ब्रह्म महा पुराण
15 - कोणादित्यकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं - भारतवर्ष में दक्षिण समुद्र के किनारे ओण्ड्र देश के नाम से विख्यात एक प्रदेश है, जो स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाला है। समुद्र से उत्तर विरज मण्डलतक का प्रदेश पुण्यात्माओं के सम्पूर्ण गुणों द्वारा सुशोभित है। उस देश में उत्पन्न जो जितेन्द्रय ब्राह्मण तपस्या एवं स्वाध्याय में संलग्न रहते हैं, वे सदा ही वन्दनीय एवं पूजनीय हैं। उस देश के ब्राह्मण श्राद्ध, दान, विवाह, यज्ञ अथवा आचार्य कर्म- सभी कार्यों के लिये उत्तम हैं। वे षट्कर्मपरायण, वेदों के पारंगत विद्वान्, इतिहासवेत्ता, पुराणार्थविशारद, सर्वशास्त्रर्थकुशल, यज्ञशील और राग-द्वेष से रहित होते हैं। कोई वैदिक अग्निहोत्र में लगे रहते और कोई स्मार्त अग्निकी उपासना करते हैं। वे स्त्री, पुत्र और धन से सम्पन्न, दानी और सत्यवादी होते हैं तथा याग्योत्सव से विभूषित पवित्र उत्कल देश में निवास करते हैं। वहाँ क्षत्रिय आदि अन्य तीन वर्णों के लोग भी परम संयमी, स्वकर्मपरायण, शान्त और धार्मिक होते हैं। उक्त प्रदेश में भगवान् सूर्य कोणादित्य के नाम से विख्यात होकर रहते हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
मुनियों ने कहा - सुरश्रेष्ठ! पूर्वोक्त ओण्ड्र देश में जो सूर्य का क्षेत्र है, जहाँ भगवान् भास्कर निवास करते हैं, उसका वर्णन कीजिये। इस समय हम उसे ही सुनना चाहते हैं।
ब्रह्माजी बोले - मुनिवरो! लावणसमुद्र का उत्तरतट अत्यन्त मनोहर और पवित्र है। वह सब ओर वालुकाराशि से आच्छादित है। उस सर्वगुणसम्पन्न प्रदेश में चम्पा, अशोक, मौलसिरी, करवीर (कनेर), गुलाब, नागकेसर, ताड़, सुपारी, नारियल, कैथ और अन्य नाना प्रकार के वृक्ष चारों ओर शोभा पाते हैं। वहाँ भगवान् सूर्य का पुण्यक्षेत्र है, जो सम्पूर्ण जगत् में विख्यात है। उसका विस्तार सब ओर से एक योजन से अधिक है। वहाँ सहस्त्र किरणों से सुशोभित साक्षात् भगवान् सूर्य निवास करते हैं, वे 'कोणादित्य' के नाम से विख्यात एवं भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। वहाँ माघमास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को इन्द्रिय-संयमपूर्वक उपवास करे। फिर प्रात:काल शौच आदि से निवृत्त एवं विशुद्धचित्त हो सूर्यदेव का स्मरण करते हुए विधिपूर्वक समुद्र में स्नान करे। देवता, ऋषि और मनुष्यों का तर्पण करे। तत्पश्चात् जल से बाहर आकार दो स्वच्छ वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके पवित्रतापूर्वक सूर्योदय के समय समुद्र के तटपर पूर्वाभिमुख होकर बैठे। लाल चन्दन और जल से ताँबे के पात्र में एक अष्टदल कमलकी आकृति बनाये, जो केसरयुक्त और गोलाकार हो। उसकी कर्णिका ऊपरकी ओर उठी हो। फिर तिल, चावल, जल, लाल चन्दन, लाल फूल और कुषा उस पात्र में रख दे। ताँबे का बर्तन न मिले तो मदार के पत्ते का दोना बनाकर उसी में तिल आदि रखे। उसे पात्र को एक दूसरे पात्र से ढककर रखे। इसके बाद हृदय आदि अङ्गोंके क्रम से अङ्गन्यास और करन्यास करके पूर्ण श्रध्दा के साथ अपने आत्मस्वरुप भगवान् सूर्य का ध्यान करे, पूर्वोक्त अष्टदल कमल के मध्यभाग में तथा अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान कोणों दलों में एवं पुन: मध्यभाग में क्रमशः प्रभूत, विमल, सार, आराध्य, परम और सुखरूप सूर्यदेव का पूजन करे। इसके अनन्तर वहाँ आकाश से सूर्यदेव का आवाहन करके कर्णिका के ऊपर उनकी स्थापना करे। तत्पश्चात् हाथों से सुमुख-संपुट आदि मुद्राएँ दिखाये। फिर देवता का स्नान आदि कराकर एकाग्रचित्त हो इस प्रकार ध्यान करे- भगवान् सूर्य श्वेत कमलके आसनपर तेजोमण्डल में विराजमान हैं। उनकी आँखें पिली और शरीर का रंग लाल है। उनके दो भुजाएँ हैं। उनका वस्त्र कमल के समान लाल है। वे सब प्रकार के शुभ लक्षणों से युक्त और सभी तरह के आभूषणों से विभूषित हैं। उनका रूप सुंदर है। वे वार देनेवाले, शांत एवं प्रभापुञ्ज से देदीप्यमान हैं। तदनन्तर उदयकाल में स्त्रिग्ध सिन्दूर के समान अरुण वर्णवाले भगवान् सूर्य का दर्शन करके अर्घ्यपात्र ले। उसे सिरके पास लगाये और पृथ्वीपर घुटने टेककर मौन हो एकाग्रचित्त से त्र्यक्षर-मन्त्रका उच्चारण करते हुए सूर्य को अर्घ्य दे। जिस पुरुष को दीक्षा नहीं दी गयी है, वह भावयुक्त श्रध्दा के साथ सूर्य का नाम लेकर ही अर्घ्य दे; क्योंकि भगवान् सूर्य भक्ति के द्वारा ही वश में होते हैं।
अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य एवं ईशान कोण, मध्यभाग तथा पूर्व आदि दिशाओं में क्रमशः हृदय, सर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्रकी पूजा करे।१ फिर अर्घ्य दे, गन्ध, धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन कर जप, स्तुति, नमस्कार तथा मुद्रा करके देवता का विसर्जन करे। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्र अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा संयमपूर्वक भक्तिभाव और विशुद्ध चित्त से भगवान् सूर्य को अर्घ्य देते हैं, वे मनोवाञ्छित भोगों क उपभोग करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।२ जो मनुष्य तीनों लोकों को प्रकाशित करनेवाले आकाशविहारी भगवान् सूर्य की शरण लेते हैं, वे सुखके भागी होते हैं। जबतक भगवान् सूर्य को विधिपूर्वक अर्घ्य न दे लिया जाय, तबतक श्रीविष्णु, शङ्कर अथवा इन्द्रका पूजन नहीं करना चाहिये। अत: प्रतिदिन पवित्र हो प्रयत्न करके मनोहर फूलों और चन्दन आदि के द्वारा सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिये। इस प्रकार जो सप्तमी तिथि को स्नान करके शुद्ध एवं एकाग्रचित्त हो सूर्य को अर्घ्य देता है, उसे मनोवाञ्छित फल प्राप्त होता है। रोगी पुरुष रोग से मुक्त हो जाता है, धन की इच्छा रखनेवाले को धन मिलता है, विद्यार्थी को विद्या प्राप्त होती है और पुत्र की कामना रखनेवाला मनुष्य पुत्रवान् होता है।
इस प्रकार समुद्र में स्नान करके सूर्य को अर्घ्य दे, उन्हें प्रणाम करे, फिर हाथ में फूल लेकर मौन हो सूर्य के मंदिर में जाय। मंदिर के भीतर प्रवेश करके भगवान् कोणादित्य की तीन बार प्रदक्षिणा करे और अत्यन्त भक्ति के साथ गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, साष्टाङ्ग, प्रणाम, जय-जयकार तथा सतोत्रों द्वारा उनकी पूजा करे। इस प्रकार सहस्त्र किरणों द्वारा मण्डित जगदीश्वर सूर्यदेवका पूजन करके मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञों का फल पाटा है। इतना ही नहीं, वह सब पापों से मुक्त हो दिव्य शरीर धारण करता है और अपने आगे-पीछे की सात-सात पीढ़ियों का उद्धार करके सूर्य के समान तेजस्वी एवं इच्छानुसार गमन करनेवाले विमानपर बैठकर सूर्यके लोक में जाता है। उस समय गन्धर्वगण उसका यशोगान करते हैं। वहाँ एक कल्पतक श्रेष्ठ भोगों का उपभोग करके पुण्य क्षीण होने पर वह पुन: इस संसार में आता और योगियों के उत्तम कुल में जन्म ले चारों वेदों का विद्वान्, स्वधर्मपरायण तथा पवित्र ब्राह्मण होता है। तदनन्तर भगवान् सूर्य से ही योग की शिक्षा प्राप्त करके मोक्ष पा लेता है। चैत्रमास के शुक्लपक्ष में भगवान् कोणादित्य की यात्रा होती है। यह यात्रा दमनभञ्जिका के नाम से विख्यात है। जो मनुष्य यह यात्रा करता है, उसे भी पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् सूर्य के शयन और जागरण के समय, संक्रान्ति के दिन, विषुव योग में, उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होने पर, रविवार को, सप्तमी तिथि को अथवा पर्व के समय जो जितेन्द्रिय पुरुष वहाँ की श्रद्धापूर्वक यात्रा करते हैं, वे सूर्यकी ही भाँति तेजस्वी विमान के द्वारा उनके लोक में जाते हैं। वहाँ (पूर्वोक्त क्षेत्र में) समुद्र के तटपर रामेश्वर नाम से विख्यात भगवान् महादेव जी विराजमान हैं, जो समस्त अभिलक्षित फलों के देनेवाले हैं। जो समुद्र में स्नान करके वहाँ श्रीरामेश्वर का दर्शन करते और गंद, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, नमस्कार, स्तोत्र, गीत और मनोहर वाद्यों द्वारा उनकी पूजा करते हैं, वे महात्मा पुरुष राजसूय तथा अश्वमेध-यज्ञों का फल पाते और परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
१. पूजनके वाक्य इस प्रकार हैं- 'ह्रां ह्रदयाय नम:, अग्निकोणे। ह्रीं शिरसे नम:, नैर्ॠत्ये। ह्रूं शिखायै नम:,'
वायव्ये। ह्रैं कवचाय नम:, ऐशाने। ह्रौं नेत्रत्रयाय नम:, मध्यभागे। ह्र: अस्त्राय नम:, चतुर्दिक्षु' इति।
२. ये वार्घ्यं सम्प्रयच्छन्ति सूर्याय नियतेन्द्रिया:। ब्राह्मणा; क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शुद्राश्च संयता:॥
भक्तिभावेन सततं विशुद्धेनान्तरात्मना। ते भुक्त्वाभिमतान् कामान् प्राप्नुवन्ति परां गतिम् ॥
(२८ । ३७-३८)
Summary of chapter 15 of the Brahma Mahā Purana is as follows:
Kṛṣṇa continues his effort to recover the Syamantaka. He encounters Jāmbavān in combat; after twenty-one days of fierce battle, Jāmbavān recognizes Kṛṣṇa as Rāma reborn and surrenders both the gem and his daughter Jāmbāvatī in marriage. Kṛṣṇa returns the jewel to Satrājit, who offers it back along with his daughter Satyabhāmā in marriage. The gem ultimately passes into Akrūra's keeping.