ब्रह्म पुराण

4 - राजा सगरका चरित्र तथा इक्ष्वाकुवंशके मुख्य-मुख्य राजाओंका परिचय

लोमहर्षणजी कहते हैं - राजकुमार सत्यव्रत भक्ति, दया और प्रतिज्ञावश विनयपूर्वक विश्वामित्रजी की स्त्री का पालन करने लगा। इससे मुनि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने सत्यव्रत से इच्छानुसार वार माँगने के लिये कहा। राजकुमार बोला- 'मैं इस शरीर के साथ ही स्वर्गलोक में चला जाऊँ।' जब अनावृष्टि का भय दूर हो गया, तब विश्वामित्र ने उसे पिता के राज्य पर अभिषिक्त करके उसके द्वारा यज्ञ कराया। वे महाततपस्वी थे, उन्होंने देवताओं तथा वसिष्ठ के देखते-देखते सत्यव्रत को शरीर सहित स्वर्गलोक में भेज दिया। उसकी पत्नी का नाम सत्यरथा था। केकयकुल की कन्या थी। उसने हरिश्चन्द्र नमक निष्पाप पुत्र को जन्म दिया। राजसूय-यज्ञ का अनुष्ठान करके वे सम्राट् कहलाये। हरिश्चन्द्र के पुत्र का नाम रोहित था। रोहित के हरित और हरित के पुत्र चञ्चु हुए। चञ्चु के पुत्र का नाम विजय था। वे सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के कारण विजय कहलाये। विजय के पुत्र राजा रुरुक हुए, जो धर्म और अर्थ के ज्ञाता थे। रुरुक के वृक, वृक के बाहु और बाहु के सगर हुए। वे गर अर्थात् विष के साथ प्रकट हुए थे, इसलिये उनका नाम सगर हुआ। उन्होंने भृगुवंशी और्वमुनि से आग्नेय अस्त्र प्राप्तकर तालजङ्घ और हैहय नामक क्षत्रियों को युद्ध में हराया और समूची पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। फिर शक, पह्लव तथा पारदों के धर्म का निराकरण किया।

मुनियों ने पूछा - सगर की उत्पत्ति गरके साथ कैसे हुई? उन्होंने क्रोध में आकर शक आदि महातेजस्वी क्षत्रियों के कुलोचित धर्मों का निराकरण क्यों किया? यह सब विस्तारपूर्वक सुनाइये।

लोमहर्षणजी ने कहा - राजा बाहु व्यसनी थे, अत: पहले हैहय नामक क्षत्रियों ने तालजङ्घों और शकों की सहायता से उनका राज्य छीन लिया। यवन, पारद, काम्बोज तथा पह्लव नाम के गणों भी हैहयों के लिये पराक्रम दिखाया। राज्य छीन जानेपर राजा बाहु दु:खी हो पत्नी के साथ वन में चले गये। वहीं उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। बाहु की पत्नी यादवी गर्भवती थीं। वे भी राजा का सहगमन करने को प्रस्तुत हो गयीं। उन्हें उनकी सौत ने पहले से ही जहर दे रखा था। उन्होंने वन में चिता बनायी और उस पर आरुढ़ हो पति की साथ भस्म हो जाने का विचार किया। भृगुवंशी और्व मुनि को उनकी दशा पर बड़ी दया आयी। उन्होंने रानी को चिता में जलने से रोक दिया। उन्हीं के आश्रम में वह गर्भ जहर के साथ ही प्रकट हुआ। वही महाराज सगर हुए। और्व ने बालक के जातकर्म आदि संस्कार किये, वेद-शास्त्र पढ़ाये तथा आग्नेय अस्त्र भी प्रदान किया, जो देवताओं के लिये भी दु:सह है। उसी से सगर ने हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश किया और लोक में बड़ी भारी कीर्ति पायी। तदनन्तर उन्होंने शक, यवन, काम्बोज, पारद तथा पह्लवगणों का सर्वनाश करने के लिए उद्योग किया। वीरवर महात्मा सगर की मार पड़ने पर वे सभी महर्षिवसिष्ठ की शरण में गये और उनके चरणों पर गिर पड़े। तब महातेजस्वी वसिष्ठ ने कुछ शर्त के साथ उन्हें अभय-दान दिया और राजा सगर को रोका। सगर ने अपनी प्रतिज्ञा तथा गुरु के वचन का विचार करके केवल उनके धर्म का निराकरण किया और उनके वेष बदल दिये। शकों के आधे मस्तक को मूँड़कर विदा कर दिया। यवनों और काम्बोजों का सारा सर मुँड़ा दिया। पारदों के सारे केश उड़ा दिये।

धर्मविजयी राजा सगर इस पृथ्वी को जीतकर अश्वमेध-यज्ञ की दीक्षा ली और अश्व को देश में विचारने के लिये छोड़ा। वह अश्व जब पूर्व-दक्षिण समुद्र के तटपर विचर रहा था, उस समय किसी ने उसको चुरा लिया और पृथ्वी के भीतर छिपा दिया। राजा ने अपने पुत्रों से उस प्रदेश को खुदवाया। महासागर की खुदाई होते समय उन्होंने वह आदिपुरुष भगवान् विष्णु को जो हरि, कृष्ण और प्रजापति नाम से भी प्रसिद्ध हैं, महर्षि कपिल के रूप में शयन करते देखा। जागने पर उनके नेत्रों के तेज से वे सभी जलकर भस्म हो गये। केवल चार ही बचे, जिनका नाम हैं- बर्हिकेतु, सुकेतु, धर्मरथ और पञ्चनद। ये ही राजा के वंश चलने वाले हुए। कपिलरूपधारी भगवान् नारायण ने उन्हें वरदान दिया कि 'राजा इक्ष्वाकु का वंश अक्षय होगा और इसकी कीर्ति कभी मिट नहीं सकती।' भगवान् ने समुद्र को सागर का पुत्र बना दिया और अन्त में उन्हें अक्षय स्वर्गवास के लिये भी आशीर्वाद दिया। उस समय समुद्र ने अर्घ्य लेकर महाराज सगर का वन्दन किया। सगर का पुत्र होने के कारण ही समुद्र का नाम सागर हुआ। उन्होंने अश्वमेध-यज्ञ के उस अश्व को पुन: समुद्र से प्राप्त किया और उसके द्वारा सौ अश्मेध-यज्ञ के अनुष्ठान पूर्ण किये। हमने सुना है, राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे।

मुनियों ने पूछा - साधुवर! सगर के साठ हजार पुत्र कैसे हुए। वे अत्यन्त बलवान् और वीर किस प्रकार हुए?

लोमहर्षणजी ने कहा - सगर की दो रानियाँ थीं, जो तपस्या करके अपने पाप दग्ध कर चुकी थीं। उनमें बड़ी रानी विदर्भ नरेश की कन्या थीं। उनका नाम केशिनी था। छोटी रानी का नाम महती था। वह अरिष्टनेमि की पुत्री तथा परम धर्मपरायणा थी। इस पृथ्वी पर उसके रूप की समता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। महर्षि और्व ने उन दोनों को इस प्रकार वरदान दिया-'एक रानी साठ हजार पुत्र प्राप्त करेगी और दूसरी को एक ही पुत्र होगा, किन्तु वह वंश चलाने वाला होगा। इन दो वरों में से जिसकी जिसे इच्छा हो, वह वही ले ले।' तब उनमें से एक ने साठ हजार पुत्रों का वरदान ग्रहण किया और दूसरी ने वंश चलाने वाले एक ही पुत्र को प्राप्त करना चाहा। मुनि ने 'तथास्तु' कहकर वरदान दे दिया; फिर एक रानी के राजा पञ्चजन हुए और दूसरी ने बीज से भरी हुई एक तूँबी उत्पन्न की। उसके भीतर तिल के बराबरसाठ हजार गर्भ थे। वे समयानुसार सुखपूर्वक बढ़ने लगे। राजा ने उन सब गर्भो को घीसे भरे हुए घड़ों में रखवा दिया और उनका पोषण करने के लिए प्रत्येक के पीछे एक-एक धाय नियुक्त कर दी। तत्पश्चात् क्रमशः दस महीनों में सगर की प्रसन्नता बढ़ानेवाले वे सभी कुमार उठ खड़े हुए। पञ्चजन ही राजा बनाये गये। पञ्चजन के पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे पञ्चजन उनके पुत्र दिलीप हुए, जो खट्वाङ्ग के नाम से भी प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने स्वर्ग से यहाँ आकर दो घड़ी के ही जीवन में अपनी बुद्धि तथा सत्य के प्रभाव से परमार्थ-साधन के द्वारा तीनों लोक जीत लिये। दिलीप के पुत्र महाराज भगीरथ हुए, जिन्होंने नदियों में श्रेष्ठ गङ्गाको स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारकर समुद्र तक पहुँचाया और उन्हें अपनी पुत्री बना लिया। भागीरथ की पुत्री होने के कारण ही गङ्गाको भागीरथ कहते हैं। भागीरथ के पुत्र राजा श्रतु हुए। श्रुत के पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। नाभाग के पुत्र अम्बरीष हुए, जो सिन्धुद्वीप के पिता थे। सिन्धुद्वीप के पुत्र आयुताजित् से महायशस्वी ऋतुपर्ण की उत्पत्ति हुई, जो द्यूतविद्या के रहस्य को जानते थे। राजा ऋतुपर्ण महाराज नल के सखा तथा बड़े बलवान् थे। ऋतुपर्ण के पूत्र महायशस्वी आर्तुपर्णि हुए। उनके पुत्र सुदास हुए, जो इन्द्र के मित्र थे। सुदास के पुत्र को सौदास बताया गया है; वे ही कल्मषापाद के नाम से विख्यात हुए तथा राजा मित्रसह भी उन्हीं का नाम था। कल्मषापाद के पुत्र सर्वकर्मा हुए, सर्वकर्मा के पुत्र अनरण्य थे। अनरण्य के दो पुत्र हुए-अनमित्र और रघु। अनमित्र के पुत्र राजा दुलिदुह थे। उनके पुत्र का नाम दिलीप हुआ, जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के प्रपितामह थे। दिलीप के पुत्र महाबाहु रघु हुए, जो अयोध्या के महाबली सम्राट् थे। रघु के अज और अजके पुत्र दशरथ हुए। दशरथ से महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम का प्रादुर्भाव हुआ। श्रीरामचन्द्रजी के पुत्र कुश के नाम से विख्यात हुए। कुश से अतिथि का जन्म हुआ, जो बड़े यशस्वी और धर्मात्मा थे। अतिथि के पुत्र महापराक्रमी निषध थे। निषध के नल और नल के नभ हुए। नभ के पुण्डरीक और पुण्डरीक के क्षेमधन्वा हुए। क्षेमधन्वा के पुत्र महाप्रतापी देवानीक थे। देवानीक से अहीनगु, अहीनगु से सुधन्वा, सुधन्वा से राजा शल, शल से धर्मात्मा उक्य, उक्य से वज्रनाभ और वज्रनाभ से नल का जन्म हुआ। मुनिवरो! पुराण में दो ही नल प्रसिद्ध हैं-एक तो चन्द्रवंशीय वीरसेन के पुत्र थे और दूसरे इक्ष्वाकुवंश के धुरंधर वीर थे। इक्ष्वाकुवंश के मुख्य-मुख्य पुरुषों के नाम बताये गये। ये सुर्यवंश के अत्यंत तेजस्वी राजा थे। अदितिनन्दन सूर्य की तथा प्रजाओं के पोषक श्राद्धदेव मनु की इस सृष्टि-परम्परा का पाठ करनेवाला मनुष्य संतानवान् होता और सूर्य का सायुज्य प्राप्त करता है।