53 - श्रीरामतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! रामतीर्थ भ्रूर्णहत्याका नाश करनेवाला है। उसकी महिमाके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामके क्षत्रिय राजा हुए, जो सम्पूर्ण विश्व में विख्यात थे। वे इन्द्रकी ही भाँति बलवान्, बुद्धिमान् और शूरवीर थे तथा बलिकी भाँति अपने पिता-पितामहोंके राज्यका पालन करते थे। महाराज दशरथ के तीन रानियाँ थीं- कौसल्या, सुमित्रा और कैकयी। वे तीनों कुलीन, सौभाग्यशालिनी, रूपवती और सुलक्षणा थीं। राजा दशरथ जब अयोध्या के राजसिंहासनपर आसीन थे और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी उनके पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित थे, उस समय देशमें न रोग थे न मानसिक चिन्ताएँ। न तो अनावृष्टि होती थी और न अकालही पड़ता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अट्टहा शूद्रोंको और चारों आश्रमोंको भी पृथक्-पृथक् बड़ा सुख मिलता था। एक समय की बात है, देवताओं और दानवों में राज्य के लिए युद्ध छिड गया। न तो उसमें देवताओंकी जीत होती थी और न दैत्यों एवं दानवोंकी ही। वह युद्ध कई दिनोंतकलगातार चलता रहा। इसी बीच में आकाशवाणी हुई- 'राजा दशरथ जिनका पक्ष ग्रहण करेंगे, वे ही विजयी होंगे, दूसरे नहीं।' यह सुनकर देवता और दानव दोनों अपनी विजयके लिए राजा के पास चले। देवताओंकी औरसे वायु शीघ्र जा पहुँचे और राजा से बोले- 'महाराज! देव-दानव-संग्राममें आपको चलना चाहिये। वहाँ यह आकाशवाणी सुनायी दी है कि जिस ओर राजा दशरथ रहेंगे, उसी पक्षकी जीत होगी; अत: आप देवताओंका पक्ष ग्रहण कीजिये, जिससे देवता विजयी हों।'

वायुकी यह बात सुनकर राजा दशरथ ने कहा- 'वायुदेव! आप सुखपूर्वक पधारें। मैं अवश्य चलूँगा।´वायु के चले जाने पर दैत्यगण राजा के पास आये और बोले- 'भगवन् हमारी सहायता कीजिये। महाराज! विजयी आपपर ही अवलम्बित है, अत: आप दैत्यराज की सहायता करें।' राजा बोले- 'वायुदेव ने पहले मुझसे प्रार्थना की है और मैंने देवताओंकी सहायता करनेका वचनसे दिया है; अत: दैत्य और दानव लौट जाएँ।' राजा दशरथने वैसा ही किया। स्वर्गमें पहुँचकर उन्होंने दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके साथ लोहा लिया। उस समय नमुचिके भाईयोंने देवताओंक देखते-देखते तीखे बाण मारकर राजा के रथकी धुरी तोड़ डाली। राजा बड़े वेगसे युद्ध में लगे थे। उन्हें धुरी टूटनेका पता न लगा। नारद! उस युद्धमें रानी कैकयी भी राजा के पास ही बैठी थी। उसे रथ की अवस्था का पता लग गया, परन्तु उसने राजा को इस बात की सूचना नहीं दी। धुरी टूटी देख उसने उसकी जगह अपना हाथ ही लगा दिया। यह बड़ा अद्भुत कार्य था। रथियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथने कैकयीके हाथ से थाँमें हुए रथ के द्वारा दैत्योंऔर दानवों पर विजयी पायी, फिर देवताओंसे अनेक वर पाकर उनकी अनुमति ले वे पुन: अयोध्या लौट आये। आते समय मार्ग के बीच में जब महाराज दशरथ ने अपनी प्रिया कैकयीकी ओर दृष्टिपात किया, तब उसका वह साहसपूर्ण कार्य देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। नारद! इस कार्यसे प्रसन्न होकर राजा ने कैकयीको वर दिए। रानी कैकयी ने भी राजा की आज्ञा स्वीकार करके इस प्रकार कहा- 'महाराज! आपके दिए हुए ये वर आपके ही पास रहें [आवश्यकता पड़नेपर ले लूँगी] ।'*

राजा दशरथ पुरूस्कार में अनेक आभूषण देकर अपनी प्रिय कैकयीके साथ अपने नगर को गये। विजयी होनेसे वे बहुत प्रसन्न थे। तदनन्तर बहुत समयके बाद मुनीश्वर ऋष्यश्रृङ्ग की कृपा से देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिए राजा दशरथ के चार देवोपम पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकयीसे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भरत तथा सुमित्रासे लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए। वे सभी पुत्र बुद्धिमान्, प्रिय तथा राजा के आज्ञाकारी थे। एक बार महर्षि विश्वामित्र आये और उन्होंने यज्ञकी रक्षाके लिए राजा से राम और लक्ष्मणको माँगा। विश्वामित्र उनके महत्त्व को जानते थे।

राजा दशरथ बोले - मुने! इस बुढ़ापेमें किसी तरह दैवयोगसे मेरे ये बालक उत्पन्न हुए हैं, जो मेरे मन को आनन्द देनेवाले हैं। मैं अपना शरीर और यह राज्य दे दूँगा, किन्तु इन पुत्रोंको न दे सकूँगा।

उस समय वसिष्ठ ने राजा दशरथसे कहा- 'राजन्! रघुवंशियोंने किसीकी प्रार्थनाको ठुकराना नहीं सीखा है।' उनके यों कहनेपर राजा ने किसी तरह श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा- 'पुत्रो! तुम ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करो।' यों कहकर उन्होंने अपने दोनों पुत्र विश्वामित्रजी को सौंप दिए। राम और लक्ष्मण ने 'बहुत अच्छा' कहकर राजा दशरथ को नमस्कार किया और यज्ञ की रक्षाके लिए विश्वामित्रजी के साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिए। तब महर्षि विश्वामित्रने उन दोनों भाइयोंको महेश्वरी महाविद्या, धनुर्वेद, शस्त्रविद्या, अस्त्रविद्या, लोकविद्या, रथविद्या, गजविद्या, अश्वविद्या, गदाविद्या तथा मन्त्रद्वारा अस्त्रोंके आवाहन और विसर्जनकी शिक्षा दी। इस प्रकार सम्पूर्ण विद्याएँ प्राप्त कर श्रीराम और लक्ष्मण वनवासियोंका हित करनेके लिए वनमें ताड़काको मार डाला और हाथ में धनुष लेकर यज्ञ की रक्षा करनेलगे। तत्पश्चात् महायज्ञ पूर्ण होनेपर मुनिवर विश्वामित्र दोनों राजकुमारोंके साथ राजा जनकसे मिलने गये। वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने राजाओंकी मण्डलीमें अपने गुरुसे सीखी हुई होकर राजा जनकने अपनी अयोनिजा कन्या लक्ष्मीस्वरूपा सीताका श्रीरामके साथ विवाह कर दिया। इसी प्रकार लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नका विवाह भी राजा जनक के ही घर हुआ। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा दशरथ समस्त प्रजा और गुरुकी अनुमतिसे श्रीराम को राज्य देने लगे। उस समय मन्थरारुपी दुर्दैवसे प्रेरित होकर रानी कैकयी ईर्ष्यासे व्याकुल हो उठी। उसने श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न डाला और उन्हें वनवास भेजनेके लिए कहा। साथ ही उसने वाही राज्य भरतके लिए माँगा, परन्तु राजाने स्वीकार नहीं किया। पिता के सत्यकी रक्षाके लिए श्रीराम स्वयं ही घोर जङ्गलमें चले गये। सीता और लक्ष्मणने भी उन्हींका साथ दिया। श्रीरामने अपने सदुणोंके कारण सत्पुरुषों के शुद्ध हृदयमें घर बना लिया था। जब श्रीराम राज्यकी तृष्णासे रहित और वनवासके लिए दीक्षित हो लक्ष्मणऔर सीताके साथ चले गये, तब राम, लक्ष्मण और गुणशालिनी सीताका स्मरण करके महाराज को बड़ा दु:ख हुआ और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इधर श्रीराम चन्द्रजी चलते-चलते चित्रकूटमें आये। वहीँ उन्होंने तीन वर्ष व्यतीत किये। फिर वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर चलकर वे क्रमशः दण्डकारण्यमें पहुँचे, जो समस्त देशों में पवित्र और तीनों लोकों में विख्यात है। वह महान् वन दैत्योंसे सेवित होनेके कारण बड़ा भयंकर था। ऋषियोंने भयभीत होकर उसे छोड़ दिया था। श्रीरामने वहाँ दैत्यों और राक्षसोंको मारकर दण्डकवनको ऋषि-मुनियोंके रहनेयोग्य बना दिया। फिर पाँच योजनआगे जाकर वे धीरे-धीरे गौतमी के तटपर पहुँचे। भगवान् शिवकी जो पुञ्जीभूत एवं अनिर्वचनीय पराशक्ति है, वाही जलस्वरूपमैन्प्र्कत हुई गौतमी नदी है- ऐसा संत-महात्माओंका कथन है। गौतमी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लिए भी माननीय तथा वन्दनीय है।

श्रीराम बोले - अहो, गङ्गा का कैसा अद्भुत प्रभाव है! तीनों लोकों में इनकी कहीं उपमा नहीं है। हम धन्य हैं कि इन त्रिभुवनपावनी गङ्गाका दर्शन पा सके।

यों कहकर श्रीराम ने बड़े हर्षके साथ महादेवजी की स्थापना की और यत्नपूर्वक षोडशोपचारसे छत्तीस कलाओंवाले महादेव जी आवरणसहित पूजा करके हाथ जोड़ उनकी स्तुति करने लगे।

श्रीराम बोले - मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ। जिनकी असीम सत्ताका कहीं पार या अन्त नहीं है, उन सर्वज्ञ शिवको में प्रणाम करता हूँ। अविनाशी प्रभु रूद्रको नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ। लोकगुरु उमापतिको प्रणाम करता हूँ। दरिद्रताका विनाश करनेवाले शिवको नमस्कार करता हूँ। रोगोंका अपहरण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है, उन कल्याणमय शिवको नमस्कार करता हूँ। विश्वकी उत्पत्तिके बीजभूत भगवान् भवको प्रणाम करता हूँ। जगत्का पालन करनेवाले परमात्माको नमस्कार करता हूँ। संहारकारी रूद्रको बारंबार प्रणाम करता हूँ। पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ। नित्य, क्षर-अक्षरस्वरुप शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिनका स्वरुप चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान् त्रिलोकचन मैं मस्तक झुकाकर बारंबार नमस्कार करता हूँ। करुणा करनेवाले भगवान् शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय देनेवाले भगवान् भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हूँ। मनोवाञ्छित फलोंके दाता महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। भगवती उमा के स्वामी श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ। तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचन को प्रणाम करता हूँ। त्रिविध मूर्तिसे रहित सदा शिवको नमस्कार करता हूँ। पुण्यमय शिवको प्रणाम करता हूँ। सत्-असत् से पृथक् परमात्माको नमस्कार करता हूँ। पापोंका अपहरण करनेवाले भगवान् हरको प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके हित में लगे रहते हैं, उन भगवान् को नमस्कार करता हूँ। जो बहुत-से रूप धारण करता हैं, उन भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जो संसार के रक्षक तथा सत् और असत् के निर्माता हैं, उन्हें नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं, उन विश्वनाथको प्रणाम करता हूँ। हावी-कव्यस्वरुप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ। सम्पूर्ण लोकों का सर्वदा कल्याण करनेवाले जो भगवान् शिव आराधना करनेपर उत्तम गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय इष्टदेव को मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् सोमनाथको प्रणाम करता हूँ। जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके पराधीन रहते हैं, उन विजयशील उमानाथको में नमस्कार करता हूँ। विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। संसार के दु:ख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान् चन्द्रशेखरको मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ। जो स्तुति करने योग्य और मस्तकपर गङ्गाको धारण करनेवाले हैं, उन महेश्वरको नमस्कार करता हूँ। देवताओं में श्रेष्ठ उमापति को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि ईश्वर, इन्द्र आदि देवता तथा असुर भी जिनके चरण-कमलोंकी पूजा करते हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने पार्वतीजीके मुखसे निकलनेवाले वचनोंपर दृष्टिपात करनेके लिये मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं, उन भगवान् को प्रणाम करता हूँ। पञ्चामृत, चन्दन, उत्तम धूप, दीप, भाँति-भाँति के विचित्र पुष्प, मन्त्र तथा अन्न आदि समस्त उपचारोंसे पूजित भगवान् सोमको में नमस्कार करता हूँ।

तदनन्तर भगवान् शंकरने प्रकट होकर श्रीराम और लक्ष्मण से कहा-'तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो।'

श्रीराम बोले - सुरश्रेष्ठ! महेश्वर! जो लोग इस स्रोत के द्वारा भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाएँ। शम्भो! जिनके पितृ नरकके समुद्रमें डूबे हों, उनके वे पितर यहाँ पिण्ड आदि देनेसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें चले जाएँ। जन्मभर के कमाए हुए मानसिक, वाचिक और शारीरिक पाप यहाँ स्नान क्र्नेमात्रसे तत्काल नष्ट हो जाएँ। जो लोग यहाँ याचकों को भक्तिपूर्वक थोडा भी दान दें, वह सब अक्षय होकर दाताओं के लिए उत्तम फल दनेवाला हो।

यह सुनकर शंकरजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर श्रीरामचन्द्र की बातका अनुमोदन किया। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिवके अन्तर्धान हो जानेपर श्रीराम अपने अनुगामियोंके साथ धीरे-धीरे उस प्रदेश में गये, जहाँसे गोदावरी नदी प्रकट हुई हैं। तबसे वह तीर्थ श्रीरामतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जहाँ लक्ष्मणने स्नान और शंकरका पूजन किया, वह लक्ष्मणतीर्थ के नामसे प्रसिद्ध हुआ और जहाँ सीताने स्नानादि किया, वह सीतातीर्थ के नामसे कहलाया। सीतातीर्थ नाना प्रकारकी समस्त पापराशिको निर्मूल करनेमें समर्थ है। जिसके चरणोंसे त्रिभुवनपावनी गङ्गा प्रकट हुईं, उन्होंने ही जहाँ स्नान

 किया, उस तिर्थकी विशिष्टता के विषयमें क्या कहा जा सकता है। अत: श्रीरामतीर्थके समान कहीं कोई भी तीर्थ नहीं है।

* स तु मध्ये महाराजो मार्गे वीक्ष्य तदा प्रियाम्। कैकेय्या: कर्म तद् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गत:॥

ततस्तस्यै वरान् प्रादात्त्रींस्तु नारद सा अपि। अनुमान्य नृपप्रोक्तं कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥

त्वयि तिष्ठन्तु राजेन्द्र त्वया दत्ता वरा अमी॥