर्दन्तैर्घोरतराननम् ॥ १५ ॥
फूलों की माला पहिने, चन्दन हुये, और केतकी के पुष्प की सदृश पीले वाले और भयानक मुख वाले ||१५|| वामोलमाश्रितांचास्य ददर्शायतलोचनाम् । पत्नी मदनिकां नाम पुंस्कोकिलकलस्वनाम् ||१६||
तथा जिस वार्ड जाँघ पर बड़ी-बड़ी आँखों वाली, कोकिल समान मधुर कण्ठ वाली उसकी पत्नी पनि नाम बैठी हुई है ॥ १६ ॥ ततो रोपपरीतात्मा कन्धरः कन्दरस्थितम् ।
मुवाच सुदुष्टात्मन्नेहि युध्यस्व वै मया॥ १७॥ क्रोध से कन्धर ने इस हालत में उस राक्षस को खोह. बैठा देखा और उससे कहा, "रे दुष्ट ! आ मुझसे युद्ध कर" ॥ १७ ॥ स्माज्ज्येष्ठो मम भ्राता विश्रब्धो घातितस्त्वया ।
स्मात्त्व मदसंसक्त नयिष्ये यमसादनम् ||१८||
जिस प्रकार तूने मेरे बड़े भाई को मार कर चैन लिया है उसी प्रकार मैं भी तुझ नशे में चूर को यमराज के घर भेजे देता हूँ ॥ १८ ॥ वेश्वस्तघातिनां लोका ये च स्त्रीवालघातिनाम् । पास्यसे निरयान् सर्व्वस्तांस्त्वमद्य मया हतः ॥
जहाँ विश्वासवाती अथवा वालक और स्त्रीधातक जाते हैं वहाँ ही तू मुझसे मारा जाकर श्राज पहुँचेगा ॥ ॥
मार्कण्डेय उवाच इत्येवं पतगेन्द्रेण प्रोक्त स्त्रीसन्निधौ तदा । रक्षः क्रोधसमाविष्टं प्रत्यभाषत पक्षिणम् ||२०||
मार्कण्डेयजी बोले- इस प्रकार स्त्री के सामने पक्षिराज द्वारा धम-काया हुआ वह राक्षस क्रोधितही पक्षीके प्रति बोला २० ॥ यदि ते निहतो भ्राता पौरुषं तद्धि दर्शितम् । वामप्यद्य हनिष्येऽहं खड्गेनानेन खेचर ||२१||
हे पक्षी ! जिस प्रकार मैंने तेरे भ्राता कावध किया था उसी प्रकार तेरा भी पौरुप देखकर इस तलवार से तुझे मारूँगा ॥ २१ ॥ तिष्ठ क्षणं न मे जीवन् पतगाधम यास्यसि। त्युक्त्वाञ्जनपुञ्जाभं विमलं खड्गमाददे ||२२||
"रे नीच पक्षी ! तनिक ठहर, क्षणभर में तेरे जीवन का अंतहोगा" यह कहकर उस राक्षस ने जिसका रङ्ग कालौंच के ढेर के समान था एक स्वच्छ तलवार हाथ में लेली ॥ २२ ॥ तिः पतगराजस्य यक्षाधिपस्य च । भूव युद्धमतुलं यथा गरुड़-शक्रयोः ॥२३॥
इसके अनन्तर उस पक्षिराज. कन्वर और यक्षों के राजा राक्षस में वोर युद्ध
हुआ जिस प्रकार कि गरुड़ और इन्द्र में हुआ था २३ ॥ तः स राक्षसः क्रोधात् खड्गमाविध्य वेगवत् । चिक्षेप पतगेन्द्राय निर्वाणाङ्गारवर्चसम् ||२४||
इसके बाद उस राक्षस ने क्रोधित हो, तेजी से श्रृङ्गारे के समान स्वच्छ तलवार को पक्षिराज कन्धर पर फेंका ॥ २४ ॥
तिगेन्द्र तं खड्गं किंचिदुत्प्लुत्य भूतलात् । क्त्रेिण जग्राह तदा गरुड़ : पन्नगं यथा ||२५||
उस पक्षियों के राजा ने पृथ्वी से कुछ उछल कर उस तलवारको चोंच से इस प्रकार उठा लिया जिस प्रकार गरुड़सर्प को ले लेता है ॥ २५ ॥ त्रिपादतलैर्भक्त्वा चक्रे क्रोधमथांडजः । स्मिन् भग्ने ततः खड़गे वाहयुद्धमवर्त्तत ॥ २६ ॥
फिर पक्षिराज कन्धर ने चोंच और पाँवों के बीच में रखकर उस तल- चार को तोड़ डाला और फिर दोनों में द्वन्द युद्ध हुना ॥ २६ ॥ तः पतगराजेन वक्षस्याक्रम्य राक्षसः | -पाद-करैराशु शिरसा च वियोजितः ॥२७॥ फिर कन्धर ने राक्षस को अपने वक्षस्थल से दवाया और उसके शिर हाथ और पैरों को चोंच से काट डाला ॥ २७ ॥ स्मिन् विनिहते सा स्त्री खर्ग शरणमभ्यगात् । कंचित् सञ्जातसन्त्रासा प्राह भार्य्या भवामि ते २८||
उस राक्षस के मर जाने पर भय से सहमी हुई उसकी स्त्री पक्षी की शरण में आ गई और उससे बोली, “मैंतेरी स्त्री होकर रहूँगी" ॥ २८ ॥ आमादाय खगश्रेष्ठः स्वकं गृहमगात् पुनः । 'त्वा स निष्कृतिं भ्रातुर्विद्यद्रूपनिपातनात् ॥ ॥
वह श्रेष्ठ पक्षी जिसका भाई कङ्क तो मरही चुका था उस स्त्रीको लेकर विजली की तरह वेग से अपने घर गया ॥ ॥ न्धरस्य च सा वेश्म प्राप्येच्छारूपधारिणी । निकातनया सुभ्रूः सौपर्णं रूपमाददे ॥३०॥
इच्छानुसार रूप धारण करने वाली उस स्त्री ने जिसकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं और जो वस्तुतः मेनका की पुत्री थी कन्धर के घर आकर पक्षी का रूप धारण कर लिया ॥ ३० ॥ स्यां स जनयामास ताक्षीं नाम सुतां तदा । निशापानिविप्लुष्टां वपुमप्सरसां वराम् । स्य नाम तदा चक्रे ताक्षमिति विहङ्गमः ||३१|
उसी स्त्री से तार्क्षी नाम की कन्या उत्पन्न हुई जो कि दुर्वासा मुनि के शाप की अग्नि से वपु नाम अप्सरा की जगह पक्षिणी हो गई थी, उसी का नाम कन्धर ने ताक्षी रक्खा ॥ ३१ ॥
मन्दपालसुताचा संश्चत्वारोऽमितबुद्धयः जरितारिप्रभृतयो द्रोणान्ता द्विजसत्तमाः ||३२||
हे द्विज श्रेष्ठ जैमिनि ! मन्दपाल नाम पक्षी के चार पुत्र थे ऐसा जानो । उनमें ( उनके नाम ) जरितारि से लेकर द्रोण तक थे ॥ ३२ ॥
तेषां जघन्यो धर्मात्मा वेदवेदांगपारगः । उपयेमे स तां ताक्ष कन्धरानुमते शुभाम् ||३३||
उनमें द्रोण के साथ जो धर्मात्मा तथा वेद-वेदान में पूर्ण था कन्धरने अपनी सुन्दरी कन्या तार्क्षी का विवाह कर दिया ॥ ३३ ॥ कस्यचित्त्वथ कालस्य ताक्ष गर्भमवाप ह। सप्तपक्षाहिते गर्भे कुरुक्षेत्रं जगाम सा ॥ ३४ ॥
कुछ समय बाद ताक्ष गर्भवती हुई और सात - पखवाड़े अर्थात् साढ़े तीन महीने बाद वह कुरुक्षेत्र गई ॥ ३४ ॥ कुरुपाण्डवयोर्युद्धे वर्त्तमाने सुदारुणे । भावित्वाचैव कार्य्यस्य ररणमध्यं विवेश सा ||३५||
उस समय वहाँ कौरवों और पांडवों में घोर युद्ध हो रहा था । होनहार वश कार्य से वह रण के बीच में पहुँच गई ॥ ३५ ॥ तत्रापश्यत युद्ध सा सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् । शरशक्त्यष्टिभिर्भीमं यथा देवासुरं रणम् ||३६||
उसने सब राजाओं का तीर, शक्ति और भालों से पूर्ण वह भीषण युद्ध इस प्रकार देखा जैसा कि देवताओं और असुरों में हुआ था ॥ ३६ ॥ तत्रापश्यत् तदा युद्ध भगदत्त - किरीटिनोः । निरन्तरं शरैरासीदाकाशं शलभैरिव ॥३७॥॥
इसके बाद उसने भगदत्त और अर्जुन का युद्ध देखा जिसमें निरन्तर तीरों से आकाश इस प्रकार श्राच्छादित होगया था जिस प्रकार टीढ़ीदल से होता है ॥ ३७ ॥ पार्थकोदण्डनिर्म्मक्तमासन्नमतिवेगवत् । तस्या भल्लमहिश्यामं त्वचं चिच्छेद जाठरीम् ॥ ३८ ॥
उस समय अर्जुन के धनुष से निकला हुआ एक तीर अत्यन्त वेग से काले सर्प के समान तार्क्षी के पेट में छिंद गया ||३८| भिन्ने कोष्ठे शशांकाभं भूमावण्डचतुष्टयम् । आयुषः सावशेषत्वात् तूलराशाविवापतत् ॥ ३६ ॥
उसके पेट के फटने पर चंद्रमा के समान प्रभा वाले चार अराडे पृथ्वी पर गिर पड़े और वह भी निर्जीव होकर रुई के ढेर की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ी ॥ ३६ ॥ तत्पातसमकालंच सुप्रतीकाद्द्वजोत्तमात् । पपात महती घण्टा वारणसेञ्चिन्नबन्धना ||४०||
उसके मरकर गिरने के समय ही सुप्रतीक नाम उत्तम हाथी का बड़ा घण्टा भी वाण से कट जाने के कारण गिरा ॥ समं समन्तात् प्राप्ता तु निर्भिन्नधरणीतला । छादयन्ती खगांडानि स्थितानि पिशितोपरि ॥ ४१ ॥
वह घण्टा इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा कि वगैर टूटे हुए ही उस पक्षिणी के अंडे उसके नीचे स्थित होगये ॥ ४१ ॥ हते च तस्मिन् नृपतौ भगदत्ते नरेश्वरे । बहून्य हान्यभूदयुद्ध कुरुपाण्डवसैन्ययोः ॥ ४२ ॥
फिर राजा भगदत्त के मारे जानें पर कौरवों और पांडवों की सेनाओं में बहुत दिन तक घोर युद्ध हुआ ॥ ४२ ॥
वृत्ते युद्ध े धर्मपुत्रे गते शान्तनवान्तिकम् । भीष्मस्य गदतोऽशेषान् श्रोतुं धर्मान् महात्मनः ४३॥
युद्ध के समाप्त होने पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर भीष्म के पास गये वहाँ उन्होंने उन महात्मा से बहुत सी धर्म की बातें सुनीं ॥ ४३ ॥ घण्टागतानि तिष्ठन्ति यत्राडानि द्विजोत्तम । श्राजगाम तमुद्देशं शमीको नाम संयमी ||४४ ||
हे द्विजश्रेष्ठ जैमिनि ! जहाँ घण्टे के अन्दर अण्डे रक्खे हुए थे वहाँ दैवात् शमीक नामक ऋषि पहुँचे || ४४ ॥ स तत्र शब्दमशृणोच्चिचीकुचीति वाशताम् । बाल्यादस्फुटवाक्यानां विज्ञानेऽपि परे सति ॥ ४५ ॥
उन्होंने पक्षी के शावकों की आवाज सुनी परन्तु चालक के अस्पष्ट वाक्यों, के कारण कुछ समझ में न श्रासकी ॥ ४५ ॥ थर्षिः शिष्यसहितो घण्टामुत्पाव्य विस्मितः । मातृ-पितृपक्षांच शिशुकान् स ददर्श च ॥ ४६
इसके. वाद मुनि ने अपने शिष्यों समेत उस घण्टे को उठाया तो विस्मित होकर मातृ-पितृविहीन उन पक्षी के बच्चों को देखा ॥ ४६ ॥ तांस्तु तत्र तथा भूमौ शमीको भगवान् मुनिः । दृष्ट्वा स विस्मयाविष्टः प्रोवाचानुगतान् द्विजान् ४७॥
उनको पृथ्वी पर देखकर आश्चर्ययुक्त होकर मुनिश्रेष्ठ शमीकजी अपने शिष्यों से वोले ॥ ४७ ॥ सम्यगुक्तं द्विजाग्येण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ।
पलायनपरं दृष्ट्वा दैत्यसैन्यं सुरार्द्दितम् ||४८ |
देवताओं से मर्दित,होकर राक्षसों की सेना जब भागी थी उस समय उनको भागते हुये देखकर जो कुछ ब्राह्मण श्रेष्ठ. शुक्राचार्य ने कहा था वह बहुत ठीक था ॥ ४८ ॥
न गन्तव्यं निवर्त्तध्वं कस्माद्वजथ कांतराः । उत्सृज्य शौर्य्ययशसी क्व गता न मरिष्यथ ॥ ४६ ॥
" भाग कर न जाओ, कातर होकर क्यों भागते हो ? शूरता और यश को छोड़कर कहाँ जाकर न मरोगे" ॥ ४६ ॥
नश्यतो युध्यतो वापि तावद्भवति जीवितम् । यावद्धातासृजत् पूर्व्वं न यावन्मनसेप्सितम् ||५०
अब तक विधाता ने लिखा है युद्ध करने वाला भी नहीं मर सकता । अपनी इच्छा विधाता के प्रतिकूल कोई जीवित नहीं रह सकता ॥ ५० ॥ एके म्रियन्ते स्वगृहे पलायन्तोऽपरे जनाः । भुञ्जन्तोऽन्नं तथैवापः पिबन्तो निधनं गताः ॥
कोई अपने घर में मर जाता है, कोई भागते समय मरता है, कोई अन्न खाते समय तथा कोई पानी पीते समय मरताहै ॥ ५१ ॥ विलासिनस्तथैवान्ये कामयाना निरामयाः । अविक्षताङ्गाः शस्त्रैश्च प्रेतराजवशं गताः ॥ ५२ ॥ |
कितने ही विलास से, कुछ चोट से, कुछ विना बीमारी. कुछ विना घाव के और कुछ हथियारों से यम-राज के घर पहुँचते हैं ॥ ५२ ॥ अन्ये तपस्यभिरता नीताः प्रेतनृपानुगैः । योगाभ्यासरताश्चान्ये नैव प्रापुर मृत्युताम् ॥५३॥
कुछ लोग तप मेंलीन हुए तथा कुछ योगाभ्यास में तत्पर होते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ ५३ ॥ शम्बराय पुरा क्षिप्तं वज्र' कुलिशपाणिना हृदयेऽभिहतस्तेन तथापि न मृतोऽसुरः ||
प्राचीन कालमें इन्द्र ने एक बार शस्त्रर नामक असुर को वज्र से छाती में मारा था परन्तु इससे वह असुर मृत्यु को प्राप्त न हुआ ॥ ५४ ॥
तेनैव खलु वज्ररेण तेनैवेन्द्रेण दानवाः । प्राप्ते काले हता दैत्यास्तत्क्षणान्निधनं गताः ॥ ५५॥
फिर उसी वज्र से उसी इन्द्र ने समय आने पर उस दैत्य को एक क्षण में मार डाला ॥ ५५ विदित्वैवं न सन्त्रासः कर्त्तव्यो विनिवर्त्तत । ततो निवृतास्ते दैत्यास्त्यक्त्वा मरणजं भयम् ।। ५६
यह बात जानकर कि कोई भय नहीं है अपने-अपने कर्तव्य पर लौटो | मरने के भय को त्याग कर वे दैत्य रण करने को लौटे ॥ ५६ ॥
इति शुक्रवचः सत्यंकृतमेभिः खगोत्तमैः । ये युद्ध ऽपि न सम्प्राप्ताः पञ्चत्वमतिमानुषे ||७||
इन उत्तम पक्षियों ने शुक्राचार्य का वचन सत्य कर दिखाया कि युद्ध में रहकर भी ये मृत्यु को प्राप्त न हुए || ५७ ॥
काण्डानां पतनं विमा: क घण्टापतनं समम् कच मांस वसा रक्तर्भूमेरास्तरणक्रिया ॥ ५८ ॥
है ब्राह्मणी ! कहाँ अण्डों का गिरना कहाँ घण्टे का गिरना और कहाँ मांस, मज्जा व रुधिर से भरी हुई पृथ्वी में इनका बचना ॥ ५८ ॥
केऽप्येते सर्व्वथा विमा नैते सामान्यपक्षिणः । देवानुकूलता लोके महाभाग्यप्रदर्शिनी ॥ ५६
हे ब्राह्मणो ! सर्वथा ये साधारण पक्षी नहीं हैं, इस संसार में दैव की अनुकूलता बड़े सौभाग्य की द्योतक है ॥ ५६ ॥ एवमुक्त्वा स तान वीक्ष्य पुनर्वचनमब्रवीत् । निवर्त्तताश्रमं यात गृहीत्वा पक्षिवालकान् ॥६०॥
यह कहकर उन बच्चों की ओर देखकर उन बालकों को लेकर अपने आश्रम को लौट गये और बोले ||०||
मार्जाराखुभयं यत्र नैषामण्डजजन्मनाम् । श्येनतो नकुलाद्वापि स्थापयन्तां तत्र पक्षिणः ॥ ६१
जहाँ पर विल्ली, मूषक, वाज व नकुल रहते हों वहाँ इन पक्षियोंकी स्थिति ठीक नहीं ॥ ६१ ॥
द्विजाः किं वातियत्नेन माय्र्यन्ते कर्मभिः स्वकैः । रक्ष्यन्त चाखिला जीवा यथैते पक्षिवालकाः ६२||
हे ब्राह्मणो ! बहुत यत्न करने से क्या होता है ? सम्पूर्ण जीवों की रक्षा अपने कर्म से होती है, जिस प्रकार ये पक्षी - चालक अपने भाग्य से जीवित हैं ॥ ६२ ॥
तथापि यत्नः कर्त्तव्यो नरैः सर्वेषु कर्मसु । कुर्व्वन् पुरुषकारन्तु वाच्यतां याति नो सताम् ६३ ||
तथापि सब कर्मों में यत्न अवश्य करना चाहिये । यत्न करने से मनुष्य के प्रति कुछ कहना शेष नहीं रहता है ॥ ६३ ॥
इति मुनिवरचोदितास्ततस्ते मुनितनयाः परि- गृह्य पक्षिणस्तान् । तरुविटपसमाश्रितालिसङ्घ ययुरथ तापसरम्यमाश्रमं स्वम् ||६४ ||
इस प्रकार मुनि शमीक द्वारा कहे जाने पर वे शिष्यगण - उन पक्षियों को अनेक वृक्षों से सुशोभित अपनेश्राश्रम में ले श्राये ॥ ६४ ॥
स चापि वन्यं मनसाभिकामितं प्रगृह्य मूलं कुसुमं फलं कुशान्। चकार चक्रायुध-रुद्र-धर्मा सुरेन्द्र - वैवस्वत- जातवेदसाम् ||६५||
उन्होंने भी वनके फूल, मूल, फल कुशों आदि से प्रसन्न मन होकर विष्णु, रुद्र बह्मा, इन्द्र, सूर्य, अग्नि तथा ॥ ६५ ॥ श्रपाम्पतेगांप्पतिवित्तरक्षिणोः समीरणस्यापि तथा द्विजोत्तमः । धातुर्विधातुस्त्वथ वैश्वदेविका: श्रुतिप्रयुक्ता विविधास्तु सत्क्रियाः ॥ ६६ ॥ वरुणः बृहस्पति, कुबेर, पवन, धाता विधाता श्रर्थात् ब्रह्मा व विश्वदेवियों की अनेक क्रियाओं से वेदविहित पूजा की ॥ ६६ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में चटकोत्पत्ति नाम द्वितीय अध्याय समाप्त ।
Summary of chapter 2 of the Mārkandeya Mahā Purana is as follows:
The sacred lineage and miraculous origin of the four righteousness-abiding birds are revealed as a testament to karmic destiny and divine protection. Born on the battlefield of Kurukshetra when a heavy war-bell fell from an royal elephant and sheltered their egg-nest, these nestlings were raised under the compassionate care of Maharshi Shamīka. Through the spiritual power of the sage and their former life as sons of Ṛshi Sukṛsha cursed by Muni Durvāsas, they retained sacred knowledge and articulate human speech. When Jaimini arrives at their peaceful cavern in the Vindhya range, the noble birds receive him with profound reverence and prepare to unravel the subtle mysteries of righteousness.