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नारायणं नमस्कृत्य नरचैव नरोत्तमम् देवीं सरस्वतींचैव ततो जयमुदीरयेत्

तपःस्वाध्यायनिरतं मार्कण्डेयं महामुनिम् व्यासशिष्यो महातेजा जैमिनिः पर्य्यपृच्छत

श्रीनारायण, नरों में श्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा व्यासको नमस्कार करके जयरूप इस ग्रन्थका वर्णन करता हूँ व्यासजी के शिष्य, परमं तेज वाले जैमिनि ऋषि ने तप और धर्म में संयुक्त  महामुनि श्रीमार्कण्डेयजीसे पूछा ॥१॥

भगवन् भारताख्यानं व्यासेनोक्तं महात्मना पूर्णमस्तमलैः शब्दैर्नानाशास्त्रसमुच्चयैः

हे महात्मन् ! अनेक विमल एवं सुन्दर शास्त्रों के समूह से युक्त भारत श्राख्यान नाम महाभारत कथा को भगवान व्यास ने कहा है || २ || जातिशुद्धिसमायुक्त साधुशब्दोपशोभितम् पूर्वपक्षोक्तिसिद्धान्त-परिनिष्ठासमन्वितम् ३।।

वह प्राचीनतायुक्त, पवित्र तथा पूर्वापर उक्तियों और सिद्धान्तों से परिपूर्ण है

' त्रिदशानां यथा विष्णुद्विपदां ब्राह्मणो यथा भूपणानांच सर्व्वेषां यथा चूड़ामणिवरः ४।।

जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, मनुष्यों में ब्राह्मण और सब भूषणोंमें श्रेष्ठ चूड़ामणि यथायुधानां कुलिशमिन्द्रियाणां यथा मनः तथेह सर्व्वशास्त्राणां महाभारतमुत्तमम्

तथा जिस प्रकार शस्त्रों में वज्र और इन्द्रियों में मन उत्तम है उसी प्रकार सव शास्त्रों में महाभारत उत्तम है चैव धर्म्म कामो मोक्षश्च वर्ण्यते परस्परानुवन्धाश्च सानुबन्धाश्च ते पृथक्

और यहाँ ( महाभारत में ) धर्म, श्रर्थ, काम, मोक्ष आदि चारों पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध का पृथक पृथक वर्णन है धर्मशास्त्रमिदं श्रेष्ठमर्थशास्त्रमिदं परम् कामशास्त्रमिदञ्चाग्र्यं मोक्षशास्त्रं तथोत्तमम्

यही धर्मशास्त्र है, यही श्रेष्ठ अर्थशास्त्र तथा काम शास्त्र और उत्तम मोक्ष शास्त्र है चतुराश्रमधर्माणामाचारस्थितिसाधनम् प्रोक्तमेतन्महाभाग वेदव्यासेन धीमता

हे महाभाग ! महावुद्धिमान् वेदव्यास ने इसमें चारों श्राश्रमों धर्म, आचार व साधन का वर्णन किया है तथा तात कृतं ह्येतदव्यासेनोदारकर्म्मणा यथा व्याप्तं महाशास्त्रं विरोधैर्नाभिभूयते

हे तात ! उदार आशय वाले व्यासजी ने इसका ऐसा निर्माण किया है कि यह सर्वत्र व्याप्त है तथा इसका किसी महाशास्त्र से विरोध नहीं है व्यासवाक्यजलौघेन कुतर्कतरुहारिणा वेदशैलावतीर्णेन नीरजस्का मही कृता १०

व्यासजी का वाक्य एक नदी के समान है जो कुतर्करूपी वृक्षों को उखाड़ कर फेंक देती है श्रीरजो वेदरूपी पर्वत से निकल कर पृथ्वी को धूलि - रहित करती है १०

कलशब्दमहाहंसं महाख्यानपराम्बुजम् कथाविस्तीर्णसलिलं काष्र्णं वेदमहाहृदम् ११॥ उस कथा के सुन्दर वाक्य ( नदी के ) हंसों के समान हैं, बड़े-बड़े इतिहास कमलों के समान हैं, कथा फैले हुए जल के सदृश है तथा सम्पूर्ण वेद उसका हृदय रूप है ११

तदिदं भारताख्यानं बहर्थं श्रुतिविस्तरम्

“तत्त्वती ज्ञातुकामोऽहं भगवंस्त्वामुपस्थितः ॥१२॥

हे भगवन् ! मैं उस महाभारत की कथा को जो बहुत अर्थी से पूर्ण तथा वेद और विस्तार - युक्त है तत्वरूप से जानने के लिए आपके पास उपस्थित हुआ हूँ १२ "कस्मान्मानुषतां प्राप्तो निर्गुणोऽपि जनार्द्दनः वासुदेवो जगत्सूति-स्थिति- संयमकारणम् ||१३||

जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संयम के आदि कारण जनार्दन ने निर्गुण होते हुए भी किस प्रकार मनुष्य का छात्र- तार लिया और वासुदेव कहलाये १३ कस्माच पाडुपुत्त्राणामेका सा द्रुपदात्मजा पञ्चानां महिषी कृष्णाात्र नः संशयो महान् १४

और राजा द्रुपद की पुत्री कृष्णा श्रर्थात् द्रौपदी किस प्रकार पाण्डु के पाँचों पुत्रों की रानी हुई इसमें ..हमको बड़ा सन्देह है १४

भेषजं ब्रह्महत्याया बलदेवो महाबलः तीर्थयात्राप्रसंगेन कस्मान्चक्रे हलायुधः || १५ ||

और महाबलवान् वलदेवजी ने तीर्थ यात्रा करके किस प्रकार ब्रह्म- हत्यारूपी रोग की औषधि की १ १५ कथञ्च द्रौपदेयास्तेऽकृतादारा महारथाः पाण्डुनाथा महात्मानो वधमापुरनाथवत् ॥१६॥

और द्रौपदी के पाँचों विवाहित कुमार जिनके श्रभिः भावक महारथी पाण्डवं थे किस प्रकार अनाथों की तरह मार दिये गये १६ एतत् सर्व्वं विस्तरशो ममाख्यातुमिहार्हसि १भवन्तो मूढबुद्धीनामवबोधकराः सदा १७:

वह सब ( कथा ) आप मुझसे विस्तार पूर्वक कहने के योग्य हैं । आप सदा मूर्खो को ज्ञान देने वाले हैं १७ इति तस्य वचः श्रुत्वा मार्कण्डेयो महामुनिः दशाष्टदोषरहितो वक्तु ं समुपचक्रमे ॥१८॥ उनके यह वचन सुनकर महामुनि मार्कण्डेय अठारहों दोषों से रहित वचन जैमिनि ऋषि से बोले ॥१८॥

मार्कण्डेय उवाच क्रियाकालोऽयमस्माकं सम्प्राप्तो मुनिसत्तम विस्तरे चापि वक्तव्ये नैष कालः प्रशस्यते १६

मार्कण्डेय बोले- हे मुनिश्रेष्ठ ! यह हमारे अनेक कार्य करने का है १६ 'ये तु वक्ष्यन्ति वक्ष्येऽद्य तानहं जैमिने तव तथा च नष्टसन्देहं त्वां करिष्यन्ति पक्षिणः ||२०||

हे जैमिनि ! जो कथा श्राप मुझसे समय है यह समय विस्तार पूर्वक कहने का नहीं- कहलवाना चाहते हैं वह कथा मेरी ही सश पक्षीगण आपको सुनाकर श्रापका सन्देह दूर करेंगे २० पिङ्गाक्षच विबोधश्च सुपुत्त्रः सुमुखस्तथा द्रोणपुत्राः खगश्रेष्ठास्तत्त्वज्ञाः शास्त्र चितकाः || २१

वे श्रेष्ठ पक्षी पिङ्गाक्ष, विवोध, सुपुत्र और सुमुख नाम वाले तथा शास्त्र के चिन्तक हैं २१ वेदशास्त्रार्थविज्ञाने येषामव्याहता मतिः विन्ध्यकन्दरमध्यस्थास्तानुपास्य च पृच्छ च ||२२||

वेद शास्त्र के विज्ञान में उनकी बुद्धि श्रगाध है, वे विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में रहते हैं उनके पास जाकर पूछो २२

एवमुक्तस्तदा तेन मार्कण्डेयेन धीमता प्रत्युवाचर्षिशार्दूलो विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥२३॥

परम विद्वान् मार्कण्डेयजी से यह सुनकर ऋषि श्रेष्ठ जैमिनि के नेत्र आश्चर्य से चकित होगये और वे बोले ॥२३॥

जैमिनिरुवाच अत्यनुतमिदं ब्रह्मन् खगवागिव मानुपी यत् पक्षिणस्ते विज्ञानमापुरत्यन्तदुर्लभम् ॥२४॥

जैमिनि वोले- हे ब्रह्मन् ! यह अत्यन्त श्राश्वर्य की बात है किपक्षियों की बोली मनुष्यों की सी है ऐसे विज्ञानी पक्षी पाना बड़ा दुर्लभ है २४

तिर्य्यग्योन्यां यदि भवस्तेषां ज्ञानं कुतोऽभवत् कथञ्च द्रोणतनयाः प्रोच्यन्ते ते पतत्रिणः ||२५||

पक्षियोनि में उत्पन्न होकर उनको ज्ञान किस प्रकार हुआ और वे पक्षी द्रोण के पुत्र किस प्रकार कहलाये २५॥

'कश्च द्रोणः प्रविख्यातो यस्य पुत्रचतुष्टयम् जातं गुणवतां तेषां धर्म्मज्ञानं महात्मनाम् ||२६||

और यह द्रोण कौन है जिसके चारों पुत्र इतने गुणवान, धर्मात्मा, ज्ञानी तथा महात्मा हुए ॥२६॥

मार्कण्डेय उवाच मृणुष्वावहितो भूत्वा यद्वृत्तं नन्दने पुरा

शक्रस्याप्सरसांचैव नारदस्य च सङ्गमे २७||

मार्कण्डेय बोले- ध्यान से सुनो, एक वार प्राचीन काल मेंइन्द्र अप्सरात्रों के साथ नन्दन बन में थे कि. दैवात् नारदजी का भी वहाँ समागम होगया ||२७||

नारदो नन्दनेऽपश्यत् पुंश्चलीगणमध्यगम् शक्रं सुराधिराजानं तन्मुखासक्तलोचनम् ||२८||

नारद ने नन्दन वन में देखा कि देवराज इन्द्र अप्सरात्रों के मध्य में बैठकर उनके मुखों को आसक्त हुए नेत्रों से देख रहे हैं २८ स तेनर्षिवरिष्ठेन दृष्टमात्रः शचीपतिः समुत्तस्थौ स्वञ्चास्मै ददावासनमादराद ||||

इन्द्र ने नारद ऋषि को देखते ही उठकर उनको सम्मान पूर्वक अपना आसन स्वयं दिया तं दृष्ट्वा बलवृत्रघ्नमुत्थितं त्रिदशाङ्गनाः प्रणेमुस्ताश्च देवर्षि विनयावनताः स्थिताः ३०||

और अप्सराओं ने भी वलवृत्र के मारने वाले इन्द्र को प्रणाम किया ३० ताभिरभ्यर्चितः सोऽयमुपविष्टे शतक्रतौ यथार्ह कृतसम्भाषः कथाश्चक्रे मनोरमाः ||३१||

अप्सराओं से वन्दित होकर उठते देखकर बड़ी विनयपूर्वक देवर्षि नारद को नारदजी बैठगये और इन्द्र ने उनकी पूजा कर मनोहर वार्तालाप से उनका सत्कार किया ३१ ततः कथान्तरे शक्रस्तमुवाच महामुनिम् देह्याज्ञां नृत्यतामासां तव याभिमतेति वै ३२

वातचीत करने के बाद इन्द्र ने महर्षि नारद से श्रप्सराओंका गायन व नृत्य सुनाया तथा दिखाया कहा "श्राज्ञा दीजिये कि आपको इच्छानुसार जावे" ३२॥ रम्भा वा मिश्रकेशी वा उर्व्वश्यथ तिलोत्तमा घृताची मेनका वापि यत्र वा भवतो रुचिः ||३३|

रम्भा, मिश्रकेशी, उर्वशी, तिलोत्तमा, घृताची अथवा मेनका जिसपर भी आपकी रुचि हो ३३

एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठो वचो शक्रस्य नारदः विचिन्त्याप्सरसः प्राह विनयावनताः स्थिताः ३४

इन्द्र का यह वचन सुनकर द्विजश्रेष्ठ श्रों के प्रति बोले ३४

युष्माकमिह सर्व्वासां रूपौदार्य्यगुणाधिकम् आत्मानं मन्यते या तु सा नृत्यतु ममाग्रतः॥ ३५

तुम सब में से जो अपने नारद विचार करके विनयपूर्वक बैठी हुई अप्सरा- को रूप, श्रदार्य और गुणों की अधिकता में श्रेष्ठ मानती हो वह मेरे आगे नृत्य करे ३५ गुणरूपविहीनायाः सिद्धिर्नाट्यस्य नास्ति वै चार्व्वधिष्ठानवन्नत्यं नृत्यमन्यद्विडम्बनम् ॥३६॥

गुण और रूप से विहीन नृत्य अच्छा नहीं होता । श्रन्यथा विडम्बना अर्थात् नकल मात्र है   नृत्य वही है जो गुण, रूप, ध्वनि यादि से युक्त है ॥ ३६ मार्कण्डेय उवाच तद्वाक्यसमकालञ्च एकैकास्ता नतास्ततः अहं गुणाधिका न त्वं न त्वं चान्याऽब्रवीदिदम् ३७||

मार्कण्डेय बोले- नारद के समयानुसार वचन सुनकर अप्सराएँ एक दूसरे के प्रति कहने लगीं 'मैं तुमसे अधिक गुणवान् हूँ' दूसरी कहतीथी कि तू नहीं मैं हूँ ॥३७॥ तासां सम्भ्रममालोक्य भगवान् पाकशासनः पृच्छयतां मुनिरित्याह वक्तायांवोगुणाधिकाम् ३८ ||

राजा इन्द्र ने उनका विभ्रम देखकर नारदजी से कहा कि आपही वताइये कि इन सप में अधिक गुणवाली कौन है ३८ शक्रच्छन्दानुयाताभिः पृष्टस्ताभिः स नारदः प्रोवाच यत् तदा वाक्यं जैमिने तन्निबोध में ।।

इन्द्र के शब्द सुनने पर तथा अप्सराओं द्वारा पूछे जाने पर नारद ने जो वाक्य कहे हे जैमिनि ! वै मुझसे सुनो ॥॥ तपस्यन्तं नगेन्द्रस्थं या वः क्षोभयते बलात् दुर्वाससं मुनिश्रेष्ठं तां वो मन्ये गुणाधिकाम् ४०

सव पर्वतों में श्रेष्ठ पर्वत पर तप करते हुए दुर्वासामुनि को जो अप्सरा अपने मन से लुभा ले नही सबसे श्रधिक गुणवाली समझी जावेगी || ४० तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्व्वा वेपितकन्धराः अशक्यमेतदस्माकं द्वन्द्वशथक्रिरे कथाः ४१

नारदजी की यह बात सुनकर सब अप्सराएँ कम्पित होगई और कहने लगीं कि यह बात हमारी सामर्थ्य से वाहर है ४१ तत्राप्सरा वपुर्नाम मुनिक्षोभणगर्विता प्रत्युवाचाद्य यास्यामि यत्रासौ संस्थितो मुनिः ४२।।

फिर बपु नाम अप्सरा जिसकी कि बहुत से मुनियों को लुभा लेनेका गर्व था वोली और "जहाँ वह मुनि है वहाँ मैं जाऊँगी” ४२ अयं तं 'देहयन्तारं प्रयुक्तेन्द्रियवाजिनम्

स्मरशस्त्रगलद्रश्मिं करिष्यामि कुसारथिम् ४३ | कहा कि मैं ऋषि की देह में अपने इन्द्रियरूपी अश्व जोत कर कामदेव के वाणों का बाग लगा कर उनको कुसारथी बनाऊँगी ४३ ब्रह्मा जनार्द्दनो वापि यदि वा नीललोहितः 'तमप्यद्य करिष्यामि कामवाणक्षतान्तरम् ||४४ |

यदि ब्रह्मा, विष्णु अथवा शिव भी हों तो उनको भी काम- वारणों से वेधन करूँगी ४४ इत्युक्त्वा जगामाथ प्रालेयाद्रिं वपुस्तदा मुनेस्तपःप्रभावेण प्रशान्तश्वापदाश्रमम् ||||

यह कहकर वह अप्सरा प्रालेय पर्वत पर दुर्वासा ऋषि के आश्रम पर जो कि ऋषि के तप के प्रभाव से आपत्तियों से रहित था, गई ४५ सा पुंस्कोकिलमाधुर्य्या यत्रास्ते स महामुनिः क्रोशमात्रं स्थिता तस्माद्गायत वराप्सराः || ४६ ||

जहाँ दुर्वासा मुनि थे वहाँ से एक कोस की दूरी पर वह अप्सरा कोकिल के समान सधुरता से गायन करने लगी ||४६ तद्गीतध्वनिमाकर्ण्य मुनिर्विस्मितमानसः जगाम तत्र यत्रास्ते सा वाला रुचिरस्वना ||४७ ||

उसके गीत की ध्वनि सुनकर आश्चर्य मन वाले वे मुनि जहाँ वह सुन्दर मुखवाली थी वहाँ गये ४७ तांडा चारुसर्वाङ्गीं मुनिः संस्तभ्य मानसम् क्षोभणायागतां ज्ञात्वा कोपामर्षसमन्वितः ॥४८॥

उस पूर्णाही अप्सरा को देखकर मुनि स्तम्भित होगये फिर अपने लुभाये जानेका कारण जानकर क्रोधयुक्त होगये ४८ उवाचेदं ततो वाक्यं महर्षिस्तां महातपाः  

और फिर उन तपस्वी महर्षि ने उससे इस प्रकार कहा || यस्माद्वदुःखाज्जितस्येह तपसो विघ्नकारणात् 'प्रगतासि मदोन्मत्ते मम दुःखाय खेचरि ||५०॥

हे आकाश में विचरने वाली मूर्खे ! यद्यपि तू मुझे दुःख देने तथा मेरे तप में विघ्न डालने के लिये आई है तथापि तूने अपने ही लिये दुःख उत्पन्न किया है तस्मात् सुपर्णगोत्रे त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता जन्म प्राप्स्यसि दुष्पज्ञे यावर्षाणि षोडश ५१

अतः तू मेरे क्रोध से कलङ्कित होकर सुपर्ण पक्षीके गोत्र में जन्म लेकर सोलह वर्ष तक जीवित रहेगी ५१

निजरूपं परित्यज्य पक्षिणीरूपधारिणी ' चत्वारस्ते च तनया जनिष्यन्तेऽधमाप्सरः ||  हे नीच अप्सरा ! अपने स्वरूप को छोड़कर तू पक्षी रूप धारण करेगी और तुमसे चार पुत्र उत्पन्न होंगे ५२ अमाप्य तेषु च प्रीतिं शस्त्रपूता पुनर्दिवि वासमाप्स्यसि वक्तव्यं नोत्तरं ते कथंचन ५३॥

फिर तू उनकी प्रीति छोड़कर किसी शस्त्र द्वारा मरण प्राप्त कर पवित्र होकर स्वर्ग में पहुँचेगी। इसके उत्तर में तुझको कुछ न कहना चाहिये ५३

इति वचनमसह्य' कोपसंरक्तदृष्टि- चलकलवलयां तां मानिनीं श्रावयित्वा

तरलतरतरङ्गां गां परित्यज्य विप्रः प्रथितगुणगणौघां सम्प्रयातः खगङ्गाम्॥ ५४

क्रोध से रक्तवर्ण. नेत्र होरहे हैं जिनके ऐसे दुर्वासा ऋषि के दुःसह वचनों को सुनकर वह अप्सरा कम्पायमान होगई और अपने सुन्दर स्वरूपको छोड़कर विप्र दुर्वासा द्वारा कथित पक्षी का रूप होगई ५४ इति श्रीमार्कण्डेयपुराण में वपु शाप नाम प्रथम अध्याय समाप्त