ब्रह्म पुराण

16 - भगवान् सूर्यकी महिमा

मुनियों ने कहा - सुरश्रेष्ठ! अपने भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् भास्करों के उत्तम क्षेत्र का जो वर्णन किया है, वह सब हम लोगों ने सुना। अब यह बताइये कि उनकी भक्ति कैसे की जाती है और वे किस प्रकार प्रसन्न होते हैं? इस समय यही सब सुनने की हमारी इच्छा है।

ब्रहमाजी बोले - मनके द्वारा इष्टदेव के प्रति जो भावना होती है, उसे ही भक्ति और श्रद्धा कहते हैं। जो इष्टदेव की कथा सुनता, उसनके भक्तों की पूजा करता तथा अग्नि की उपासना में संलग्न रहता है वह सनातन भक्त है। जो इष्टदेव का चिन्तन करता, उन्हीं में मन लगाता, उन्हीं की पूजा में रत रहता तथा उन्हीं के लिये कर्म करता है, वह निश्चय ही सनातन भक्त है। जो इष्टदेव के लिये किये जाने वाले कर्मों का अनुमोदन करता, उनके भक्तों दोष नहीं देखता, अन्य देवता की निन्दा नहीं करता, सूर्य के व्रत रखता तथा चलते, फिरते, ठहरते, सोते, सूँघते और आँख खोलते-मीचते समय भगवान् भास्कर का स्मरण करता है, वह मनुष्य अधिक भक्त माना गया है। विज्ञ पुरुष को सदा ऐसी ही भक्ति करनी चाहिये। भक्ति,समाधि, स्तुति और मनसे जो नियम किया जाता और जो ब्राहमण को दान दिया जाता है, उसे देवता, मनुष्य और पितर- सभी ग्रहण करते हैं। पत्र, पुष्प, फल और जल- जो कुछ भी भक्तिपूर्वक अर्पण किया जाता है, उसे देवता ग्रहण करते हैं; परन्तु वे नास्तिकों की दी हुई वस्तु नहीं स्वीकार करते। नियम और आचार के साथ भावशुद्धि का भी उपयोग करना चाहिये। हृदय के भाव को शुद्ध रखते हुए जो कुछ किया जाता है, वह सब सफल होता है। भगवान् सूर्य के स्तवन, जप, उपहार-समर्पण, पूजन, उपवास (व्रत) और भजन से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। जो पृथ्वी पर मस्तक रखकर भगवान् सूर्य को नमस्कार करता है, वह तत्काल सब पापों छूट जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सूर्यदेव की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपों सहित पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। जो सूर्यदेव को अपने हृदय में धारण करके केवल आकाश की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा निश्चय ही सम्पूर्ण देवताओं की परिक्रमा हो जाती है।* जो षष्ठी या सप्तमी को एक समय भोजन करके नियम और व्रत का पालन करते हुए सूर्यदेव का भक्तिपूर्वक पूजन करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञ का फल मिलता। जो षष्ठी अथवा सप्तमी को दिन-रात उपवास करके भगवान् भास्कर का पूजन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

जब शुक्लपक्ष की सप्तमी को रविवार हो, उस दिन विजयासप्तमी होती है। उसमें दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला है। विजयासप्तमी को किया हुआ स्नान, दान, तप, होम और उपवास- सब कुछ बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाला है। जो मनुष्य रविवार के दिन श्रद्धा करते और महातेजस्वी सूर्यका यजन करते है, उन्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। जिनके समस्त धार्मिक कार्य सदा भगवान् सूर्यके उद्देश्य से होते हैं, उनके कुल में कोई दरिद्र अथवा रोगी नहीं होता। जो सफेद, लाल अथवा पीली मिट्टी से भगवान् सूर्य के मंदिर लीपता है, उसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। जो निराहार रहकर भाँति-भाँति के सुगन्धित पुष्पों द्वारा सूर्यदेव कापूजन करता है, उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। जो घी अथवा तिलके तेलसे दीपक जलाकर भगवान् सूर्य की पूजा करता है, वह कभी अंधा नहीं होता। दीप-दाप करनेवाला मनुष्य सदा ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित रहता है। जो सदा देव-मंदिरों, चौराहों और सड़कों पर दीप-दान करता हिया, वह रूपवान् तथा सौभाग्यशाली होता है। दीपकी शिखा सदा ऊपरकी ही ओर उठती है, उसकी गति कभी निचे की ओर नहीं होती। इसी प्रकार दीप-दान करनेवाला पुरुष भी दिव्य तेजसे प्रकाशित होता है। वह कभी तिर्यग्योनि में नहीं पड़ता। जलते हुए दीपक को न कभी चुराये, न नष्ट करे। दीपहर्ता मनुष्य बन्धन, नाश, क्रोध एवं तमोमय नरक को प्राप्त होता है। उदयकाल में प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देने से एक ही वर्ष में सिद्धि प्राप्त होती है। सूर्य के उदय से लेकर अस्ततक उनकी ओर मुँह करके खड़ा हो किसी मन्त्र अथवा स्तोत्र का जप करना आदित्यव्रत कहलाता है। यह बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाला है। सूर्योदय के समय श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर सब कुछ साङ्गोपाङ्ग दान करे। इससे सब पापों से छुटकारा मिल जाता है।१ अग्नि, जल, आकाश, पवित्र भूमि, प्रतिमा तथा पिण्डी (प्रतिमाकी वेदी)- में यत्नपूर्वक सूर्यदेवको अर्घ्य देना चाहिये।२ उत्तरायण अथवा दक्षिणायन में सूर्यदेव का विशेषरूप से पूजन करके मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार जो मानव प्रत्येक वेला में अथवा कुवेला में भी भक्तिपूर्वक श्रीसूर्यदेवका पूजन करता है, वह उन्हीं के लोक में प्रतिष्ठित होता है। जो तीर्थों में पवित्र हो भगवान् सूर्य को स्नान करने के लिए एकाग्रतापूर्वक जल भरकर लाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। छत्र, ध्वजा, चँदोवा आदि वस्तुएँ सूर्यदेव को श्रद्धापूर्वक समर्पित करके मनुष्य अभीष्ट गतिको प्राप्त होता है। मनुष्य जो-जो पदार्थ भगवान् सूर्य को भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, उसे वे लाखगुना करके उस पुरुषको देते हैं। भगवान् सूर्य की कृपा से मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। सूर्यदेव के एक दिन के पूजन से भी जो फल प्राप्त होता है, वह शस्त्रोक्त दक्षिणा से युक्त सैकड़ों यज्ञों के अनुष्ठान से भी नहीं मिलता।

मुनियों ने कहा - जगत्पते! भगवान् सूर्यका यह अद्भुत माहात्म्य हमने सुन लिया। अब पुन: हम जो कुछ पूछते हैं, उसे बतलाइये। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी- जो भी मोक्ष प्राप्त करना चाहे, उसे किस देवता का पूजन करना चाहिये? कैसे उसे अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होगी? किस उपाय से वह उत्तम मोक्षका भागी होगा तथा वह किस साधनका अनुष्ठान करे, जिससे स्वर्ग में जानेपर उसे पुन: नीचे न गिरना पड़े?

ब्रहमाजी बोले - द्विजवरो! भगवान् सूर्य उदय होते ही अपनी किरणों से संसार का अन्धकार दूर कर देते हैं। अत: उनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। वे आदि-अन्त से रहित, सनातन पुरुष एवं अविनाशी हैं तथा अपनी किरणों से प्रचण्ड रूप धारणकर तीनों लोकों को ताप देते हैं। सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरुप हैं। ये तपनेवालों में श्रेष्ठ, सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, साक्षी तथा पालक हैं। ये ही बारम्बार जीवों की सृष्टि और संहार करते हैं तथा ये ही अपनी किरणों से प्रकाशित होते, तपते और वर्षा करते हैं। ये धाता. विधाता, सम्पूर्ण भूतों के आदि कारण और सब जीवों को उत्पन्न करने वाले हैं। ये कभी क्षीण नहीं होते। इनका मण्डल सदा अक्षय बना रहता है। ये पितरों के भी पिता और देवताओं के भी देवता हैं। इनका स्थान ध्रुव माना गया है, जहाँ से फिर नीचे नहीं गिरना पड़ता। सृष्टि के समय सम्पूर्ण जगत् सूर्य से ही उत्पन्न होता है और प्रलय के समय अत्यन्त तेजस्वी भगवान् भास्कर में ही उसका लय होता है। असंख्य योगिजन अपने कलेवरका परित्याग करके वायुस्वरूप हो तेजोराशि भगवान् सूर्य में ही प्रवेश करते हैं। राजा जनक आदि गृहस्थ योगी, वालखिल्य आदि ब्रह्मवादी महर्षि, व्यास आदि वानप्रस्थ ऋषि तथा कितने ही संन्यासी योग का आश्रय ले सूर्यमण्डल में प्रवेश कर चुके हैं। व्यास पुत्र श्रीमान् शुकदेवजी भी योगधर्म प्राप्त करने के अनन्तर सूर्य की किरणों में पहुँचकर ही मोक्षपद में स्थित हुए। इसलिये आप सब लोग सदा भगवान् सूर्य की आराधना करें; क्योंकि वे सम्पूर्ण जगत् के माता, पिता और गुरु हैं।

अव्यक्त परमात्मा समस्त प्रजापतियों और नाना प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करके अपने को बारह रूपों में विभक्त करके आदित्यरूप से प्रकट होते हैं। इन्द्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भाग, विवस्वान्, विष्णु, अंशुमान्, वरुण और मित्र- इन बारह मूर्तियों द्वारा परमात्मा सूर्य ने सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है। भगवान् आदित्य की जो प्रथम मूर्ति है, उसका नाम इन्द्र है। वह देवराज के पदपर प्रतिष्ठित है। वह देवशत्रुओं का नाश करनेवाली मूर्ति है। भगवान् के दूसरे विग्रह का नाम धाता है, जो प्रजापति के पदपर स्थित हो नाना प्रकार के प्रजावर्ग की सृष्टि करते हैं। सूर्यदेव की तीसरी मूर्ति पर्जन्य के नाम से विख्यात है, जो बादलों में स्थित हो अपनी किरणों द्वारा वर्षा करती है। उनके चतुर्थ विग्रह को त्वष्टा कहते हैं। त्वष्टा सम्पूर्ण वनस्पतियों और ओषधियों में स्थित रहते हैं। उनकी पाँचवीं मूर्ति पूषा के नाम से प्रसिद्ध है, जो अन्न में स्थित हो सर्वदा प्रजाजनों की पुष्टि करती है। सुर्यकी जो छठी मूर्ति है, उसका नाम अर्यमा बताया गया है। वह वायु के सहारे सम्पूर्ण देवताओं में स्थित रहती है। भानु का साँतवा विग्रह भग के नाम से विख्यात है। वह ऐश्वर्य तथा देहधारियों के शरीर में स्थित होता है। सूर्यदेव की आठवीं मूर्ति विवस्वान् कहलाती है, वह अग्नि में स्थित हो जीवों के खाये हुए अन्न को पचाती है। उनकी नवीं मूर्ति विष्णु के नाम से विख्यात है, जो सदा देवशत्रुओं का नाश करने के लिए अवतार लेती है। सूर्य की दसवीं मूर्ति का नाम अंशुमान् है, जो वायु में प्रतिष्ठित होकर समस्त प्रजा को आनन्द प्रदान करती है। सूर्य का ग्यारहवाँ स्वरुप वरुण के नाम से प्रसिद्ध है, जो सदा जल में स्थित होकर प्रजा का पोषण करता है। भानु के बारहवें विग्रह का नाम मित्र है, जिसने सम्पूर्ण लोकों का हित करने के लिए चन्द्र नदी के तट पर स्थित होकर तपस्या की। परमात्मा सूर्यदेव ने इन बारह मूर्तियों के द्वारा सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है। इसलिये भक्त पुरुषों को उचित है कि वे भगवान् सूर्य में मैन लगाकर पूर्वोक्त बारह मूर्तियों में उनका ध्यान और नमस्कार करें। इस प्रकार मनुष्य बारह आदित्यों को नमस्कार करके उनके नामों का प्रतिदिन पाठ और श्रवण करने से सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

मुनियों ने पूछा - यदि ये सूर्य सनातन आदि देव हैं तो इन्होनें वर पाने की इच्छा से प्राकृत मनुष्यों की भाँति तपस्या क्यों की?

ब्रहमाजी बोले - ब्राह्मणो! यह सूर्य का परम गोपनीय रहस्य है। पूर्वकाल में मित्र देवताने महात्मा नारद को जो बात बतलायी थी, वही मैं तुम लोगों से कहता हूँ। एक समय की बात है, अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवाले महायोगी नारदजी मेरुगिरि के शिखर से गन्धमादन नामक पर्वत पर उतरे और सम्पूर्ण लोकों में विचरते हुए उस स्थान पर आये, जहाँ मित्र देवता तपस्या करते थे। उन्हें तपस्या में संलग्न देख नारदजी के मन में कौतूहल हुआ। वे सोचने लगे, 'जो अक्षय, अविकारी, व्यक्ताव्यक्तस्वरुप और सनातन पुरुष हैं, जिन महात्मा ने तीनों लोकों को धारण कर रखा है, जो सब देवताओं के पिता एवं परसों से भी पर हैं, वे किन देवताओं अथवा पितरों का यजन करते रहे हैं और करेंगे?' इस प्रकार मन-ही-मन विचार करके नारद जी मित्र देवता से बोले- ' भगवन्! अङ्गोपाङ्गों सम्पूर्ण वेदों एवं पुराणों में आपकी महिमा का गान किया जाता है। आप अजन्मा, सनातन, धाता तथा उत्तम अधिष्ठान हैं। बहुत, भविष्य और वर्तमान- सब कुछ आप में ही प्रतिष्ठित है। गृहस्थ आदि चारों आश्रम प्रतिदिन आपका ही यजन करते हैं। आप ही सबके पिता, माता और सनातन देवता हैं। फिर भी आप किस देवता अथवा पितर की आराधना करते हैं, यह हमारी समझ में नहीं आता।'

मित्र ने कहा - ब्रह्मन्! यह परम गोपनीय सनातन रहस्य कहने योग्य तो नहीं है; परन्तु आप भक्त है, इसलिये आपके सामने में उसका यथावत् वर्णन करता हूँ। वह जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त, अचल, ध्रुव, इन्द्रियरहित, इन्द्रियों के विषयों से रहित तथा सम्पूर्ण भूतों से पृथक् है, वही समस्त जीवों का अन्तरात्मा है; उसी को क्षेत्रज्ञ भी कहते हैं। वह तीनों गुणों से भिन्न पुरुष कहा गया है, उसी का नाम भगवान् हिरण्यगर्भ है। वह सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, शर्व (संहारकारी) और अक्षर (अविनाशी) माना गया है। उसने इस एकात्मक त्रिलोकी को अपने आत्मा के द्वारा धारण कर रखा है। वह स्वयं शरीर से रहित है, किन्तु समस्त शरीरों में निवास करता है। शरीर में रहते हुए भी वह उसके कर्मों से लिप्त नहीं होता। वह मेरा, तुम्हारा तथा अन्य जितने भी देहधारी हैं, उनका भी आत्मा है। सबका साक्षी है, कोई भी उसका ग्रहण नहीं कर सकता। वह सगुण, निर्गुण, विश्वरूप तथा ज्ञानगम्य माना गया है। उसके सब और मुख हैं तथा सब ओर कान हैं, वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।* सम्पूर्ण मस्तक उसके मस्तक, सम्पूर्ण भुजाएँ उसकी भुजा, सम्पूर्ण पैर उसके पैर, सम्पूर्ण नेत्र उसके नेत्र एवं सम्पूर्ण नासिकाएँ उसकी नासिका हैं। वह स्वेच्छाचारी है और अकेला ही सम्पूर्ण क्षेत्र में सुखपूर्वक विचरता है। यहाँ जितने शरीर हैं, वे सभी क्षेत्र कहलाते हैं। उन सबको वह योगात्मा जनता है, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है। अव्यक्त पुरमें शयन करता है, अत: उसे पुरुष कहते हैं। विश्व का अर्थ है बहुविध; वह परमात्मा सर्वत्र बतलाया जाता है, इसलिये बहुविधरूप होने के कारण वह विश्वरूप माना गया है। एकमात्र वही महान् और एकमात्र वही पुरुष कहलाता है; अत: वह एकमात्र सनातन परमात्मा ही महापुरुष नाम धारण करता है। वह परमात्मा स्वयं ही अपने-आप को सौ, हजार, लाख और करोड़ो रूपों में प्रकट कर लेता है। जैसे आकाश से गिरा हुआ जल भूमि के रसविशेष से दूसरे स्वाद का हो जाता है, उसी प्रकार गुणमय रस के समपर्क से वह परात्मा अनेक रूप प्रतीत होने लगता है। जैसे एक ही वायु समस्त शरीरों में पाँच रूपों में स्थित है, उसी प्रकार आत्मा की भी एकता और अनेकता मानी गयी है। जैसे अग्नि दूसरे स्थान की विशेषता से अन्य नाम धारण करती है, उसी प्रकार वह परमात्मा ब्रह्मा आदि के रूपों में भिन्न-भिन्न नाम धारण करता है। जैसे एक दीप हजारों दीपों को प्रकट करता है, वैसे ही वह एक ही परमात्मा हजारों रूपों को उत्पन्न करता है। संसार में जो चराचर भूत हैं, वे नित्य नहीं हैं; परन्तु वह परमात्मा अक्षय, अप्रमेय तथा सर्वव्यापी कहा जाता है। वह ब्रह्म सदसत्स्वरूप है। लोक में देवकार्य तथा पितृकार्य के अवसर पर उसी की पूजा होती है। उससे बढ़कर दूसरा कोई देवता या पितर नहीं है। उसका ज्ञान ओने आत्मा के द्वारा होता है। अत: मैं उसी सर्वात्मा का पूजन करता हूँ। देवर्षे! स्वर्ग में भी जो जीव उस परमेश्वर को नमस्कार करते हैं, वे उसी के द्वारा दिये हुए अभीष्ट गति कोति प्राप्त होते हैं। देवता और अपने-अपने आश्रमों में स्थित मनुष्य भक्तिपूर्वक सबके आदिभूत उस परमात्मा का पूजा करते हैं और वे उन्हें सद्रति प्रदान करते हैं। वे सर्वात्मा, सर्वगत और निर्गुण कहलाते हैं। मैं भगवान् सूर्य को ऐसा मानकर अपने ज्ञान के अनुसार उनका पूजन करता हूँ। नारदजी! यह गोपनीय उपदेश मैंने अपनी भक्ति के कारण आपको बतलाया है। आपने भी इस उत्तम रहस्य को भली-भाँति समझ लिया। देवता, मुनि और पुराण- सभी उस परमात्मा को वरदायक मानते हैं और इसी भाव से सब लोग भगवान् दिवाकर का पूजन करते हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं - इस प्रकार मित्र देवता ने पूर्वकाल में नारदजी को यह उपदेश दिया था। भानु के उपदेश को मैंने भी आपलोगों से कह सुनाया। जो सूर्य का भक्त न हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनाता और जो सुनता है, वह नि:संदेह भगवान् सूर्य में प्रवेश करता है। आरम्भ से ही इस कथा को सुनकर रोगी मनुष्य रोग से मुक्त हो जाता है और जिज्ञासु को उत्तम ज्ञान एवं अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है। मुनियो! जो इसका पाठ करता है, वह जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसे निश्चय ही प्राप्त कर लेता है।

* भावशुद्धि: प्रयोक्तव्या नियमाचारसंयुता। भावशुद्धया क्रियते यत्तत्सर्वं सफलं भवेत् ॥

स्तुतिजप्योप्हारेण पुज्यापि विवस्वत:। उपवासेन भक्त्या वै सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

प्रणिधाय शिरो भूम्यां नमस्कारं करोति य:। तत्क्षणात्सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशय: ॥

भक्तियुक्तो नरो योऽसौ रवे: कुर्यात्प्रदक्षिणाम्। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा ॥

सूर्य मनसि य: कृत्वा कुर्याद् व्योमप्रदक्षिणाम्। प्रदक्षिणीकृतास्तेन सर्वे देवा भवन्ति हि ॥

(२९। १७-२१)

१. अर्घ्येण सहितं चैव सर्वं साङ्गं प्रदापयेत्। उदये श्रद्धया युक्त: सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

(२१ । ४६)

२. अग्नौ तोयेऽन्तरिक्षे च शुचौ भूम्यां तथैव च। प्रतिमायां तथा पिण्डयां देवमर्घ्यं प्रयत्नत: ॥

(२१ । ४८)

* वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्येत कर्मभि:। ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंस्थिता: ॥

सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्य: केनचित् क्वचित्। सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानगम्यो ह्यसौ स्मृत:॥

सर्वत:पाणिपाडान्त: सर्वतोऽक्षिशिरोमुख:। सर्वत:श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

(३०। ६३-६५)