ब्रह्माजी कहते हैं - नागतीर्थ के नाम से जो प्रसिद्ध क्षेत्र है, वह सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। वहाँ भगवान् नागेश्वर निवास करते हैं। उनके महात्म्यकी विस्तृत कथा भी सुनो। प्रतिष्ठान में चन्द्रवंशी राजा शूरसेन राज्य करते थे। वे समस्त गुणोंके सागर और बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी पत्नीके साथ पुत्र उत्पन्न होनेके लिए बड़े-बड़े यत्न किये। दीर्घकालके पश्चात् उन्हें एक पुत्र हुआ, किन्तु वह भयानक आकारवाला सर्प था। राजा ने उस पुत्रको बहुत छिपाकर रखा। किसीको इस बातका पता न लगा कि राजा का पुत्र सर्प है। अन्त:पुर अथवा बाहरका मनुष्य भी इस भेद से परिचित न हो सका। माता-पिता के सिवा धाय, अमात्य और पुरोहित भी यह बात नहीं जानते थे। उस भयंकर सर्पको देखकर पत्नीसहित राजा को प्रतिदिन बड़ा संताप होता था। वे सोचते, सर्परूप पुत्र की अपेक्षा तो पुत्रहीन रहना ही अच्छा है। वह था तो बहुत बड़ा सर्प, किंतु बातें मनुष्योंकी-सी करता था। उसने पिता से कहा- 'मेरे चूडाकरण, उपनयन तथा वेदाध्ययन-संस्कार कराइये। द्विज जबतक वेदका अध्ययन नहीं करता, तबतक शूद्रके समान रहता है।'
पुत्रकी यह बात सुनकर शूरसेन बहुत दु:खी हुए। उन्होंने किसी ब्राह्मणको बुलाकर उसके संस्कार आदि कराये। वेदाध्ययन समाप्त करके सर्पने अपने पितासे कहा- 'नृपश्रेष्ठ! मेरा विवाह कर दीजिये। मुझे स्त्री प्राप्त करनेकी इच्छा हो रही है। मेरा विश्वास है, ऐसा किये बिना आपका कोई भी कार्य सिद्ध न हो सकेगा। पुत्रका यह निश्चित जानकार राजा ने अमात्योंको बुलाया और उसके विवाहके लिए इस प्रकार कहा- 'मेरा पुत्र युवराज नागेश्वर सब गुणोंकी खान है। वह बुद्धिमान, शूर, दुर्जय तथा शत्रुओंको संताप देनेवाला है। उसका विवाह करना है। मैं बूढ़ा हुआ। अब पुत्रको राज्यका भार सौंपकर निश्चितन्त होना चाहता हूँ। आपलोग मेरे हित-साधनमें तत्पर हो उसके विवाहके लिए प्रयत्न करें।'
राजाकी बात सुनकर अमात्यगण हाथ जोड़कर बोले- 'महाराज! आपके पुत्र सब गुणों में श्रेष्ठ हैं और आप भी सर्वत्र विख्यात हैं। फिर आपके पुत्रका विवाह करनेके लिये क्या मन्त्रणा करनी है और किस बातकी चिंता।' अमात्योंके यों कहनेपर नृपश्रेष्ठ शूरसेन कुछ गम्भीर हो गये। वे उन अमात्योंको यह बताना नहीं चाहते थे कि मेरा बेटा सर्प है; तथा वे भी इस बात से अपरिचित ही रहे। राजाने फिर कहा- 'कौन कन्या गुणोंमें सबसे अधिक है तथा कौन राजा ऊँचे कुल में उत्पन्न, श्रीमान् और उत्तम गुणोंके आश्रय हैं?' राजाका यह कथन सुनकर अमात्योंमें से एक परम बुद्धिमान् पुरुष, जो महाराज के संकेतको समझनेवाले थे, उनका विचार जानकार बोले- 'महाराज! पूर्वदेश में विजय नामके एक राजा हैं। उनके पास घोड़े, हाथी और रत्नोंकी गिनती नहीं है। महाराज विजय के आठ पुत्र हैं, जो बड़े धुनर्धर हैं। उनकी बहिन भोगवती साक्षात् लक्ष्मीके समान है। राजन्! वह आपके पुत्रके लिये सुयोग्य पत्नी होगी।'
बूढ़े अमात्यकी बात सुनकर राजा ने उत्तर दिया- 'राजा विजयकी वह कन्या मेरे पुत्रके लिए कैसे प्राप्त हो सकती है, बताओ।'
बूढ़े अमात्यने कहा- 'महाराज! आपके मन में जो बात है, मैं उसे समझ गया। अब आप मुझे कार्य-सिद्धिके लिए जानेकी आज्ञा दें।' महाराजा शूरसेनने भूषण, वस्त्र तथा मधुर वाणी से बूढ़े मन्त्रीका सत्कार करके उन्होंने बहुत बड़ी सनके साथ भेजा। वे पूर्वदेश में जाकर महाराज विजयसे मिले और नाना प्रकारके वचनों तथा नीतिजनित उपायोंसे राजाको संतुष्ट किया। मन्त्रीने राजकुमारी भोगवती और युवराज नाग का विवाह तय करा दिया। राजा विजयने कन्या देना स्वीकार कर लिया। बूढ़े मन्त्री लौट आये और शूरसेनसे उन्होंने विवाह निश्चित होनेका सब वृत्तान्त सुना दिया। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत हो जानेपर वृद्ध मन्त्री अन्य सब सचिवोंको साथ लेकर सहसा राजा विजयके वहाँ पहुँचे और इस प्रकार बोले- 'राजन् महाराज शूरसेन के राजकुमार नाग बड़े ही बुद्धिमान् और गुणोंके समुद्र हैं। वे स्वयं यहाँ आना नहीं चाहते। क्षत्रियोंके विवाह अनेक पप्रकार से होते हैं। अत: यह विवाह शस्त्रों द्वारा हो जाय तो अच्छा है।'
वृद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर राजा विजयने उसे सत्य ही माना और भोगवतीका विवाह शस्त्रके साथ ही शास्त्र-विधिके अनुसार सम्पन्न हुआ। विवाहके पश्चात् महाराजने बड़े हर्षके साथ बहुत-सी गौएँ, सुवर्ण और अश्व आदि सामग्री दहेज में देकर कन्याको विदा किया। साथ ही अपने अमात्योंको भी भेजा। बूढ़े मन्त्री आदि सचिवोंने प्रतिष्ठानमें आकार महाराज शूरसेन को उनकी पुत्रवधू समर्पित कर दी। राजा विजयने जो विनयपूर्ण वचन कहे थे, उनको भी सुनाया और उनकी दी हुई दहेजकी सामग्री-विचित्र आभूषण, दासियाँ तथा वस्त्र आदि निवेदन किये। इन सब कार्योंका सम्पादन करके वे लोग कृतकृत्य हो गये। राजकुमारी भोगवतीके साथ जो विजयके अमात्य पधारे थे, उनका महाराज शूरसेन ने बड़े सम्मानके साथ स्वागत-सत्कार किया। जिसे सुनकर राजा विजयको प्रसन्नता हो, ऐसा बर्ताव करके सबको विदा किया। राजा विजय्की कन्या रूपवती थी। वह सुन्दरी सदा अपने सास-ससुरकी सेवा में संलग्न रहती थी। भोगवतीका पति अत्यन्त भीषण महानाग रत्नोंसे सुशोभित एकान्त गृहमें सुगन्धित पुष्पोंसे बिछी हुई सुखद शय्यापर आराम करता था। उसने अपने माता-पितासे बार-बार कहा- 'मेरी पत्नी राजकुमारी मेरे समीप क्यों नहीं आती?' पुत्रकी यह बात सुनकर उसकी माता ने धायसे कहा- 'तुम भोगवतीसे जाकर कहो, 'तुम्हारा पति एक सर्प है। देखो, इसपर क्या कहती है।' 'बहुत अच्छा' कहकर धाय भोगवतीके पास गयी और एकान्त में विनीत भाव से बोली- 'कल्याणी! मैं तुम्हारे पतिको जानती हूँ। वे देवता हैं। किन्तु यह बात किसीपर प्रकट न करना- वे मनुष्य नहीं, सर्पके रूप में हैं।' धायकी बात सुनकर भोगवतीने कहा- 'मनुष्य-कन्यको सामान्यत: मनुष्य ही पति मिला करता है; यदि देवजातिका पुरुष पतिरूपमें प्राप्त हो, तब तो क्या कहना। वह तो बड़े पुण्यसे मिलता है। धायने भोगवतीकी बात सर्पसे, उसकी माता से और महाराज शूरसेन से भी कही। भोगवतीने भी धायको बुलाकर कहा- 'तुम्हारा कल्याण हो, मुझे मेरे स्वामीका दर्शन तो कराओ।'
तब धायने उसे ले जाकर अत्यन्त भयानक सर्पका दर्शन कराया। वह सुगन्धित फूलोंसे आच्छादित पलंगपर विराजमान था। एकान्त गृहमें रत्नोंसे विभूषित भयानक सर्पके आकारमें बैठे हुए अपने स्वामी को देखकर भोगवतीने हाथ जोधकर कहा- 'मैं धन्य और अनुगृहित हूँ, जिसके पति देवता हैं। पति ही स्त्रिकी गति है।' यह सुनकर नागको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर कहा- 'सुन्दरी! में तुम्हारी भक्ति से संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हें क्या अभीष्ट वरदान दूँ? तुम्हारे अनुग्रहसे मेरी सम्पूर्ण स्मरणशक्ति जाग उठी है। मुझे पिनाकधारी देवाधिदेव भगवान् शंकरने शाप दिया है। शेषनागका पुत्र महाबलवान् नाग जो भगवान् शंकरके हाथका कङ्कण बना रहता है, वाही में तुम्हारा पति हूँ और तुम भी वही पूर्वजन्मकी मेरी पत्नी भोगवती हो। एक दिन भगवान् शंकर एकान्तमें पार्वतीजी के साथ बैठे थे। वहाँ पार्वतीजी ने एक बात कही, जिसे सुनकर भगवान् शिव ठठाकर हँस पड़े। उस समय मुझे भी हँसी आ गयी। इससे कुपित होकर भगवान ने मुझे यह शाप दिया- 'तू मनुष्य-योनिमें सर्परूपसे जन्म लेकर ज्ञानी होगा।' कल्याणी! यह शाप सुनकर तुमने और मैंने भी भगवान् को प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। तब उन्होंने कहा- 'जब तुम गौतमीके तटपर मेरा पूजन करोगे और मैं तुम्हारे अन्त:कारणमें ज्ञान का आधान करूँगा, उस समय तुम भोगवतीके प्रसादसे शापमुक्त हो जाओगे' इसीलिये मुझपर यह संकट आया है। तुम मुझे गौतमीके तटपर ले चलो और इम्रे साथ ही भगवान्की पूजा करो। इससे मेरा शाप छूट जायगा और हम दोनों पुन: भगवान् शिवका सांनिध्य प्राप्त करेंगे। कष्टमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंके लिए सदा भगवान् शिव की परम गति हैं।" पतिकी यह बात सुनकर भोगवती उन्हें साथ ले गौतमी-तटपर गयी और वहाँ गौतमीमें स्नान करके उसने शिवका पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवान् ने उस सर्प को दिव्य रूप प्रदान किया। तब वह अपने माता-पितासे पूछकर शिवलोकमें जानेको उद्यत हुआ। यह जानकार पिताने कहा- 'बेटा! तुम एक ही मेरे पुत्र और युवराज हो; इसलिये इस समस्त राज्यका पालन क्रो और बहुत-से पुत्र उत्पन्न करके मेरए स्वर्गगमनके पश्चात् शिवलोकमें जाओ।' पिताका यह कथन सुनकर नागराजने कहा- 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' फिर वे इच्छानुसार रूप धारण करके अपनी पत्नीके साथ रहने लगे। पिता, माता और पुत्रोंके साथ उन्होंने उस विशाल राज्यका उपभोग किया और जब पिता स्वर्गलोकमें चले गये, तब अपने पुत्रोंको राज्यपर बिठाकर वे पत्नी और अमात्य आदिके साथ शिवमें गये। तबसे वह तीर्थ नागतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ भोगवतीके द्वारा स्थापित भगवान् नागेश्वर निवास करते हैं। उस तीर्थ में किया हुआ स्नान और दान सब तीर्थों का फल देनेवाला है।
Summary of chapter 48 of the [[BOOK_TITLE]] is as follows:
Bhagavān Puruṣottama — Jagannātha, Lord of the Universe — is described in his divine form as established at Nīlāgiri. His physical characteristics, divine ornaments, and the arrangement of attendants and subsidiary deities around him are presented. The theological meaning of each attribute is expounded, and the Lord is affirmed as the supreme Puruṣa, Nārāyaṇa, Viṣṇu — the one who transcends yet pervades all creation.