ब्रह्माजी कहते हैं - नारद! कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम नामक तीर्थ सब लोकों में प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। मैं उनके पापहारी स्वरुपका वर्णन करता हूँ, सुनो। विन्ध्यपर्वतके दक्षिणभाग में सहृय नामक महान् पर्वत है। उसीके शाखा-पर्वतोंसे गोदावरी और भीमरथी आदि नदियाँ निकली हैं। वहीं विरजतीर्थ और एकवीरा नदी भी है। उस पर्वत की महिमाका कोई वर्णन नहीं कर सकता। उसी सहृयगिरिके पावन प्रदेश में जो वृत्तान्त घटित हुआ था, वह गोपनीयसे भी गोपनीय हिया; साक्षात् वेद में उसका वर्णन है। उसे देवता, मुनि, पितर और असुर भी नहीं जानते। वाही गुह्य रहस्य आज मैं तुम्हारी प्रसन्नता के लिए प्रकट करता हूँ, वह श्रवणमात्र से सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाला है।
जो अव्यक्त एवं अक्षर परमात्मा है, उसे परम पुरुष जानना चाहिये। वाही जब प्रकृति से संयुक्त होता है, तब क्षय एवं अपर कहलाता है। पुरुष पहले निराकार से साकार रूप में प्रकट हुआ। फिर उससे जल की उत्पत्ति हुई। जल से पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। फिर जल और पुरुष से कमल प्रकट हुआ। उस कमलसे मेरी उत्पत्ति हुई। मुने! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- ये पाँच तत्व मुझसे पहले एक ही समय में प्रकट हुए थे। मैंने उत्पन्न होनेपर सबसे पहले इन्हीं को देखा और कोई स्थावर-जङ्गम भूत मेरे देखने में नहीं आये। उस समय वेद नहीं प्रकट हुए थे। दूसरी कोई वस्तु ही मैंने नहीं देखि। अधिक क्या कहूँ- जिनसे स्वयं मेरी उत्पत्ति हुई, उनको भी मैं न देख सका। उस समय मैं मौन बैठा था। इतने में ही उत्तम आकाशवाणी सुनायी दी- 'ब्रह्मन्! तुम स्थावर और जङ्गम जगत् की सृष्टि करो।' नारद! यह आकाशवाणी सुनकर मैंने कहा- 'कैसे सृष्टि करूँगा, कहाँ सृष्टि करूँगा और किस साधनसे इस जगत् की सृष्टि करूँगा?' आकाशवाणी ने पुन: उत्तर दिया- ब्रह्मन्! यज्ञ करो, इससे तुम्हें शक्ति प्राप्त होगी। यज्ञ ही विष्णु है- यह सनातन श्रुतिका कथन है। यज्ञ करनेवालों के लिए इस लोक और परलोक में कौन-सी वस्तु असाध्य है।' मैंने फिर पूछा- 'कहाँ और किस वस्तु से यज्ञ करूँ?' पुन: आकाशवाणी सुन पड़ी- 'कर्मभूमि में यज्ञेश्वर यज्ञपुरुष का यजन करो। स्वयं पुरुष ही तुम्हारे यज्ञके साधन होंगे। तुम उन्हींसे उनका यजन करो। यज्ञ, स्वाहा, स्वधा, मन्त्र, ब्राह्मण और हविष्य आदि सब कुछ श्रीहरि ही हैं। उन्हींसे सबकी प्राप्ति होती है।'
नारद! उस समय भागीरथी, नर्मदा, यमुना, तापी, सरस्वती, गौतमी, समुद्र, नद, सरोवर तथा अन्यान्य निर्मल सरिताएँ नहीं थीं। अत: मैंने पूछा- 'कर्मभूमि कहाँ है?' आकाशवाणी से उत्तर मिला- 'मेरुगिरि के दक्षिण हिमालय, विन्ध्य और सह्यसे भी दक्षिण जो प्रदेश हैं, उन्हें कर्मभूमि कहते हैं। वह सबके लिए सर्वदा कल्याणका उदय करनेवाली है।' यह सुनकर मैंने मेरुगिरिको त्याग दिया और सह्यगिरिके समीप आकार सोचने लगा- 'कहाँ ठहरुँ?' इतने में ही फिर आकाशवाणी हुई- 'इधर आओ। यहीं रहो और बैठकर यज्ञका संकल्प करो। संकल्प करनेके बाद सम्पूर्ण वेद प्रकट होंगे। फिर वे जो कुछ भी कहें, करो।'
तदनन्तर इतिहास, पुराण तथा अन्य जो भी वाङ्मय शास्त्र है, वह मेरे मुख में स्वत: आ गया और मुझे उसका स्मरण होने लगा। तत्काल ही सम्पूर्ण वेदार्थ भी मुझे ज्ञात हो गया। तब मैंने लोकविख्यात पुरुषसूक्तका स्मरण किया। वेदमें जो यज्ञकी सामग्री बताई गयी थी, उसके अनुसार ही मैंने उसकी कल्पना की। वेदोक्त प्रकार ही यज्ञपात्र भी कल्पित हुए। मैंने जहाँ पवित्रता और संयमपूर्वक बैठकर यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की, वह मेरे यज्ञका स्थान मेरे ही नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह ब्रह्मगिरि कहलाने लगा। ब्रह्मगिरीसे पूर्वकी ओर चौरासी हजार योजनतक मेरे यज्ञयका स्थान है। उस भूमि के मध्यभाग में वेदी थी तथा दक्षिणभाग में गार्हपत्य-अग्निकी स्थापना हुई। इसी प्रकार एक ओर आहवनीय अग्निकी प्रतिष्ठा की गयी। श्रुतिमें यह कहा है कि बिना पत्नीके यज्ञ सिद्ध नहीं होता, इसलिये मैंने शरीरके दो भाग किये। पूर्वार्द्धसे मेरी पत्नी प्रकट हुई, जो यज्ञसिद्धिके लिए सहधर्मिणी बनी। उत्तरार्द्ध मैं स्वयं पुरुषरूप में स्थित हुआ। श्रुति भी कहती है 'अर्द्धो जाया'- पत्नी आधा अङ्ग है। नारद! मैंने वसन्त-ऋतुको उत्तम घृत बनाया। ग्रीष्मसे ईंधन का काम लिया। शरद्-ऋतुको हविष्य बनाया। वर्षा को कुशके स्थान में रखा। सात छन्द सात परिधि हुए। कला, काष्ठा और निमेष- ये क्रमशः समिधा, पात्र और कुश माने गये। जो अनादि और अनन्त काल है, वही यूपके रूप में कल्पित हुआ। इसके बाद पशु बाँधनेके लिए रस्सीकी आवश्यकता हुई। सत्त्व आदि तीनों गुण ही रस्सीकी जगह काम आये, किन्तु उसमें बाँधने के लिए पशुका अभाव था। तब मैंने आकाशवाणी से कहा- 'बिना पशुके यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता।' उत्तर मिला- 'पुरुषसूक्तसे परमपुरुष की स्तुति करो।'
'बहुत अच्छा'- कहकर मैंने अपने जन्मदाता देवाधि जनार्दन का भक्तिपूर्वक पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा स्तवन किया। उस समय फिर आकाशवाणी हुई- 'ब्रह्मन्! तुम मुझे ही पशु बनाओ।' मैं समझ गया, ये मेरे जन्मदाता अविनाशी पुरुष हैं। मैंने त्रिगुणमयी डोरियोंसे कालयूप के पार्श्वभग में उन्हें बाँध दिया। सबसे पहले प्रकट हुए पुरुषरुपी पशुका, जो कुशोंपर विराजमान थे, प्रोक्षण किया। इसी समय पुरुष से ये सब वस्तुएँ प्रकट हुईं- उनके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राण से वायु, कान से दिशाएँ तथा मस्तक से समपूर्ण स्वर्गलोककी उत्पत्ति हुई। मनसे चन्द्रमा, नेत्रसे सूर्य, नाभिसे अन्तरिक्ष, दोनों जाँघोंसे वैश्य और चरणोंसे शुद्र तथा पृथ्वीका प्राकट्य हुआ। रोमकूपों से ऋषि और केशों से ओषधियाँ प्रकट हुईं। नखोंसे ग्रामीण तथा जंगली पशु हुए। पायु और उपस्थ से कृमि, कीट एवं पतङ्ग आदिका जन्म हुआ। इनके सिवा जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम तथा दृश्य-अदृश्य जगत् है, वह सब पुरुष से प्रकट हुआ। इसी समय भगवान् की दैवी वाणी ने पुन: मुझसे कहा- ब्रह्मन्! सब पूरा हो गया। मनोवाञ्चित सृष्टि उत्पन्न हुई। इस समय जितने पात्र हैं, उन सबकी अग्नि में आहुति कर दो। यूप, प्रणीता, कुश, ऋत्विक्, यज्ञ, स्त्रुवा, पुरुष और पाश- सबका विसर्जन कर दो।'
आकाशवाणी के इतना कहते ही मैंने क्रमशः गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीयाग्निमें हवन किया। प्रत्येक होम में विश्वकी उत्पत्ति के कारणभूत पुरुष का ध्यान किया। लोककर्त्ता जगन्नाथ भगवान् विष्णु शुक्लरूप धारण करके आहवनीयाग्निमें स्थित हुए, श्यामरूप से दक्षिणाग्नि में और पीतरूप से गार्हपत्याग्नि में स्थित हुए। उन सभी देशों में भगवान् विष्णुका नित्य निवास है। कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जहाँ विश्वयोनि भगवान् विष्णु न हों। उस यज्ञ में मन्त्रोंद्वारा मैंने प्रणीतापत्रका भी सम्पादन किया था। वह प्रणीताका जल ही प्रणीता नदी के रूप में परिणत हुआ। फिर कुशोंसे मार्जन करके प्रणीताका मैंने विसर्जन कर दिया। मार्जन करते समय जो प्रणीताके जलकी बूँदे इधर-उधर गिरीं, वे गुणवान् तीर्थोंके रूप में प्रकट हुईं। वे तीर्थ स्नान करनेसे यज्ञके फल देनेवाले हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णुने जिसे सदा सुशोभित किया है, वह गौतमी वैकुण्ठ धामपर पहुँचनेके लिए सीढियोंकी पंक्ति है। संमार्जन करने के बाद जहाँ कुश इस पृथ्वीपर गिरे थे, वह स्थान कुशतपर्ण नामक तीर्थ हुआ, जो बहुत पुण्यफल देनेवाला है। मैंने विन्ध्यपर्वत के उत्तर जहाँ यूप खड़ा किया था, वह स्थान भगवान् विष्णुका आश्रय बना तथा वह यूप अक्षयवटके रूप में परिणत हुआ। वह वृक्ष नित्य एवं कालस्वरूप है और स्मरण करनेमात्रसे यज्ञ का पुण्य देनेवाला है। मेरे यज्ञका मुख्य स्थापन यह दण्डकारण्य है। जब यज्ञ पूरा हुआ, तब मैंने भक्तिपूर्वक भगवाना विष्णुको प्रसन्न किया। जिन्हें वेद में विराट् कहते हैं, जिनसे मूर्तिमान् जगत्की उत्पत्ति हुई है तथा जिनसे मेरा जन्म हुआ है, उन देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करके मैंने उनका विसर्जन कर दिया।
नारद! मेरे देवयजनका स्थान चौबीस योजन है। आज भी वहाँ तीन कुण्ड हैं, जो यज्ञेश्वरस्वरुप हैं। तभी से वह स्थान मेरे देवयजन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वहाँ रहनेवाले जो कीड़े-मकोड़े आदि हैं, वे भी अन्त में मोक्ष के भागी होते हैं। दण्डकारण्य धर्म और मोक्ष का बीज बताया जाता है। विशेषत: वह प्रदेश, जिसे गौतमी गङ्गा ने स्पर्श किया है, अधिक पुण्यमय हो गया है। प्रणीता-संगम तथा कुश्तर्पण-तीर्थ में जो स्नान और दान आदि करते हैं, वे परमपद को प्राप्त होते हैं। उनके वृतान्तका स्मरण, पठन अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण भी मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। मुने! कुशतर्पणतीर्थ काशीसे भी उत्तम है। चराचर जगत् में इसके समान दूसरा कोई भी तीर्थ नहीं है। इसके स्मरणमात्र से ब्रह्महत्या आदि पापोंका नाश हो जाता है। नारद! यह तीर्थ इस पृथ्वी पर स्वर्गका द्वार बताया जाता है।
Summary of chapter 61 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
The sacred paurṇamāsī (full moon day) in the month of Jyeṣṭha (May–June) is extolled as the most auspicious festival day at the Puruṣottama kṣetra. The specific observances, worship procedures, and ritual baths prescribed for this day are described, and the extraordinary merit of performing them at this holy site is expounded.