ब्रह्म महा पुराण
98 - युगान्तकालकी अवस्थाका निरूपण
मुनियोंने कहा- धर्मज्ञ हमलोग धर्मको लालसासे अब उस कलिकालके समीप आ पहुँचे हैं, जब कि स्वल्प कर्मके द्वारा हम सुखपूर्वक उत्तम धर्मको प्राप्त कर सकते हैं। अब जिन निमित्तों (लक्षणों) - से धर्मका नाश और त्रास एवं उद्वेग करनेवाले युगान्तकालकी उपस्थिति जानी जाय, उसे बतानेकी कृपा करें।
व्यासजी बोले- ब्राह्मणो! युगान्तकालमें प्रजाकी रक्षा न करके केवल कर लेनेवाले राजा होंगे । वे अपनी ही रक्षामें लगे रहेंगे । उस समय प्रायः क्षत्रियेतर राजा होंगे ब्राह्मण शूद्रोंके यहाँ रहकर जीवन-निर्वाह करेंगे और शूद्र ब्राह्मणोंके आचारका पालन करनेवाले होंगे युगान्तकाल आनेपर श्रोत्रिय तथा काण्डपृष्ठ (अपने कुलका त्याग करके दूसरे कुलमें सम्मिलित हुए पुरुष) एक पंक्ति में बैठकर यज्ञकर्मसे हीन हविष्य भोजन करेंगे। मनुष्य अशिष्ट , स्वार्थपरायण , नीच तथा मद्य और मांसके प्रेमी होकर मित्र - पत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले होंगे चोर राजाकी वृत्तिमें रहकर अपना काम करेंगे और राजा चोरोंका - सा बर्ताव करेंगे । सेवकगण स्वामीके दिये बिना ही उसके धनका उपभोग करनेवाले होंगे । सबको धनको ही अभिलाषा होगी । साधु - संतोंके बर्तावका कहीं भी आदर होगा । पतित मनुष्यके प्रति किसीके मनमें घृणा न होगी । पुरुष नकटे , खुले केशवाले होंगे । स्त्रियाँ सोलह वर्षको आयुके पहले ही और कुरूप बच्चोंकी माँ बन जायँगी। युगान्तमें स्त्रियाँ धन लेकर पराये पुरुषोंसे समागम करेंगी । सभी द्विज वाजसनेयी (बृहदारण्यक उपनिषद्के ज्ञाता) बनकर ब्रह्मकी बात करेंगे । शूद्र तो वक्ता होंगे और ब्राह्मण चाण्डाल हो जायँगे । शूद्र शठतापूर्ण बुद्धिसे जीविका चलाते हुए मुँड - मुँड़ाकर गेरुआ वस्त्र पहने धर्मका उपदेश करेंगे । युगान्तके समय शिकारी जीव अधिक होंगे, गौओंकी संख्या घटेगी और साधुओंके स्वभावमें परिवर्तन होगा चाण्डाल तो गाँव या नगरके बीचमें बसेंगे और बीचमें रहनेवाले ऊँचे वर्णके लोग नगर या गाँवसे बाहर बसेंगे । विधान सारी प्रजा लज्जाको तिलाञ्जलि दे उच्छृङ्खलतापूर्ण बर्तावसे नष्ट हो जायगी दो सालके बछड़े हलमें जोते जायेंगे और मेघ कहीं वर्षा करेगा , कहीं नहीं करेगा । शूरवीरके कुलमें उत्पन्न हुए सब लोग पृथ्वीके मालिक होंगे । प्रजावर्गके सभी मानव निम्नश्रेणीके हो जायेंगे । प्रायः कोई मनुष्य धर्मका आचरण नहीं करेगा । अधिकांश भूमि ऊसर हो जायगी सभी मार्ग बटमारोंसे घिरे होंगे । सभी वर्णोंके लोग वाणिज्य वृत्तिवाले होंगे । पिताके धनको उनके दिये बिना ही लड़के आपसमें बाँट लेंगे , उसे हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और लोभ आदि कारणोंसे वे परस्परविरोधी बने रहेंगे । सुकुमारता , रूप और रक्तका नाश हो जानेसे नारियाँ बालोंसे ही सुसज्जित होंगी । उनमें वीर्यहीन गृहस्थकी रति होगी । युगान्तकालमें पत्नीके समान दूसरा कोई अनुरागका पात्र नहीं होगा । पुरुष थोड़े हों और स्त्रियाँ अधिक , यह युगान्तकालकी पहचान हैI संसारमें याचक अधिक होंगे और एक - दूसरेसे याचना करेंगे। किंतु कोई किसीको कुछ न देगा।सब लोग राजदण्ड , चोरी और अग्निकाण्ड आदिसे क्षीण होकर नष्ट हो जायेंगे। खेतीमें फल नहीं लगेंगे । तरुण पुरुष अकर्मण्य होंगे बुड्ढोंकी तरह आलसी और जो शील और सदाचारसे भ्रष्ट हैं , ऐसे लोग सुखी होंगे । वर्षाकालमें जोरसे आँधी चलेगी और पानीके साथ कंकड़ - पत्थरोंको वर्षा होगी । युगान्तकालमें परलोक संदेहका विषय हो जायगा । क्षत्रिय वैश्योंकी भाँति धन - धान्यके व्यापारसे जीविका चलायेंगे। युगान्तकालमें कोई किसीसे बन्धु-बान्धवका नाता नहीं निभायेगा । प्रतिज्ञा और शपथका पालन नहीं होगा । प्रायः लोग ऋणको चुकाये बिना ही हड़प लेंगे । लोगोंका हर्ष निष्फल और क्रोध सफल होगा । दूधके लिये घरमें बकरियाँ बाँधी जायेंगी । इसी प्रकार जिसका शास्त्रमें कहीं विधान नहीं है , ऐसे यज्ञका अनुष्ठान होगा। मनुष्य अपनेको पण्डित समझेंगे और बिना प्रमाणके ही सब कार्य करेंगे । जारज , क्रूर कर्म करनेवाले और शराबी भी ब्रह्मवादी और अश्वमेध-यज्ञ करेंगे।अभक्ष्य - भक्षण करनेवाले ब्राह्मण धनकी तृष्णासे यज्ञके अनधिकारियोंसे भी यज्ञ करायेंगे । कोई भी अध्ययन नहीं करेगा । तारोंकी ज्योति फीकी पड़ जायगी , दसों दिशाएँ विपरीत होंगी । पुत्र पिताको और बहुएँ सासको अपना काम करनेके लिये भेजेंगी । इस प्रकार युगान्तकालमें पुरुष और स्त्रियाँ ऐसा ही जीवन व्यतीत करेंगी । द्विजगण अग्निहोत्र और अग्राशन* किये बिना ही भोजन कर लेंगे । भिक्षा दिये बिना और बलिवैश्वदेव किये बिना ही लोग स्वयं भोजन करेंगे । स्त्रियाँ सोये हुए पतियोंको धोखा देकर अन्य पुरुषोंके पास चली जायँगी ।
मुनियोंने कहा — महर्षे ! इस प्रकार धर्मका नाश होनेपर मनुष्य कहाँ जायँगे ? वे कौन - सा कर्म और कैसी चेष्टा करेंगे ? वे किस प्रमाणको मानेंगे ? उनकी कितनी आयु होगी ? और किस सीमातक पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त करेंगे?
व्यासजी बोले- मुनिवरो! तदनन्तर धर्मका नाश होनेसे समस्त प्रजा गुणहीन होगी शीलका नाश हो जानेसे सबकी आयु घट जायगी । आयुकी हानिसे बलकी भी हानि होगी बलकी हानिसे शरीरका रंग बदल जायगा । फिर शरीरमें रोगजनित पीड़ा होगी । उससे निर्वेद
(वैराग्य) होगा । निर्वेदसे आत्मबोध होगा और आत्मबोधसे धर्मशीलता आयेगी I इस प्रकार अन्तिम सीमापर पहुँचकर लोगोंको सत्ययुगकी प्राप्ति होगी । कुछ लोग लोग कोई उद्देश्य लेकर धर्मका आचरण करेंगे , कोई मध्यस्थ रहेंगे थोड़ी मात्रा में धर्मका आचरण करेंगे प्रति केवल कौतूहल रखेंगे I कुछ लोग प्रत्यक्ष और अनुमानको ही प्रमाण मानेंगे । दूसरे लोग सबको अप्रमाण ही मानेगे I कोई नास्तिकतापरायण , कोई धर्मका लोप करनेवाले और कोई द्विज अपनेको पण्डित माननेवाले होंगे Iयुगान्तकालके मनुष्य वर्तमानपर ही विश्वास करनेवाले , शास्त्रज्ञानसे रहित , दम्भी और अज्ञानी होंगे । इस प्रकार धर्मकी डाँवाडोल परिस्थितिमें श्रेष्ठ पुरुष दान और शीलरक्षामें तत्पर हो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करेंगे I जब जगत्के मनुष्य सर्वभक्षी हो जायँ , स्वयं ही आत्मरक्षा के लिये विवश हों - राजा आदिके द्वारा उनकी रक्षा असम्भव हो जाय , जब उनमें निर्दयता और निर्लज्जता आ जाय , तब उसे कषायका लक्षण समझना चाहिये। ( क्रोध - लोभ आदिके विकारको कषाय कहते हैं । युगान्तकालमें वह पराकाष्ठाको पहुँच जाता है । ) मुनिवरो ! जब छोटे वर्णोंके लोग ब्राह्मणोंकी सनातन | वृत्तिका आश्रय लेने लगें , तब वह भी कषायका ही लक्षण है । युगान्तकालमें बड़े - बड़े भयंकर युद्ध , बड़ी भारी वर्षा , प्रचण्ड आँधी और जोरोंकी गर्मी पड़ेगी । यह सब कषायका लक्षण है । लोग खेती काट लेंगे , कपड़े चुरा लेंगे , पानी पीनेका सामान और पेटियाँ भी चुरा ले जायँगे कितने ही चोर ऐसे होंगे , जो चोरकी सम्पत्तिका भी अपहरण करेंगे । हत्यारोंकी भी हत्या करनेवाले लोग होंगे । चोरोंके द्वारा चोरोंका नाश हो जानेपर जनताका कल्याण होगा । युगान्तकालमें मर्त्यलोकके मनुष्योंकी आयु अधिक - से - अधिक तीस वर्षकी होगी । लोग दुर्बल , विषय सेवनके कारण कृश तथा बुढ़ापे और शोकसे ग्रस्त होंगे । उस समय रोगोंके कारण उनकी इन्द्रियाँ क्षीण हो जायँगी I फिर धीरे - धीरे लोग साधु पुरुषोंकी सेवा , दान , सत्य एवं प्राणियोंकी रक्षामें तत्पर होंगे। इससे धर्मके एक चरणकी स्थापना होगी । उस धर्मसे लोगोंको कल्याणको प्राप्ति होगी। लोगो के गुणों में परिवर्तन होगा और धर्मसे लाभ होनेका अनुमान दृढ़ होता जायेगा I फिर श्रेष्ठ क्या है , इस बात पर विचार करनेसे धर्म ही श्रेष्ठ दिखायी देगा। जिस प्रकार क्रमशः धर्मकी हानि हुई थी , उसी प्रकार धीरे - धीरे प्रजा धर्मकी वृद्धिको प्राप्त होगी। प्रकार धर्मको पूर्णरूपसे अपना लेनेपर सब लोग सत्ययुग देखेंगे । सत्ययुगमें सबका व्यवहार अच्छा होता है और युगान्तकालमें साधु - वृत्तिकी हानि बतायी जाती है । ऋषियोंने प्रत्येक युगमें देश कालकी अवस्था के अनुसार पुरुषोंकी स्थिति देखकर उनके अनुरूप आशीर्वाद कहा है । धर्म , अर्थ काम और मोक्षके साधन, देवताओंकी प्रतिक्रिया, पुण्य एवं शुभ आशीर्वाद तथा आयु- ये प्रत्येक युगमें अलग - अलग होते हैं । युगोंके परिवर्तन भी चिरकालसे चलते रहते हैं । उत्पत्ति और संहारके द्वारा नित्य परिवर्तनशील यह संसार कभी क्षणभरके लिये भी स्थिर नहीं रहता।
* बलिवैश्वदेव करके अतिथि आदिके लिये पहले ही जो अत्र निकाल दिया जाता है
वह 'अप्राशन' कहलाता है ।
Summary of chapter 96 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
The sons born to Kṛṣṇa from his various queens are enumerated. Pradyumna and others born of Rukmiṇī, Sāmba and others born of Jāmbāvatī, and the sons of Satyabhāmā and other queens are named. The chapter describes the flourishing Yādava dynasty at Dvārakā, prosperous and renowned, whose many descendants of Kṛṣṇa establish branches of the divine lineage across the land.